Wednesday, March 3, 2010

अब तारीख पर तारीख नहीं !




मोहन सिंह आज बड़ा खुश लगा रहा है। जिला कचहरी में चल रहा उसका बरसों पुराना केस आज वो जीत गया। अदालत में वकील साहब को उसने मिठाई खिलाई। वकील साहब के घर भी गया था। बड़े साहब उमाकांत को भी उसने मिठाई खिलाई। आखिरकार जमीन के कागजात लेकर वो अपने घर पर गया। लालजी की फोटो के आगे उसने कागज रखा और उन्ह प्रणाम किया। मोहन सिंह की मां और पत्नी आज बड़े खुश थे। मोहन सिंह की मां की आंखों से आंसू निकले। वो भी लालाजी की फोटो के आगे जाकर रोने लगी। उसके मुंह से निकला, अगर आप आज ज़िंदा होते तो इस जीत का मजा ही कुछ और होता। अब जाकर मेरी समझ में आया कि लालाली मोहन सिंह के पिता हैं। और जो केस मोहन 20 बरस की उम्र में जीता है उसकी शुरूआत तब हुई थी जब उसके पिताता यानि लालाजी 20 बरस के थे। 55 की उम्र में उनका निधन हो गया। तब मोहन की उम्र केवल 15 साल थी। लालजी की मौत के साथ ही उनके वकील उमाकांत भी रिटायर की उम्र तक पहुंच गए थे। इसलिए केस की ज़िम्मेदारी नई पीढ़ी की हाथ चली गई थी। अदालत में चक्कर पे चक्कर और तारीख पर तारीख लेने के बाद 30 साल का इंतजार ही था जिसकी बदौलत उन्हे 1 बीघा जमीन के केस में जीत मिली। उस एक बीघा जमीन के लिए लालाजी और मोहन सिंह ने 2 लाख रुपए से ज्यादा खर्च कर दिए। आज पचा चला कि उस जमीन की कीमत 50 हजार से भी ज्यादा नहीं है। ये भूमिका इसलिए दी ताकि अदालत से आपको रूबरू कर सकूं। इतना मैं भी जानता हूं कि अदालती प्रक्रिया के बारे में आपने भी बचपन से ही सुना होगा कि कोर्ट कचहरी के चक्कर में ना ही पड़ो तो अच्छा है। मैं भी ज्यादा नहीं कहुंगा क्योंकि जेल की दीवारें मुझे अच्छी नहीं लगतीं। बहरहाल अदालतों की कार्रवाई में पीढ़ियां ना बदलें इसलिए सरकार ने हाल ही में आनन-फानन में जजों की नियुक्ति की। लेकिन ढाक के तीन पात रहा सबकुछ। लेकिन एक बार ऊंट ने फिर करवट ली है। हायर जुडिशल सर्विसेज़ में जवाबदेही और मानक स्थापित करने के लिए प्रस्तावित नए कानून के तहत जजों को किसी मामले में बहस पूरी होने के बाद तीन महीने के अंदर अपना फैसला सुनाना होगा। कानून मंत्रालय के प्रस्तावित जुडिशल स्टैंडर्ड ऐंड अकाउंटेबिलिटी बिल 2010 का उद्देश्य न्यायिक सेवाओं में मानक स्थापित करना और ऐसी प्रणाली बनाना है जिससे सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट के जजों के खिलाफ दुर्व्यवहार और अयोज्ञता की शिकायतों को दूर किया जा सके। इस विधेयक में जजों की संपत्ति और दायित्वों की घोषणा का भी प्रावधान किया गया है। केंद्रीय मंत्रिमंडल की स्वीकृति के बाद इस विधेयक को वर्तमान बजट सत्र के दौरान इसे संसद के समक्ष पेश किए जाने की संभावना है। प्रस्तावित कानून में कहा गया है कि बहस पूरी होने के तीन महीने की समय सीमा के अंदर जज को अपना फैसला देना होगा। विधेयक के मसौदे में कहा गया है कि उच्च न्यायिक सेवाओं के सदस्यों को अपने न्यायिक कार्य के दौरान निष्पक्ष रहना चाहिए या उनके द्वारा दिए गए निर्णय धर्म, नस्ल, जाति, लिंग या जन्म स्थान से प्रभावित नहीं होने चाहिए। विधेयक के अन्य दिशा निर्देशों में कहा गया है कि जज चुनाव नहीं लड़ सकते, वे किसी क्लब या संगठन के सदस्य नहीं हो सकते, बार कांउसिल के किसी सदस्य के साथ घनिष्ठता नहीं बढ़ा सकते, अपने संबंधियों के अलावा और किसी से उपहार या मेहमाननवाजी नहीं स्वीकार कर सकते और उन कंपनियों के मामलों की सुनवाई नहीं कर सकते जिनके शेयर उनके पास हैं। प्रस्तावित कानून में कहा गया है कि जज को अपने किसी निर्णय के संबंध में मीडिया को इंटरव्यू नहीं देना चाहिए। इसके अलावा जजों को राजनीतिक मसलों पर किसी सार्वजनिक बहस में भाग नहीं लेना चाहिए। जजों द्वारा न्यायिक मानकों को गिराने वाले किसी भी कदम के लिए उनके खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई की जाएगी। जजों के विरूद्ध दुर्व्यवहार या भ्रष्टाचार की शिकायत को तीन जजों की जांच समिति के समक्ष पेश किया जाएगा। जांच समिति यदि जज के खिलाफ किसी शिकायत को वाजिब पाती है तो उसे न्यायिक निगरानी समिति के पास भेजा जाएगा। यह समिति मामले की जांच कर जांच रिपोर्ट को राष्ट्रपति के पास उक्त जज के खिलाफ कार्रवाई के लिए भेजेगी। राज्यसभा के सभापति के रूप में उप राष्ट्रपति न्यायिक निगरानी समिति की संभवत: अध्यक्षता करेंगे। इस समिति के अन्य सदस्यों में भारत के चीफ जस्टिस, सीजेआई द्वारा नामांकित हाई कोर्ट के एक चीफ जस्टिस और राष्ट्रपति द्वारा नियुक्त किए गए दो नामचीन कानून के जानकार शामिल होंगे। भारत के सभी 21 हाई कोर्ट्स में एक-एक जांच समिति का गठन किया जाएगा। विधेयक के मुताबिक जज के दुर्व्यवहार के अनुसार उसे चेतावनी, फटकार या प्रतिबंध की सजा दी जा सकती है। लेकिन यदि न्यायिक मानकों के उल्लंघन की प्रकृति गंभीर है तो उसके खिलाफ महाभियोग लगाया जा सकेगा। इस विधेयक के बाद अदालत में तारीखों के दान पर रोक लगेगा या नहीं इसके लिए हमें विधेयक के लागू होने तक का इंतजार करना पड़ेगा।

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