


अन्ना हजारे को अब सारा देश पहचानता है। ऐसे लोगों की भी कमी नहीं है जो अन्ना को सालों से जानते हों। लेकिन पिछले तीन महीनों में अन्ना की ख्याति दावालन के आग की तरह फैली। और शायद यही वजह हो सकती है कि समाज का एक तबका उन्हे किसी ना किसी बहाने निशाने पर लेने की कोशिश कर रहा है। ये तबका कौन है इसे समझाने की ज़रूरत नहीं पड़ेगी। साधारण भाषा में हम उन्हे नेता कहते हैं। ये प्राणी हर पांच साल बाद हमारे आस-पास लोकलुभावन वादों के लॉलीपॉप लेकर आते हैं। भोली-भाली जनता से वोट लेकर ऐसे ग़ायब होते हैं जैसे गधे के सर से सींग। इन बातों के दुहराना भी अब बेमानी सा लगता है। लेकिन अंदर की चोट की विवशता की शिकार हूं जो मैं बार-बार उन्हे कोसता हूं। देश में भ्रष्टाचार चरम पर है। हर दिन एक नया खुलासा हमें झकझोर कर कहता है कि क्या ये वहीं इंदिरा और राजीव गांधी की पार्टी है और क्या ये वही नेता हैं जो गांधी-नेहरू के आदर्शों पर चलने का दम भरते हैं। जितनी बार चिल्लाते रहे कि हम भर्ष्टाचार के खिलाफ हैं उतनी बार एक नए घोटाले सामने आए। और देश ने जब कार्रवाई की मांग की तो सारे एक दूसरे पर आरोपों के मिसाइल दागने में लगे रहे। मैं कांग्रेस विरोधी नहीं हूं और ना ही भारतीय जनता पार्टी का समर्थक। लेकिन आलोचना मेरा अधिकार है। और मैं वही लिख रहा हूं जो मैने महसूस किया है। 2-जी घोटाले में राजा तो तब नापा गया जब मीडिया ने मामले के सार पर्दे खोल डाले। सरकार ने दखा की सारे देश की नज़र इस मामले पर है और फजीहत से बचने के लिए उसने राजा को मंत्रिमडल से बाहर कर दिया। भला हो सुप्रीम कोर्ट का जिसकी वजह से देश के साथ धोखा करने वाला आज सलाखें गिन रहा है। लेकिन कांग्रेस को राजनीति करने में महारत हासिल है। देश भर में डंका बजाया कि राजा के खिलाफ कार्रवाई कांग्रेस की भर्ष्टाचार के खिलाफ लड़ाई की प्रतिबद्धता का एक उदाहरण है। लेकिन देश की जनता बेवकूफ नहीं है। काले धन के मुद्दे को लेकर बाबा रामदेव ने दिल्ली की ओर कूच किया तो मंत्रियों का एक समूह उन्हे मनाने गया। बात नहीं बनी तो 4 जून की रात को रामलील मैदान में महाभारत मचा दिया। अब निशाना अन्ना हजारे की ओर है। अन्ना ने लोकपाल बिल लाने की बात क्या कह दी, सरकार और देश के सभी नेताओं को सांप सा सूंघ गया। देश के नेताओं को ये गलतफहमी हो गई है कि वे हमारे नेता नहीं बल्कि हमारे भगवान बन गए हैं। अन्ना ने उन्हे ये अहसास कराने की कोशिश की कि वो भगवान नहीं बल्कि उस जनता के महज़ एक सेवक हैं जिसने उन्हे वोट देकर अपने हितों की रखवाली के लिए आगे भेजा है। इससे ज्यादा उनकी हैसियत और कुछ नहीं है। शायद राजजीतिक तबके के अहं को इस बात से कुछ ज्यादा ठेस पहुंची है कि जनता अब जाग गई है और अब उनकी एक नहीं चलेगी। राजनीतिक गलियारों में बर संभव कोशिश हो रही है कि 16 अगस्त को होने वाले अन्ना हजारे के अनशन को रोक दिया जाए। अन्ना की बेदाग छवि और करोड़ों लोगो का जनसमर्थन देखकर सरकार के हौसले पस्त हैं। हालांकि अन्ना पर हमले जारी हैं। कुछ नेता अन्ना को ब्लैकमेलर भी कह रहे हैं। मैंने इक लेखक का लेख पढ़ा। और मेरे दिमाग में ब्लैकमेलिंग की परिभाषा अब स्पष्ट है। ब्लैकमेलिंग तब होती है जब एक व्यक्ति अपने निजी स्वार्थों की पूर्ति के लिए सामने वाले पर दबाव बनाए और या फिर उसे नुकसान पहुंचाने की कोशिश करे। लोकपाल बिल की मांग से अन्ना को कोई निजी लाभ नहीं पहुंचेगा। और नाही उन्होने किसीको नुकसाने पहुंचाने की धमकी दी या कोशिश की। अनशन पर बैठने से उन्हे ही स्वास्थय हानि होगी। तो फिर ब्लैकमेलिंग की कौन सी परिभाषा कपिल सिब्बल जैसे नेताओं ने पढ़ी है। 120 करोड़ की आबादी वो हर शख्स लोकपाल जैसे कठोर कानून की मांग कर रहा है जो भ्रष्टाचार से पीड़ित है। महज चंद लोग ही ऐसे जो इसके विरोध में हैं..एकमात्र कारण ये कि इस कानून से उनकी सार्वभौमिकता और उनके निजी स्वार्थों और कुशासन पर अकुंश लग सकता है। फिर वो चाहे नेता हों, नौकरशाह हों या फिर मंत्री। कपिल सिब्बल को ज़मीनी हक़ीकत दिखाने के लिए अन्ना एंड कंपनी ने उन्ही के निर्वाचन क्षेत्र दिल्ली के चांदनी चौक में लोकपाल बिल को लेकर सर्वे कराया। इलाके के 85 प्रतिशत लोगों ने अन्ना के लोकपाल का सम्रथन किया। कांग्रेस को जैसे ही कांटा चुभा फौरन उनके एक तीस मार खां सिपाही मनीष तिवारी ने अन्ना को चुनाव लड़ने की चुनौती दे डाली। मनीष ये भूल गए कि जिस अन्ना ने देश के लिए लड़ाई लड़ी,जिस अन्ना से अपने के विकास की शुरूआत करके पूरे देश में भ्रष्टाचार के खिलाफ लडाई लडी उसे चुनाव लड़ने की क्या जरूरत है। अन्ना की ताकत का अंदाज़ा इस सरकार को जंतर-मंतर से लेकर देश कर हर कोने से मिले समर्थन को देखकर लग चुका है। दबाव में ही सही सरकार ने इस सत्र में लोकपाल का एक मसौदा पेश कर दिया। लेकिन हैरत की बात ये कि जो मसौदा संसद में पेश किया गया वो ड्राफ्टिंग कमेटी के और खुद मंत्रियों के एक समूह के द्वारा बनाए गए मसौदे से भी बिलकुल अलग है। इस मसौदे में प्रधानमंत्री, सांसद, नौकरशाह और न्यायव्यवस्था को बाहर रखा है। हास्यापद यह है कि जिन लोगों को लोकपाल के दायरे में रखा गया है उनका प्रतिशत बेहद कम है। आकंड़ों की मानें तो लगभग 0.5 प्रतिशत। ये आंकड़ो मैंने एक लेखक के लेख से साभार लिए हैं। मंत्रियों और नौकरशाहों को लोकपाल से बाहर रखने पर शायद पूरा देश नाराज़ है। क्योंकि मंत्री भ्रष्टाचार नहीं करते बल्कि नौकरशाह उन्हे ऐसा करना सिखाते हैं। इसलिए चोर-चोर दोनों मौसेरे भाई कभी भी अपने ऊपर अंकुश सहन नहीं करना चाहेंगे। लोकपाल किसी के खिलाफ मामले नहीं दर्ड कर सकता। लोकपाल को कुछ मंत्रियों का समूह मिलकर निकालने की कार्रवाई कर सकता है। यानि कुल मिलाकर जनता के लोकपाल की हत्या करके नेताओं और अफसरों के लोकपाल को जनता पर थोपने की तैयारी की जा रही है। लेकिन क्या जनता इसे स्वीकार करेगी ? जवाब जरूर दीजिएगा।




















