Tuesday, March 21, 2017

क्योंकि हमें जनादेश मिला है......

जनादेश का सम्मान किसी भी संवैधानिक राष्ट्र के जिंदा और स्वस्थ होने का प्रमाण होता है कोई भी जनादेश सवाल पूछने या सवाल उठाने के मौलिक अधिकार से ऊपर नहीं हो सकता। जनादेश दरअसल जिम्मेदारी का ही लोकतांत्रिक पर्याय है़। लेकिन आज माहौल बदल चुका है या यूं कहें कि माहौल बदलने की कोशिश धडल्ले से जारी है। इस बदले हुए माहौल में सत्ता परम सत्य है और सत्ताधारी हरिशचंद्र से भी बडे सत्यवादी, क्योंकि हमें जनादेश मिला है।
    अब मोमबत्ती जलाने से भी दिल नहीं पसीजते बल्कि अब हर सवाल पर इंसाफ मांगने के लिए जलने वाली मोमबत्ती की लौ बुझाने वाली सेना राष्ट्रवाद के नाम पर हाथ में चाबुक लिए घूम रही है। इस माहौल में राम राज्य के नाम पर जनादेश तो मिला लेकिन राज्य बदलने की उम्मीद दूर दूर तक नहीं दिखती।
  जनता को आजादी देने के नाम पर मिले जनादेश के बाद प्रजा को अनदेखे डर से डराने की कोशिश का दौर है ये। स्याही फेंकने वालों को सम्मान और स्याही से लिखने वालों पर स्याही फेंकने का दौर है ये। स्याह इतिहास की ओर देश को धकेलने का दौर है क्योंकि अंधेरा होगा तो ना आप कुछ देख पाएंगे ना आपको कुछ देखने दिया जाएगा। स्याह अंधेरे में दोस्त और दुश्मन कोई नजर नहीं आएगा।
  बस लौ बुझाने वालों की आवाज आएगी और उनके बताए रास्ते पर चलने को मजबूर हो जाएंगे, ये जाने बिना कि वो रास्ता किस तरफ जाता है। ये जाने बिना कि वो रास्ता आगे कुंए की ओर जाएगा या खाई में।
   ये सत्ता के साथ सुख भोगने का दौर है। सत्ता का वो सुख जो मृगमरीचिका की तरह दिखता तो है लेकिन मिलता नहीं। सत्ता सार्थक सत्य है और ये आत्म ग्यान उन सभी आत्माओं को मिल चुका है जो चंद लम्हों पहले मुल्क के लिए निजाम से बगावत कर चुके थे और भीड को उम्मीद दे रहे थे कि सवाल जिंदा हैं और इंसान भी, ईमान जिंदा है और रूह भी। लेकिन बदलते दौर के साथ बदले निजाम के साथ उन सभी रूहों को नए निजाम में ही इंसाफ का चेहरा नजर आने लगा।

     ये वो दौर है जब सूट बूट वाला जनता का सिपाही सत्ता का जयकार करता है और सवाल उठाने वालों पर शब्दों के हंटर से प्रहार करता है। ये वो दौर है जब लोकतंत्र के हर खंबे टूट रहे हैं और जो अटूट है उसमें दीमक लगाने की कोशिश की जा रही है। जम्हूरियत के लौह खंभे सत्ता की नमी से जंग खाने लगे हैं और जनता की जंग भूलकर सियासत से निकाह कर चुके हैं। और ये सब इसलिए क्योंकि हमें जनादेश मिला है।

ये वो दौर है जब कमजोर किसी कोने में खडा सूख चुके आंसुओं भरे सुर्ख आंखों से सियासत की ओर सवालिया निगाह डालता है लेकिन बुद्धू बक्से में सजे धजे जीव कहते हैं वो भीड तो सत्ता का स्वागत करने खडी है। ये वो दौर है जब सत्ता हीरो है और विपक्छ विलेन। ये वो दौर है जिसमें गुणगान करना धर्म है और सवाल पूछना अधर्म। ये वो दौर है जिसमें चाटुकारिता परम सुख है और सवाल राष्ट्रद्रोह। ये सब इसलिए क्योंकि हमें जनादेश मिला है।

ये उस दौर की शुरूआत है जब अंधेरा मुल्क की किस्मत बन जाएगा और इस अंधेरे को रामराज्य कहकर ढिंढोरा पीटा जाए। जो इस अंधेरे में चकम सुख प्राप्त करने लगे उसे क्या फर्क लेकिन जिंदा रूहों तो सुकून मयस्सर नहीं होने का दौर है ये। क्योंकि हमें जनादेश मिला है।

डरती नहीं जम्हूरियत लाशों के मैदानों से
खतरा है मुल्क को मर चुकी जिंदा रूहों से

आशुतोष मिश्रा