Monday, July 26, 2010

इज्जत का सवाल है...




कॉमनवेल्थ गेम्स नज़दीक हैं। चारों ओर हल्ला है कि देश की इज्जत खतरे में है। देश की नाक कट जाएगी। सरकार ने पानी की तरह पैसा बर्बाद कर दिया। लेकिन कबतक इस शोर से हम सरकार को जगाने की कोशिश करेंगे। एक बार हमें भी तोसोचना होगा....मैं नोएडा से कनॉट प्लेस आ रहा था। यात्रा के दौरान मुझे एक साल पीछे की तस्वीरें दिखाई देने लगीं। उन तस्वीरों और आज की तस्वीरों में जो फर्क दिखा वो सकून देने वाला था। एक पल मैं ये सोचने को मजबूर हो गया कि मैं दिल्ली में ही हूं या कहीं और। जिन सड़कों पर गाड़ियों का काफिला लग जाता था आज वहीं गाड़ियों को इंतजार नहीं करना पड़ता। सिंगल लेन सड़क डबल लेन के बराबर हो गई है। फ्लाई ओवर ने रास्ता और आसान कर दिया। एक दूसरा फ्लाईओवर जो डबल लेन का है उसके खुलने के बाद ये रास्ता बेहद आसान हो जाएगा। चारों ओर हरियाली है। जितने पेड़ काटे गए उससे कहीं ज्यादा लगाए गए हैं। खेलगांव और अक्षरधाम मंदिर के पास से होती हुई सड़क पर अब ट्रैफिक नहीं लगता। इसी इलाके में खिलाड़ियों के लिए बनाए गए फ्लैटों की खूबसूरती देखते ही बनती है। यहां भी एक फ्लाईओवर बनाया गया है। यानि ट्रैफिक की समस्या यहां भी बस कुछ दिनों की बात है। अब आइए इंद्रप्रस्थ पार्क के पास...तस्वीरें यहां भी आपको खुश कर देंगी। चौड़ी होती सड़कें और खूबसूरत पार्क देखने लायक है। इसी तरह दिल्ली की तमाम सड़कों को देखिए कहीं सड़के चौड़ी हो रही हैं तो कहीं फ्लाईओवर बन रहे हैं। आखिर ये किसके लिए हैं ? मैं ये नहीं कहता कि सरकार जनताका भला सोच रही है...जाहिर है जितना पैसा खर्च हमारे भले के लिए किया गया है उसके आंकड़ों में हेरा-फेरी की गई है। कई बाबुओं की तिजोरी भर चुकी है खेलों के नाम पर। खेल सर पर हैं और हम दिल्ली की एक अलग ही तस्वीर दुनिया को दिखा रहे हैं। सब कहते हैं कि देश की नाक कटने वाली है....मैं बचपन से एक कहावत सुनता हूं...फर्स्ट इंप्रेशन इज़ लास्टइंप्रेशन....। मतलब भी सुनिए। खिलाड़ी और हमारे विदेशी मेहमान जब सरज़मीन-ए-हिंदुस्तान पर कदम रखेंगे तो उनकी आंखों के सामने होगा दिल्ली का टी-3 टर्मिनल। इस एयरपोर्ट के बारे में मीडिया के जरिए सारा देश जानता है। अंतरराष्ट्रीय स्तर के इस एयरपोर्ट पर उतरते ही उन्हे भारत की शान का अंदाज़ा होगा। एयरपोर्टसे निकलते ही उन्हे मिलेगी एयरपोर्ट लाइन मेट्रो। हवा की रफ्तार से हमारे मेहमान दिल्ली के दिल पर दस्तक देंगे। कनॉट प्लेस की खूबसूरती उन्हे दिल्ली का दीवाना बना देगी। जाहिर है पहली तस्वीर उनके जेहन में उतर जाएगी। तो शिकायत का मौका नहीं मिलेगा। खेलों के दौरान कमर्शियल गाड़ियों,ब्लूलाइन बसों को हटा दिया जाएगा। यानि सड़कों पर से 30 फीसदी ट्रैफिक कम हो जाएगा। सरकार दिल्ली की जनता से आग्रह करेगा कि खेलों के दौरान निजी वाहनों का इस्तेमाल कम से कम करें। दिल्ली की जनता भी देश की इज्जत की खातिर थोडी कुर्बानी देकर मेट्रो से सफर करेगी। स्कूल, कॉलेज और सरकारी दफ्तर बंद रहेंगे। यानि ट्रैफिक की समस्या हमारे मेहमानों के सामने नहीं आएगी। एक न्यूज़ चैनल पर पूर्व खेल मंत्री मणिशंकर अय्यर ने कहा था कि वो नहीं चाहते कि कॉमनवेल्थ थेल सफल हों। अय्यरसाहब से कोई पूछे कि कल को आप उनके देश क्या नहीं जाएंगेजो आपके दरवाजे पर आने वाले हैं। आप ना भी जाएं लेकिन आपको कोई हक नहीं कि आप देश की इज्जत का फैसला करें। हमें भी उनके देश जाना है। मीडिया पर लगातार दिखाया जा रहा है कि तैयारियां पूरी नहीं हुई हैं। मैं भी जानता हूं कि तैयारियां पूरी नहीं हुई हैं। लेकिन मैं वो तस्वीर भी देखना चाहता हूं जिसमें दिल्ली का वो चेहरा भी दिखाई दे जिसमें विकास की तस्वीर दिखती है।वो सड़कें देखना चाहता हूं चोडबल लेन के बराबर हो चुकी हैं और जिन सड़कों के बीच पौधे लगाकर हरा-भरा करने की कोशिश की गई। रामकृष्ण आश्रम मेट्रो से होकर पहाड़गंज की ओर जाइए...यकीन मानिए तस्वीर बिलकुल अलग है। हरियाली के साथ सड़कों के किनारे लटकने वाले जानलेवा बिजली के तार अब आपको नज़र नहीं आएंगे। सीवर सिस्टम बेहतर हो चुका है। लाने पक्के और सीमेंटेड हैं। सड़कों पर मलबा पड़ा है, मैंने भी देखा है। लेकिन सड़कों पर लगे बिजली के नए खंबे भी मैंने देखे हैं। बिजली की कमी के बावजूद भी दिल्ली में बिजली की कटौती ज्यादा नहीं हुई। अमूमन चारों ओर यही हाल है। खेल मंत्री गिल ने एक बार कहा था कि तैयारियों के बारे में मीडिया सवाल ना उठाए क्योंकि हमारे देश में बारात आने तक लड़की के घर में तैयारी होती है।ये बयान एक मंत्री के लिए शर्मनाक है लेकिन हम सब जानते हैं कि येसच भी है। मैं सरकार की भाषा नहीं बोल रहा हूं। लेकिन अपने देश की इज्जत की चिंता मुझे भी है। कई खिलाड़ी और मेहमान देश में आ चुके हैं। मीडिया में तैयारियों पर सवाल लगातार उठ रहे हैं। इन सवालों पर नज़र उनकी भी पड़ रही है। जाहिर है दिल्ली का एक ऐसा चेहरा वो देख रहे हैं जो उन्हे नहीं देखना चाहिए। आखिर अपने घर की बात है, किसी और को क्यों बताएं। खेलों के बाद हर घोटाले का हिसाब लिया जा सकता है। किसने कहां कितना पैसा खाया इसबात की पड़ताल की जा सकती है। लेकिन फिलहाल वक्त है हमारे मेहमानों को 'फीलगुड' कराने का। क्योंकि दिल्ली बदल रही है। सरकार को हम बदल सकते हैं लेकिन सरकारी बाबुओं को नहीं। इसलिए उन्हे सबक जरूर सिखाया जाए..लेकिन देश की इज्जत बचाने के बाद।

Saturday, July 24, 2010

सलेम पर हमला !




मुंबई....अंडरवर्ल्ड का सेंट्रल प्वाइंट है। ये शहर कई गैंगस्टरों को पैदा करता है। यहां किसी एक की सत्ता नहीं चलती। लेकिन शहर पर हक हर कोई जताता है। जिसके पास जितने आदमी उता ही शहर उसका। जिसके पास जितनी पुलिस उतनी ही पकड़ मजबूत....यही है मुंबई अंडरवर्ल्ड का सच। खबर आपने सुनी होगी। मुंबई की आर्थर रोड जेल में फिर गैंगवार हुई। जेल में बंद 93 में हुए धमाकों के आरोपी अंडरवर्ल्ड डॉन अबू सलेम पर जानलेवा हमला हुआ। कहा जा रहा है कि सलेम पर ये हमला दाऊद इब्राहिम के गुर्गे मुस्तफा मंजू उर्फ मुस्तफा दौसा ने करवाया है। दौसा भी इसी जेल में बंद है। दौसा और उसके आदमियों ने सलेम पर धारदार हथियार से हमला किया। जांच में पता चला कि हमला कैदियों द्वारा इस्तेमाल की जाने वाली चम्मच से हुआ। आर्थररोड जेल प्रशासन के लिए इस तरह की खबर नहीं है। इससे पहले भी जेल में राजन के खास गर्गे डीके राव पर हमला हो चुका है। हमले के बाद राव को अंडासेल में भेज दिया गया। अंडासेल में रहकर भी राव ने अपने विरोधियों से बदला लिया। राव के लोगों ने दाउद के कई गुर्गों पर हमला करवाया। इन हमलों में एक खास तरह के हथियार का इस्तेमाल किया गया। जेल के कैदी एल्यमिनियम की जिस प्लेट में खाना खाते हैं उसी प्लेट के किनारे वाले हिस्से को जेल के अंदर पत्थरों पर घिसकर उसे नुकीला बनाते हैं। और इसी हथियार से जेल के अंदर होता है गैगवार। जेल के अधिकारियों को इस खास हथियार के बारे में पता है। 1995 के बाद से इस जेल में लगभग हर साल गैंगवार होते रहे। हर बार हमले का तरीका एक ही रहा। लेकिन अब तक प्रशासन ने कोई खास कदम नहीं उठाए।
मुंबई अच्छी तरह जानती है कि अंडरवर्ल्ड के तार मुंबई पुलिस से जुड़े हैं। जेल में दाउद के गुर्गों को हर वो चीज़ मुहैया है जो उन्हे बाहर मिल सकती है। अच्छा खाना, अच्छा बिस्तर, केबल टीवी और वो सबकछ जिसकी जरूरत उन्हे है। बदल में उन पुलिसवालों को दुबई से तनख्वाह मिलती है। सलेम किसी ज़माने में दाउद के साथ डी कंपनी चलाता था। मनमुटाव हुआ और दाउद का दामन सलेम ने छोड़ दिया। तब तक छोटा राजन उर्फ दीपक निकालजे
दाउद के साथ था। सलेम को दाउद के तमाम धंधों की जानकारी थी। सलेम का साथ छोड़ना दाउद को रास नहीं आया। कहा तो ये भी जाता है कि सलेम को गिरफ्तार करवाने के लिए दाउद ने भी काफी हाथपैर मारे थे। पुर्तगाल में दाउद का ड्रग्स का कारोबार है। जाहिर है पुर्तगाल सरकार और पुलिस में उसकी अच्छी पैठ है। इंटरपोल का नोटिस पहले ही सलेम के खिलाफ था। भारतीय इंटेलीजेंस ने जब सलेम के प्रत्यर्पण की बात पुर्तगाल सरकार से की तो दाउद ने भी सलेम की गिरफ्तारी के लिए प्रयास किए। सलेम मुंबई पुलिस के पास आ गया। लेकिन दाउद को अब ये डर है कि कहीं सलेम के सीने में दफन वो राज जो दाउद के कारोबार पर असर डाल सकता है, कहीं मुंबई पुलिस को पता चल जाए। पुलिस में दाउद के कई लोग हैं। इनकी मदद से दाउद सलेम को लगातार परेशान करवाता रहा। सलेम की जान को शरू से ही खतरा था। और इस बार तो उसपर बाकायदा हमला हो भी गया। यानि जेल के अंदर हो या बाहर अंडरवर्ल्ड हर जगह हावी है। भाई के लोग आपको देख रहे हैं....