

इलाहाबाद का नाम सुनते ही संगम नगरी का चेहरा सामने आ जाता है। जो लोग इस तीर्थ को देख चुके हैं उनकी यादें एक बार फिर ताजा हो जाएंगी। लेकिन जिन्होंने इस इस देवनगरी के दर्शन नहीं किए हैं उन्हे मैं इलाहाबाद का दर्शन कराउंगा। 26 साल तक मैंने केवल इस नगरी का नाम सुना था। कुछ ऐसा संयोग बना कि अब मैं अक्सर इलाहाबाद जाता रहता हूं। दिल्ली से प्रयागराज एक्पप्रेस में रात 9 बजकर 25 मिनट पर मैं चला। इसे वीआईपी ट्रेन कहते हैं और अगर कोई प्राकृतिक आपदा ना आए तो ट्रेन अक्सर वक्त पर य़ानि अगले दिन सुबह साढे 6 बजे आपको संगम नगरी पहुंचा देती है। तो साहेबान अगले दिन मैं भी वक्त पर इलाहाबाद पहुंच गया। स्टेशन से बाहर निकलते ही आपको अंदाज़ा हो जाएगा कि आप उत्तरप्रदेश में आ गए हैं। जनाब इलाहाबाद में मैं आपका स्वागत करता हूं। रेलवे स्टेशन से बाहर आइए। यहां आनेवाले ज्यादातर मुसाफिर संगम की ओर बढ़ते हैं। तो चलिए आपको भी संगम ले चलता हूं। हिंदुस्तान की ज्यादातर आबादी ये जानती है कि इलाहाबाद में संगम कहां है और इसका नाम संगम क्यों पड़ा। संक्षिप्त में आपको मैं भी बतादूं, इलाहाबाद में जिस जगह पतित पावनी गंगा, जीवन दायिनी यमुना और पवित्र सरस्वती आपस में मिलती हैं उसे संगम कहते हैं। रेलवे स्टेशन के बाहर तीन पहिए वाले ऑटोरिक्शा (विक्रम) वाले आपका स्वागत करेंगे। एक साथ वो आपपर झपटेंगे। अपने विवेक से काम लें और सही जगह देखकर विक्रम की सवारी का मजा लें। हां अपने सामान की जिम्मेदारी आपकी ही होगी ये बताने की जरूरत नहीं है। तो जनाब इलाहाबाद की गलियों से आप गुजरें। जर्जर होती पुरानी इमारतों के बीच से आप चल रहे हैं। सड़कें पतली हैं और गाड़ियों का काफिला दोनों ओर से गुजर रहा है। किस्मत अच्छी रही तो ज्यादा ट्रैफिक जाम नहीं मिलेगा। बाजार, गली, मोहल्ला पार करने के बाद आपको खुली सड़क भी मिलेगी। बीच-बीच में कई सारे छोटे-छोटे मंदिर भी मिलेंगे। लोगों ने अपने पसंदीदा देवताओं की श्रद्धा के हिसाब से मंदिर बना रखे हैं। चाहें तो रिक्शा में बैठे-बैठे ही सिर झुकाकर आस्था प्रकट कर लें। लोग अक्सर ऐसा करते हैं। हां अगर जोर-जोर से मंदिरों में लाउडस्पीकर पर फिल्मी धुनों पर भजन बज रहे हों तो परेशान ना हों। आस्था प्रकट करने का लोगों का अपना-अपना तरीका। मंदिरों के जमघट पार करने के बाद आप रूबरू होंगे पुराने पुल से। आप चाहें तो नए पुल से भी जा सकते हैं। लेकिन वहां से में आपको बाद में ले चलुंगा। तो साहब हम पहुंच गए पुराने पुल पर। अंग्रेजों के जमाने से चला आ रहा पुल हिलता जरूर है लेकिन अभी तक गिरा नहीं है। आए दिन सरकारी खर्चे पर इसकी मरम्मत भी होती है। मरम्मत के बहाने स्थाई ठेकेदार की दुकानदारी भी चल जाती है। पुल के ऊपर से ट्रेनें भी गुजरती हैं। अगर उसी दौरान नीचे से आप भी गुजर रहे होंगे तो शोर से आपको तकलीफ भी हो सकती है। बहरहाल अब पुल से अपने दोनों ओर देखिए। पुल के नीचे यमुना मैया आपको दर्शन देंगी। अगर वक्त सुबह का है सूरज की रोशनी के चलते आपको यमुना का पानी काला नहीं दिखाई देगा। हाथ जोड़कर उनसे माफी मांगिए कि हे यमुना मैया हम तुम्हारा पानी काला होने से नहीं बचा सकते, हमें माफ करो। ऑटो में बैठै-बैठे आप देख सकेंगे कि कैसे स्थाई लोगों के साथ बाहर के मुसाफिर भी अपने घर का बचा-खुचा सामान यमुना नदीं में प्रवाहित करके पुण्य प्राप्त करने का लाभ महसूस करते हैं। उन्हे ये मत कहिएगा कि आपने कचरा नदी में क्यों बहाया। वो आपसे नाराज़ हो सकते हैं। उन्हे लगता है कि उनके घर की गंदगी यमुना स्वीकार करेंगी और उन्हे यश का प्रसाद देंगी। अपने बाईं ओर थोड़ी दूर देखने की क्षमता अगर आप में होगी तो आप संगम भी देख सकेंगे। ध्यान देंगे तो आपको गंगा मैया की कराह भी सुनाई देगी जो अपने बेटों से कहती है कि मेरा दर्द सुनो। मुझे बचाओ, मेरा अस्तित्व खतरे में है। लेकिन हम हिंदुस्तानी हैं, दूसरों की दर्द की परवाह किए बगैर सतत आगे बढ़ते जाना हमारी आदत में शामिल है। किसी और की पीड़ा सुनने के लिए हमारे पास वक्त नहीं है। तो दर्द और मायूसी से बाहर निकलें। पुराना पुल पार हो चुका है। आगे बढ़ें,तो गुलाब के फूलों की मंडी से गुजरेंगे। खुशबू से आपको अच्छा महसूस होगा। थोड़ा और आगे आएंगे तो एक बड़ा चौराहा पड़ेगा। यहां से सीधा रास्ता आपको नैनी, बनारस और विंध्याचल की ओर ले जाएगा। बाईं सड़क आपको नए पुल से होते हुए वापस इलाहाबाद शहर की तरफ ले जाएगी। दाईं तरफ की सड़क पर ध्यान ना दें। वहां आपको सड़क किनारे कई ट्रक दिखाई देंगे। और ड्राइवरों से बातचीत करते पुलिस वाले। उनके बीच होनेवाले लेन-देन को बिलकुल ना देंखें। नहीं तो आप उन्हे घूसखोर कहेंगे। और अगर आपने ऐसा किया तो आपका सफर प्रभावित हो सकता है। इसलिए बिलकुल भारतीय बनकर आगे बढ़े। चलिए अब इसी चौराहे से संगम की ओर चला जाए। नए पुल पर आपका स्वागत है। देश में विदेशी तरीके से बना ये पुल आपको बेहद खूबसूरत लगेगा। इस पुल से आप नीचे यमुना का गंदा पानी भी देख सकेंगे। इक्का-दुक्का मछुआरे भी अपनी छोट-छोटी नाव में दिखाई देंगे। पुल पर बने बड़े-बड़े खंबे और खंबों से लगे लंबे-लंबे तार आपको किसी दूसरे देश में होने का अहसास कराएंगे। इस पुल पर अगर कुछ देर रुकने की इच्छा है तो उसे रिक्शावाले को व्यक्त ना करें। क्योंकि वो रुकेगा नहीं। हां अगर आप चाहें तो रिक्शा रोक लें और कुछ देर रुककर दूसरा रिक्शा लें। यहां कुछ तस्वीरें आप ले सकते हैं। आपनी यात्रा की यादगार के लिए। आब आगे चलिए...पुल पार करने के बाद सड़क के दाईं ओर बनी पतली सड़क पकड़ लें। ये रास्ता आपको संगम की ओर ले जाएगा। लगभग 2 किलोमीटर चलने के बाद आप पहुंचेंगे तीर्थराज प्रयाग नगरी के संगम पर। कथा में वर्णित तीन की बजाए आपको दिखेंगी केवल 2 नदियां और उनका संगम। नदी के किनारे आते समय अपने आस-पास की दुकानों को देखिए। यहां पूजा-पाठ से जुड़ा हर सामान आपको मिलेगा। थोड़ा और नीचे गए तो मचान के नीचे तख्ता लगाकर आपको साधू बाबा भी दिखेंगे। ये प्राणी यहां भारी मात्रा में पाए जाते हैं। आपकी इच्छा हो या ना हो ये आपको अपना चेला बना ही लेंगे। चलिए टीका लगवाइए और इन्हे दस-पांच रुपए देकर आगे बढ़िए। अब अपने जूते उतारकर पवित्र यमुना के ठंडे पानी में पैर डालिए। उस अहसास का वर्णन करना मेरे लिए भी कठिन है। अपने सामने थोड़ी दर पर देखिए जहां गंगा और यमुना का मिलन होता है। यहां नाव वाले भी मिलेंगे। किसी नाव में बैठिए, 10 रुपए दीजिए और संगम पर पहुंच जाइए। नाव पर बैठे-बैठे ही संगम की धारा को अपने हाथों से स्पर्श कीजिए। गंगा और यमुना की महानता आपको खुद-बखुद समझ में आ जाएगी। उस पवित्र धारा में 3 डुबकी लगाइए और प्राचीन कथाओं के अनुसार अपने पापों को धो लीजिए। शीतल जल में स्नान के बाद आप एक बार ये महसूस करेंगे कि इस धारा का जल सदैव निर्मल रहे इसके लिए आपभी कुछ प्रयास करेंगे। लेकिन नदी से बाहर आने के बाद आपकी याद्दाश्त कुछ कमजोर हो जाएगी। चिंता ना करें, इसका भी बंदोबस्त बाहर है। यहां कई बड़-बड़े सरकारी घड़े रखे हैं। और किनारे लगे बड़े-बड़े बैनरों पर लिखा है कि नदी में कचरा ना डालें। लेकिन इसकी परवाह किए बिना लोग गंगा-यमुना में कचरा डालकर पवित्र होने का मौका खोना नहीं चाहते। अब चाहे तो क्रोध कीजिए या फिर अफसोस कीजिए लेकिन लोगों को कुछ मत कहिए। बेवजह नाराज हो जाएंगे। नदी से बाहर ऊपर की तरफ आईए। सामने एक राजा का किला है। कभी लोग परिवार के साथ घूमने आते थे, आजकल शहर के रोमियो-जूलियट के लिए पनाहगार है किला। जिस ओर नहीं जाना उसका जिक्र क्या करना लेकिन फिर भी मन में कुछ और चल रहा है तो जाइए घूम आइए। वापस आकर संगम किनारे बने मंदिरों के दर्शन भी कर लें। यहां एक बजरंगबली का भी मंदिर है। सुना है कि ये मंदिर बरसात के समय एक बार पानी से जरूर भरता है। गंगा मैया हनुमानजी को अपना दर्शन देती हैं। यहां अपनी इच्छानुसार पूजा-प्रार्थना कीजिए। पंडित जी बाहर मिलेंगे ही..आप चाहें तो हवन वगैरह भी करवा सकते हैं। अब संगम से बाहर निकलें तो इलाहाबाद बाजार की ओर चलें। सबसे पहले चलते हैं चौक बाजार में। यहां आपको इलाहाबाद का हर रंग मिलेगा। चौक बाजार खाने-पीने की चीजों के लिए प्रसिद्ध है। बाजार के एक ओर चा वालों का कब्जा है दूसरी ओर मिठाई वालों का। यहां की चाट अगर आपने एक बार चख ली तो दिल्ली और बंबई वालों की चाट का जाएगा आपको दोबारा नहीं भाएगा। तरह-तरह के चाट मिलते है यहां। गोलगप्पों के साथ-दही वड़ा भी काफी मशहूर है। जी ललचाए और अगर रहा ना जाए तो किसी भी चाट की दुकानपर जाइए और टूट पड़िए। लेकिन चाट की दुकानपर जाकर टमाटर वाली चाट एक बार जरूर खाएं वो भी बिना मीठी चटनी के। चाट की कीमतें इतनी सस्ती हैं कि अगर 20 रुपए में आप हर तरह की चाट का जाएका ले सकते हैं। गोलगप्पे, आलूचाट, टिक्की और टमाटर चाट खाने के बाद भी 20 रुपए खर्च नहीं होंगे। कम कीमत में उम्दा जाएका लेने के बाद मोहन जाचा की लस्सी जरूर पीजिए। इनकी दुकान काफी प्रसिद्ध है। 2 तरह की मलाई के साथ खड़ी चम्मच वाली लस्सी मिलेगी यहां। खड़ी चम्मच से अर्थ है कि लस्सी इतनी गाढ़ी कि चम्मच डालने पर वह गिरेगा नहीं। लस्सी में केसर और गुलाबजल पड़के बाद इसका जाएका और भी बढ़ जाएगा। मोहन चाचा की लस्सी के बाद सामने की दुकानों पर आप लाल पेड़े का स्वाद लेना ना भूलें। इसका स्वाद आपको जिंदगी भर याद रहेगा। यहां एक और मिठाई भी प्रसिद्ध है। परवर वाली मिठाई। ये मिठाई आपने शायद ही खाई होगी। इसका जाएगा आपके लिए यादगार रहेगा। चाहें तो इसे पैक भी करा सकते हैं लेकिन ये ज्यादा दिन नहीं टिकता। परवर मिठाई पैक कराइए और अब जाएगा लीजिए दही जलेबी का, मजा आ जाएगा। अब इस बाजार से बाहर निकलकर आगे बढ़े। आगे मिलेगी बताशेवाली गली। सफेद-सफेद बताशे आपको गांवों के मेलों की याद दिलाएंगै। सिक्के के बराबर बताशे के साथ आपको पूड़ी के बराबर के बताशे भी आपको बताशामंडी में मिल जाएगा। साइकिलरिक्शों के जमघट और भीड़-भाड़ से बाहर निकलें। अब आगे चलते हैं सिविल लाइंस की ओर। इलाहाबाद के लोग यहां से कपड़ों की खरीददारी करते हैं। यहां बिगबाजार भी है। शहर आधुनिकीकरण की ओर बढ़ रहा है। यहां भी हनुमान जी का मंदिर है। दर्शन कीजिए और यहां मिलनेवाली मिठाईयों का भी जाएका लीजए। चाहें तो पास ही में एल्फ्रेड पार्क भी जा सकते हैं। शहीद चंद्रशेखर आजाद ने यहीं कुर्बानी दी थी। इन खास जगहों के दर्शन के बाद वापस रेलवे स्टेशन लौटें और वापस अपने घर की गाड़ी पकड़ें।
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