


10 महीने से ज्यादा हो गए। साल 2009 का बजट भी आ गया। लेकिन घर का बजट बिगड़े 10 महीने से ज्यादा हो चुका है। नई नौकरी के नाम पर जो तिलासा मिलता है वो भी खूब है। भई अभी तो मंदी है। ग्लोबल क्राइसिस का दौर। जैसे ही कुछ होगा, बताएंगे। ना जाने कितने लोगों की उम्मीदें इंतजार कर रही हैं इस मंदासुर के अंत का। उन लोगों को हाल क्या होगा जिनके पास दाल-रोटी का कोई ज़रिया नहीं बचा है। सोचकर रूह कांप जाती है। हालात हर जगह बिगड़े हैं। कोस रहे हैं उस दिन को जब डिग्री लेकर निकले थे। मां ने सारे मुहल्ले में मिठाइयां बांटी थीं। उनका पप्पू पास जो हो गया था। पप्पू को नौकरी मिली तो घर में मानो खुशियों ने डेरा जमा लिया। खुशी के मारे मां ने बेचारे की शादी भी करवा दी। 10 हजार की नौकरी ने पप्पू की मां को 2 लाख रुपए का दहेज भी दिला दिया। सब कुछ ठीक चल रहा था। तभी मंदासुर नामक एक विशाल राक्षस आया, और ना जाने किस जनम का बदला लिया इस कमबख्त ने। करोड़ों नौकरियां इसके पेट में समां गईं। मेरे कई दोस्त इस मंदासुर की खुराक बन गए।
एक तो मंदी पर से महंगाई। एक जनरल कहावत सुनी है। एक तो पहले ही गरीबी में आटा मांगकर लाए थे और वो भी गीला हो गया। टीवी पर सारे चैनल चीख-चीख कर रहे थे महंगाई दर में कमी , महंगाई दर में कमी आई। मन में खुशी हुई, चलो मंदी के दौर में महंगाई कम हो तो कुछ राहत मिले। घर का राशन लेने निकले तो पता चला कि पैसे कम पड़ गए। हर बार इतने में ही सामान आ जाता था। तो इस बार कम कैसे पड़ गया ? हर चीजों की कीमत बढ़ी हुई थी। दाल की कीमतों में तो मानो आग ही लग गई थी। सब्ज़ियां कैसे खाएं। दाम इतने की बस देखकर ही पेट भर लो। शाम को फिर उसी बुद्धू बक्से में चिल्लाहट हुई। घबराएं मत दिल्ली सरकार दाल बेचेगी, वो भी सस्ते दाम पर। एक झूठे सुकून का एहसास हुआ। दिन हुआ और थैला लेकर मैं भी चला दुकान पर। लेकिन यहां मंजर कुछ और ही था। सारा शहर दुकान पर मौजूद था। समझ गया कि महंगाई का शिकार सिर्फ मैं ही तो नहीं बल्कि और भी हैं। वक्त बीतता रहा, दोपहर हो गई। सस्ते दाल की आस में भरी दुपहरिया में पसीना सुखाते रहे। लेकिन तभी पता चला कि दाल का सरकारी स्टॉक नहीं आया। तभी मुझे याद आया कि ये सरकारी वादा था। मैंने यकीन किया ये मेरी अपरिपक्वता थी। अगले दिन फिर दुकान पर जाने की हिम्मत नहीं हुई। नौकरी से पहले ही झल्लाया था। 30 दिन 9 घंटे की नौकरी तो की लेकिन तनख्वाह वक्त पर आती ही नहीं। कभी-कभी तो आती ही नहीं। एक महीना बीतता तो दूसरा लगभग बीत जाता तब कहीं जाकर हरे-हरे नोटों के दर्शन होते हैं। टीवी पर प्रचार देखा 'खुश है ज़माना आज पहली तारीख है' लेकिन मैं तो कैलेंडर देखना ही भूल गया। घर के बिगड़े बजट के बैलेंस करते-करते हालत पतली हो गई है। मंदी में दूसरी नौकरी का ख्वाब भी महंगा हो गया है। घर चलाता हूं इसलिए दर्द जानता हूं। आप में कई हैं जो इस मार के शिकार हैं। मुझे आप से हमदर्दी है।

