Saturday, December 30, 2017

दोस्तों के नाम नए साल का संदेश

दोस्तों आप सभी को आने वाला नया साल मुबारक हो। ईश्वर से प्रार्थना करूंगा कि आने वाले साल में आप सभी के घर में खुशियां आए आप सब अपने परिवार अपने समाज और अपने देश के लिए लड़ने की शक्ति हासिल करें और हर बुराई से एकजुट होकर लड़ें। सोशल मीडिया पर 4 साल के मेरे इस सफर में 50 हजार से ज्यादा दोस्तों का प्यार मिला है। आप लोगों के साथ अब तक की यात्रा बेहद दिलचस्प रही। आप सभी दोस्तों में हर विचार धारा के प्रतिनिधि शामिल हैं। मेरी हर उस खबर जो आपको अच्छी ना लगी हो या जिससे आपकी भावनाएं आहत हुई, उस पर आप ने मुझे डांटा, गालियां भी दी, अभद्रता भी की, मुझे और मेरे परिवार को धमकी भी दी।
   लेकिन सोशल मीडिया की इस दुनिया में ऐसे दोस्त भी मिले जो मुझे छींक आ जाने पर भी डॉक्टरी सलाह से लेकर दुआओं की झड़ी लगा रहे थे। कश्मीर से लेकर असम तक मेरी न्यूज़ रिपोर्ट पर मेरा हौसला बढ़ा रहे थे। अच्छी खबर पर तारीफ करते थे। कई बार भावनात्मक सपोर्ट देते थे। मेरा परिवार बहुत छोटा है लेकिन इस सोशल मीडिया पर मुझे इतना बड़ा परिवार मिला कि मैं कभी खुद को अकेला समझ ही नहीं पाया। लोग कहते हैं कि सोशल मीडिया सिर्फ नफरत फैलाने का साधन है। मैं इस बात से बिल्कुल इत्तेफाक नहीं रखता क्योंकि सोशल मीडिया पर मिले इतने दोस्तों से भरा मेरा यह परिवार हमेशा मेरे साथ खड़ा रहा। जैसे किसी गुलदस्ते में सिर्फ एक रंग के फूल हो तो वह गुलदस्ता ही बेकार लगने लगता है इसी तरह इन दोस्तों में हर विचारधारा से प्रेरित और प्रभावित लोगों के समूह ने मुझे लगातार सक्रिय बनाए रखा। आपके इस प्यार के लिए मैं हमेशा आपका आभारी रहूंगा। नए साल पर आप से निवेदन है कि जब भी मुझसे कोई अच्छा काम हो तो उस पर तारीफ करें या ना करें लेकिन जब भी मैं कोई गलत काम करूं तो उसकी आलोचना करें और मेरी हर गलतियों पर मुझे फटकार लगाएं। यदि आपको लगे कि मेरे अंदर अभिमान जगह बना रहा है तो तुरंत चेतावनी दें। इतने हजारों दोस्तों का प्यार बड़ी किस्मत वालों को मिलता है। आप सब को एक बार फिर नए साल की ढेरों शुभकामनाएं।
Happy New Year

आशुतोष

Wednesday, November 1, 2017

राष्ट्रवादी खिचडी खाइए...देश का हाज़मा खराब है

देश मर्ज इतना गहरा है कि डॉक्टर लगातार कडवी दवा देकर इलाज कर रहे हैं। महंगाई का एलोपैथी से नब़्ज पकड नहीं आई तो नोटबंदी की होम्योपैथी भी आज़माई गई। सेहद बिगडी तो हकीम ने जीएसटी की नैचुरोपैथी भी आज़माई ली है। देश का मर्ज़ है कि ठीक होने का नाम नहीं ले रहा। नादान लोग कह रहे हैं कि दवाइयों का साइड इफेक्ट हो गया है। लेकिन
हकीम से जलने वाले तो ये भी कह रहे हैं कि मर्ज़ कुछ और था दवा कोई और दे दी। अब उनकी क्यों सुनें जो हकीम से खार खाते हैं। वैद्यशाला के खाते में धन तो आ रहा है ना! मरीज का जितना ज्यादा और लंबा इलाज, अस्पताल की उतनी ही कमाई। अब गणित तो सीधे-सीधे यही कहता है जी। अब कुछ लोग यहां तक कह रहे हैं कि अस्पताल में जो पैसा आया है उससे डॉक्टर साहब अपने परिवार के बीमार लोगों की हालत ठीक करेंगे। अब परिवार का ख्याल रखना गुनाह है क्या जी? परिवार ने इतना निवेश किया है तो उनकी मर्ज़ तो पहले ठीक करना पडेगा ना? पहले वाले डॉक्टर ने भी तो यही किया था। उधर जो मर्ज़ नहीं है वो गालों पर ग्लो लेकर चलेगा लेकिन अस्पताल को मर-मर कर और भर-भरकर देने वाले का इलाज ही नहीं हो रहा। हकीम लगातार एक्सपेरीमेंट करने के मूड में है। विदेशी रिपोर्ट कह दी है कि इस अस्पताल में इलाज करने के लिए माहौल बढिया है। डॉक्टर गदगद हो गए और टेबल पर रखी उस विदेशी रिपोर्ट को धीरे से कचरे के डब्बे में डाल गए जिसपर लिखा था कि अस्पताल की दवा का असर किसी मरीज पर नहीं हो रहा है बल्कि झारखंड में कुछ तो बिना इलाज के ही मर गए।
       डॉक्टर सिर्फ दवा ही नहीं सलाह और हौसलों के जुमले भी बांटता है जिससे मरीज़ को इलाज पर उम्मीद हो जाए और उसे लगे कि दवा का असर हो रहा है और वो ठीक हो रहा है। देश के मर्ज़ को साथ भी यही हो रहा है। जुमलों का सीरप डिब्बा भर के पिलाया जा रहा है। जिनके गले से नीचे नहीं उतर रहा उन्हे वही सीरप राष्ट्रवादी डिब्बों में भरकर पिलाया जा रहा है़। जो पीने से मना करे उसे पाकिस्तानी अस्पताल भेजने की व्यवस्था की जा रही है। धैर्य रखिए राष्दवा का नुस्खा नया है। इसका फायदा डॉक्टर को अस्पताल में नहीं बाहर ज्यादा हुआ है।
   लेकिन मर्ज़ इतना बेगैरत हैं जो इन तमाम दवाओं से भी ठीक होने का नाम नहीं ले रहा है। बडा ही देशद्रोही किस्म का मर्ज़ है जो बीमार रहकर हकीम को बदनाम करने की कोशिश कर रहा है। लेकिन हकीम ने हिम्मत नहीं हारी है। हकीम अब मर्ज़ को जड से खत्म करने के लिए मरीज़ को खिचडी खाने को कह रहा है। इस में खिचडी राष्ट्रवाद का नमक, मिर्च और मसाला होगा। हकीम से खिचडी आपको नहीं देगा बल्कि खिचडी का इंतजाम आपको खुद करना होगाा। क्या हुआ जो सब्जी और चूल्हा तनिक महंगा हो गया है। मर्ज़ भी तो गहरा है। बीरबल की खिचडी भले ना पकी हो। ये खिचडी ज़रूर पकेगी और मर्ज़ इसीसे खत्म होगा। है कि हकीम की हिम्मत की दाद दीजिए। खिचडी से ठीक ना हुआ तो अगले इलाज की तैयारी चल ही रही होगी। बस तबतक कहीं दर्द से मरीज़ की मौत ना हो जाए।

Friday, May 26, 2017

तीन साल "बेमिसाल" - मोदी सरकार के 3 साल पर एक नज़र

भारत की अब तक की सबसे मजबूत मोदी सरकार के 3 साल पूरे हो चुके हैं। बीजेपी पूरे देश में जश्न का जलूस निकाल रही है। जमीन पर इन 3 सालों में देश को क्या मिला उसका तो नहीं पता, लेकिन अपना हर संभव बखान करने के लिए BJP कुछ न कुछ मुद्दा और नारा ढूंढ ही लेगी, क्योंकि उसे पता है इन मुद्दों पर ना तो जनता को सवाल पूछने की इजाजत है और ना ही मीडिया उन मुद्दों पर सवाल करने की हिम्मत करेगा। हां मैं भी मानता हूं कि मोदी क्या यह 3 साल का कार्यकाल सफल रहा है और सफलता का सबसे बड़ा पैमाना यह है कि इन 3 सालों में प्रधानमंत्री, उनकी सरकार, उनके मंत्री और बीजेपी ने जो कुछ भी कहा, मीडिया ने उस बयान को सरकार का दावा जैसा नहीं बल्कि ब्रह्म वाक्य के तौर पर प्रस्तुत किया। मोदी सरकार की सबसे बड़ी कामयाबी ही शायद यही है कि इन 3 सालों में कश्मीर से लेकर कन्याकुमारी तक की हर समस्या के लिए विपक्ष, सेक्युलर, लिबरल, कांग्रेस , JNU या फिर केजरीवाल जिम्मेदार है। इतना ही नहीं मोदी सरकार के कार्यकाल की सबसे बड़ी सफलता यही है कि इन 3 सालों में उनके किसी भी फैसले को मीडिया ने सवालों और वास्तविकता की कसौटी पर परखने की बजाय उसका एक तरफा प्रचार किया। मोदी सरकार के किसी भी फैसले पर मीडिया का आलोचना तो छोड़िए एक सवाल भी नहीं उठाना ही उनकी सबसे बड़ी जीत है। 
    वरना ऐसा क्या बदल गया कि भारत की सीमाओं से लेकर कश्मीर के अंदरूनी मामले तक और देश में बढ़ती बेरोजगारी से लेकर आसमान छूती कीमतों तक जहां 2014 तक नई दिल्ली और नई दिल्ली में बैठे प्रधानमंत्री और उनकी सरकार जिम्मेदार होती थी अब उन्हीं मसलों पर नई दिल्ली नहीं बल्कि स्थानीय मुद्दे जिम्मेदार होते हैं। ऐसा क्या बदल गया देश की अंदरूनी सुरक्षा की जिम्मेदारी पहले सरकार की होती थी लेकिन अब सुरक्षा पर मंडरा रहे खतरे पर जवाब कन्हैया और उमर खालिद से मांगा जाता है। नोटबंदी का फैसला यकीनन ऐतिहासिक था। 8 मई को अपने भाषण में प्रधानमंत्री मोदी ने कहा कि नोटबंदी से कालेधन पर लगाम लगेगी और राजनीतिक दलों का काला पैसा महेश काली स्याह बनकर रह जाएगा। प्रधानमंत्री के भाषण खत्म होने के तुरंत बाद तुरंत भारतीय मीडिया ने नोटबंदी को कालेधन का दुश्मन साबित कर दिया। एक चर्चा या एक सवाल भी नहीं उठा कि प्रधानमंत्री जो दावा कर रहे हैं उसके लिए सरकार की तैयारी आंकड़े और रिसर्च कितनी है। मीडिया ने एक सवाल नहीं पूछा कि आखिर भारत के सिस्टम में कितना काला पैसा है और नोटबंदी के बाद कितना काला पैसा सिस्टम में वापस आएगा। प्रधानमंत्री ने जो कहा उसे भारतीय मीडिया ने जस का तस सवा सौ करोड़ की आबादी के सामने परोस दिया। इतनी भी नैतिकता नहीं दिखाई कि जो प्रधानमंत्री कह रहे हैं उसे सरकार का दावा तक कहा जाए बल्कि उसके उलट भारतीय मीडिया देश के जनमानस को यह बताने में जुट गई कि जो प्रधानमंत्री कह रहे हैं वही अटल सत्य है और आप मान लीजिए कि नोटबंदी से काला धन खत्म हो जाएगा। पहले दिन से लेकर आज 6 महीने से ज्यादा वक्त बीतने के बाद भी वही मोदी सरकार यह बताने में आनाकानी कर रही है और बदले झांक रही है कि आखिर नोटबंदी के बाद भारत की अर्थव्यवस्था में कितना काला पैसा सिस्टम के अंदर आया और कितना काला पैसा बर्बाद हुआ। 
  तो आप जरा इन 3 सालों के कामकाज पर एक नजर डालते हैं। 
देश का सबसे बुनियादी मसला है रोजगार और जरा सरकार से यह जवाब मांग कर देखिए कि क्या इन 3 सालों में पिछले किसी भी शासन की तुलना में लोगों को मिलने वाले रोजगार में 1% की बढ़ोतरी हुई है। आंकड़े बताते हैं कि मोदी सरकार के इन 3 सालों के राज के दरमियान नौकरियों में कमी हुई है। हाल ही में आई रिपोर्ट कि अगर मानें तो आईटी सेक्टर में सालाना 300000 नौकरियों तक की कटौती हो सकती है। लेकिन क्या रोजगार की समस्या पर आप कहीं कोई चर्चा देख रहे हैं या फिर कहीं सरकार रोजगार के सवालों पर जवाब देने के मूड में दिखती है जवाब है नहीं। 
देश के दूसरे सबसे बड़े मुद्दे पर ध्यान देते हैं वह है महंगाई। आपकी कमाई आपके घर के खर्च में सीधा रिश्ता है। इन 3 सालों में वह दौर आया था जब अरहर की कीमतें ₹60 से ₹170 तक पार कर गई थी। बाजार चाहिए और देखिए अरहर की दाल की कीमतें क्या हैं? 
3 सालों के वक्त में सवा सौ करोड़ की आबादी वाले हिंदुस्तान में शिक्षा और स्वास्थ्य के क्षेत्र में अगर कायापलट नहीं की जा सकती तो कम से कम एक नई क्रांति की शुरुआत जरूर की जा सकती है। क्या आपके पास जवाब है कि इन 3 सालों में  शिक्षा और स्वास्थ्य के क्षेत्र में मोदी सरकार ने कौन सी नई योजनाएं शुरु की जो आम जनमानस तक पहुंच कर उन्हें सीधा फायदा दे सके?
भ्रष्टाचार- यूपीए-1 के कार्यकाल में देश का मीडिया लगभग इसी तरह केंद्र सरकार की शरण में था। लेकिन यूपीए-2 में वह बदलाव देखने को मिला जब जनता और मीडिया दोनों ने भ्रष्टाचार के मसले पर कांग्रेस नेतृत्व वाली यूपीए-2 सरकार पर सवाल उठाए। सवालों का जवाब देने में नाकामयाब सरकार के खिलाफ जंतर मंतर पर आंदोलन भी हुआ। सवालों का जवाब देने में नाकामयाब सरकार के खिलाफ जंतर-मंतर पर आंदोलन भी हुआ उस आंदोलन मौजूदा कांग्रेस सरकार के खिलाफ नफरत का एक बीज बोया जिसकी फसल बीजेपी और नरेंद्र मोदी ने 2014 में काटी। इन 3 सालों में जरा पूछिए केंद्र सरकार से कि कहां है देश का लोकपाल। क्यों लोकपाल की नियुक्ति को नेता विपक्ष की स्थिति ना होने के बहाने से लटकाया जा रहा है। क्या इन 3 सालों में देश से भ्रष्टाचार खत्म हो गया है? या फिर इस सरकार में भ्रष्टाचार उतना गंभीर अपराध नहीं है जितना पिछली सरकार में था। देश की सबसे बड़ी जांच एजेंसी सीबीआई खुद राजनीतिक और आपराधिक आरोपों से घिरी हुई है। देश के आयकर विभाग पर राजनीतिक होने के आरोप लग रहे हैं। यानी जनता के पास मोदी सरकार के राज में भ्रष्टाचार के खिलाफ शिकायत करने के लिए कोई निष्पक्ष तंत्र मौजूद नहीं है। सोचिए अगर देश का लोकपाल होता तो क्या उसके दरवाजे पर इस सरकार के खिलाफ हजारों शिकायतें नहीं पहुंचती। और अगर वह शिकायतें पहुंचती तो क्या इस सरकार पर भ्रष्टाचार के आरोप नहीं लगते? तो क्यों ना माने कि यह वही वजह है जिसकी वजह से लोकपाल आज भी सरकार की फाइलों के ढेर में दबा बैठा है। 
कटप्पा ने बाहुबली को क्यों मारा हिंदुस्तान को इसका पता चल गया लेकिन आज तक यह पता नहीं चल पाया कि मोदी सरकार ने नोटबंदी क्यों लागू की। रिजर्व बैंक बार बार आरटीआई से मांगी जाने वाली जानकारियों को अलग-अलग बहाने से ठुकरा रहा है। रिजर्व बैंक की माने तो नोटबंदी के कारण और उसके बाद सिस्टम में आए गए काले पैसों का ब्यौरा जारी करने से देश की सुरक्षा पर खतरा मंडरा सकता है। पर मजे की बात यह है कि इस हास्यास्पद जवाब की आलोचना तो छोड़िए सिस्टम में ऐसी चुप्पी बंधी है जैसे मानो आंकड़े सामने आ गए तो सरकार गिर जाएगी। क्या मोदी सरकार ने यह दावा नहीं किया था कि नोटबंदी से काला पैसा खत्म हो जाएगा काले धन के खेल में लिप्त नेता जेल जाएंगे उनका पैसा बर्बाद हो जाएगा और हिंदुस्तान जन्नत बन जाएगा। जरा देखिए अपने आसपास और नोटबंदी के बाद के इन 6 महीनों में हुए घटनाक्रमों पर नजर डालिए। नोटबंदी के बाद भी कई राज्यों में चुनाव हुए क्या वहां पर काले पैसे का इस्तेमाल नहीं हुआ। नोटबंदी के दौरान काले पैसों के खेल में सबसे ज्यादा पकड़े जाने वाले लोग क्या केंद्र में शासित सत्ता दल के ही नहीं थे? जरा देखिए कि नोटबंदी के बाद कितनी राजनीतिक दलों के नेता कंगाल हुए या सलाखों के पीछे गए। 
ऐसा पहली बार हुआ है जब किसी शासनकाल में सोशल मीडिया पर सत्ताधारी दल के कार्यकर्ताओं और समर्थकों ने अभद्रता और आतंक की सारी मर्यादाएं तोड़ दी हैं। महिलाओं के खिलाफ बदसलूकी गाली गलौज से लेकर सरकार से सवाल पूछने वाले पत्रकारों के खिलाफ सोशल मीडिया पर सत्ताधारी दल के गुंडों द्वारा दिनदहाड़े हमले हो रहे हैं। लेकिन सबसे गंभीर स्थिति तब उठती है जब इस तरह के असामाजिक तत्वों को खुद देश के प्रधानमंत्री सोशल मीडिया पर फॉलो करते हैं।
देश की आंतरिक समस्याएं बढ़ रही हैं। उत्तर प्रदेश से लेकर झारखंड तक बीजेपी शासित राज्यों में जातीय हिंसा और अराजकता गंभीर स्थिति तक पहुंच चुकी है। मैनचेस्टर में हुए आतंकी हमले पर भारत के प्रधानमंत्री दुख जताते हैं लेकिन उनके आवास से महज कुछ सौ किलोमीटर की दूरी पर मारे जा रहे लोगों के लिए संवेदना प्रकट करने के लिए उनके पास शब्द शायद नहीं हैं। क्या ऐसा पहली बार नहीं हो रहा है जब गाय और गोबर को इंसानी जान से ज्यादा तवज्जो दी जा रही हो। 
जन्नत कहे जाने वाले कश्मीर कश्मीर की स्थिति 90 के दशक वाली स्थिति में पहुंच गई है। जिस कश्मीर में बीजेपी के ही नेता और पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेई आदर्श हुआ करते थे आज उसी कश्मीर में मौजूदा मोदी सरकार के खिलाफ इतना असंतोष क्यों है। नई दिल्ली और श्रीनगर के बीच भरोसे की इतनी कमी शायद ही पहले कभी देखी गई हो। लेकिन इन मसलों पर सरकार से सवाल पूछे भी तो पूछे कौन। कश्मीर के नाम पर राष्ट्रवाद की खेती जम्मू से लेकर कन्याकुमारी तक की जा रही है क्योंकि इस खेती से वोटों की फसल लहलहाएगी।
एक नजर इन 3 सालों की विदेश नीति पर भी डाल ही लेते हैं। प्रधानमंत्री ने इन 3 सालों में विदेश यात्राओं और उन पर होने वाले जनता के पैसों के खर्च के पिछले सारे रिकॉर्ड तोड़ दिए हैं। सरकार के विदेश मंत्रालय में आरटीआई डालिए और पता कीजिए कि इन 3 सालों में प्रधानमंत्री के विदेश दौरों से देश को सीधे तौर पर क्या मिला। इन 3 सालों में नेपाल जिसके साथ भारत का रोटी-बेटी जैसा संबंध था उसने कड़वाहट घुल चुकी है।
इन 3 सालों में शासन का वह चेहरा पहली बार सामने देखने को मिला है जब देश की समस्याएं कम होने की वजह लगातार बढ़ रही हैं सामाजिक असंतोष बढ़ रहा है, लोगों के बीच नफरत राजनीतिक मकसद से फैलाई जा रही है। लेकिन न जाने यह सरकार कौन सा जादू कर रही है जिससे आपको भूखे पेट भी पेट भरे होने का एहसास हो रहा है। दर्द से करा रहे हिंदुस्तान ने कभी ऐसा फील गुड शायद नहीं किया था। और इसीलिए कह सकता हूं कि मोदी सरकार के 3 साल वाकई बेमिसाल।
आशुतोष मिश्रा

Tuesday, March 21, 2017

क्योंकि हमें जनादेश मिला है......

जनादेश का सम्मान किसी भी संवैधानिक राष्ट्र के जिंदा और स्वस्थ होने का प्रमाण होता है कोई भी जनादेश सवाल पूछने या सवाल उठाने के मौलिक अधिकार से ऊपर नहीं हो सकता। जनादेश दरअसल जिम्मेदारी का ही लोकतांत्रिक पर्याय है़। लेकिन आज माहौल बदल चुका है या यूं कहें कि माहौल बदलने की कोशिश धडल्ले से जारी है। इस बदले हुए माहौल में सत्ता परम सत्य है और सत्ताधारी हरिशचंद्र से भी बडे सत्यवादी, क्योंकि हमें जनादेश मिला है।
    अब मोमबत्ती जलाने से भी दिल नहीं पसीजते बल्कि अब हर सवाल पर इंसाफ मांगने के लिए जलने वाली मोमबत्ती की लौ बुझाने वाली सेना राष्ट्रवाद के नाम पर हाथ में चाबुक लिए घूम रही है। इस माहौल में राम राज्य के नाम पर जनादेश तो मिला लेकिन राज्य बदलने की उम्मीद दूर दूर तक नहीं दिखती।
  जनता को आजादी देने के नाम पर मिले जनादेश के बाद प्रजा को अनदेखे डर से डराने की कोशिश का दौर है ये। स्याही फेंकने वालों को सम्मान और स्याही से लिखने वालों पर स्याही फेंकने का दौर है ये। स्याह इतिहास की ओर देश को धकेलने का दौर है क्योंकि अंधेरा होगा तो ना आप कुछ देख पाएंगे ना आपको कुछ देखने दिया जाएगा। स्याह अंधेरे में दोस्त और दुश्मन कोई नजर नहीं आएगा।
  बस लौ बुझाने वालों की आवाज आएगी और उनके बताए रास्ते पर चलने को मजबूर हो जाएंगे, ये जाने बिना कि वो रास्ता किस तरफ जाता है। ये जाने बिना कि वो रास्ता आगे कुंए की ओर जाएगा या खाई में।
   ये सत्ता के साथ सुख भोगने का दौर है। सत्ता का वो सुख जो मृगमरीचिका की तरह दिखता तो है लेकिन मिलता नहीं। सत्ता सार्थक सत्य है और ये आत्म ग्यान उन सभी आत्माओं को मिल चुका है जो चंद लम्हों पहले मुल्क के लिए निजाम से बगावत कर चुके थे और भीड को उम्मीद दे रहे थे कि सवाल जिंदा हैं और इंसान भी, ईमान जिंदा है और रूह भी। लेकिन बदलते दौर के साथ बदले निजाम के साथ उन सभी रूहों को नए निजाम में ही इंसाफ का चेहरा नजर आने लगा।

     ये वो दौर है जब सूट बूट वाला जनता का सिपाही सत्ता का जयकार करता है और सवाल उठाने वालों पर शब्दों के हंटर से प्रहार करता है। ये वो दौर है जब लोकतंत्र के हर खंबे टूट रहे हैं और जो अटूट है उसमें दीमक लगाने की कोशिश की जा रही है। जम्हूरियत के लौह खंभे सत्ता की नमी से जंग खाने लगे हैं और जनता की जंग भूलकर सियासत से निकाह कर चुके हैं। और ये सब इसलिए क्योंकि हमें जनादेश मिला है।

ये वो दौर है जब कमजोर किसी कोने में खडा सूख चुके आंसुओं भरे सुर्ख आंखों से सियासत की ओर सवालिया निगाह डालता है लेकिन बुद्धू बक्से में सजे धजे जीव कहते हैं वो भीड तो सत्ता का स्वागत करने खडी है। ये वो दौर है जब सत्ता हीरो है और विपक्छ विलेन। ये वो दौर है जिसमें गुणगान करना धर्म है और सवाल पूछना अधर्म। ये वो दौर है जिसमें चाटुकारिता परम सुख है और सवाल राष्ट्रद्रोह। ये सब इसलिए क्योंकि हमें जनादेश मिला है।

ये उस दौर की शुरूआत है जब अंधेरा मुल्क की किस्मत बन जाएगा और इस अंधेरे को रामराज्य कहकर ढिंढोरा पीटा जाए। जो इस अंधेरे में चकम सुख प्राप्त करने लगे उसे क्या फर्क लेकिन जिंदा रूहों तो सुकून मयस्सर नहीं होने का दौर है ये। क्योंकि हमें जनादेश मिला है।

डरती नहीं जम्हूरियत लाशों के मैदानों से
खतरा है मुल्क को मर चुकी जिंदा रूहों से

आशुतोष मिश्रा