Monday, March 8, 2010

क्या बिक गए तुम ?




देश की आधी आबादी की आवाज़ है...
आधा देश बुला रहा है...
अब बराबरी का हक दो...
मंगलवार को ये तमाम लाइनें तमाम न्यूज चैनलों के स्लग के रूप में दिखाई दे रही थीं। मामला था महिलाओं आरक्षण विधेयक से जुड़ा हुआ। दिन भर हंगामा चलता रहा। विपक्ष के कुछ नेताओं ने संसद में हंगामा किया। टीवी चैनलों की फुल स्क्रीन पर लिखा गया, संसद शर्मसार हुआ। नेताओं ने संसद की मर्यादा का नुकसान किया। ऐसा लगा कि नेताओं ने किसीकी हत्या कर दी हो। शाम को घर पहुंचते ही फिर से टीवी चालू किया। देश के नामी न्यूज चैनलों ने बड़े-बड़े नेताओं को बैठाकर अपनी टीआरपी बढ़ाने का माहौल बना लिया था। एक दूसरे का झगड़ा इनके लिए पैसा लाता है। हालांकि अब ये बात टीवी देखने वाले तमाम लोग जानते हैं। मैंने एक अंग्रेजी चैनल लगाया। देश में काफी नाम है इस चैनल का। अच्छी खासी व्यूअरशिप भी है। खबरों में हमेशा आगे रहने वाले इस चैनल की हरकतें मैं बेहद बारीकी से देख रहा था। महिला आरक्षण बिल लाने वाली कांग्रेस की नीयत पर सवाल उठाने के बजाए उस एक चैनल के अलावा देश के सभी बड़े चैनल विपक्ष को कोस रहे थे। मानो बिल का बहिष्कार करके उन्होने देश के साथ गद्दारी कर दी हो। अपनी राजनीति की दुकान चलाने की मजबूरी ने ही उन्हे बिल का विरोध करने पर मजबूर किया। जिन पार्टियों में महिला चेहरे नहीं हैं उनकी दुकानदारी इस बिल से प्रभावित हो सकती है। शायद यही वजह है कि विरोध के स्वर सुने गए। लेकिन चैनल के पत्रकार कबसे कांग्रेसी प्रवक्ता बन गए। बिल पर सार्थक बहस देखने के लिए मैंने तमाम चैनलों पर गौर किया। लेकिन कहीं भी सार्थकत नज़र नहीं आई। लालू यादव ने अगर अपना मत रखा तो चैनलों ने उसे गलत बता दिया। आखिर सही-गलत का फैसला करने के हक उन्हे किसने दिया। चैनलों का रवैया ऐसा था मानों कांग्रेस हाईकमान ने तमाम चैनलों में शेयर ले रखा हो। ऐसा लगा मानो विपक्ष के नेताओं को सिर्फ जलील करने के लिए बुलाया हो। मैं कांग्रेस या दूसरे दलों का विरोधी नहीं हूं। लेकिन अगर आपने किसी को चर्चा के लिए बुलाया होलतो उसे बोलने का मौका तो मिलना चाहिए। चैनलों में वक्त की कीमत भी समझ सकता हूं। लेकिन मेहमान से ज्यादा मेजबान का बोलना इसे खारिज कर देता है। मानो चैनलवाले कांग्रेस के खिलाफ कुछ सुनना ही नहीं चाहते। महिला बिल पास हो, सारा देश ये चाहता है लेकिन बिल पास होने से पहले मीडिया ने इतना बवाल क्यों किया। कौन देगा इसका जवाब। इसलिए क्योंकि आपके पास सैटेलाइट की ताकत है..या इसलिए क्योंकि आपके पास जनता का विश्वास है...आप खुद खुदा बन बैठे। लोकतंत्र में बोलने का हक हर किसी को है। तरीका गलत हो तो समर्थन हम भी नहीं करते। गंदी राजनीति की निंदा और विरोध हम भी करते हैं। लेकिन चौथे स्तंभ को किसी पार्टी का सरेआम साथ देना दुखद लगता है। मानो मीडिया बिक गई हो। संसद में हंगामा करने वाले नेता टीवी पर गुंड़ों के रूप में दिखाई दिए। लेकिन यही काम अगर कांग्रेस ने किया होता तो शायद वो वीर क्रांतिकारी कहलाते। कांग्रेसियों का विरोध भी सही हो जाता। कहीं कांग्रेस कार्यकर्ताओं पर लाठीचार्ज होता है तो खबरें ऐसी चलाई जाती हैं मानों भगत सिंह के साथियों पर अंग्रेजों ने लाठी चार्ज कर दिया है। कृपाशंकर सिंह और संजय निरूपम की बात सही लगती है लेकिन रविशंकर प्रसाद की दलील सुनी भी नहीं जाती। कौन सही है कौन गलत इसका फैसला जनता पर छोड़ना चाहिए। तराजू बराबर रखकर खबर बेची जाए, टीआरपी तब भी आती है। तरीके और भी हो सकते हैं। बिल सही है या गलत इसके लिए चर्चा तो होनी ही चाहिए। लेकिन पहले हर किसी की बात तो सुनी जाए।

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