Sunday, August 7, 2011

निशाने पर अन्ना




अन्ना हजारे को अब सारा देश पहचानता है। ऐसे लोगों की भी कमी नहीं है जो अन्ना को सालों से जानते हों। लेकिन पिछले तीन महीनों में अन्ना की ख्याति दावालन के आग की तरह फैली। और शायद यही वजह हो सकती है कि समाज का एक तबका उन्हे किसी ना किसी बहाने निशाने पर लेने की कोशिश कर रहा है। ये तबका कौन है इसे समझाने की ज़रूरत नहीं पड़ेगी। साधारण भाषा में हम उन्हे नेता कहते हैं। ये प्राणी हर पांच साल बाद हमारे आस-पास लोकलुभावन वादों के लॉलीपॉप लेकर आते हैं। भोली-भाली जनता से वोट लेकर ऐसे ग़ायब होते हैं जैसे गधे के सर से सींग। इन बातों के दुहराना भी अब बेमानी सा लगता है। लेकिन अंदर की चोट की विवशता की शिकार हूं जो मैं बार-बार उन्हे कोसता हूं। देश में भ्रष्टाचार चरम पर है। हर दिन एक नया खुलासा हमें झकझोर कर कहता है कि क्या ये वहीं इंदिरा और राजीव गांधी की पार्टी है और क्या ये वही नेता हैं जो गांधी-नेहरू के आदर्शों पर चलने का दम भरते हैं। जितनी बार चिल्लाते रहे कि हम भर्ष्टाचार के खिलाफ हैं उतनी बार एक नए घोटाले सामने आए। और देश ने जब कार्रवाई की मांग की तो सारे एक दूसरे पर आरोपों के मिसाइल दागने में लगे रहे। मैं कांग्रेस विरोधी नहीं हूं और ना ही भारतीय जनता पार्टी का समर्थक। लेकिन आलोचना मेरा अधिकार है। और मैं वही लिख रहा हूं जो मैने महसूस किया है। 2-जी घोटाले में राजा तो तब नापा गया जब मीडिया ने मामले के सार पर्दे खोल डाले। सरकार ने दखा की सारे देश की नज़र इस मामले पर है और फजीहत से बचने के लिए उसने राजा को मंत्रिमडल से बाहर कर दिया। भला हो सुप्रीम कोर्ट का जिसकी वजह से देश के साथ धोखा करने वाला आज सलाखें गिन रहा है। लेकिन कांग्रेस को राजनीति करने में महारत हासिल है। देश भर में डंका बजाया कि राजा के खिलाफ कार्रवाई कांग्रेस की भर्ष्टाचार के खिलाफ लड़ाई की प्रतिबद्धता का एक उदाहरण है। लेकिन देश की जनता बेवकूफ नहीं है। काले धन के मुद्दे को लेकर बाबा रामदेव ने दिल्ली की ओर कूच किया तो मंत्रियों का एक समूह उन्हे मनाने गया। बात नहीं बनी तो 4 जून की रात को रामलील मैदान में महाभारत मचा दिया। अब निशाना अन्ना हजारे की ओर है। अन्ना ने लोकपाल बिल लाने की बात क्या कह दी, सरकार और देश के सभी नेताओं को सांप सा सूंघ गया। देश के नेताओं को ये गलतफहमी हो गई है कि वे हमारे नेता नहीं बल्कि हमारे भगवान बन गए हैं। अन्ना ने उन्हे ये अहसास कराने की कोशिश की कि वो भगवान नहीं बल्कि उस जनता के महज़ एक सेवक हैं जिसने उन्हे वोट देकर अपने हितों की रखवाली के लिए आगे भेजा है। इससे ज्यादा उनकी हैसियत और कुछ नहीं है। शायद राजजीतिक तबके के अहं को इस बात से कुछ ज्यादा ठेस पहुंची है कि जनता अब जाग गई है और अब उनकी एक नहीं चलेगी। राजनीतिक गलियारों में बर संभव कोशिश हो रही है कि 16 अगस्त को होने वाले अन्ना हजारे के अनशन को रोक दिया जाए। अन्ना की बेदाग छवि और करोड़ों लोगो का जनसमर्थन देखकर सरकार के हौसले पस्त हैं। हालांकि अन्ना पर हमले जारी हैं। कुछ नेता अन्ना को ब्लैकमेलर भी कह रहे हैं। मैंने इक लेखक का लेख पढ़ा। और मेरे दिमाग में ब्लैकमेलिंग की परिभाषा अब स्पष्ट है। ब्लैकमेलिंग तब होती है जब एक व्यक्ति अपने निजी स्वार्थों की पूर्ति के लिए सामने वाले पर दबाव बनाए और या फिर उसे नुकसान पहुंचाने की कोशिश करे। लोकपाल बिल की मांग से अन्ना को कोई निजी लाभ नहीं पहुंचेगा। और नाही उन्होने किसीको नुकसाने पहुंचाने की धमकी दी या कोशिश की। अनशन पर बैठने से उन्हे ही स्वास्थय हानि होगी। तो फिर ब्लैकमेलिंग की कौन सी परिभाषा कपिल सिब्बल जैसे नेताओं ने पढ़ी है। 120 करोड़ की आबादी वो हर शख्स लोकपाल जैसे कठोर कानून की मांग कर रहा है जो भ्रष्टाचार से पीड़ित है। महज चंद लोग ही ऐसे जो इसके विरोध में हैं..एकमात्र कारण ये कि इस कानून से उनकी सार्वभौमिकता और उनके निजी स्वार्थों और कुशासन पर अकुंश लग सकता है। फिर वो चाहे नेता हों, नौकरशाह हों या फिर मंत्री। कपिल सिब्बल को ज़मीनी हक़ीकत दिखाने के लिए अन्ना एंड कंपनी ने उन्ही के निर्वाचन क्षेत्र दिल्ली के चांदनी चौक में लोकपाल बिल को लेकर सर्वे कराया। इलाके के 85 प्रतिशत लोगों ने अन्ना के लोकपाल का सम्रथन किया। कांग्रेस को जैसे ही कांटा चुभा फौरन उनके एक तीस मार खां सिपाही मनीष तिवारी ने अन्ना को चुनाव लड़ने की चुनौती दे डाली। मनीष ये भूल गए कि जिस अन्ना ने देश के लिए लड़ाई लड़ी,जिस अन्ना से अपने के विकास की शुरूआत करके पूरे देश में भ्रष्टाचार के खिलाफ लडाई लडी उसे चुनाव लड़ने की क्या जरूरत है। अन्ना की ताकत का अंदाज़ा इस सरकार को जंतर-मंतर से लेकर देश कर हर कोने से मिले समर्थन को देखकर लग चुका है। दबाव में ही सही सरकार ने इस सत्र में लोकपाल का एक मसौदा पेश कर दिया। लेकिन हैरत की बात ये कि जो मसौदा संसद में पेश किया गया वो ड्राफ्टिंग कमेटी के और खुद मंत्रियों के एक समूह के द्वारा बनाए गए मसौदे से भी बिलकुल अलग है। इस मसौदे में प्रधानमंत्री, सांसद, नौकरशाह और न्यायव्यवस्था को बाहर रखा है। हास्यापद यह है कि जिन लोगों को लोकपाल के दायरे में रखा गया है उनका प्रतिशत बेहद कम है। आकंड़ों की मानें तो लगभग 0.5 प्रतिशत। ये आंकड़ो मैंने एक लेखक के लेख से साभार लिए हैं। मंत्रियों और नौकरशाहों को लोकपाल से बाहर रखने पर शायद पूरा देश नाराज़ है। क्योंकि मंत्री भ्रष्टाचार नहीं करते बल्कि नौकरशाह उन्हे ऐसा करना सिखाते हैं। इसलिए चोर-चोर दोनों मौसेरे भाई कभी भी अपने ऊपर अंकुश सहन नहीं करना चाहेंगे। लोकपाल किसी के खिलाफ मामले नहीं दर्ड कर सकता। लोकपाल को कुछ मंत्रियों का समूह मिलकर निकालने की कार्रवाई कर सकता है। यानि कुल मिलाकर जनता के लोकपाल की हत्या करके नेताओं और अफसरों के लोकपाल को जनता पर थोपने की तैयारी की जा रही है। लेकिन क्या जनता इसे स्वीकार करेगी ? जवाब जरूर दीजिएगा।

Sunday, June 5, 2011

इमरजेंसी ?






मैं क्रांतिकारी नहीं हूं, और ना ही मैां हिंसा में विश्वाश करता हूं। देश का हर ज़िम्मेदार नागरिक मेरी ही तरह सोचता है। लेकिन 4 जून की रात को रामलीला मैदान में जो कुछ भी उसे देखकर अगर कोई उग्र हो जाए तो दोष आप किसे देंगे। भद्रजनों के मन में पहले ही व्यवस्था के खिलाफ रोष था। लेकिन अब ये क्रोध अपनी सारी सीमाएं लांघ चुका है। आम आदमी का गुस्सा अब सत्ता और व्यवस्था दोनों में परवर्तन चाहता है। और हो भी क्यों ना, जिन सत्ता आरूढ़ हमारे अगुवाइयों की ज़िम्मेदारी है समाज की व्यवस्था को हमारे अनुकूल बनाना और समाज का सही ताना-बाना बुनना। लेकिन जिस दिन सत्ता अपनी व्यवस्था की जिम्मेदारी से दूर हो जाएगा...परिवर्तन की मांग ज़रूर उठेगी। दिल्ली के रामलीला मैदान में हजारों की भीड़ सत्ता बदलने के लिए नहीं आई थी। लोगों का सैलाब मात्र व्यवस्था को अपने अनुकूल बनाने की मांग कर रहा था। जिसकी मांग करने का अधिकार देश का संविधान हमें देता है। लेकिन सत्ता का एक रूप ऐसा भी सामने आता है जो हमारे अधिकारों का दमन कर देता है। देश के 120 करोड़ लोगों की गाढ़ी मेहनत की कमाई देश के बाहर जमा हो रही है। ये पैसा कितना है अब ये बताने की ज़रूरत नहीं है। सारा देश जानता है कि जिस दिन ये पैसा देश में आ गया भारत की किस्मत बदल जाएगी। रामदेव के साथ खड़ा जनसैलाब उसी पैसे का भारत लाने की मांग कर था। 13 अप्रैल 1919 को भारत की ब्रिटिश सरकार ने रॉलेट एक्ट का शांतिपूर्वक विरोध करने पर जननेता पहले ही गिरफ्तार कर लिए थे। इस गिरफ्तारी की निंदा करने और पहले हुए गोली कांड की भर्त्सना करने के लिए जलियांवाला बाग़ में शांतिपूर्वक एक सभा आयोजित की गयी थी। दिन के तीसरे पहर दस हज़ार से भी ज़्यादा निहत्थे स्त्री, पुरुष और बच्चे जनसभा करने पर प्रतिबंध होने के बावजूद अमृतसर के जलियांवाला बाग़ में विरोध सभा के लिए एकत्र हुए। उसके बाद क्या हुआ इतिहास उसका गवाह है। 4 जून की रात दिल्ली के रामलीला मैदान में जो कुछ भी हुआ उसने जलियांवाला बाग हत्याकांड की तस्वीरें एक बार फिर सामने ला दीं। नई पीढ़ी ने उस हत्याकांड के बारे में पढ़ा होगा लेकिन 4 जून 2011 को जो कुछ भी हुआ अब हम उसके गवाह हैं। यहां नरसंहार नहीं हुआ लेकिन गहरी नींद में सो रही जनता को लाठी-डंडों से पीटा गया। गोलियां नहीं चलीं लेकिन आंसू गैस के गोले दागे गए। निहत्थों को मौत के घाट नहीं उतारा गया लेकिन जबरन घसीटा गया। क्या पुरुष, क्या महिला और क्या बच्चे....सत्ता का आतंक का शिकार हर कोई हुआ। ये देखकर रूह थरथरा गई कि पिटने वाले भी अपने थे और पीटने वाले भी। लेकिन आदेश किस जनरल डायर का था इसका जवाब शायद हमें कभी नहीं मिलेगा। कानून तोड़ना अपराध है। बाबा रामदेव ने अनशन के लिए इजाजत नहीं ली थी। और इस अपराध के लिए उनके और उनके समर्थकों पर बल प्रयोग किया गया। लेकिन देश के साथ गद्दारी करने वाले और सारे नियम-कानून तोड़कर अपनी इच्छा से कानून को धराशायी करने वालों पर बल प्रयोग करने की मंशा तक दिखाई नहीं पड़ती। ए.राजा और सुरेश कलमाड़ी जेल में भी हंसते दिखाई देते हैं। मानों हमपर हास्य कर रहे हों कि हमारा कोई कुछ भी नहीं बिगाड़ सकता है। हमारे पास उस हास्य को स्वीकार करने के अलावा और कोई चारा नहीं बचता। हम उस दिन को को कोसते हैं जिस दिन उन्हे अपना कीमती मत देकर अपने सिर पर बिठाया। ये सरकार दम चाहे जितना भी भरे लेकिन आज तक कोई भी ठोस कदम कभी नहीं उठाया गया। हमारे आगे हाथ जोड़ने वाले हमें ही अपने पैरों से रौंद रहे हैं। क्या संविधान ने इन्हे ये अधिकार दिया है। देश के साथ धोखा, देशवासियों के साथ धोखा ना जाने कितना धोखा ये सरकार करेगी। हम धन्यवाद करते हैं सुप्रीम कोर्ट का जिसने देश के नागरिकों ये भरोसा दिलाया है कि कानून से बढकर कोई नहीं। तो क्या अब फिर से सुप्रीम कोर्ट को ही पहल करनी होगी इस सत्ता और व्यवस्था को बदलने के लिए।

Sunday, April 10, 2011

हम जीत गए, मैं जीत गया....




अण्णा हजारे के साथ हजारों। जंतर-मंतर पर ये नारा थमने का नाम नहीं ले रहा था। सिस्टम के खिलाफ आम आदमी का गुस्सा था। कुछ दिन पहले देश ने वर्ल्डकप जीता था। अब देश एक बार फिर कप जीता है। करप्शन की पिच पर फ्रंटफुट पर बैटिंग करने उतरे यूपीए के टॉप आर्डर को अण्णा की फिरकी ने बैकफुट पर फेंक दिया। मैंने 1947 का आंदोलन नहीं देखा और ना ही मेरी नई पीढ़ी ने इस तरह का आंदोलन देखा होगा।
लेकिन 2011 के के इस क्रांति का मैं गवाह भी हूं और हिस्सा भी। हमारी लड़ाई ना बाबू से थी, और ना खादी से। ना साहब से थी और ना खाकी से। ये लड़ाई थी सिस्टम से। अब तक कहते रहे कि इस देश का कुछ नहीं हो सकता क्योंकि इस देश का सिस्टम ही खराब है। दुनिया की सबसे बड़ी डेमोक्रेसी की विडंबना ही यही थी। लेकिन पानी सर से ऊपर हो गया।
गांधी और भगत सिंह के किस्से पढ़े भी और सुने भी, लेकिन जंतर-मंतर पर मैंने गांधी और भगत सिंह को देख लिया। इस पीढ़ी के साथ आनेवाली पीढ़ी को भी क्रांतिकारी बनते देख लिया। हाथों में तिरंगा और सत्ता कि खिलाफ गुस्सा...ये क्रांति नहीं तो और क्या है ? ये गुस्सा शायद सालों से हमारे अंदर था। करप्शन का शिकार हममें हर कोई हो चुका है। स्कूल में एडमिशन के लिए करप्शन, गाड़ी चलाने की परमिशन के लिए करप्शन....लेकिन अब बस...
मैं विधिज्ञानी नहीं हूं। इसलिए नहीं जानता कि लोकपाल बिल कितना कारगर होगा...होगा भी या नहीं। लेकिन इतना समझ गया कि पब्लिक अब चुप नहीं रहेगी। अब लालबत्ती पर 100 रुपए नहीं दूंगा। गलती की, तो सज़ा भुगत लूंगा लेकिन 100 रुपए देकर इस करप्ट सिस्टम का हिस्सा नहीं बनूंगा। किसी ने अन्याय किया तो चुपचाप सहने की बजाए लोकपाल का दरवाजा खटखटाउंगा। अब तक देश में अंधेर देखा है इसलिए देर से ही सही लेकिन हक की लड़ाई लड़ूंगा।
अरे ! वोट देकर जिसे अपना रहनुमा बनाकर दिल्ली भेजा उसने हमारे सीने में छुरा भोंक दिया। मेरा घर संभालने के लिए मैंने जिसे पावर दिया उसीने मेरे घर में डाका डाल दिया। अब मैं अपने घर की रखवाली के लिए नेता की बजाए अपना अधिकारी रखना चाहता हूं। वो मेरा लोकपाल होगा। वो मेरी बात सुनेगा। ना जाने कितने राजा और कलमाड़ी मेरे घर से मेरी ही मेहनत की कमाई लूटकर अपनी तिजोरी भर रहे हैं। मेरी शिकायत सुनने वाला कोई नहीं है। मेरा लोकपाल मेरी सुनेगा। और ऐसे राजा और कलमाड़ी से मेरा पैसा मुझे वापस लाकर देगा। इतना ही नहीं उन्हें उनके कारनामों की सजा भी देगा।
मैं भी जंतर-मंतर गया था। अण्णा हजारे को समर्थन देने नहीं बल्कि अपने आनेवाली पीढ़ी को ये बताने कि मैंने इस सिस्टम को बदलने के लिए आवाज़ उठाई थी। मेरा नाम इतिहास में भले ना लिखा जाए लेकिन मैं उस इतिहास का हिस्सा हूं। मैं सरकार को झुका दिया। उन्हे झुका दिया जो खुद को खुदा समझते थे। मैंने उन्हे बता दिया कि मालिक मैं हूं और तुम सिर्फ नौकर। अण्णा के एहसान मैं कभी नहीं भूलुंगा। अण्णा ने मुझे ताकत दी मेरे गुस्से को सही रास्ता दिखाया। मेरी आवाज के आगे सिस्टम झुक गया। ये मेरी जीत है...ये हमारी जीत है......

Sunday, March 27, 2011

बदलता बिहार...





सालों से अगर हमारे मस्तिष्क पटल पर अगर कोई भ्रांति ने डेरा जमा रखा हो तो ज़रूरी नहीं है को वो अटल सत्य है। वस्तुत: उस विषय विशेष से जुड़ी धारणा किसी परिपेक्ष में यथार्थ हो सकती है। मैंने बिहार नहीं देखा है। लेकिन बिहार पर कटाक्ष करने में मैं भी पीछे नहीं रहा। मैं भी से मेरा तात्पर्य कदाचित आपको भी समझ में आ गया होगा। जब मतभ्रांति टूटी तो मुझे नालंदा विश्वविद्यालय याद आया। मुझे वो वक्त भी याद आया जब सिर्फ आर्यावार्त ही नहीं अपितु समस्त संसार के विद्याप्रेमी बिहार की धूलि पाकर स्वयं को धन्य समझते थे। सार और संसार का ज्ञान केवल बिहार के पास था। राजनीति और कूटनीति यहीं की देन है। इसी राज्य ने चाण्क्य दिया तो इसी राज्य ने चंद्रगुप्त मौर्य भी दिया। इतिहास के पन्नों से शुरू इस यात्रा को मैं वर्तमान परिवेश में ले जाना चाहुंगा। 90 के दशक तक बिहार पर लालू यादव सत्ता शीर्ष रहे। राजनीति और साम्राज्यवाद का अनुपम मेल बिहार में देखने के मिल रहा था। लालू अवसरवादी थे लेकिन जनता के सामने अपनी छवि वो समाजसेवी की बनाए रखते थे। बिहार को विकास की बारहखड़ी भी नहीं पता थी। समयचक्र बदला...लोगों की जिज्ञासा बढ़ी और बदलाव की बयार ने सबकुछ बदल दिया। बिहार में शिक्षा की दर सबसे कम रही। बावजूद इसके देश की व्यवस्था बनाए रखने वाले साहब इसी प्रदेश से आते रहे। बिहार और बिहार के लोग आज भी उनपर गर्व करते हैं। लोकतंत्र का चौथा स्तंभ भी इसी प्रदेश ने मजबूत किया।
15 सालों के लालूराज ने बिहार की छवि कुछ यूं बदहाल की जिसका नतीजा बिहार के लोगों को पूरे देश में भुगतना पड़ा। प्रदेश को विकास और शिक्षा से दूर क्या रखा, पलायन दर बढ़ती रही। महाराष्ट्र में बिहार वासियों के साथ जो कुछ भी हुआ उसका एक कारण आप पलायन को मान सकते हैं। कूटनीति और राजनीति का जगतगुरू बना ये प्रदेश अब सांस लेने लगा है। विकास दर बढ़ चुकी है। शिक्षा दर बढ़ रही है। पूंजीवादी अब बिहार में मौका तलाशन लगे हैं। ज़ाहिर है आनेवाला वक्त बिहार के लिए एक नया सूरज लेकर आने वाला है। इस लेख को लिखने के लिए मुझे एक लेख ने प्रेरित किया है। कहीं पढ़ा था कि देश के अन्य राज्यों की तुलना में विभिन्न क्षेत्रों में पिछड़ा बिहार शराब की खपत के मामले में भी सबसे पीछे है और यहां प्रति सौ व्यक्ति इसकी खपत मात्र 45 लीटर है। देश की राजधानी दिल्ली, हरियाणा, पंजाब, महाराष्ट्र और उत्तर प्रदेश में शराब की खपत क्रमश: 999 लीटर, 612 लीटर, 594 लीटर, 414 लीटर और 144 लीटर है। अगर विदेशों की बात करें तो दक्षिण अफ्रीका में 2122 लोगों पर शराब की एक दुकान है। इसी प्रकार ब्रिटेन में 303, अमेरिका में 265, आस्ट्रेलिया में 483, रुस में 432 तथा चीन में 195 लोगों पर एक दुकान मौजूद है। इस खबर को मैं बिहार के लिए एक नया सवेरा मानता हूं। बिल गेट्स का हालिया दौरा इस सेवरे में जान फूंकता है। मैं किसी पार्टी या व्यक्ति विशेष का नाम नहीं लूंगा न ही मैं किसी राजनीतिक पार्टी से संबंध रखता हूं। लेकिन बिहार का वर्तमान चेहरा मुझे सोचने पर मजबूर करता है कि मैं अपनी राय बदलूं। हर अंधकार के बार सूरज उगता है और बिहार का सूर्योदय हो चुका है। बिहार के लोग बदलाव के पक्ष में हैं और अब बिहार में एक नया युग आएगा।

Saturday, March 12, 2011

बस कुछ दिन ?



जापान में ज़लज़ला क्या आया...सारी दुनिया की ज़बान पर एक ही सवाल है। बस कुछ दिन और ? धरती की तबाही की शुरूआत हो चुकी है। विनाश की उल्टी गिलती शुरू हो चुकी है। सालों लंबी ज़िंदगी अब लम्हों में कट रही है। जापान के साथ सारी दुनिया ने जो मंज़र देखा उसकी तस्वीर ज़िंदगी भर ज़िंदा रहेगी। कुदरत का क़हर धरती पर ऐसा बरपा मानो विनाश का दिन आज ही है। माया सभ्यता के कैलेंडर ने विनाश की दिन मुकर्रर कर दी है। जापान की विनाशकारी घटना आने वाले खतरे का संकेत मात्र है। प्रलय किसे कहते हैं अब ये समझना मुश्किल नहीं है। पाप और पुण्य के तराजू में पाप का पलड़ा शायद भारी हो चुका है। डर हर किसी के जेहन में घर कर चुका है। सारी दुनिया धरती मां से प्रार्थना कर रही है कि हे धरती मां हमें हमारी ग़लतियो के लिए माफ कर दो। ये विनाशलीला रोक दो।
आखिर हमें हमारी ग़लतियों का एहसास अब क्यों हो रहा है ? सालों तक हमने प्रकृति की उपेक्षा की। और अब जब प्रकृति हमारी उपेक्षा कर रही है तो हम चीख-पुकार मचा रहे हैं। इस दिन की कल्पना पर्यावरणविदों ने बहुत पहले ही कर दी थी। लेकिन मानवी लोलुपता और पिपाशा के वशीभूत होकर मानवों ने प्रकृति के हर उस नियम की अवहेलना की जिसका दुष्परिणाम आज हमारे सामने है। अपने निजी हितों के लिए हमने प्रकृति में परिवर्तन करना शुरू किया। निजी स्वार्थ के चलते धरती की हरियाली पतनोन्मुख हो गई। क्या धरती..क्या आसमान सब दूषित होते गए। जल, थल और वायु पर नियंत्रण करने की हमारी मंशा ने हमें अंत के द्वार पर खड़ा कर दिया है। दुनिया के विकसित देश बढ़ते प्रदूषण या यूं कहें की ग्रीन हाउस इफेक्ट के लिए प्रगतिशील देशों को ज़िम्मेदार ठहराते हैं। प्रगतिशील देशों में ताकतवर और कद्दावर बनने की होड़ मची है, चाहे इसके लिए कोई भी कीमत क्यों ना चुकानी पड़ी। जापान में जो ज़लज़ला आया वो इतिहास की सबसे बड़ी विनाशकारी घटना है। लाखों लोग अभी भी लापता हैं। मरनेवालों का आंकड़ा लगातार बढ़ता जा रहा है। द्वितीय विश्वयुद्ध के समय जापान ने मित्र राष्ट्रों में सबसे कद्दावर देश अमेरिका को पर्ल हार्बर जैसा ज़ख्म दिया। अमेरिका ने जापान को नागासाकी और हिरोशिमा पर परमाणु बम बरसाकर करारा जवाब दिया। जापान एक त्रासदी भूला भी नहीं था कि अब एक और जख्म से पीड़ित हो चुका है। और सिर्फ जापान ही क्यों...26 जुलाई, मुंबई, पिछले साल चीन की बाढ़, लेह और लद्दाख की त्रासदी के साथ दुनिया के अलग-अलग कोने लगातार मिल रही तबाही की खबरें हमें इस बात का इशारा कर रही हैं कि अब वो वक्त आ गया है। जापान के पास बचने के लिेए 12 मिनट मात्र शेष थे। लेकिन हमारे पास तो शायद अभी सालों का वक्त है। हम अभी भी अपनी गलतियां सुधार कर मानव सभ्यता को विलुप्त होने से बचा सकते हैं। हम अभी भी तबाही को रोक सकते हैं। बशर्ते हम प्रकृति का आदर करें।

Saturday, March 5, 2011

इन आंखों की मस्ती के दीवाने हज़ारों हैं !



हम बीसवीं सदी में जी रहे हैं। सारी दुनिया के रंग और कलेवर अब बदल चुके हैं। बात करें फिल्मों की तो अब 36 मिमी का रंग 70 मिमी के परदे पर उतर चुका है। सिंगल स्क्रीन थिएटर तो अब आंखों से दुर्लभ हो गए हैं। मल्टीप्लेक्स का ज़माना है। कभी लकड़ी की कुर्सियों पर बैठकर फिल्मों का लुत्फ उठाते लोग अब गोल्टन टिकट लेकर लेटकर बॉलीवुड का मज़ा लेते हैं। लेकिन मैं बात यहां ना तो फिल्मों की करुंगा और ना ही थिएटरों की...आज मुझे याद आ रही है उन्नीसवीं सदी की उस महान अदाकारा की जिसकी खूसबसूरती का आज भी कोई जवाब नहीं। जिसके अभिनय की नकल तो दूर उसके पास पहुंचने की हिमाकत भी आज की किसी अभिनेत्री ने नहीं की। आज मुझे याद आ रही है रेखा की। जिस रेखा के बिना आज भी बॉलीवुड अधूरा है उसने ज़िंदगी में संघर्ष और सफलता के बीच का फैसला कैसे तय किया, वो आज भी एक मिसाल है। चार साल की उम्र में बेबी भानुरेखा ने रूपहले पर्दे पर पहला कदम रखा। हिंदी फिल्मों की जान बनने से पहले रेखा अभिनय की शुरूआत दक्षिण भारतीय फिल्मों से की।
1970 में रेखा ने हिंदी फिल्मों का रुख किया। बतौर अभिनेत्री रेखा की पहली हिंदी फिल्म थी ‘सावन भादों’। इस फिल्म से रेखा को कुछ खास सफलता नहीं मिली जिसकी वजह से उन्हे बेहद निराशा हुई। लेकिन उन्हे नहीं पता था कि इस फिल्म के बाद हिंदी फिल्मों के तमाम निर्देशकों की नज़र अब उन पर पड़ चुकी थी। रेखा के हाथों की रेखा
ने अपना जलवा तब दिखाया जब उन्हे पहली बार आज की सदी के महानायक अमिताभ बच्चन के साथ फिल्म अलाप में काम करने का मौका मिला। इस जोड़ी की सफलता देखकर प्रकाश मेहरा ने इन दोनों को फिल्म ‘मुकद्दर का सिकंदर’ फिल्म बनाई। फिल्म इसी जोड़ी को मौका दिया गया। और देखते ही देखते रेखा और अमिताभ ने शोहरत के आसमान को छूना शुरू कर दिया। फिल्म की कामयाबी के साथ रेखा के सितारे भी सातवें आसमान को पार कर चुके थे। अमिताभ के साथ ही फिल्म ‘मि.नटवरलाल’
में रेखा एक बार फिर नज़र आईं। फिल्म का गीत ‘परदेसिया’ इतना ज़बरदस्त हिट हुआ कि उसके बोल सुनते ही आज की पीढ़ी भी थरकने को नजबूर हो जाती है। एक गांव की भोली-भाली लड़की का किरदार रेखा ने बखूबी निभाया। वहीं फिल्म ‘सुहाग’ में रेखा की अदायगी ने उन्हे प्रशंसकों के दिलोदिमाग पर हावी कर दिया। अपनी कई फिल्मों में तवायफ का किरदार रेखा ने कुछ ऐसा निभाया कि उनपर मर मिटने वालों का रेला सा लग गया। रेखा की आंखें बिना बोले ही बहुत कुछ कह जाती थीं। उनकी आँखों की कशिश ने ना जाने कितनों को घायल किया। रेखा के चाहने वालों की तादात बढ़ती जा रही थी। वहीं रेखा के दिल में भी किसी शख्स ने अपनी जगह बनानी शुरू कर दी। वो शख्स कोई और नहीं बल्कि अमिताभ बच्चन थे। दोनों के अफेयर के चर्चे खूब चले।
बॉलीवुड की सबसे हिट जोड़ी को हर चाहने वाला जीवन भार साथ देखने की चाहत पालने लगा। लेकिन अमिताभ के दिल में पहले ही जया बहादुरी बस चुकी थीं। रेखा, अमिताभ और जया के बीच लवट्राएंगल को यश चोपड़ा ने देखा। यश चोपड़ा ने जया, अमिताभ और रेखा को लेकर फिल्म बनाई जिसका नाम था ‘सिलसिला’। फिल्म बेहद मशहूर हुई। फिल्म की सफलता के पीछे आज भी वजह इन तीनों कलाकारों के रिश्ते का माना जाता है। रील लाइफ की कहानी को लोगों ने रीयल लाइफ से जोड़कर देखा।
प्रेम की मारी रेखा ने अपना प्रेम खो दिया। लेकिन ज़िंदगी से हार नहीं मानी। फिल्म
‘उमराव जान’ में रेखा ने जो अदायगी दिखाई वो एक मिसाल बन गई। उसी ‘उमराव जान’ को जब दोबारा पर्दे पर उतारा गया जो उसमें रेखा की जगह ऐश्वर्या राय नज़र आईं। ऐश्वर्या ने ‘उमराव जान’ के किरदार को निभाने की पूरी कोशिश की लेकिन दर्शकों ने इस ‘उमराव जान’ को उस ‘उमराव जान’ के ज़रा भी करीब नहीं पाया। मैं खुद भी रेखा के चाहने वालों में से एक हूं। और इसलिए मैं जानता हूं कि जिस दिन रेखा और अमिताभ दोबारा सिल्वर स्क्रीन पर आए तो बॉलीवुड में एक नया इतिहास बनेगा। रेखा अपने आप में एक अनसुलझी कहानी हैं। प्रेम ऐसा किया कि दोबारा किसी को दिल में जगह नहीं दी। किसने क्या कहा और क्यों कहा इसकी परवाह ज़रा भी नहीं की। रेखा की इस प्रेम को मैं सलाम करता हूं।

Monday, February 28, 2011

कभी देखी है ऐसी शादी ?



आज सुबह का अखबार सिर्फ आम आदमी की बजट से उम्मीदों से ही भरा नहीं था। ना ही इसमें सिर्फ प्रणब दा की गई गुहारों और घर बैठे खाली विश्लेषकों की राय से भरा था। अखबार के एक पन्ने में कुछ अलग ही खबर छपी थी। खबर भी ऐसी की जिसपर यकीन करना मुश्किल था, लेकिन ये सच था। दिल्ली की एक जानी-मानी हस्ती हैं कंवर सिंह तंवर। दिल्ली और आस-पास रहने वाले लोग इनको बखूबी जानते होंगे। विधानसभा और लोकसभा में ये बहुजन समाजवादी पार्टी के उम्मीदवार रहे हैं। इन साहब के साहबज़ादे शादी की उम्र् तक पहुंच गए हैं। ज़ाहिर है इतनी बड़ी हस्ती के घर की शादी है तो कुछ खास ही होगी। तो जनाब तंवर साहब के साहबजादे का रिश्ता पूर्व विधायक सुखबीर सिंह जौनपुरिया की बेटी से तय हुई है। अब आप सोचेंगे कि मैं दूसरों के घरों के निजी मामलों पर कटाक्ष करता हूं। लेकिन कहानी शुरू ही यहीं से होती है। चलिए मैं आप से ये सवाल पूछता हूं कि आप अपनी बेटी की शादी में क्या तोहफा देते हैं। मैं तोहफा इसलिए कह रहा हूं क्योकि अगर मैं दहेज का नाम लूंगा तो आप मुझपर असमाजवादी और दहेज जैसी बुरी प्रथा को बढ़ावा देने का आरोप लगाएंगे। इससे अच्छा है कि मैं इसे तोहफे का ही नाम दूं। हां तो जनाब...आप अपनी बेटी और दामाद को तोहफे में क्या दे सकते हैं। गाड़ी...लाखों रुपए...बंगला...या फिर गहने। लेकिन एक पिता ऐसा भी है जिसने पितृप्रेम का एक नया इतिहास रच दिया है। जी हां सुना है पूर्व विधायक जौनपुरिया ने अपने होने वाले दामाद को तोहफे के रूप में उड़न खटोला यानि हेलिकॉप्टर दिया है। पिता के अरमान देखिए..सोचा होगा कि बेटी और दामाद सड़क पर गाड़ियों के भीड़ में कहीं परेशान नाहो जाएं। कहीं गाड़ी का एसी खराब हो गया तो दामाद जी को तकलीफ होगी। और गर कहीं दिल्ली से चंडीगढ़ जाना होगा तो घंटों गाड़ी चलाने की जेहमत ना उठानी पड़ी। सो जौनपुरिया साहब ने अपने दामाद को एक नया हेलिकॉप्टर तोहफे में दे दिया। मेरी भाषा से आपको लग रहा होगा कि मैं ईर्ष्या और द्वेश का शिकार हो रहा हूं। लेकिन ऐसा नहीं है। मैं तो पिता के प्रेम पर विश्वास करने की कोशिश कर रहा हूं। जौनपुरिया साहब ने चुनाव लड़ते समय अपनी संपत्ति का जो ब्यौरा दिया था उस पर नज़र डालें तो उनका ये तोहफा कुछ और ही कहानी कहता है। लेकिन जब काफी समय के लिए वो विधायक की कुर्सी पर विराजमान थे तो कत्तई ताज्जुब नहीं होता। सालों पहले बिहार में भी कुछ ऐसी ही मिसाल देखने को मिली थी। बिहार की कुर्सी पर लालू यादव विराजमान थे। सीएम साहब की बेटी की शादी थी। सुना है शहर की सभी दुकानों से फ्रिज, टीवी और कूलर एक एणे मार्ग पहुंच गए थे। बेटी की शादी में आए सभी मेहमानों को तोहफे दिए गए थे। लेकिन जौनपुरिया साहब ने बेटी के प्रेम में जो नया इतिहास रचा है उसे तो कोई टाटा-बिड़ला या अंबानी भी नहीं तोड़ पाएंगे। जौनपुरिया साहब ने अरबों रुपए का ये हलिकॉप्टर कितनी पसीना बहाकर खरीदा है इसकी जांच होगी या नहीं ये मैं नहीं जानता लेकिन इस शादी को मैं कभी भी नहीं भूल पाउंगा।

Saturday, February 26, 2011

बिगड़ गया बजट...





बजट आने वाला है। आद आदमी बढ़ती महंगाई से पहले ही हलकान है। ज़ाहिर है हर किसी की नज़र प्रणब के पिटारे पर लगी है। दादा के बक्से में आम लोगों के लिए क्या है...कोई कहता है कि दादा टैक्स की छूट को 2 लाख तक कर देंगे। तो कई कहता है कि निवेश की सीमा बढ़ा सकते हैं। हर किसी की अपनी-अपनी सोच है। लेकिन सोच के पीछे का सच दरअसल ये है कि ये इनकी ज़रूरत है और अपनी ज़रूरत के लिए आम आदमी इस बजट स उम्मीदें लगाए बैठा है। देश के प्रधानमंत्री ने वादा किया है कि विकास दर को इस साल 9 फीसदी तक पहुंचाएंगे। आगे क्या होगा ये तो पता नहीं लेकिन महंगाई दर अब तक के सारे रिकॉर्ड तोड़ चुकी है। दाल रोटी से भी मोहताज हो रहे देश के लोगों ने नज़रें उठाकर सवाल पूछा तो उन्हे जवाब में कहा गया कि सब्र करो। देखिए ना...महंगाई भी कैसे-कैसे छलावा करती है। कागज़ों में महंगाई दर कम होती दिखाई पड़ी लेकिन बाज़ार में रोजमर्रा की चीज़ों के दाम और आम आदमी की जेब कुछ और ही कहानी कहती है। सुना है कि भारत की अर्थव्यवस्था की गणना दुनिया में पांचवें नंबर पर की जाती है। हम विकसित देशों की तुलना में खड़े होने लगे हैं। लेकिन ज़मीनी हक़ीकत फिर से हमारे सपनों के आगे अंधेरा कर देती है। गरीबी, बेरोजगारी, और भ्रष्टाचार हमारी ज़ड़ों को खोखला कर रहा है। लेकिन फिर भी हमारे सपने सातवें आसमान के घोड़े पर सवार हैं। प्रणब बाबू बजट के रूप में क्या तोहफा देंगे। रेल बजट में दीदी ने आम आदमी की जेब का ख्याल रखा। चालू डिब्बे में सफर करने वालों पर बोझ नहीं डाला। टिकटों के दाम नहीं बढ़ाए। ये और बाता है कि उनका बजट सिर्फ बंगाल के लिए ही था। लेकिन हम इस बात से ही खुश हैं कि हमारी जेब से ज्यादा पैसे नहीं निकलेंगे। महंगाई में कुछ पैसे तो बचेंगे। हमारे कुछ भाई ऐसे हैं जो पैसों से पैसा बनाना जानते हैं। शेयर बाज़ार के दांव-पेंच हमें समझ में नहीं आते लोकिन वो खिलाड़ी हैं। साल के इस दिन उनकी धड़कनें भी बढ़ी होंगी। दादा के पत्ता खोलने के बाद बैंकों के ब्याज दरों में भी उथल-पुथल हो सकती है। ज़ाहिर है ब्याज़ बढ़ेंगे तो कइयों के सपने बिखर जाएंगे। बंगले का सपना 2 बेडरूम वाल फ्लैट में बदल जाएगा और फ्लैट का सपना देखने वाले तो घर को ही सपना समझ कर संतोष कर लेंगे। पेट्रोल की कीमतें पहले ही आसमान पर हैं। डीजल के दाम रोककर सरकार तेल कंपनियों के दबाव में है। ज़ाहिर है उस तबके का दबाव सरकार बर्दाश्त नहीं कर सकती है। फिर चाहे कीमतों में आग ही क्यों ना लग जाए। तो मन मारने से अच्छा है कि पहले ही तैयार रहें और भगवान से प्रार्थना करें कि दादा का पिटार जब खुले तो मेरी लिखी सारी बातें सिर्फ कोरी कल्पना बनकर रह जाए। सच कहूं तो मैं भी यही चाहता हूं।

Thursday, February 24, 2011

ये बाबा बोलता है...




बाबा रामदेव आजकल सुर्खियों में हैं। कारण है काला धन... काला धन बाबा के पास है या नहीं ये या तो बाबा बखूबी जानते हैं या फिर वो लोग जो बाबा पर काला धन रखने का आरोप लगाते हैं। दुनिया भर में योग क्रांति लाने वाले बाबा रामदेव के सितारे फिलहाल गर्दिश में हैं। जब से बाबा को राजनीति की चस्का लगा है, आए दिन उनपर सियासी हमले हो रहे हैं। हाल ही में बाबा आसाम गए थे। योग शिबिर में योग का ज्ञान देते-देते ना जाने बाबा की ज़बान फिसली या फिर आदतन समझिए, बाबा ने भ्रष्टाचार और काले धन के खिलाफ बोलना शुरू कर दिया। योगगुरू का ये ज्ञान स्थानीय कांग्रेस नेता को रास नहीं आया। नोताजी ने बाबा को सिर्फ योग पर ध्यान देने की नसीहत दे डाली। बस फिर क्या था ? बाबा नेताजी पर बरस पड़े और बाबा बनाम कांग्रेस में बयानबाज़ी का दौर शुरू हो गया। रामदेव ने साफ-साफ कह दिया कि अगर बाबा को छेड़ोगे तो बाबा छोड़ेगा नहीं। बाबा का बयान और क्रांतिकारी सोच की लपट दिल्ली तक पहुंच गई। विवादों और बयानों के साथ चोली-दामन का साथ निभाने वाले कांग्रेसी नेता दिग्विजय सिंह ने बाबा रामदेव को चुनौती देते हुए कहा कि बाबा को अपनी संपत्ति का ब्यौरा भी देना चाहिए। बाबा ने आव देखा ना ताव..तुरंत गरम तवे पर हथौड़ा मारते हुए अपनी संपत्ति के सारे कागज़ लेकर खडे़ हो गए। खुलासे में पता चला कि बाबा रामदेव ट्रस्ट यानि पचंजलि योगपीठ के पास अरबों रुपए की संपत्ति है। बाबा ने सफाई में कहा कि ये पैसा उनके भक्तों ने उन्हे दान में दिया है। लेकिन कांग्रेस बाबा के इस सफाई से कहां मानने वाली थी। दिग्विजय सिंह ने फिर अपने तीखे तीर चलाते हुए कहा कि बाबा को चंदा या दान लेते वक्त इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि कहीं उन्हे दान में दिया जाने वाला पैसा काला धन तो नहीं। योगगुरू को दिग्गी राजा का ये बयान बिलकुल भी रास नहीं आया। बाबा ने पूरी कांग्रेस को चुनौती देते हुए कहा कि कांग्रेस चाहे तो उनकी संपत्ति की जांच भी करवा सकती है। महज़ 12 साल में योग के गुर सिखाते-सिखाते बाबा रामदेव की ख्याति सात समंदर पार कर चुकी है। बाबा के भक्त देश ही नहीं दुनिया के हर कोने में हैं। बाबा की यही प्रसिद्घि राजनीतिक दलों के पेशानी पर बल लाने के लिए काफी है। बाबा ने पहले ही ऐलान कर दिया है कि वो देश में फैले भ्रष्टाचार को मिटाने के लिए राजनीति में उतरेंगे और अगला लोकसभा चुनाव भी लड़ेंगे। ज़ाहिर है बाबा की ख्याति राजनीतिक गलियारों में चिंता की सबब बन चुकी है। ऐसे में बाबा का काले धन पर बोलना आग में घी का काम कर रहा है। ट्यूनिशिया से लेकर लीबिया तक सत्ता के खिलाफ फैले आक्रोश को दुनिया देख रही है। इजिप्त और ट्यूनिशिया में हुआ क्रांतिकारी बदलाव एक सटीक उदाहरण है। ज़ाहिर है हिंदुस्तान की सत्ता की कुर्सी पर विराजे लोगों के अंदर भी खौफ है। कहीं बाबा अपने भक्तों के साथ सड़क पर ना उतर जाए। फिलहाल बाबा राजनीति में उतरने के लिए धोती कस चुके हैं। देखना होगा कि आने वाला समय बाबा के लिेए अच्छा साबित होता है या नहीं.