Saturday, February 27, 2010

ना ईश्वर कहो ना अल्लाह...



चंदन काका के साइकिल रिक्शे पर स्कूल जाते थे। मास्टर जी कक्षा लेने से पहले प्रार्थना करवाते थे। मास्टर जी के अस्पष्ट शब्दों को हम अपने सुर में दोहराने की कोशिश करते थे। पंक्तियां कुछ ऐसी थीं...ईश्वर अल्लाह तेरो नाम, सबको सम्मति दे भगवान बचपन के मन ने मास्टर से जी इन पंक्तियों का मतलब पूछा तो उनका जवाब समझने के लिए मष्तिष्क के साथ जूझना पड़ा। लेकिन घर जाकर दादी मां से इसका अर्थ समझ में आया। दादी कभी स्कूल नहीं गई लेकिन इतना जरूर पढ़ा सकती थी कि हिंदू और मुसलमान दोनों की भगवान की बनाई हुई देन है। लेकिन जैसे ही दूसरे गांव का किसान अनाज के पैसे देने आया तो उसे चाय मिट्टी के बर्तन में दी गई। जबकि वही चाय हम कप में पी रहे थे। माजरा समझने के लिए मुझे सवाल पूछना ही था। जिस दादी ने कुछ देर पहले मुझे हिंदू-मुस्लिम एकता का ज्ञान दिया था थोड़ी ही देर में मैंने उसे ईश्वर की देन का अपमान करते हुए देखा। पता चला वो किसान मुसलमान है इसलिए उसे मिट्टी के बर्तन में चाय दी गई। उसकी गरीबी भी उसकी हालत की एक वजह थी। पिता जी मास्टर हैं। दूसरे बच्चों को पढ़ाते हैं। मेरी किताब में एक अध्याय फिर आया। मैंने पढ़ा भेदभाव नहीं करना चाहिए। मन में शंकाओं का कुतूहल उठा। पिताजी ने समझाया कि हम सब एक हैं इसलिए जात-पात के नाम पर भेदभाव नहीं करना चाहिए। मैंने इस पंक्ति को अपने मन में घर कर लिया। इस एकता की मिसाल बनाने के लिए मैं रामअधारे के बेटे के साथ खेलने गया। लेकिन घर आते ही पिताजी के हाथ में बेहये का डंडा मेरे इंतजार में था। मार तो पड़ी ही साथ में कड़कती ठंड में मुझे नहलाय़ा भी गया। जाहिर है आगे से मुझे रामअधारे के टोले के किसी भी बच्चे के साथ खेलने या बातचीत करने से मना कर दिया गया। तब मैंने इंसानी प्रवृत्ति का एक और उदाहरण देखा। मन ही मन सोच लिया कि जब मैं बड़ा होउंगा तब इन कुरीतियों के खिलाफ लड़ुंगा। क्योंकि अभी घर में बगावत करने पर सज़ा का हकदार हो जाउंगा इतनी समझ मुझमें थी। आज मैं बड़ा हो गया हूं। अच्छे-बुरे की समझ है। इंसान को चांद पर पहुंचे ज़माना हो चुका है। मंगल पर इंसानों की बस्ती बसने वाली है। इंसानों का क्लोन भी पुरानी बात हो गई है। लेकिन बचपन की कुछ बातें आज भी नहीं बदली हैं। धर्म और मजहब के नाम पर लड़ाई हो जातिवाद, इंसानों की बस्ती में ये आज भी उतने ही मजबूत हैं जितने कल थे। उदाहरण लीजिए मलेशिया का। लेखक मधुसूदन आनंद लिखते हैं अल्लाह या ईश्वर का शुक्र मनाइए कि आपका जन्म न तो मलयेशिया में हुआ और न ही आप वहाँ रहते हैं। अगर आप मुसलमान नहीं होते और गलती से भी अपने ईश्वर को अल्लाह के नाम से पुकारते तो आपकी खैर नहीं थी। कोई भी हिन्दू, सिख, ईसाई, जैन या अन्य गैरमुस्लिम आदमी किसी भी गैर इस्लामी संदर्भ और विमर्श में ईश्वर के लिए यदि अल्लाह शब्द लिखता या बोलता है तो उसे एक साल तक की सजा हो सकती है। मलयेशिया में 7 प्रतिशत आबादी भारतीय मूल के लोगों की है और वहाँ हिन्दू और सिख धर्मावलंबियों की अच्छी-खासी संख्या है। मलयेशिया में जो भाषाएँ बोली जाती हैं, उनमें चीनी, थाई और अँगरेजी भाषा के साथ-साथ पंजाबी का भी नाम आता है। बहुधर्मी और बहुभाषी समाज में भाषाएँ एक-दूसरे को प्रभावित करती हैं। जैसे हमारे यहाँ ईश्वर को रब, अल्लाह, ईश्वर, खुदा, राम, रहीम, गॉड आदि किसी भी नाम से पुकारा जा सकता है, वैसे ही पश्चिमी देशों में ही नहीं अरब देशों तक में चलन है। जो समाज अनीश्वरवादी रहे हैं, वहाँ भी इस तरह की कोई बंदिश नहीं है। लेकिन मलयेशिया में ईश्वर को या गॉड को या रब को अल्लाह कहने की मनाही है। मलयेशिया से ज्यादा मुसलमान पड़ोसी देश इंडोनेशिया में रहते हैं, लेकिन वहाँ किसी भी धर्म का आदमी अपने ईश्वर को अल्लाह के नाम से पुकार सकता है। और तो और मलयेशिया के बोर्नियो में रहने वाले ईसाई लोग अपने गॉड को अल्लाह के नाम से पुकार सकते हैं लेकिन मलयेशिया की मुख्यभूमि पर इसकी मनाही है। यही नहीं 'फतवा', 'इमाम', 'हाजी', 'शेख', 'मुफ्ती' और 'अल्लाह-ओ-अकबर' जैसे शब्द भी कोई गैर मुस्लिम लिख या बोल नहीं सकता। सब जानते हैं कि ईसाई और सिख धर्म में अल्लाह शब्द का ईश्वर के अर्थ में इस्तेमाल होता है। संत, कवियों और सूफियों ने यही सिखाया है कि ईश्वर एक है और उसे किसी भी नाम से पुकारा जा सकता है। गाँधीजी का तो भजन है : 'ईश्वर अल्लाह तेरे नाम, सबको सम्मति दे भगवान' इसलिए हम भारतीयों को जब यह पता चलता है कि मलयेशिया में हम ईश्वर को अल्लाह नहीं कह सकते तो हमें गहरा झटका लगता है। लेकिन मलयेशिया सरकार के अपने तर्क और कारण हैं। उसने इस तरह की बंदिशें इस डर से लगाई थीं ताकि दूसरे धर्मों के लोग और विशेषकर क्रिश्चियन लोग मुसलमानों का धर्म परिवर्तन न करा लें। अल्लाह और अन्य शब्दों को लेकर विवाद वर्षों पुराना है। 1980 के दशक में करीब दो दर्जन ऐसे शब्दों की सूची बनाकर सरकार ने हुक्मनामा जारी कर दिया था। है ईश्वर आखिरये कब तक चलता रहेगा।

Thursday, February 25, 2010

देखो होली आई रे...




चारों ओर रंग ही रंग हैं। जहां जाओ रंग भरे गुब्बारे आपका इंतजार कर रहे हैं। आप आगे बढ़े नहीं कि एक गुब्बारा हवाओं के साथ मुकाबला करता हुआ आप पर हमला कर देगा। आपके कपड़ों पर गुब्बारा अपना सारा गुबार निकाल देगा। गुब्बारे की रफ्तार लंका जाते समय हनुमान की रफ्तार से कम नहीं होगी। आपके कपड़ों का रंग खून से लथपथ सिपाही की तरह होगा और हालत भीगी हुई बिल्ली की तरह। अब होली रंगो से होती है, लेकिन होली के भी कई रंग हैं। मसलन आप गोरखपुर के किसी गांव में जाइए। दोपहर के 1 बजे के पहले पहुंचे तो स्वागत कीचड़ से होगा और देर से गए तो गंदे रंगों से साथ आपका शाही स्वागत हो सकता है। शहर की ओर आते हैं। दिल्ली या मुंबई में, होली के दो हफ्ते पहले से ही माहौल बना लिया जाता है। फटे-पिचके गुब्बारे दुकानों के कोनों से बाहर की सज्जा बन जाते हैं। फिर कुछ ही देर में गली के बदमाश लेकिन मां की नज़रों में लाल के हाथों में चले आते हैं। मां के काले-काले और गोरे-गोरे लाल उन गुब्बारों का सही इस्तेमाल राहगीरों पर करते हैं। उनका कलर कॉंबिनेशन भी गजब का होता। सफेद रंग की शर्ट पहने लोगों पर लाल रंग से भरे गुब्बारे से हमला किया जाता है। किसी ने हरे रंग के कपड़े पहने हैं तो उस पर नीले रंग का गुब्बारा फोड़ दिया जाता है। गलती से जवानी की दहलीज पर कदम रखती कोई कन्या रास्ते से गुजरी तो उस पर गुब्बारों का ऐसा हमला होता है जैसे किसानों के खेत में टिड्डियों ने हमला बोल दिया हो। लड़की की हालत हमले के बाद किसान जैसी हो जाती है। पलट कर इन शरारती लेकिन मां के प्यारे-प्य़ारे बच्चों को देखने की कोशिश करेंगे तो ये ऐसे अदृश्य होंगे जैसे हवा में ऑक्सीजन। रास्ता लेकर बनारस की ओर भी चलते हैं। य़हां होली का रंग कुछ खास होता है। पंचायत वाली पेड़ के नीचे 4-5 मोटे-मोटे लोग बाल्टी में हरे रंग का खुशबू भरा शरबत बनाते नज़र आएंगे। इस शरबत में दूध की भी एक खास भूमिका होती है। भोले बाबा की नगरी में ये अनोखा शरबत पीजिए और चले जाइए एक अनोखी दुनिया में जहां संसारिक और भौतिक चीजों से मोह भंग हो जाता है। प्रसाद की ताकत आपको सूर्यकिरणों की प्रबलता के साथ नज़र आने लगेगा। बनारस से मन ऊब चुका हो तो वृंदावन आ जाइए। कान्हा की नगरी में गोपियों की होली सबसे मजेदार होती है। बरसाने की लठ्ठमार होली आपने सुनी है। अब इसके रंग का जायका लीजिए। कुछ सुंदर तो कुछ प्राकृतिक रूप से असुंदर महिलाएं ताकत लगाकर या फिर प्यार से बरसाने के पुरुषों पर लाठी से प्रहार करती हैं। कोशिश रहती है कि ना लगे लेकिन अगर किसी पुरुष का चेहरा पहचान लिया जाए मसलन इसी ने किसी समय राह चलते छेड़खानी की थी तो लाठी का निशाना चूक सकता है। फिर होली और खून का रंग एक में मिल जाता है। होली नजदीक आते ही बरसाना में फूलों की होली भी खेली जाती है। अब भला फूलों से मार कौन नहीं खाना चाहता है। लेकिन धूल भरी होली से बचना हर कोई चाहता है। बरसानो में इसे फाग कहा जाता है। इस होली में आसमान धूल से भर जाता है। चारों ओर प्राकृतिक सुंदरता का रंग धूलमय हो जाता है। होली हमारे अगुवा भी खेलते हैं। अगुवा से मेरा मतलब है हमारे वो भाई जो कुछ दिनों पहले हमारे आगे हाथ जोड़कर आए थे। लेकिन हमारे हाथ जोड़ने पर भी हमारे पास नहीं आते। आम भाषा में इन्हे नेता शब्द से संबोधित किया जाता है। हां आपस में ये होली जरूर खेलते हैं। होली के रंगों में इनकी नीतियों का भी मिलन होता है। साथ ही एक दूसरे पर गुलाल लगाकर पांच साल बाद की मित्रता को घनिष्ठ करने की कवायद की जाती है। फिर चाहे दिल मिलें या मिलें, विचार मिलें या ना मिलें, गले जरूर मिलेंगे। इसे दिखावा कहकर इनके नाटक का अपमान हम नहीं करेंगे। लेकिन एक होली इससे भी खास है। ये होली आप देख तो नहीं सकते लेकिन इसके बारे में जान जरूर सकते हैं। कश्मीर घाटी में भी होली खेली जाती है। खाकी रंग पहने, कंधे पर BSF का तमगा लगाए हमारे जवान घाटियों और हिमालय़ की चोटियों पर होली खेलते हैं। यहां लाल रंग ज्यादा प्रचलित है। गुब्बारों की जगह गोलियां चलाई जाती हैं। होली में दिवाली का रंग भी दिखता है। चाहे इस पार से या उस पार से, तोप से निकले गोले धमाका करते हैं। इस होली में जब भी बर्फ पर लाल चादर बिछती है, कहीं ना कहीं मातम ज़रूर होता है फिर चाहे इस पार हो या उस पार हो। लेकिन यहां हम ये नहीं कहतेस, बुरा ना मानो होली है....

'लेक्चर मत दो'




पाकिस्तान क्या चाहता है ? भारत के साथ सारी दुनिया इस सवाल पर सर पटककर मर जाए लेकिन जवाब नहीं मिल सकता। आखिर ये जवाब इतना मुश्किल क्यों है ? जवाब भी हम जानते हैं। पाकिस्तान के हर बार बदले रंग को देखरक उसके मानसिक मिजाज का पता नहीं चल पा रहा है। कश्मीर को लेकर उसकी मांग को हम जानते हैं। आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई को लेकर दिया गया उसका बयान भी हम सुन चुके हैं। विदेश सचिव निरुपमा राव से बात करने आए पाकिस्तान के विदेश सचिव सलमान बशीर ने कहा कि आतंकवाद क्या होता है, हमें पता है इसलिए इस पर हमें लेक्चर न दिया जाए। उन्होंने कहा कि वार्ता को 26/11 अटैक से जोड़ना मुनासिब नहीं होगा। भारत को विवाद के मुख्य मुद्दे जम्मू-कश्मीर पर बात करनी चाहिए ताकि दक्षिण एशिया में शांति बहाल हो सके। पाकिस्तान को आतंकवाद की धुरी बताकर भारत बदनाम करता रहा है जबकि सचाई यह है कि पूरे इलाके में आतंकवादी समूह हैं और इनके स्लीपर सेल हैं। बशीर ने भारतीय वार्ताकारों को यह मेसेज भी देने की कोशिश की कि प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह दक्षिण एशिया में अमन का माहौल चाहते हैं, उनके अजेंडा को विदेश मंत्रालय के अधिकारी आगे बढ़ाएं। बशीर ने कहा कि हम आतंकवाद पर भारत के साथ सहयोग को तैयार हैं। हम चाहेंगे कि दोनों देश खुफिया जानकारियों का आदान प्रदान करें। उन्होंने दावा किया कि मैं खुद इस्लामाबाद में भारतीय उच्चायुक्त को आतंकवादी घटनाओं की गोपनीय जानकारियां देता रहा हूं। लेकिन क्या उन्होंने डेविड हेडली के बारे में भारत को जानकारी दी है, बशीर ने कहा कि गुरुवार को हुई वार्ता में पहली बार भारत की ओर से हेडली के बारे में पूछा गया है। मिस्टर हेडली अमेरिकी नागरिक हैं और मैं उनके बारे में मीडिया से ही जानता हूं। निरुपमा राव ने बशीर से कहा कि भारत ने पाकिस्तान से बातचीत के लिए गंभीर और सार्थक कदम उठाए हैं लेकिन आतंकवादी हरकतों से ये सब निरर्थक साबित हुए। वास्तव में 2004 से 2007 के दौरान जो भी विश्वास बहाल हुआ था, मुंबई हमले ने उसे खत्म कर दिया। हाल में पुणे में जो हमला हुआ, उसने एक बार फिर हमें याद दिलाया कि हमारे लोग अब भी आतंकवादी हमलों के शिकार हो रहे हैं। निरुपमा ने बशीर से कहा कि आतंकवाद से कोई बात नहीं बनती। पाकिस्तान की यह ड्यूटी बनती है कि वह अपनी धरती से आतंकवादी गुटों का सफाया करे और मुंबई हमले के दोषियों को सजा दे। पाकिस्तान में अब भी लश्कर और हिजबुल मुजाहिदीन जैसे संगठन सक्रिय हैं। वहां से भारत में हिंसा फैलाने की बातें होती हैं। पाकिस्तान इस पर रोक लगाए। बशीर को ध्यान दिलाया गया कि इन नेताओं ने हाल ही में किस तरह हिंसा भड़काने की बातें की हैं, इस पर बशीर ने कहा कि ऐसे सार्वजनिक भाषणों पर रोक लगाने का कानून हमारे यहां नहीं है। निरुपमा ने कहा कि दोनों देशों के बीच बातचीत आतंकवाद से मुक्त माहौल में ही हो सकती है। यदि पिछली वार्ताओं को आगे बढ़ाने की बात की जाती है तो जरूरी है कि आतंकवाद पर लगाम लगाने की कोशिश की जाए। इन बयानों कितना सच है और कितना झूठ ये बताने का ज़रूरत शायद नहीं है।

Tuesday, February 23, 2010

दीदी की रेल...पास या फेल ?




24 फरवरी जैसे-जैसे नजदीक आ रही है वैसे-वैसे दिल की धड़कने तेज हो रही हैं। सांसें अटकी हैं। डर लग रहा है कहीं नई दिल्ली रेलवे स्टेशन पर पटना जाने वाली उसी ट्रेन की सेकेंड क्लास टिकट खरीदने के लिए जेब से ज्यादा पैसे तो खर्च नहीं करने पड़ेंगे। मामा के घर कानपुर जाने से पहले 10 बार सोचने की नौबत तो नहीं आएगी। बड़े चाचा गोरखपुर में रहते हैं। कहीं उनके बुलावे पर बहाना तो नहीं बनाना पड़ेगा। जी हां रेल बजट आने वाला है। एक साल से घर का बजट आर्थिक मंदी ने बिगाड़ा है। घर के कुछ बर्तन संभाल के इकठ्ठा किए तो महंगाई ने उसे तितर-बितर कर दिया। शहर में रहने वालों को गांव के अनाज का सहारा था। लेकिन डर है कि कहीं रेलवे का बजट बिगड़ गया तो गांव जाने का हालत भी नहीं रहेगी। लालू यादव का रेलवे बजट लंदन के मैनेजमेंट वालों को भी भाया। लेकिन ममता बनर्जी का पिछला रेल बज़ट कुछ खास नहीं रहा भले ही
पिछले साल जुलाई में रेल मंत्री की अपनी दूसरी पारी के पहले बजट में ममता ने यात्री किराये और माल भाड़े में किसी तरह की बढ़ोतरी नहीं की थी। रेलवे के साथ दुखद यह है कि इससे पिछले साल रेल मंत्री लालू प्रसाद ने भी चुनावी साल की वजह से किरायों में बढ़ोतरी नहीं की थी। इसका नतीजा यह हुआ कि पिछले 2 साल से रेलवे के किराये बढ़ोतरी से हासिल होने वाले अडिशनल रेवेन्यू में किसी तरह का इजाफा नहीं हो पाया है। पिछले 2 साल में रेलवे से माल की आवाजाही और पैसेंजर्स ट्रैफिक में काफी बढ़ोतरी हुई है, पर 9 परसेंट की ऊंची महंगाई दर की वजह से इस अतिरिक्त मुनाफे का कुछ खास असर नहीं दिख पाया है। दिलचस्प ये है कि लालू प्रसाद या ममता बनर्जी को किसी ने आम आदमी पर 'मेहरबानी' दिखाने, धड़ल्ले से नई योजनाएं शुरू करने, अपने-अपने चुनावी क्षेत्रों में नई ट्रेनों की संख्या या फ्रीक्वेंसी बढ़ाने से जुड़े कदम उठाने से किसी ने रोका भी नहीं। ऐसे हालत में जाहिर है कि इस बार जब रेल बजट पेश किया जाएगा तो रेल मंत्री को कई तरह की चुनौतियों से दो-चार होना होगा।
पैसेंजर किराया और माल भाड़ा
रेलवे रोजाना 20 लाख टन माल और 1 करोड़ 80 लाख पैसेंजर्स ढोता है। रेलवे के रेवेन्यू का 70 परसेंट हिस्सा माल भाड़े और बाकी 30 परसेंट पैसेंजर्स किराये से आता है। 2009-10 के लिए पैसेंजर किराये से होने वाली आमदनी 25 हजार करोड़ रुपये रहने के आसार हैं, जो 2008-09 में 22 हजार 330 करोड़ रुपये थी। पर मौजूदा चलन को देखते हुए ममता बनर्जी शायद ही पैसेंजर्स किराये में कोई बढ़ोतरी करें। ऐसे में रेलवे का रेवेन्यू बढ़ाने के लिए रेल मंत्री के पास माले भाड़े में थोड़ी बढ़ोतरी करनी होगी। साल 2007-08 में रेलवे ने 794.21 मिलियन टन माल ढोया। उसके अगले साल यानी 2008-09 में इसमें करीब 7 परसेंट की बढ़ोतरी हुई और यह 850 मिलियन टन हो गया। कारोबारी साल 2009-10 में इसके 882 मिलियन टन का टारगेट रखा गया है। 2009-10 के लिए माल भाड़े से होने वाली आमदनी का लक्ष्य 59 हजार 59 करोड़ रुपये रखा गया है, जो 2008-09 में 54 हजार 293 करोड़ रुपये था। पिछले साल (2009-10) इकॉनमी के मंदी की गिरफ्त में होने की वजह से माल भाड़े में बढ़ोतरी नहीं की गई। पर इस बार हालात सुधरे हैं और माल भाड़े में बढ़ोतरी की जानी चाहिए। रेलवे के जरिये लौह अयस्क, कोयले और सीमेंट की आवाजाही बड़े पैमाने पर होती है। इनके लिए भाड़ा बढ़ाकर रेल मंत्री रेलवे का बटुआ कुछ भर सकती हैं। पर खाने के सामान, फर्टिलाइजर जैसी चीजों की बड़े पैमाने पर आवाजाही होने के बावजूद इनके भाड़े में बढ़ोतरी करना शायद ममता के लिए मुश्किल हो, क्योंकि वह अपने वोट बैंक को नाराज नहीं करना चाहेंगी।

रेलवे ट्रैक पर दबाव
ट्रैक रेलवे ट्रांसपोर्टेशन की रीढ़ हैं। लिहाजा इनकी मेंटिनेंस बेहद जरूरी है। कोई भी ट्रैक 700-800 ग्रॉस मिलियन टन (जीएमटी) ढुलाई के बाद मरम्मत मांगता है। पर ऐसा हो नहीं पा रहा है। जाहिर है इस बार रेल बजट में में नई ट्रेनों का ऐलान होगा और ट्रैक्स पर बोझ और बढ़ेगा। इसे डील करने की चुनौती ममता के सामने होगी।

प्राइवेट इनवेस्टमेंट पर निर्भरता
अब तक खांटी राजनीति करती रहीं और बिजनस सेंटिमेंट से काफी दूर रहीं ममता बनर्जी को लगता है यह समझ में आ गया है कि रेलवे के लिए फंड का इंतजाम पब्लिक-प्राइवेट पार्टनरशिप के जरिये किया जा सकता है। ऐसा माना जा रहा है कि इसी वजह से ममता ने कुछ बिजनस-फ्रेंडली चेहरों को अपने इर्दगिर्द रखना शुरू कर दिया है। इन्हीं में से एक अहम चेहरे हैं - फिक्की के सेक्रेटरी जनरल अमित मित्रा। रेलवे बोर्ड के एक अधिकारी ने बताया है कि साल 2020 तक रेलवे में करीब 14 लाख करोड़ रुपये के निवेश की दरकार होगी और रेलवे इसका करीब 64 परसेंट हिस्सा खुद जुटाएगा, जिसमें पीपीपी की बड़ी भूमिका होगी। पर बड़ी दिक्कत यह है कि लालफीताशाही की दिक्कतों को देखते हुए कॉरपोरेट सेक्टर अच्छी दिलचस्पी रेलवे में नहीं दिख रही।

लोडिंग की समस्या
रेलवे ने 11वीं योजना के अंत तक (31 मार्च 2012 तक) 1150 मिलियन टन फ्रेड वॉल्यूम का लक्ष्य रखा है। फ्रेड में 7 परसेंट की बढ़ोतरी को देखने हुए वैगन की कमी की चुनौती रेलवे के सामने होगी।
तो देखिए भैया 24 तारीख को क्या होता। मीठा खाएंगे या दांत चबाएंगे अब ये दीदी पर निर्भर है।

क्या बातचीत से मानेंगे ?




भारत आतंकवाद से प्रभावित है। आतंकवाद देश की सबसे बड़ी समस्या है। रक्षा बजट भी काफी बढ़ा है। देश के विकास में होने वाला खर्च रक्षा के मुकाबले खर्च होने वाली रकम से काफी कम है। विदेशी आतंकवाद से जख्मी भारत को मरहम तो मिल रहा लेकिन माओवाद का दर्द ज़रूर मिला है। पहले से ही घायल ही चिड़िया को जख्मों को कुरेदने की हालत हो गई है हमारी। बिहार, जारखंड, छत्तीसगढ़ और पश्चिम बंगाल को माओवादियों ने 'लाल' रंग से रंग दिया है। माओवादियों ने हजारों लोगों को बघर कर दिया। लेकिन गलती सिर्फ हाथ में बंदूक लेकर कानून तोड़ने वाले माओवादियों की ही नहीं है। आखिर इनके हाथ में बंदूक दी किसने। 'लाल'कुर्सी पर बैठे कछ सफेदपोश आकाओं की मेहरबानी है कि वो हाथ जो कभी खेतों में हल चलाते थे वो हाथों में बंदूक लेकर अपने ही निर्दोष भाईयों का खून बहाते हैं। मिदनापुर के खेतों का रंग हरा से लाल हो गया है। हाल ही में बंगाल के एक गांव में नक्सली हमले की खबर आई। पता चला कि हमले को अंजाम देने वाले 15 साल के कुछ बच्चे थे। जिनके हाथों में किताबें होनी चाहिए थीं वो हाथों में हथियार लेकर अपने साथियों की हत्या कर रहे थे। बच्चो बूढ़े और महिलाएं सभी हाथों में हथियार लेकर घूम रहे हैं। एक सच ये भी है कि नक्सलियों को मारने के बहाने प्रशासनिक कार्रवाई में कई निर्दोषों को सजा मिली। जुल्म इतने हुए कि हल छोड़कर हाथों ने हथियार थाम ही लिए। उन्हे मजबूर किया गया। शिक्षा का अभाव और जुल्म की टूटती सीमा पार करने के बाद शायद अंजाम यही होना था। पहले स्थित ऐसी बन गई कि रास्ता नहीं बचा और उसके बाद उनका अंत ही रास्ता बन गया। नक्सली भी खेल को समझ गए और फिर लड़ाई आर-पार की शुरू हो गई। लडाई का नतीजा हम रोज देख रहे हैं। खबर है कि नक्सलियों ने सीज़फायर का ऐलान किया है। गृहमंत्री ने कई बार नक्सलियों को हथियार रखकर बात करने का प्रस्ताव दिया है। वहीं माओवादियों की ओर से की गई संघर्ष विराम की सशर्त पेशकश पर सरकार ने कहा है कि कोई पूर्व शर्त स्वीकार नहीं करेगी और माओवादियों से कहा कि वे सामने आएं तथा बयान जारी कर हिंसा त्यागने की बात कहें। अब जब बात करने की नौबत आई है तो सरकार ने किसी भी शर्त को जंगलों में छोड़ आने की शर्त रख दी है। जिसने बंदूक उठाने पर मजबूर किया आज वो शर्त ना रखने की शर्त रख रहे हैं। अब शर्त भी सुनिए। माओवादियों ने संघर्ष विराम के लिए सरकार के सामने शर्त रखी है कि वह 72 दिन के लिए उनके खिलाफ अभियान बंद करे और बातचीत में मध्यस्थों को शामिल करे। आखिर बुरा क्या है अगर नक्सली इन 72 दिनों तक अपने हथियारों का मुंह बंद रखें। कमसेकम इन 72 दिनों तक किसी बेकसूर का खून तो नहीं बहेगा। ऑपरेशन ग्रीन हंट जबसे चलाया गया है तबसे नक्सली वारदातों में बढ़ोत्तरी हुई है। हम ये भी नहीं कहते कि नक्सलियों पर कार्रवाई ना हो। खून बहाने वाला हर शख्स अपराधी है। और उसे सज़ा मिलनी चाहिए। गृहमंत्री ने कहा है कि वो सीपीआई (माओवादी) की ओर से एक साधारण और संक्षिप्त सा बयान चाहते हैं जिसमें वो ये कहें कि हम हिंसा छोड़ देंगे और हम बातचीत के लिए तैयार हैं।' चिदंबरम ने कहा है कि वो चाहते हैं कि ये बयान गृह मंत्रालय के नंबर - 01।-23093155 पर फैक्स कर दिया जाए। चिदंबरम जी ने नक्सलियों को रास्ता तो दे दिया है। लेकिन रास्ते रोड़े उन्होने खत्म नहीं किए हैं। ज़रूरत है कि नक्सलियों को शिक्षा दी जाए। उन्हे समाज की मुख्यदारा के साथ जोड़ा जाए। क्योंकि भारत का संविधान हर नागरिक को समान जीवन जीने का अधिकार देता है। और इस अधिकार पर उनका भी हक है। अब इंतजार है नक्सलियों के अगले कदम का। साथ ही सवाल है कि क्या भारत ऑपरेशन ग्रीन हंट को कुछ दिन के लिए रोकेगा। और इंतजार करेगा नक्सलियों के सामने आने का। ताकि नक्सलपीड़ित इलाकों में ज़िंदगी को भय ना हो।

Thursday, February 18, 2010

ई है भोजपुरिया IPL




शाहरुख खान, शिल्पा शेट्टी और प्रीति जिंटा के बाद अब मशहूर भोजपुरी कलाकार मनोज तिवारी भी इंडियन प्रीमियर लीग से नाता जोड़ने की कवायद में हैं और इस सुपरहिट ट्वेंटी20 क्रिकेट लीग में भोजपुरिया इलेवन उतारने के सिलसिले में वह जल्दी ही आईपीएल कमिश्नर ललित मोदी से मिलेंगे। तिवारी ने हैदराबाद से से बातचीत में कहा, मेरा मानना है कि इतने बड़े टूर्नामेंट में एक टीम भोजपुरिया क्षेत्र की भी होनी चाहिए, जहां क्रिकेट इतना लोकप्रिय है और देखा जाए तो भारतीय कप्तान महेंद्र सिंह धोनी भी उस इलाके से ताल्लुक रखते हैं। उन्होंने कहा- हम 7 मार्च को दो टीमों के लिए लगने वाली बोली में ही हिस्सा लेना चाहते थे लेकिन लगता है कि देर हो गई। वैसे हम ललित मोदी से मिलेंगे और देखते हैं कि क्या हो सकता है। उनसे मिलने के बाद ही आगे की रणनीति तय की जाएगी। तिवारी ने कहा कि वह सुपरस्टार अमिताभ बच्चन को भी अपनी टीम से जोड़ना चाहते हैं। उन्होंने कहा- मेरा प्रयास होगा कि अमिताभ बच्चन जी भी इस प्रोजेक्ट से जुड़े क्योंकि भोजपुरी से उनका भी खासा लगाव है। अमिताभ ने दो भोजपुरी फिल्मों और गंगोत्री में तिवारी के साथ काम किया है। तिवारी ने कहा,हम टीम इंडिया के कप्तान महेंद्र सिंह धोनी को भोजपुरिया इलेवन का ब्रैंड ऐंबैसडर बनाना चाहते हैं। गौरतलब है कि रांची के रहने वाले धोनी आईपीएल में चेन्नै सुपर किंग्स के कप्तान हैं। तिवारी ने यह भी कहा कि वह टीम में अनिवार्य 4 विदेशी खिलाड़ी भी भारतीय मूल के रखने के पक्षधर हैं। उन्होंने कहा- हमने इस प्रोजेक्ट पर विस्तार से चर्चा की है। हमारी टीम में भी आईपीएल के नियमों के तहत विदेशी खिलाड़ी होंगे लेकिन वे भारतीय मूल के ही होंगे। विदेशों में जा बसे उत्तर प्रदेश और बिहार के लोगों से संपर्क करके उन्हीं में से प्रतिभावान क्रिकेटरों की खोज की जाएगी। टीम खरीदने पर होने वाले भारी खर्च के बारे में उन्होंने कहा कि पैसा कोई मसला नहीं है। उन्होंने कहा- हमारा मकसद भोजपुरी क्षेत्र और भाषा का प्रचार करना है। मैने अपनी हर फिल्म के पारिश्रमिक से दो लाख रुपये भोजपुरी इलाके में खेल और खिलाड़ियों पर खर्च करने का फैसला किया है। ये पैसा क्रिकेट पर ही नहीं बल्कि बाकी खेलों पर भी खर्च किया जाएगा। गौरतलब है कि आईपीएल की चकाचौंध से सिने सितारों के आकर्षित होने का यह नया मामला नहीं है। सुपरस्टार शाहरुख कोलकाता नाइट राइडर्स के मालिक हैं जबकि शिल्पा शेट्टी राजस्थान रायल्स और प्रीति जिंटा किंग्स इलेवन पंजाब की सह मालिक हैं। अक्षय कुमार दिल्ली डेयरडेविल्स के ब्रांड दूत रह चुके हैं तो कटरीना कैफ रॉयल चैलेंजर्स बेंगलुरु की। दक्षिण भारत के कई सितारे चेन्नै सुपर किंग्स के प्रचार का हिस्सा रहे हैं।
 

ये इंडिया है...




हिंदुस्तान आस्था प्रधान देश है। गीता यहीं लिखी गई है। गीता में लिखा है कि फल की चिंता किए बिना कर्म करो। लेकिन भारतीयों ने इस उपदेश को अपनी सहूलियत के हिसाब से बदल लिया है। कर्म को छोड़कर सारा ध्यान धर्म और आस्था पर है। खबर सुनिए उत्तरपूर्व भारत के शिलांग के एक स्कूल ने दिल्ली के एक पब्लिशर के खिलाफ जीसस क्राइस्ट की 'अभद्र' तस्वीर छापने के आरोप में एफआईआर दर्ज कराई है। आरोप में कहा गया है कि पब्लिशर ने अपनी राइटिंग टेक्स्ट बुक में जीसस को एक हाथ में सिगरेट और दूसरे हाथ में बियर कैन लिए दिखाया है। सेंट जोसेफ गर्ल्स हायर सेकंडरी स्कूल के अधिकारियों ने स्काईलाइन पब्लिकेशन पर यह आरोप लगाया है। इस पब्लिकेशन की राइटिंग टेक्स्ट बुक्स पहली से चौथी क्लास के बच्चों को दी जाती हैं। पुलिस ने ऐसी 30 टेक्स्ट बुक्स जब्त कर ली हैं। स्कूल अधिकारियों ने बच्चों से बाकी टेक्स्ट बुक्स लौटाने को कहा है। स्कूल ने फौरन बच्चों से राइटिंग बुक्स लौटाने को कहा। पहली क्लास के लिए बनाई गई राइटिंग बुक में आई (I)अक्षर के लिए IDOL शब्द का इस्तेमाल किया गया है। IDOL के साथ में जीसस की एक तस्वीर छापी गई है। इसी तस्वीर को लेकर स्कूल अधिकारी नाराज हैं। ऐसी ही तस्वीर दूसरी, तीसरी और चौथी क्लास की राइटिंग बुक्स में भी हैं।
                   ये मामला कितना गंभीर है और गंभीर है भी या नहीं इसका फैसला आप करिए। अब आस्था का एक दूसरा उदाहरण देखि कुछ अरसे पहले 'उदयीमान भारतीय समाज में शिक्षक' शीर्षक वाली किताब ने उत्तर प्रदेश के मुस्लिमों और राजनीतिक गलियारों में हलचल मचा दी। इस किताब में कथित तौर पर पैगंबर मोहम्मद की तस्वीर छपी थी। गौरतलब है कि इस्लाम धर्म में पैगंबर की तस्वीर छापना या मूर्ति बनाने की इजाजत बिल्कुल नहीं है। यह तस्वीर किताब के पेज संख्या 403 पर मौजूद 'मानव उत्थान के लिए विभिन्न धर्मों का योगदान' नाम के चैप्टर के तहत छपी। किताब के लेखक युवराज दत्त हैं, जो लखीमपुर खीरी पोस्ट ग्रैजुएट कॉलेज के पूर्व प्रोफेसर हैं। दत्त ने इस बाबत पूछे जाने पर बताया कि पैगंबर मोहम्मद की ढेर सारी तस्वीरें इंटरनेट पर मौजूद हैं और किताब में छपी तस्वीर वहीं से डाउनलोड की गई है। उत्तर प्रदेश उच्च शिक्षा निदेशक मिया जान ने भी कहा कि 'ये किताब कभी भी पाठ्यपुस्तक के तौर पर नहीं पेश की गई। और तो और जिला प्रशासन ने इस किताब के प्रकाशन और बिक्री पर प्रतिबंध लगा रखा है। ये तो हुआ दूसरा उदाहरण। घटनाएं गिनते जाएं तो दिन बीत जाए। खबर दिल्ली से पढ़िए। दिल्ली में इंटरनैशल ब्रैंड के आइसक्रीम आउटलेट हागेन डाज़ का पहला स्वाद ही दिल्लीवासियों का जायका बिगाड़ गया। पिछले दिनों हागेन डाज़ का राजधानी में पहला आउटलेट साउथ दिल्ली के एक मॉल में खुला लेकिन उसके प्रमोशन के लिए लगाए गए बैनरों से लोग काफी आहत हुए। बैनर पर लिखा था , एंट्री सिर्फ इंटरनैशनल पासपोर्ट धारकों और इंटरनैशनल ट्रैवलर्स को मिलेगी। इस मसले पर काफी तीखी प्रतिक्रिया आने के बाद भारत में इस ब्रैंड का मालिकाना हक रखने वाली कंपनी जनरल मिल्स इंडिया को माफी मांगनी पड़ी। 
कंपनी ने कहा कि ' हमारे रेस्तरां में किसी के भी आने पर रोक नहीं है। हागेज डाज़ के प्रॉडक्ट और रेस्तरां भारत में हर कंज़्यूमर के लिए उपलब्ध है और रहेगा। रेस्तरां के दरवाजे सबके लिए खुले हैं और किसी भी आधार पर किसी को भी प्रतिबिंधित करने का कोई सवाल ही नहीं है।' उन्होंने कहा कि जिन पोस्टरों को लेकर सवाल उठाए जा रहे हैं वे मॉल में हागेन डाज़ खुलने की सूचना देने के लिए लगाए गए थे। इसमें लिखे मेसेज का उद्देश्य यह बताना था कि आप इंटरनैशनल ब्रैंड की आइसक्रीम का मज़ा यहीं पर ले सकते हैं। मसलन - फ्रांस जाए बिना फ्रेंच रिवेरिया का स्वाद लिया जा सकता है। दुर्भाग्य से पोस्टर में लिखे ' इंटरनैशनल पासपोर्ट रखने वाले ' मेसेज को लेकर गलतफहमी फैल गई , जबकि हमारा ऐसा कोई इरादा नहीं था। हमारे मेसेज का गलत संदेश जाने से भारतीय होने के नाते कई लोगों की भावनाएं आहत हुई होंगी और इसके लिए हम माफी मांगते हैं।   आस्था कितनी आसानी से व्यथित हो जाती है इसका उदाहरण देखने को मिला सात समंदर पार अमेरिका में जहां फॉक्स न्यूज पर इसके ऐंकर ग्लेन बैक ने कहा कि गंगा का नाम ही भद्दा सा है और सुनने में बीमारी सा लगता है। उन्होंने यह बात अपने शो 'द वन थिंग' में कही है। इस पर अमेरिका, इंग्लैंड और अन्य देशों के हिन्दू संगठनों ने फॉक्स चैनल से माफी मांगने को कहा। अमेरिका में ही फास्ट फूड चेन कंपनी 'बर्गर किंग' ने स्पेन में प्रदर्शित धार्मिक आस्था पर चोट करने वाले विज्ञापन के लिए हिन्दुओं से माफी मांगी। 
बर्गर किंग ने इस विज्ञापन में लक्ष्मी जी को मांस से बने सैंडविच और अन्य खाद्य पदार्थो पर बैठे दिखाया था जिसके नीचे लिखा था स्नैक दैट इज़ सैक्रेड यानी कि पवित्र नाश्ता है।
गौरतलब है कि अमेरिका की ही एक शराब कंपनी ने बीयर की बोतल पर गणेश की तस्वीर छाप दी थी। दुनियाभर में हिन्दुओं के विरोध के चलते शराब कंपनी ने भी माफी मांगी और बीयर की बोतल से गणेश का चित्र हटा दिया।  मैंने आपको कुछ उदाहरण दिए। लेकिन इससे कहीं ज्यादा आपने अपने आस-पास देखा होगा। तो भइया आखिर में आप भी वहीं कहेंगे जो हम कहते हैं। ये इंडिया है....

जनानियों ! घाट पर साबुन मत लगाना




कोलायत की दीवारों पर कुछ इबारतें बिखरी पड़ी थीं,अजीब-ओ-गरीब विज्ञापनों की शक्ल में। एक दास्तान है, जो राजस्थान के बीकानेर से करीब 40 किलोमीटर इस जगह पर पसरी हुई है। इस दास्तान का नाम है श्रीकोलायत। यह एक छोटा सा कस्बा है, जहां कपिल मुनी का आश्रम हुआ करता था। अब यहां एक तीर्थ स्थल है। अजीब बात है कि हरियाणा के कैथल जिले में भी एक जगह है जहां कपिल मुनी का आश्रम हुआ करता था। अब वहां एक तीर्थ है। और इस जगह का नाम है - कलायत। कैसे ये दोनों जगहें एक जैसी बनीं, यह तो अभी मैं नहीं जान पाया, लेकिन श्रीकोलायत के उस तीर्थ पर बड़े क्रिएटिव विज्ञापन नजर आए। विवेक आसरी ने इन जगहों का मुआयना किया। संसार में रचनात्मकता का सबसे बड़ा उदाहरण यहा मिलेगा आपको। सृजन के बाद मनुष्य कितना दूरगामी हुआ,इसका पता हम अपने चारों ओर देखकर लगा सकते हैं। आवश्यकता आविष्कार की जननी बन गई और सब कुछ यहां तक पहुंच गया। महिलाओं ने भी घर के आंगन से कदम बाहर बढ़ाए और आसमान पर अपना नाम लिख दिया। मन नहीं भरा तो चांद पर भी कदम जमा दिए। ईश्वर की इस दुनिया में एक विचित्र स्वभाव है। इसे जलन या फिर द्वेष नाम भी दे सकते हैं। ईश्वर ने नर और नारी को बनाया। नरों ने आगे निकलने की दौड़ में सदा आगे रहने के लिए नारियों को बंधनों में बांध दिया। उदाहरण आपने भी कई देखे होंगे। धीरे-धीरे रिश्ता भेदभाव तक पहुंच गया। कलायत घाट इसका सबसे बेहतर उदाहरण है। इस घाट पर महिलाओं को नहाने की इजाजत नहीं है लेकिन पुरुष यहां भांग भी पिएं तो कोई बात नहीं। कभी आप जाएं तो इस घाट की शोभा देख सकते हैं। बस देखिए किसी से ये सवाल ना पूछ बैठिएगा कि आखिर आपको जन्म देने वाली महिलाओं को इस घाट पर आने से क्यों रोका गया है। नतीजा कुछ भी हो सकता है। क्योंकि भारत में आस्था कभी-कभी अंधविश्वास बन जाती है। और अंधा कुछ भी कर सकता है...

एक और QUIT !


Work hard Until Scceed ! दीवार पर लिखे ये वो शब्द हैं जो इशारा करते हैं कि बीटेक की छात्रा प्रगति सिंह के दिमाग में क्या चल रहा था। प्रगति मेहनत को करना चाहती थी लेकिन उम्मीदों का बढ़ता बोझ उसके रास्ते में रुकावट बन रहा था। गाज़ियाबाद के इस प्राइवेट हॉस्टल में अपनी रूम पार्टनर के साथ रहने वाली प्रगति ने इसी वजह से मौत को गले लगा लिया। प्रगति ग्रेटर नोएडा के विश्वेश्वर्य संस्थान से बीटेक कर रही थी। प्रगति गाज़ियाबाद के राजनगर इलाके के इसी हॉस्टल में रहती थी। पिछले कई दिनों से प्रगति बेहद परेशान थी। पुलिस को प्रगति के कमरे से एक सुसाइड नोट मिला है। मरने से पहले प्रगति ने अपने मन की बात कागज़ पर उतार दिए। प्रगति ने लिखा है..'हम पढ़ाई की वजह से डिप्रेशन में हूं। हम बीकॉम करना चाहते थे लेकिन हमारा परिवार चाहता था कि हम बीटेक करें। पढ़ाई को लेकर हम बहुत चिंतित हैं। जब कोई अपना काम पूरा मन लगा के करता है तो लोग उसे हमेशा गलत और बुरा क्यों कहते हैं। जब घर में भी हम अपना मन लगाके पढ़ना चाहते थे तो आप कहते थे कि हम अपने आप में ही रहते थे और घमंडी हैं। हम हमेशा दूसरों के लिए और अपने परिवार के लिए ही सोचते थे। अब हम हॉस्टल में आ गए हैं तो सोचते हैं कि अगर हम अच्छा नहीं करेंगे तो आप क्या सोचेंगे। हम हॉस्टल में अपना सारा ध्यान खो बैठे हैं। लेकिन हम उन लोगों की बात ना सुनकर केवल अपने मन की बात सुनते हैं।' सुसाइड नोट के बाद प्रगति की मौत की वजह का खुलासा हो गया। लेकिन परिवार की उम्मीदें पूरी करने के लिए प्रगति ने अपने सपनों को भुलाने की बहुत कोशिश की।  दिल और दिमाग की लड़ाई में प्रगति हार गई और खुद को मौत के हवाले कर दिया। आमिर खान की हालिय़ा फिल्म 3 ईडियट में भी पढाई के तनाव की वजह से होने वाली मौत को दिखाया गया है। देश भर में भी ऐसे कई मामले सामने आए हैं।  पढ़ाई का तनाव बढ़ते सुसाइड के मामलो की एक वजह बन गया है। ऐसे में ज़रूरत है कि मां-बाप अपने बच्चों की भावनाएं समझें। क्योंकि माता-पिता का सपोर्ट बच्चों के भावी भविष्य के लिए नींव का पत्थर साबित होता है। मैंने फिल्म देखी। विधू विनोद चोपड़ा ने एक अच्छी लेकिन ऐसी कहानी को चुना जो हमारे-आपके बेहद करीब है। एक लड़का जिसकी उम्मीदें टूट जाती हैं और वो ज़िंदगी से हार जाता है। ज़िंदगी असल ज़िंदगी में भी हारी है। मुंबई में पिछले दिनों कई वारदातें एक साथ हुईं। देश के सभी ब़ड़ों शहरों में ये हादसे आम हो गए हैं। शायद वजह हम जानते हैं। पैदा होते ही बच्चे को डॉक्टर और ईंजीनियर बनने के लिए मजबूर कर दिया जाता है। इससे पहले वो खुद को समझे उसके दिमाग ये भूत घर चुका है कि नंबर उसके 100 ही आने चाहिए वरना उसकी ज़िंदगी बेकार है। कागज़ों पर नंबर 100 बनाने के लिए वो ज़िंदगी के अहम दिन तनाव में बिता देता है। इसे देखकर क्या ये नहीं लगता कि बच्चों की मौत के लिए ज़िम्मेदार उनके मां-बाप ही हैं। मैं ये भी नहीं कहता कि बच्चों पर पढ़ने का दबाव ना हो। लेकिन पढ़ाई को बोझ बनाने के बजाए माता-पिता बच्चों को पढ़ने के लिए प्रेरित कर सकते हैं ना कि उनपर दबाव बनाकर उनकी जान के दुश्मन बन जाएं।
ज़िंदगी एक रेस है लेकिन इसे जीतने के लिए सिर्फ आंख बंद करके दौड़ने की ज़रूरत नहीं है। क्योंकि ये रेस थोड़ी अलग है। इसलिए दौड़ने के लिए रास्ता सही चुनें।

ऐश्वर्या को टीबी?




बॉलीवुड का शहंशाह दादा बनना चाहता है। जया बच्चन पोते को गोद में खिलाने का ख्वाब दिन में भी देख रही हैं। अभिषेक को चाहिए कोई पापा कहने वाला। खुद ऐश्वर्या भी चाहती हैं उनके घर में कोई ऐसा हो जिसके कपडों पर गिरी सॉस वो साफ करें। जिसका टिफिन बॉक्स तैयार कर उसे स्कूल भेजें। जिसकी शिकायत आने पर स्कूल के प्रिंसिपल से मिलने जाएं। पूरे बच्चन परिवार को चाहिए एक नया मेहमान। लेकिन 'जलसा' और 'प्रतीक्षा' में बच्चे की कलकारी कब गूंजेंगी, इसका जवाब ऐश्वर्य़ा और अभिषेक देने से इनकार करते रहे हैं।
अब इस खबर में एक नया ट्विस्ट आ गया है। पहले खबर थी कि ऐश्वर्या बीमार हैं। लेकिन ऐश्वर्या राय की बीमारी और मां न बन पाने की खबरों ने यू टर्न ले लिया है। बताया जा रहा है कि उन्हें पेट का टीबी है। इसके लिए ली जा रही दवाओं के कारण वो प्रेगनेंट नहीं हो पा रही हैं। बीमारी के दौरान प्रेग्नेंसी में खतरा बताया जा रहा है। इससे पहले सोशल नेटवर्किंग साइट ट्विटर पर पति अभिषेक बच्चन ने भी उनकी बीमारी की बात कही थी, लेकिन बीमारी के संबंध में किसी तरह का खुलासा नहीं किया था। फैन्स को इतना ही बताया था कि ऐश धीरे-धीरे ठीक हो रही हैं और जल्द ही फिल्मों में वापसी करेंगी। अपनी बात मजबूत करने के लिए उसी क्रम में अपनी नानी के जन्मदिन पर ऐश्वर्या के भोपाल जने की बात भी कही थी। उसके बाद ऐश और अभिषेक भोपाल भी गए। 37 साल की ऐश्वर्या ने कुछ समय पहले खुद भी मां बनने की मंशा जाहिर की थी। लेकिन उन्होंने भी अपनी बीमारी की बात छिपाए रखी। ऐश की बीमारी से बच्चन परिवार की चिंता बढ़ गई है। माना जा रहा है कि इसी कारण से कुछ समय पहले अमिताभ बच्चन ने अपने ब्लॉग पर अमीरों को टीबी (द रिच मैन्स टीबी) के बारे में कुछ लिखा था। हालांकि उन्होंने भी कुछ स्पष्ट नहीं किया था, लेकिन उस ब्लॉग को ऐश्वर्या की खबर से जोड़ कर देखने से उनकी नाराजगी साफ उभर आती है। परिवार ने हालांकि सब कुछ वक्त पर छोड़ दिया है, लेकिन कब का सवाल अब भी बना हुआ है। ऐश्वर्या की उम्र ढलती जा रही है। समय जितना गुजरेगा, मां बनने में उतनी ही परेशानी आ सकती है। इसीलिए परिवार को जल्द से जल्द वारिस चाहिए। लेकिन ऐश कब ठीक होंगी और कब वो बच्चन परिवार को वारिस देंगी। इस जवाब का इंतजार हमसे ज्यादा बच्चन परिवार को है।
http://navbharattimes.indiatimes.com/articleshow/5587538.cms

लेकिन ऐश ने इन खबरों को महज़ अफवाह बताया है। ऐश ने इस खबर का खंडन कर दिया है। ऐश ने कहा कि ये महज़ अफवाह है मैं इन दिनों अब्डॉमिनल टीबी से ग्रस्त हूं और
इसीलिए मैं मां नहीं बन सकती। खबर से तिलमिलाए अमिताभ बच्चन और अभिषेक का खंडन पहले ही आ गया था, लेकिन अब बच्चन बहू ने भी सामने आकर यह क्लियर किया है कि टीबी वाली बात सिरे से बेबुनियाद है। ऐश की शिकायत है कि उनसे बिना क्रॉस चेक किए बीमारी वाली बात लिख दी गई।

Wednesday, February 17, 2010

सबसे आगे हिंदुस्तानी



दुनिया भर में सबसे ज्यादा खूबसूरती है भारतीयों में। ये हम नहीं कह रहे क्य़ोंकि हम भारतीय हैं। बल्कि ये कहने लगी है सारी दुनिया। भारत महज खूबसूरती की मिसाल बन चुके ताजमहल का ही देश नहीं है, यहां के बाशिंदे भी दुनिया के सबसे
खूबसूरत लोगों में से एक हैं। जी हां, अभी हाल में ब्रिटेन में हुए एक ऑन लाइन पोल में हम हिंदुस्तानियों को टॉप टेन में आठवां नंबर मिला है। ये पोलिंग कराई थी www.OnePoll.com जिसमें अमेरिकनों को पहला नंबर मिला है। जाहिर है हॉलिवुड के हैंडसम जॉर्ज क्लूनी और ऐक्ट्रेस ऐंजिलीना जोली की नुमाइंदगी के बाद अमेरिका को फर्स्ट आना ही था। दूसरे नंबर पर आई ब्राजील की ब्यूटी। स्पेन हॉलिवुड में अपना नाम रोशन करने वाली पनेलपी क्रूज को देख खुशी से फूला नहीं समाता। स्पेन की इसी सुंदरता को 5 हजार ब्रिटेन वासियों ने तीसरे नंबर पर जगह दी। ऑस्ट्रेलिया का नाम आते ही हमें याद आती है सुनहरे बालों और सूरज की रोशनी में तपकर तांबे से रंग वाले सी सर्फर्स की। इन्हें नजर में रखकर ऑस्ट्रेलिया को मिला चौथा स्थान। स्वीडन की खूबसूरती उसके निवासियों की लचीली और आकर्षक काया में है। खुद इंग्लैंड को उसके नागरिकों ने सातवां स्थान दिया। अब आया नंबर बॉलिवुड ब्यूटीज वाले देश भारत का। ऐश्वर्या राय बच्चन, करीना कपूर और कैटरीना कैफ, शाहरुख, रितिक, आमिर और सलमान सरीखे सितारे भारत ही नहीं दुनिया भर के जवां दिलों पर राज करते हैं। इसलिए आठवें रैंक पर रहा अपना इंडिया। हैरानी की बात है कि हमेशा से खूबसूरती का कददान और नफासत पसंद रहा फ्रांस नौवें नंबर पर रहा। दसवें नंबर रहे कनाडाई। तो यकीन हुआ कि भारत की खूबसूरती का कोई जवाब नहीं। वहीं टॉप ट्वेंटी में पुर्तगाल, जापान और नीदरलैंड और जर्मनी को जगह मिली। इस ऑनलाइन पोल कराने वालों का कहना था कि अमेरिका खुद को सबसे सुंदर लोगों का देश मानता है। ब्रैड पिट, जेसिका अल्बा और जेनिफर एनिस्टन जैसे लाजवाब चेहरे मोहरे वाले लोगों ने अमेरिका की ऐसी इमेज बनाई है। लेकिन हमें यह भी याद रखना है कि अमेरिका में 30 करोड़ से ज्यादा लोग रहते हैं। इसलिए ज्यादा खूबसूरत लोग हमारे सामने आते हैं। लेकिन असल में देखा जाए तो स्वीडन, इटली, फ्रांस और ब्राजील जैसे देश ज्यादा स्वाभाविक सुंदरता में धनी हैं। भारत को अच्छे नंबर मिले हैं खूबसूरती के मामले में। इसलिए खुद को किसी से कम ना समझें।

क्या किया प्रोफेसर साहब ?


अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी यानि एएमयू में रिटायरमेंट की कगार पर पहुंच चुके एक प्रोफेसर को यूनिवर्सिटी मैनेजमेंट ने सस्पेंड कर दिया है। प्रफेसर को यूनिवर्सिटी कैंपस में उनके आवास में एक रिक्शा चालक के साथ सेक्स करते हुए कैमरे में रेकॉर्ड कर लिया गया था। इन कैमरों को कुछ छात्रों ने उनके आवास में लगाया था। छात्रों ने इस विडियो फिल्म को यूनिवर्सिटी मैनेजमेंट के पास भेज दिया था, जिसके बाद प्रफेसर को सस्पेंड कर दिया गया। डॉ. श्रीनिवास रामचंद्र सिरास नाम के ये प्रफेसर यूनिवर्सिटी के मॉडर्न इंडियन लैंग्वेज विभाग के अध्यक्ष और रीडर हैं। प्रोफेसर सिरास ने कहा है कि वह यूनिवर्सिटी मैनेजमेंट के इस फैसले का विरोध नहीं करेंगे और अपनी मर्जी से यूनिवर्सिटी की नौकरी छोड़ देंगे। प्रोफेसर सिरास के इस फैसले से एएमयू प्रशासन ने राहत की सांस ली है। एएमयू प्रशासन इस 'शर्मनाक एपिसोड' को खत्म करना चाहता है। लेकिन अगर सिरास ने यूनिवर्सिटी के इस फैसले को चैलेंज किया होता तो यूनिवर्सिटी कैंपस में गे राइट का मुद्दा उभर सकता था, जिसपर खासी बहस-मुबाहिसे की गुंजाइश हो सकती थी। चूंकि प्रोफेसर का कृत्य कहीं से भी कानून का उल्लंघन नहीं था। सहमति के साथ गे सेक्स खुद कोई अपराध नहीं है। एएमयू के जन संपर्क अधिकारी राहत अबरार ने कहा कि सिरास को रिक्शा चालक के साथ सेक्स करते हुए कैमरे पर पकड़ा गया था। इस तरह की गतिविधि को कोई भी सम्मानित संस्थान नज़रअंदाज नहीं कर सकता। यही वजह है कि 9 फरवरी को वीसी प्रोफेसर पी.के. अब्दुल अजीज के आदेश से प्रोफेसर सिरास को सस्पेंड कर दिया गया। डॉ. सिरास एएमयू कैंपस की मेडिकल कॉलोनी में दिए गए घर में रहते थे। 8 फरवरी को प्रोफेसर सिरास जमालपुर इलाके के एक नौजवान रिक्शा चालक के साथ घर पर ही थे। चूंकि घर का दरवाज़ा खुला था, इसलिए लोकल टीवी चैनल के दो रिपोर्टर घर में घुस आए और उन्होंने सब कुछ कैमरे पर रेकॉर्ड कर लिया। विडियो क्लिपिंग को एएमयू प्रबंधन के पास भेज दिया गया। एएमयू यूनिवर्सिटी कैंपस में इस घटना को लेकर खासी चर्चा है। इस सबके बीच सिरास चुपचाप कैंपस छोड़ने की तैयारी कर रहे हैं। प्रोफेसर साहब का कहना है 'उन्हें जो कहना है, कहने दो। मैं कोई सफाई नहीं दूंगा।' उन्होंने कहा, अगर आपको कोई गाली देता है तो यह जरूरी नहीं कि आप भी उन्हें गाली दें।

ओम जय जगदीश...


बचपन से भगवान की आरती हम गाते रहे। लेकिन कभी ये नहीं सोचा कि जिस आरती को गाकर हम अपने ईष्ट को मनाते हैं उसे लिखा कब गया। हिंदी मीडिया साइट पर मुझे ये जानकारी मिली।
सौजन्य-- http://hindimedia.in/index.php?option=com_content&task=view&id=1255&Itemid=54
इस देश के घर-घर और मंदिरों में जिसके शब्द बरसों से गूंज रहे हैं, दुनिया के किसी भी कोने में बसे किसी भी सनातनी हिंदू परिवार में ऐसा व्यक्ति खोजना मुश्किल है जिसके ह्रदय-पटल पर बचपन के संस्कारों में उसके लिखे शब्दों की छाप न पड़ी हो। उनके शब्द उत्तर भारत से लेकर दक्षिण भारत के हर घर और मंदिर मे पूरी श्रध्दा और भक्ति के साथ गाए जाते हैं। बच्चे से लेकर युवाओं को और कुछ याद रहे या न रहे इसके बोल इतने सहज, सरल और भावपूर्ण है कि एक दो बार सुनने मात्र से इसकी हर एक पंक्ति दिल और दिमाग में रच-बस जाती है। हम बात कर रहे हैं देश और दुनियाभर के करोड़ों हिन्दुओं के रग-रग में बसी ओम जय जगदीश की आरती की। हजारों साल पूर्व हुए हमारे ज्ञात-अज्ञात ऋषियों ने परमात्मा की प्रार्थना के लिए जो भी श्लोक और भक्ति गीत रचे, ओम जय जगदीश की आरती की भक्ति रस धारा ने उन सभी को अपने अंदर समाहित सा कर लिया है। यह एक आरती संस्कृत के हजारों श्लोकों, स्तोत्रों और मंत्रों का निचोड़ है। लेकिन इस अमर भक्ति-गीत और आरती के रचयिता पं. श्रध्दाराम शर्मा के बारे में कोई नहीं जानता और न किसी ने उनके बारे में जानने की कोशिश की। हमारे हजारों पाठकों ने हमारा ध्यान इस ओर आकर्षित किया कि हम ओम जय जगदीश की आरती के लेखक के बारे में कुछ बताएं। प्रस्तुत है इस अमर रचनाकार का जीवन परिचय। ओम जय जगदीश की आरती जैसे भावपूर्ण गीत के रचयिता थे पं. श्रध्दाराम शर्मा। प. श्रध्दाराम शर्मा का जन्म 1837 में पंजाब के लुधियाना के पास फुल्लौर में हुआ था। उनके पिता जयदयालु खुद एक अच्छे ज्योतिषी थे। उन्होंने अपने बेटे का भविष्य पढ़ लिया था और भविष्यवाणी की थी कि यह एक अद्भुत बालक होगा। बालक श्रध्दाराम को बचपन से ही धार्मिक संस्कार तो विरासत में ही मिले थे। उन्होंने बचपन में सात साल की उम्र तक गुरुमुखी में पढाई की। दस साल की उम्र में संस्कृत, हिन्दी, पर्शियन, ज्योतिष, और संस्कृत की पढाई शुरु की और कुछ ही वर्षो में वे इन सभी विषयों के निष्णात हो गए। पं. श्रध्दाराम ने पंजाबी (गुरूमुखी) में 'सिखों दे राज दी विथिया' और 'पंजाबी बातचीत' जैसी किताबें लिखकर मानो क्रांति ही कर दी। अपनी पहली ही किताब 'सिखों दे राज दी विथिया' से वे पंजाबी साहित्य के पितृपुरुष के रूप में प्रतिष्ठित हो गए। इस पुस्तक मे सिख धर्म की स्थापना और इसकी नीतियों के बारे में बहुत सारगर्भित रूप से बताया गया था। पुस्तक में तीन अध्याय है। इसके अंतिम अध्याय में पंजाब की संकृति, लोक परंपराओं, लोक संगीत आदि के बारे में विस्तृत जानकारी दी गई थी। अंग्रेज सरकार ने तब होने वाली आईसीएस (जिसका भारतीय नाम अब आईएएस हो गया है) परीक्षा के कोर्स में इस पुस्तक को शामिल किया था। 1870 में उन्होंने ओम जय जगदीश की आरती की रचना की। प. श्रध्दाराम की विद्वता, भारतीय धार्मिक विषयों पर उनकी वैज्ञानिक दृष्टि के लोग कायल हो गए थे। जगह-जगह पर उनको धार्मिक विषयों पर व्याख्यान देने के लिए आमंत्रित किया जाता था और तब हजारों की संख्या में लोग उनको सुनने आते थे। वे लोगों के बीच जब भी जाते अपनी लिखी ओम जय जगदीश की आरती गाकर सुनाते। उनकी आरती सुनकर तो मानो लोग बेसुध से हो जाते थे। आरती के बोल लोगों की जुबान पर ऐसे चढ़े कि आज कई पीढियाँ गुजर जाने के बाद भी उनके शब्दों का जादू कायम है। उन्होंने धार्मिक कथाओं और आख्यानों का उध्दरण देते हुए अंग्रेजी हुकुमत के खिलाफ जनजागरण का ऐसा वातावरण तैयार कर दिया कि अंग्रेजी सरकार की नींद उड़ गई। वे महाभारत का उल्लेख करते हुए ब्रिटिश सरकार को उखाड़ फेंकने का संदेश देते थे और लोगों में क्रांतिकारी विचार पैदा करते थे। 1865 में ब्रिटिश सरकार ने उनको फुल्लौरी से निष्कासित कर दिया और आसपास के गाँवों तक में उनके प्रवेश पर पाबंदी लगा दी गई। जबकि उनकी लिखी किताबें स्कूलों में पढ़ाई जाती रही। पं. श्रध्दाराम खुद ज्योतिष के अच्छे ज्ञाता थे और अमृतसर से लेकर लाहौर तक उनके चाहने वाले थे इसलिए इस निष्कासन का उन पर कोई असर नहीं हुआ, बल्कि उनकी लोकप्रियता और बढ गई। लोग उनकी बातें सुनने को और उनसे मिलने को उत्सुक रहने लगे। इसी दौरान उन्होंने हिन्दी में ज्योतिष पर कई किताबें भी लिखी। लेकिन एक इसाई पादरी फादर न्यूटन जो पं. श्रध्दाराम के क्रांतिकारी विचारों से बेहद प्रभावित थे, के हस्तक्षेप पर अंग्रेज सरकार को थोड़े ही दिनों में उनके निष्कासन का आदेश वापस लेना पड़ा। पं. श्रध्दाराम ने पादरी के कहने पर बाईबिल के कुछ अंशों का गुरुमुखी में अनुवाद किया था। पं. श्रध्दाराम ने अपने व्याख्यानों से लोगों में अंग्रेज सरकार के खिलाफ क्रांति की मशाल ही नहीं जलाई बल्कि साक्षरता के लिए भी ज़बर्दस्त काम किया। आज जिस पंजाब में सबसे ज्यादा कन्याओं की भ्रूण हत्याएं होती है इसका एहसास उन्होंने बहुत पहले कर लिया था। 1877 में भाग्यवती नामक एक उपन्यास प्रकाशित हुआ (जिसे हिन्दी का पहला उपन्यास माना जाता है), इस उपन्यास की पहली समीक्षा अप्रैल 1887 में हिन्दी की मासिक पत्रिका प्रदीप में प्रकाशित हुई थी। इसे पंजाब सहित देश के कई राज्यो के स्कूलों में कई सालों तक पढाया जाता रहा। इस उपन्यास में उन्होंने काशी के एक पंडित उमादत्त की बेटी भगवती के किरदार के माध्यम से बाल विवाह पर ज़बर्दस्त चोट की। इसी इस उपन्यास में उन्होंने भारतीय स्त्री की दशा और उसके अधिकारों को लेकर क्रांतिकारी विचार प्रस्तुत किए। पं. श्रध्दाराम के जीवन और उनके द्वारा लिखी गई पुस्तकों पर गुरू नानक विश्वविद्यालय के हिन्दी विभाग के डीन और विभागाध्य्क्ष श्री डॉ. हरमिंदर सिंह ने ज़बर्दस्त शोध कर तीन संस्करणों में श्रध्दाराम ग्रंथावली का प्रकाशन भी किया है। उनका मानना है कि पं. श्रध्दाराम का यह उपन्यास हिन्दी साहित्य का पहला उपन्यास है। लेकिन यह मात्र हिन्दी का ही पहला उपन्यास नहीं था बल्कि कई मायनों में यह पहला था। उनके उपन्यास की नायिका भाग्यवती पहली बेटी पैदा होने पर समाज के लोगों द्वार मजाक उडा़ए जाने पर अपने पति को कहती है कि किसी लड़के और लड़की में कोई फर्क नहीं है। उन्होने इस उपन्यास के जरिए बाल विवाह जैसी कुप्रथा पर ज़बर्दस्त चोट की। उन्होंने तब लड़कियों को पढाने की वकालात की जब लड़कियों को घर से बाहर तक नहीं निकलने दिया जाता था, परंपराओं, कुप्रथाओं और रुढियों पर चोट करते रहने के बावजूद वे लोगों के बीच लोकप्रिय बने रहे। जबकि वह ऐक ऐसा दौर था जब कोई व्यक्ति अंधविश्वासों और धार्मिक रुढियों के खिलाफ कुछ बोलता था तो पूरा समाज उसके खिलाफ हो जाता था। निश्चय ही उनके अंदर अपनी बात को कहने का साहस और उसे लोगों तक पहुँचाने की जबर्दस्त क्षमता थी। हिन्दी के जाने माने लेखक और साहित्यकार पं. रामचंद्र शुक्ल ने पं. श्रध्दाराम शर्मा और भारतेंदु हरिश्चंद्र को हिन्दी के पहले दो लेखकों में माना है। पं.श्रध्दाराम शर्मा हिन्दी के ही नहीं बल्कि पंजाबी के भी श्रेष्ठ साहित्यकारों में थे, लेकिन उनका मानना था कि हिन्दी के माध्यम इस देश के ज्यादा से ज्यादा लोगों तक अपनी बात पहुँचाई जा सकती है। पं. श्रध्दाराम का निधन 24 जून 1881 को लाहौर में हुआ।

और आखिर में वो आरती जिसकी बात हम यहां कर रहे हैं.....

ओम जय जगदीश, स्वामी जय जगदीश हरे
भक्त जनों के संकट, क्षण में दूर करे
जो ध्यावे फल पावे, दुःख बिनसे मन का
सुख-सम्पति घर आवे, कष्ट मिटे तन का

मात पिता तुम मेरे, शरण गहूँ मैं किसकी
तुम बिन और न दूजा, आस करूं मैं जिसकी

तुम पूरण परमात्मा, तुम अंतर्यामी
पारब्रह्म परमेश्वर, तुम सब के स्वामी

तुम करुणा के सागर, तुम पालनकर्ता
मैं सेवक तुम स्वामी, कृपा करो भर्ता

तुम हो एक अगोचर, सबके प्राणपति
किस विधि मिलूं दयामय, तुमको मैं कुमति

दीनबंधु दुःखहर्ता, तुम रक्षक मेरे.
करुणा हस्त बढ़ाओ, द्वार पडा तेरे

विषय विकार मिटाओ, पाप हरो देवा
श्रद्धा भक्ति बढ़ाओ, संतन की सेवा

ओम जय जगदीश, स्वामी जय जगदीश हरे

Tuesday, February 16, 2010

क्या हुआ आमिर को ? ऑल इज नॉट वेल




ऑल इज नॉट वेल....ये सिर्फ आमिर ने नहीं कहा, बल्कि अब ये सारा ज़माना कहने लगा है। हां ये ज़रूर है कि हमने ये आमिर से ही सीखा है। लेकिन गजनी अपनी ही बात भूल गया। क्यों गोल-गोल घुमाएं। चलिए मुद्दे पर आते हैं। लगता है कि बॉलिवुड के 'खान' आजकल कॉन्ट्रॉवर्सीज का खूब हिस्सा बन रहे है। मसलन ट्विटर पर महेश भट्ट का मैसेज। इसके अलावा किंग खान के बाद अब परफेक्शनिस्ट खान यानी आमिर खान अपने एक बयान के कारण विवादों से घिर गए हैं। इस बार खबर बी टाउन के दो हस्तियों के आपसी टकराहट की है। खबर के मुताबिक अब पंगा हुआ है आमिर और
बी टाउन के जाने माने गीतकार-राइटर जावेद अख्तर के बीच। कॉपीराइट कानून में प्रस्तावित संशोधन पर फिल्म जगत के कुछ वर्गों की ओर से आलोचना का सामना कर रही सरकार ने, मुद्दों की समीक्षा के लिए विशेषज्ञों की एक कमिटी गठित की थी। इसमें फिल्म ऐक्टर आमिर खान भी शामिल थे। मानव संसाधन विकास मंत्री कपिल सिब्बल ने फिल्म ऐक्टर आमिर खान, प्रड्यूसर मुकेश भट्ट, गीतकार जावेद अख्तर, पटकथा लेखक अंजुम, डायरेक्टर विशाल भारद्वाज सहित 10 विशेषज्ञों की एक कमिटी बनाई थी। हुआ हूं कि कपिल सिब्बल के साथ हुई बैठक में आमिर और जावेद अख्तर के बीच जमकर तू तू- मैं मैं हुई। अपने को सुपीरियर मानने वाले आमिर खान ने मंगलवार देर शाम अपना इस्तीफा एचआरडी मिनिस्ट्री को फैक्स कर दिया है। इस्तीफे में उन्होंने साफ जिक्र किया है कि वह इस तरह कड़वाहट भरे माहौल में उनके लिए काम करना संभव नहीं होगा। इसकी पुष्टि बॉलिवुड़ के अघोषित प्रवक्ता के रूप में विख्यात महेश भट्ट के ट्वीट से भी होती है। भट्ट साहब ने ट्विटर पर लिखा है कि यश चोपड़ा ने उन्हें फोन करके बताया है कि आमिर खान कपिल सिब्बल द्वारा कॉपीराइट मुद्दे को सुलझाने के लिए बनाई गई कमिटी से रिजाइन कर दिया है। अब हम आपको बताते है कि उस बैठक के दौरान ऐसा क्या हुआ कि आमिर का गुस्सा सातवें आसमान पर पहुंच गया और उन्होंने इस्तीफा देकर अपनी भड़ास निकाली। इस बैठक में लेखकों की अगुवाई कर रहे थे जावेद अख्तर और प्रड्यूसर्स की ओर से मौजूद थे आमिर खान। कपिल सिब्बल की एचआरडी मिनिस्ट्री की ओर से आयोजित फिल्म प्रड्यूसर्स, गीतकार और लेखकों की मीटिंग में आमिर का कहना था की एक गाना हिट होता है क्योंकि उसे एक बड़े स्टार पर फिल्माया जाता है। पर आमिर के इस बयान पर गीतकार जावेद अख्तर ने जवाब देते हुए कहा, 'आमिर आपका पहला हिट गाना था पापा कहते हैं क्या उस गाने ने आपको स्टार बनाया या फिर आपकी वजह से वो गाना इतना हिट हुआ। फिल्म की कमाई में लेखकों और गीतकारों की हिस्सेदारी के मुद्दे पर आयोजित इस बैठक में आमिर, अपनी बात पर अड़े रहे और उन्होंने कहा कि किसी गाने को हिट कराने में सबसे ज्यादा योगदान उस स्टार का होता है जिस पर वह गाना फिल्माया जाता है। आमिर खान के इस बयान पर अब जावेद अख्तर सीधे आमिर खान पर व्यक्तिगत हमला कर दिया। जावेद ने कहा 'आपका सबसे ज्यादा योगदान और कुछ नहीं बल्कि बस दखलअंदाजी होता है। हम लोग हर दम के लिए आपके शुक्रगुजार रहेंगे अगर आप इस तरह का योगदान अपने ही पास रखें। आप अगर योगदान ना करें तो हम ज्यादा अच्छा काम करते हैं न कि आपकी दखलंदाजी से काम अच्छा होता है।'पर आमिर भी कहां चुप बैठने वालों मे से हैं। उन्होंने जावेद अख्तर की बात का जवाब देते हुए कहा कि मुझे तो लगता है कि किसी फिल्म में किसी गीतकार से ज्यादा योगदान फिल्म की कहानी लिखने वाले का होता है। बस आमिर का यह कहना था कि जावेद अख्तर ने उनकी दुखती रग ही दबा दी। उन्होंने कहा कि तब तो चेतन भगत के लिए बहुत अच्छा है। गौरतलब है कि आमिर की थ्री इडियट्स को लेकर लेखक चेतन भगत ने स्टोरी क्रेडिट की मांग की थी। तो भइया ये है चोरी की कहानी। कौन चोर और कौन शाह ये भी बताने की ज़रूरत नहीं है। आप तो सबकुछ जानते हैं....

Monday, February 1, 2010

एक बंगला बने न्यारा...



साल 2010 आ चुका है। अगर आप बीते साल में मकान खरीदने के बारे में सिर्फ सोचते ही रह गए, तो इस साल आपका रिजॉल्यूशन मकान खरीदना ही होना चाहिए। नए साल में प्रॉपर्टी बाजार के हाल क्या रहेंगे, कौन-सी नई-पुरानी जगहें हॉट रहेंगी, टैक्स और हाउसिंग लोन आपका साथ देंगे या नहीं? तो जनाब मेट्रो और रीयल एस्टेट सेक्टर का पुराना रिश्ता गवाह है कि मेट्रो प्रॉपर्टी की कीमतों में उछाल का बड़ा कारण रही है। मेट्रो लाइन शुरू होने की बात तो दूर, इसकी सुगबुगाहट होते ही हलचल शुरू हो जाती है। साल की शुरुआत ही मेट्रो की नई लाइन से हुई है। कई और लाइनें भी इसी साल शुरू होनी हैं। इन सभी इलाकों में रियल एस्टेट की गतिविधियां तेज होने से इनकार नहीं किया जा सकता। मेट्रो के एनसीआर में पांव पसारते ही रियल एस्टेट की कदम-ताल और तेज हो सकती है। आनंद विहार लाइन शुरू होने और वैशाली तक मेट्रो पहुंचने से इंदिरापुरम रिवाइव कर सकता है। फरीदाबाद और गुड़गांव के करीब मेट्रो पहुंचने से वहां भी रियल एस्टेट मार्केट सुधरेगा। दरअसल, सारा खेल कनेक्टिविटी का ही है। चाहे दिल्ली के आसपास गाजियाबाद और गुड़गांव जैसे इलाके हों या जयपुर और हरिद्वार जैसे सुदूर स्थित शहर, जहां भी कम समय में पहुंचा जा सकता है, वहां डिवेलपर्स बेहद जल्दी पहुंच जाते हैं। एनसीआर के ज्यादातर इलाकों में यही हो रहा है। मेट्रो आने से इन जगहों की कनेक्टिविटी और बेहतर होती है, लिहाजा प्रॉपर्टी की कीमतें भी बढ़ने लगती हैं। चार जून 2008 को दिलशाद गार्डन लाइन की शुरुआत और उससे पहले काम की शुरुआत के समयांतर में आसपास के इलाकों की रेजिडेंशल प्रॉपर्टी की कीमतें करीब 25 फीसदी तक बढ़ीं, तो 31 दिसंबर 2005 को बाराखंभा-द्वारका लाइन शुरू होने के बाद द्वारका में रियल एस्टेट की किस्मत ही पलट गई। द्वारका के एक प्रॉपर्टी डीलर हर्ष चौधरी बताते हैं, 'यह लाइन शुरू होने के तीन महीने के अंदर ही 25 लाख वाले फ्लैट की कीमत बढ़कर 30 लाख रुपये हो गई थी। अब तो यह 50 लाख में ही मिल सकता है। कभी सिर्फ 25-30 पर्सेंट आबादी वाले पूर्वी दिल्ली के शास्त्री पार्क में भी ऐसा ही हुआ। यहां डीएमआरसी का आईटी पार्क बनने के बाद इस इलाके में कॉरपोरेट ऑफिसों की मांग में जबर्दस्त इजाफा हुआ। चार-पांच साल पहले तक यह क्षेत्र काफी 'डाउन मार्केट' समझा जाता था। प्रॉपर्टी सस्ती होने के बावजूद बड़ी कंपनियां यहां आने से कतराती थीं, लेकिन आज छह एकड़ जगह में बने इस आईटी पार्क में करीब 80 फीसदी हिस्सा एक ही एमएनसी ने ले लिया है। सबसे ताजा मामला है, आनंद विहार-वैशाली लाइन का। वैशाली आने की सिर्फ घोषणा होते ही सेक्टर 4 के आसपास के इलाके में प्रॉपर्टी की कीमतों में रातों-रात बढ़ोतरी दिखाई दी। पिछले साल सितंबर में इस लाइन को बढ़ाकर इंदिरापुरम तक ले जाने की घोषणा हुई, जो वसुंधरा से गुजरेगी। उन्हीं दिनों जीडीए के ड्रॉ से इंदिरापुरम में मकान हासिल करने वाली कमला शर्मा को एक लाख रुपये के उस फ्लैट की कीमत हाथों-हाथ दोगुनी ऑफर हो गई थी। 29 जनवरी से मेट्रो ने गुड़गांव में लगभग 7.5 किमी के हिस्से में ट्रायल शुरू कर दिया। इसके बाद अभी आनंद विहार और जल्दी ही वैशाली से सीधे गुड़गांव मेट्रो से ही जाना संभव होगा। जाहिर है, इसका असर भी गुड़गांव और साउथ दिल्ली के रियल एस्टेट मार्केट पर दिखाई देगा। मेट्रो के पहुंचने से अन्य किसी इलाके के मुकाबले गुड़गांव में ग्रोथ की ज्यादा संभावनाएं हैं। वहां अभी भी काफी जगह उपलब्ध है और यह एयरपोर्ट से सीधे जुड़ा है।