Saturday, November 5, 2016

सवालों का नोटिस लीजिए, दीजिए नहीं साहब!


लोकतंत्र में बिना आवाज के स्टार्ट अप शुरू करना है!
   सवालों का नोटिस लेने वाले सरोकार सवालों पर नोटिस दे रहे हैं, २०१६ में दुनिया के सबसे महान और सबसे बडे लोकतंत्र का ये भी एक कडवा और भयावह चेहरा है। 
    हालात को इमरजेंसी करार दे दूं तो ट्रोल देशद्रोही करार दे देंगे। चलन नया शुरू किया है सरकार के सिपहसालारों ने। सवाल करना देशद्रोह है और जितना जल्दी यह समझ में आ जाए उतना ही बेहतर है। 
  "सर बागों में बहार है!" इस सवाल और इसका जवाब आपके लिए अच्छा है लेकिन जहां आपने पूछा "सर क्या बागों में बहार है?" समझिए आप अफजल गुरू के रिश्तेदार, हाफिज सईद के हमदर्द और पाकिस्तान प्रेमी जैसे ना जाने क्या क्या शब्दों से संवार दिया जाएंगे। 
      आजकल ट्रोल्स का जमाना है। हर पार्टी और सरकार के पास अपनी ही ट्रोल आर्मी है। ये आपको ईमानदारी से लेकर राष्ट्रभक्त तक हर बात का सर्टिफिकेट दे सकते हैं। इनके आकाओं पर आपने अगर सवाल उठाया तो आपको चरित्र के इतने टुकडे बिखेरेंगे कि आप सामाजिक जीवन में शर्मिंदा महसूस करने लगेंगे।
    रवीश सही कहते हैं, "दिल्ली" में कार्बन की मात्रा बढ गई है। सारे एक्सपर्ट कह रहे हैं PM10  से ज्यादा  PM 2.5 जानलेवा है। अब ये मत समझिएगा कि मैं PM10 को सरकार या पार्टी और PM2.5 को ट्रोल कहने की कोशिश कर रहा हूं। बाकी अगर आप आज के राजनीति को प्रदूषण कहना चाहते हैं तो आपकी मर्जी। 
     ताजा ताजा और नया नया सरकार ने इंट्रोड्यूस किया है और वो है "बैन"!
     मने सोचिए जरा! टीवी पर बैन लगा के वो सोचते हैं सच दब जाएगा? इंडिया है साहब! नया वाला इंडिया! हमारा इंडिया। 
     ७५ में तो पैदा तो नहीं हुए थे लेकिन इतिहास कहता है कि वो लोकतंत्र का काला दिन था। नेताओं को जेल में डाल दिया गया, अखबार बंद हुए, अदालत ठप्प हुए और सत्ता का दमनचक्र शुरू हुआ। अब 75 को इतिहास के पन्नों में खोजने की जरूरत नहीं है। बहुत कुछ सामने है।
   राज्य को मुख्यमंत्री और उपमुख्यमंत्री को हिरासत में लेना, विरोधी दल के नेता को गिरफ्तार करना वो भी इसीलिए क्योंकि वो किसी मृतक के परिवार से मिलने जा रहे थे?
    अगले दिन खबर आती है कि एक बडे विश्वसनीय चैनल को 24 घंटे के लिए बंद करने के आदेश दिए गए हैं। 
पठानकोट की कवरेज से ज्यादा क्या पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी को बुलाना गलत नहीं था।लेकिन वो तो रणनीति थी! है ना? वाह रे मापदंड!
  पत्रकारिता में मरे पडे लोगों की भीड में कुछ लोगों ने सवाल उठाया तो सरकार और उनकी फौज ने नेशनल सिक्योरिटी जैसे बडे बडे शब्दों को तीर चला दिए। लगा शायद सरकार सबक लेगी और नोटिस का दौर रुकेगा लेकिन तबतक २ और चैनल बंद करने का नोटिस प्राप्त कर चुके थे। यकीन कीजिए कि ये 2016 ही है। 
      अब ७५ और १६ के बीच मैं फर्क करने की कोशिश करता हूं तो मुझे ना जाने क्यों दिखता है कि सरकार अपनी हे देशवासियों के खिलाफ सर्जिकल स्ट्राइक पर आमादा है।
ये इमरजेंसी नहीं है लेकिन उससे कम दिखती है क्या? 
    जो अथॉरिटी हैं क्या उनकी जिम्मेदारी नहीं है जवाब देना? और अगर है तो सवाल पूछना देशद्रोह कैसे है? 
    एनकाउंटर में 8 सिमी सदस्य मारे गए, गंभीर आरोप थे उनपर लेकिन कोई सजायाफ्ता नहीं। एनकाउंटर सीधे-सीधे फर्जी नजर आता है, लेकिन जैसे सवाल उठाओ तो राष्ट्रद्रोही करार दे दिए जाएंगे। हवाला दिया जाता है कि फोर्सेस पर सवाल उठाने से उनका मनोबल गिरता है। 
   अरे क्या फर्जी और राजनीतिक एनकाउंटर नहीं होते? क्या पुराने सारे एनकाउंटर असली हैं? पुलिस कबसे सवालों से परे हो गई? 
   पुलिस मतलब ही सरकार होता है और सरकार से ही सवाल पूछे जाते हैं। सवाल से ही तो जिंदा और मुर्दा होने का फर्क पता चलता है। 
      सवाल उठाना सिर्फ धर्म नहीं हमारा अधिकार है, और संविधान द्वारा दिए गए अधिकारों पर हमला ही राष्ट्रद्रोह है। वो सारी सरकारें राष्ट्रद्रोही हैं जो सवाल पूछने पर हमला करती हैं। 
     नोटिस, गिरफ्तारी, विरोध और प्रदर्शन पर भी जब आवाज अनसुनी कर दी जाए तो समझिए आप अहंकार के दायरे में घुस चुके हैं। लेकिन यहां तो अहंकार अपनी सारी मर्यादाएं तोड रहा है।
    याद रखिए हिंदुस्तान का इतिहास गवाह है, इस देश ने बहुत गुनाह माफ किए लेकिन अहंकार कभी माफ नहीं किया। रामायण और महाभारत भी अहंकारी के साथ हुए परिणाम को बयान करते हैं। वक्त है संभल जाइए।