Friday, July 31, 2009

माफ करो, मंदी है...







10 महीने से ज्यादा हो गए। साल 2009 का बजट भी आ गया। लेकिन घर का बजट बिगड़े 10 महीने से ज्यादा हो चुका है। नई नौकरी के नाम पर जो तिलासा मिलता है वो भी खूब है। भई अभी तो मंदी है। ग्लोबल क्राइसिस का दौर। जैसे ही कुछ होगा, बताएंगे। ना जाने कितने लोगों की उम्मीदें इंतजार कर रही हैं इस मंदासुर के अंत का। उन लोगों को हाल क्या होगा जिनके पास दाल-रोटी का कोई ज़रिया नहीं बचा है। सोचकर रूह कांप जाती है। हालात हर जगह बिगड़े हैं। कोस रहे हैं उस दिन को जब डिग्री लेकर निकले थे। मां ने सारे मुहल्ले में मिठाइयां बांटी थीं। उनका पप्पू पास जो हो गया था। पप्पू को नौकरी मिली तो घर में मानो खुशियों ने डेरा जमा लिया। खुशी के मारे मां ने बेचारे की शादी भी करवा दी। 10 हजार की नौकरी ने पप्पू की मां को 2 लाख रुपए का दहेज भी दिला दिया। सब कुछ ठीक चल रहा था। तभी मंदासुर नामक एक विशाल राक्षस आया, और ना जाने किस जनम का बदला लिया इस कमबख्त ने। करोड़ों नौकरियां इसके पेट में समां गईं। मेरे कई दोस्त इस मंदासुर की खुराक बन गए।



एक तो मंदी पर से महंगाई। एक जनरल कहावत सुनी है। एक तो पहले ही गरीबी में आटा मांगकर लाए थे और वो भी गीला हो गया। टीवी पर सारे चैनल चीख-चीख कर रहे थे महंगाई दर में कमी , महंगाई दर में कमी आई। मन में खुशी हुई, चलो मंदी के दौर में महंगाई कम हो तो कुछ राहत मिले। घर का राशन लेने निकले तो पता चला कि पैसे कम पड़ गए। हर बार इतने में ही सामान आ जाता था। तो इस बार कम कैसे पड़ गया ? हर चीजों की कीमत बढ़ी हुई थी। दाल की कीमतों में तो मानो आग ही लग गई थी। सब्ज़ियां कैसे खाएं। दाम इतने की बस देखकर ही पेट भर लो। शाम को फिर उसी बुद्धू बक्से में चिल्लाहट हुई। घबराएं मत दिल्ली सरकार दाल बेचेगी, वो भी सस्ते दाम पर। एक झूठे सुकून का एहसास हुआ। दिन हुआ और थैला लेकर मैं भी चला दुकान पर। लेकिन यहां मंजर कुछ और ही था। सारा शहर दुकान पर मौजूद था। समझ गया कि महंगाई का शिकार सिर्फ मैं ही तो नहीं बल्कि और भी हैं। वक्त बीतता रहा, दोपहर हो गई। सस्ते दाल की आस में भरी दुपहरिया में पसीना सुखाते रहे। लेकिन तभी पता चला कि दाल का सरकारी स्टॉक नहीं आया। तभी मुझे याद आया कि ये सरकारी वादा था। मैंने यकीन किया ये मेरी अपरिपक्वता थी। अगले दिन फिर दुकान पर जाने की हिम्मत नहीं हुई। नौकरी से पहले ही झल्लाया था। 30 दिन 9 घंटे की नौकरी तो की लेकिन तनख्वाह वक्त पर आती ही नहीं। कभी-कभी तो आती ही नहीं। एक महीना बीतता तो दूसरा लगभग बीत जाता तब कहीं जाकर हरे-हरे नोटों के दर्शन होते हैं। टीवी पर प्रचार देखा 'खुश है ज़माना आज पहली तारीख है' लेकिन मैं तो कैलेंडर देखना ही भूल गया। घर के बिगड़े बजट के बैलेंस करते-करते हालत पतली हो गई है। मंदी में दूसरी नौकरी का ख्वाब भी महंगा हो गया है। घर चलाता हूं इसलिए दर्द जानता हूं। आप में कई हैं जो इस मार के शिकार हैं। मुझे आप से हमदर्दी है।

सबसे बड़ा स्वयंबर ?




दिन भर दफ्तर की थकान के बाद घर पहुंचा। सोचा मेरे गृह (घर) की मंत्री प्यार से पानी तो पूछेंगी। रोज आने में थोड़ी देर हो जाती है। आज जल्दी देखा तो पूछ लिया कि जल्दी क्यों आई हो। जवाब मिला राखी का स्वयंबर आने वाला है। मैं समझ गया कि जिस ड्रामे को दुनिया देख रही है। उसका एक दर्शक मेरे घर में भी होगा। लो जी पानी मैंने खुद से पी लिया। हसरत हुई कि कुछ खा लूं। भूख तो लग ही जाती है। लेकिन समझ में आ गया कि जब तक ये स्वयंबर शो खत्म नहीं होगा। कुछ नहीं मिलेगा। अपने घर से काफी दूर हूं। माता-पिता दूसरी जगह रहते हैं। सोचा उनसे बात कर लूं। मोबाइल निकाला और मिला दिया अपने घर का नंबर। मां ने फोन उठाया। हाल-चाल तो दूर की बात। मेरी मां ने कहा अभी राखी सावंत का स्वयंबर आ रहा है। थोड़ी देर बाद फोन करना। आखिर इस स्वयंबर में ऐसा क्या है। मैंने रामायण पड़ी है। इसलिए स्वयंवर के बारे में जानता हूं। इस शो के बारे में काफी-कुछ पढ़ और सुन चुका हूं। सड़कों के किनारे बड़ी-बड़ी होर्डिंग्स पर भी इस शो की कुछ तस्वीरें देखी हैं। मन में आया चलो आज ये शो भी देख लें। आखिर ऐसा क्या है इस स्वयंबर में। राखी सावंत को देखा तो फ्लैशबैक में चला गया। राखी के ना जाने कितने ड्रामे मैंने बतौर रिपोर्टर कवर किए। कभी बाथरूम में बुद्ध की मूर्ति लगाना, तो कभी बॉलीवुड के आईटम गर्ल्स के साथ कैटफाईट। इसी समय मुझे याद आया राखी का मीडिया प्रेम। राखी ने हजारों बार कहा है कि वो मीडिय़ा की बेटी हैं। इस बेटी की इज्जत भरी मीडिया के सामने पार्टी में मीका ने उतारी। फिर याद आया मीका का वो किस। आज भी उस पर सवाल बना हुआ है कि मीका ने सबकुछ कहीं राखी के कहने पर ही तो नहीं किया। फिर याद आया कि अपने पुराने ब्वॉयफ्रेंड अभिषेक को कैसे राखी ने थप्पड़ मारा था। और ना जाने क्या-क्या। इन किस्सों को लिखता जाऊं तो सुबह से शाम हो जाए। जी तो मैं कह रहा था, कि उस लड़की का स्वयंवर देखने मैं बैठा। देश के कई हिस्सों से राखी के दीवाने आए। लिखने के पहले मैंने शो के कई एपिसोड देखे। ये स्वयंवर कुछ-कुछ महाभारत का रंग ले रहा था। स्वयंवर में आए सभी दूल्हों के थ राखी के बोलने, हंसने उठने, बैठने का तरीका एक जैसा ही है। राखी की आंखों में हर किसी के लिए एक जैसा ही प्यार दिखाई देता है। जैसे हर किसी से उन्हे प्यार हो गया है। आखिर में बचे तीन दूल्हों में तो मानो मुझे काफी जद्दोजहद करनी पड़ी। लेकिन ये नहीं समझ में आया कि राखी किसे चाहती है। तीनों के साथ राखी का बर्ताव देखकर मुझे महाभारत के द्रौपदी की याद आ गई। पांचाली के पांच पति तो राखी के लगभग तीन पति। लेकिन कुछ कहने से बात बढ़ जाएगी। तो इतना ही समझिए कि इस शादी के पहले ही राखी के तीनों पति अपना इम्तेहान देंगे। जिसपर राखी का दिल आएगा उनसे राखी शादी करेंगी। ऐसा बी सुना है कि ये शादी नहीं होगी। या शादी के वक्त मीका या अभिषेक की एंट्री भी हो जाएगी। भई इस स्वयंवर में ट्विस्ट तो काफी हैं। तभी तो मैं अपनी भूख प्यास भी भूल गया। मैं रिएलिटी शो देखने बैठा था, लेकिन इतना हंसा जितना किसी कॉमडी शो को देखकर नहीं हंसा था। अब समझ में आया कि जबतक ये शो चलेगा ना मां सुनेगी, ना बीवी।

अगर आप कभी उदास हों, तो आप भी ये शो ज़रूर देखिएगा। यकीन मानिए हंस-हंस कर आपका पेट भर जाएगा।