Monday, March 8, 2010

बहुत चालाक है कांग्रेस !




साल 2010 का बजट कितनी खुशियां लाया, ये किसी मध्यवर्गीय परिवार से पूछिए। उस परिवार से जो 20हजार में अपनी सारी जरूरत पूरी कर लेता है। सरकार के टैक्स के साथ बच्चों की पढ़ाई, बहन-बेटी की शादी, पत्नी और माता-पिता की दवाई के साथ घर की जरूरतें, ये तमाम जरूरत वो परिवार महज 20 हजार रुपए मासिक आमदनी में पूरी कर लेता है। इस बजट से उसने जो उम्मीदें की वो टूट गई होंगी। घर में अगर गाडी है तो इस बजट के वार ने उसे घायल जरूर किया होगा। बजट में पेट्रोल-डीजल महंगा हो गया। नतीजा तमाम जरूरत की चीजों के दाम आसमान पर पहुंच गए। यूपीए सरकार ने आम जनता खून चूस-चूस कर अपनी जेबें भर लीं। सरकार के तमाम मंत्री देश-विदेश का जायजा लेते रहे। लेकिन महंगाई के बोझ तले जनता की सुध लेने की किसी ने नहीं सोची। सरकार को जगाने के लिए देश की दूसरी राजनीतिक पार्टियां एकजुट होने लगीं। हालांकि इनका मकसद देश के साथ हमदर्दी नहीं बल्कि जनता की तकलीफों की लौ में अपनी रोटियां सेंकना था। तो जनाब देश की दूसरी पार्टियां सरकार के खिलाफ लामबंद होने लगीं। सरकार को डर सताने लगा। मामला इसके पहले गंभीर हो जाए, कांग्रेस ने फूट डाले राज करो की नीति अपनाई। नतीजा महिला आरक्षण बिल का सामने आना। सन 96 में जिस विधेयक को लेकर सरकार घिरी थी, उसी विधेयक के जिन्न को यूपीए ने अपने फायदे के लिए फिर जगाया। महिला आरक्षण बिल को संसद के इसी सत्र में पास कराने की कवायद शुरू हो गई। महंगाई पर सरकार को घरने के लिए पूरी ताकत लगाने वाला विपक्ष महिला आरक्षण बिल के वार से चकनाचूर हो गया। पार्टियों की एकता गर्त मे चली गई। पने ही परा होने लगे। महिलाओं के खिलाफ बोलकर कोई भी पार्टी अपना वोटबैंक खत्म करने का रिस्क नहीं लेना चाहती थी। इसलिए बीजेपी और लेफ्ट ने बिल का समर्थन कर दिया। लेकिन कई क्षेत्रीय पार्टियों में बगावत के सुर उठने लगे। जेडीयू में भी दरार पड़ी। तो समाजवादी पार्टी भी बिल के खिलाफ हो गई। इन पार्टियों की मजबूरी ये है कि अगर महिला आरक्षण बिल पास हो जाता है तो इनके पास महिला चेहरे ऐसे नहीं हैं जिसे सामने रहकर ये वोट हथिया सकें। जाहिर है इनके अस्तित्व पर खतरा हो सकता है। इसके उलट लेफ्ट और बीजेपी के पास ऐसे चेहरे हैं जिसे वो कैश करा सकते हैं। लेकिन कामयाबी पर सवाल अभी भी है। लेकिन आरक्षण बिल का निवाल ना ही ये पार्टियां निगल सकती हैं और ना ही उगल सकती हैं। इसलिए नाराजगी झेलने से अच्छा है कि बिल के समर्थन में आ जाएं। इस बिल का प्रस्ताव रखते ही विपक्ष समेत सारे देश का ध्यान महंगाई से हट चुका है। देश के विकास का दम भरने वाली कांग्रेस देश को खोखला होने से बचाने के बजाए अब अपनी राजनीतिक जमीन को मजबूत कर रही है। हम किसी के उद्देश्य के खिलाफ नहीं हैं। लोकतंत्र में कोई भी अगुवाई कर सकता है। लेकिन पहले अपना फर्ज तो पूरा करे। महंगाई दर गिरती रही लेकिन कीमतों ने आसमान से नीचे उतरने का नाम ही नहीं लिया। कृषि मंत्री शरद पवार कहते हैं कि रबी की फसल आने के बाद महंगाई कम होगी। चीनी के दाम भगवान पर छोड़कर शरद पवार भी निश्चिंत हैं। आखिर उन्हे तो 9 घंटे की नौकरी के बाद महीने की तनख्वाह पर गुजारा तो नहीं करना है। आम आदमी पिसता है तो पिसे। उन्हे क्या ? भगवान ने चाहा तो रबी की फसल जल्द ही बाजार में आ जाएगी। लेकिन इस बात का यकीन कौन दिलाएगा कि बिचौलिए और दलाल इस फसल में सेंध नहीं लगाएंगे। आखिर सरकार ने महंगाई के लिए इन्हीं दीमकों को जिम्मेदार ठहराया था। जब महंगाई पर सारा देश अपना सुर एक कर रहा था तो कांग्रेस ने नया शिगूफा छेड़कर सबका ध्यान दूसरी ओर कर दिया। आम जनता के दुख को समझने का दम भरने वाले नेताओं के सुर भी बदल गए। अब महंगाई की लड़ाई कौन लड़ेगा। आम जनता की आवाज सरकार तक नहीं पहुंचेगी, इतना तो देश जानता ही है। इसलिए अब ये आवाज राख के नीचे दब गई है। लेकिन सरकार ये ना भूले कि चिंगारी पर सिर्फ राख पड़ी है। आग तो अंदर बाकी है...

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