Thursday, June 7, 2018

दिल्ली को क्यों चाहिए पूर्ण राज्य का दर्जा?

दिल्ली की सत्ता में पिछले 3 साल से काबिज अरविंद केजरीवाल की आम आदमी पार्टी की सरकार ने दिल्ली विधानसभा का तीन दिवसीय विशेष सत्र बुलाकर दिल्ली को पूर्ण राज्य का दर्जा दिए जाने की मांग का प्रस्ताव सदन के पटल पर पेश किया है। हालांकि केजरीवाल की इस मांग को अगले साल होने वाले लोकसभा चुनावों के मद्देनजर केंद्र में बैठी बीजेपी को घेरने की एक राजनीति कोशिश के तौर पर भी देखा जा सकता है। एक वक्त में BJP और कांग्रेस दोनों ही दिल्ली को पूर्ण राज्य का दर्जा दिए जाने की मांग को लेकर आवाज उठाते रहे हैं। लेकिन आज दोनों ही पार्टियों दिल्ली को पूर्ण राज्य का दर्जा दिए से ऐतराज़ है। राजधानी दिल्ली में मौजूदा व्यवस्था के तहत कई सरकारें हैं। दिल्ली में एक विधानसभा है और यहां कुल 70 विधायक चुने जाते हैं।एक मुख्यमंत्री समेत सात मंत्रियों की एक कौंसिल ऑफ मिनिस्टर दिल्ली में सरकार चलाती है। मौजूदा व्यवस्था में दिल्ली में सबसे बड़ी सरकार उपराज्यपाल हैं जो कि एक केंद्र सरकार के अधिकारी हैं लेकिन दिल्ली के पूर्ण राज्य ना होने की स्थिति में वह राष्ट्रपति के नुमाइंदे कहे जाते हैं और जिनका ओहदा दिल्ली में मुख्य प्रशासक का है। सारे फैसले, अधिकारियों के तबादले और उनके खिलाफ कार्रवाई का अधिकार भी सिर्फ उपराज्यपाल के पास हैं। वहीं दूसरे राज्यों की तरह दिल्ली में नगर निगम भी दिल्ली की चुनी हुई सरकार के सीधे अधीन ना होकर उपराज्यपाल के अधीन है साथ ही निगम चुनी हुई सरकार के आदेशों को मानने के लिए बाध्य नहीं है। 

        दूसरे राज्यों की तरह दिल्ली में जमीन यानी दिल्ली विकास प्राधिकरण सीधे-सीधे उपराज्यपाल के जरिए केंद्र सरकार के अधीन है और दिल्ली सरकार लाख चाहे तो भी जमीन से जुड़े हुए फैसले नहीं ले सकती। इतना ही नहीं, अगर दिल्ली सरकार को कहीं किसी सरकारी परियोजना के लिए जमीन की जरूरत हो तो उसे उपराज्यपाल और केंद्र सरकार की दया पर निर्भर होना पड़ता है। दिल्ली के केंद्र शासित प्रदेश होने की स्थिति में दिल्ली की पुलिस भी उपराज्यपाल के जरिए सीधे सीधे केंद्र सरकार के गृह मंत्रालय के नियंत्रण में है और दिल्ली की चुनी हुई सरकार के आदेश मानने के लिए पुलिस बाध्य बिल्कुल नहीं है। इतना ही नहीं दिल्ली में विधान सभा के गठन होने के बाद से लगातार दिल्ली सरकार के अधीन रही एंटी करप्शन ब्रांच मई 2015 के बाद से दिल्ली की चुनी हुई सरकार के अधीन नहीं है क्योंकि केजरीवाल के दोबारा सत्ता में आने के कुछ ही महीनों के भीतर यानी मई 2015 में मोदी सरकार द्वारा गृह मंत्रालय से जारी एक नोटिफिकेशन में दिल्ली की चुनी हुई सरकार से एंटी करप्शन ब्रांच और सर्विसेस विभाग को छीनकर उपराज्यपाल को सौंप दिया गया था। इस नोटिफिकेशन में गृह मंत्रालय ने दो टूक कह दिया कि दिल्ली में सरकार का मतलब सिर्फ और सिर्फ उपराज्यपाल हैं। दिल्ली हाईकोर्ट में केजरीवाल सरकार ने इस नोटिफिकेशन को चुनौती भी दी लेकिन हाई कोर्ट ने भी केंद्र के फैसले को सही ठहराते हुए दिल्ली में उप-राज्यपाल को ही सबसे बड़ा प्रशासक माना और उन्हें ही सर्व शक्तियों वाली सरकार घोषित कर दिया। जाहिर है अब दिल्ली में चपरासी से लेकर नौकरशाह की नियुक्ति, उनके तबादले और उनके खिलाफ कोई भी कार्रवाई का अधिकार सिर्फ और सिर्फ उपराज्यपाल को है। ऐसी स्थिति में दिल्ली सरकार के अधिकारी अब चुनी हुई सरकार के आदेश या निर्देश मानने के लिए बाध्य नहीं हैं क्योंकि अब उन्हें चुनी हुई सरकार द्वारा किसी भी तरह की कार्यवाही का बिल्कुल डर नहीं है। दरअसल यही वह स्थिति है जो केजरीवाल के आरोपों को पूरी तरह खारिज नहीं कर पाती कि उपराज्यपाल के इशारों पर ही दिल्ली सरकार के अफसर चुनी हुई सरकार के फैसलों में अड़ंगा लगाते हैं और तो और मंत्रियों के ना आदेश मानते हैं ना उनकी बुलाई बैठकों में आते हैं। केजरीवाल सरकार और दिल्ली की नौकरशाही के बीच पिछले 3 साल से इंद्रप्रस्थ में महाभारत चल रहा है। ऐसा पहली बार नहीं हुआ है जब दिल्ली को पूर्ण राज्य का दर्जा दिए जाने की मांग की जा रही है जिससे दिल्ली में चुनी हुई सरकार जनता की उम्मीदों को बेहतर तरीके से पूरा कर सके। दिल्ली में कानून व्यवस्था बिगड़ने से लेकर महिलाओं की सुरक्षा तक के सवाल पर पूर्व मुख्यमंत्री शीला दीक्षित भी दिल्ली के पूर्ण राज्य ना होने और पुलिस के राज्य सरकार के अधीन ना होने का हवाला देती रहीं। वास्तविक स्थिति यह भी है कि अगर दिल्ली के बाहरी इलाके में किसी गांव में कानून-व्यवस्था बिगड़े या कोई विवाद हो तो दिल्ली की जनता के सामने असमंजस की स्थिति हो जाती है कि आखिर वो गुहार लगाए भी तो किससे लगाए। केंद्र सरकार के फैसले और हाईकोर्ट के आदेश के बाद दिल्ली में सर्वे सर्वा उपराज्यपाल हैं लेकिन न तो वह जनता के सामने आते हैं ना ही उन पर किसी सवाल के जवाब देने का उत्तरदायित्व है। सीधे-सीधे समझिए तो दिल्ली में लोकतंत्र के मूलभूत सिद्धांत के विपरीत स्थिति है यानी जिसको जनता ने चुना है और जो जनता के प्रति सीधे जवाबदेह है, उसके पास शक्तियां नहीं है और जिसको जनता ने नहीं चुना है बल्कि नियुक्त किया गया है और जो जनता के प्रति सीधे जवाबदेह नहीं है, उसके पास अथाह शक्तियां हैं। दिल्ली की मौजूदा परिस्थिति में चुनी हुई सरकार की भूमिका का महज़ सलाहकार बनकर रह गई है। यानी दिल्ली की लाखों की आबादी ने जिस सरकार को फैसले लेने के लिए चुना है वह नीति और नियम तो बना सकती है लेकिन उन नीतियों को अमलीजामा पहनाने का अधिकार उस सरकार के पास नहीं बल्कि उसके ऊपर बिठाए गए एक चुने हुए केंद्र सरकार या राष्ट्रपति के प्रतिनिधि यानी कि उपराज्यपाल के पास है। लोकतंत्र की विडंबना है कि संविधान की धारा 239 ए ए मैं मौजूदा परिभाषा के अनुसार उपराज्यपाल दिल्ली की चुनी हुई सरकार की सलाह मानने के लिए बिलकुल बाध्य नहीं हैं। दूसरे राज्यों में लोकतंत्र के मूल सिद्धांत के तहत राज्यपाल चुनी हुई सरकार के फैसले मानने के लिए बाध्य हैं लेकिन दिल्ली में उपराज्यपाल के पास अधिकार हैं कि वह जब चाहें, जितने चाहें या फिर चाहें तो चुनी हुई सरकार के सारे फैसले और आदेश पलट सकते हैं या उसे खारिज कर सकते हैं। दिल्ली में ऐसा पिछले 3 सालों में लगातार देखा जा रहा है जब उपराज्यपाल चुनी हुई सरकार के नीतिगत फैसले या जारी किए गए आदेश सीधे-सीधे पलट देते हैं। राजनीतिक आरोपों की माने उपराज्यपाल चुनी हुई सरकार के नीतिगत मामलों की फाइलें महीनों तक दबाए रखते हैं। यह स्थिति इसलिए है और ऐसे आरोप इसलिए लगते हैं क्योंकि दिल्ली को पूर्ण अधिकार नहीं मिला है और दिल्ली की चुनी हुई सरकार को हर हालत में उप-राज्यपाल और केंद्र सरकार के रहमों करम पर जीना पड़ता है। स्थिति तब और बदतर हो जाती है जब दिल्ली में किसी और पार्टी की सरकार हो और केंद्र में कोई और दल सत्ता में काबिज हो। फिलहाल केंद्र में बीजेपी की सरकार और दिल्ली में आम आदमी पार्टी की सरकार है और दोनों के बड़े नेताओं के बीच कड़वाहट जगजाहिर है। जाहिर है खामियाजा दिल्ली की जनता भुगत रही है। दिल्ली में मौजूदा हालात में दिल्ली सरकार, केंद्र सरकार, उपराज्यपाल, नगर निगम, डीडीए और दिल्ली पुलिस के बीच आपसी समन्वय ना होने की स्थिति में दिल्ली की जनता का नुकसान सबसे ज्यादा होता है। दिल्ली की स्थिति की शिकायत तब मुख्यमंत्री शीला दीक्षित भी करती थी और आज के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल भी कर रहे हैं क्योंकि सुबह का मुख्यमंत्री होने के बावजूद दोनों के पास अधिकारों के नाम पर कुछ नहीं था। हालांकि शीला दीक्षित के पास उस समय एंटी करप्शन ब्रांच और सर्विसेस विभाग था जिससे वह अधिकारियों पर नकेल लगा सकती थी जिससे सरकार का काम काफी हद तक आसान हो जाता था। केजरीवाल के पास वह शक्तियां भी नहीं है। स्थिति ऐसी ही रही तो दिल्ली में आने वाली हर सरकार के पास शक्तियों के नाम पर कुछ भी नहीं रह जाएगा। यानी दिल्ली में सरकार सिर्फ कहने के लिए होगी और अधिकार उस सरकार के पास होगा जो जनता के प्रति सीधे जवाब देह नहीं है। पूर्व मुख्यमंत्री शीला दीक्षित के पास मौका था जब 10 साल की अंदर में कांग्रेस की सरकार थी और दिल्ली में भी कांग्रेस की ही सरकार थी। राज्य और केंद्र अगर आपसी सहमति बनाते और इच्छा शक्ति दिखाते तो दिल्ली आज की तारीख में एक पूर्ण राज्य की शक्ल में होती और सूबे की सरकार को अपने अधिकारों के लिए केंद्र द्वारा नियुक्त अधिकारी के सामने गिड़गिड़ाना नहीं पड़ता। दरअसल उपराज्यपाल, केंद्र सरकार या राष्ट्रपति किसी की भी जिम्मेदारी दिल्ली की जनता के प्रति सीधे नहीं है इसीलिए यह जरूरी हो जाता है कि उस राज्य की चुनी हुई सरकार के पास वह तमाम शक्तियां हो जिससे वह अपने नीतिगत फैसले ले सके और उस को अमलीजामा पहना सके। जाहिर है जिसकी जवाबदेही है उसके पास अधिकार भी होने चाहिए। यही एक बड़ी वजह है जिससे दिल्ली को पूर्ण राज्य का दर्जा दिए जाने की मांग को समर्थन मिलता है। दिल्ली को पूर्ण राज्य का दर्जा नाम दिए जाने के पीछे तर्कों का हल निकाल अब वक्त आ गया है कि दिल्ली की दो करोड़ की आबादी को एक चुनी हुई सरकार मिल सके जो उनके लिए न सिर्फ सीधे तौर पर जिम्मेदार हो बल्कि उस जिम्मेदारी का निर्वहन करने के लिए पर्याप्त शक्तियां भी रखती हो। नई दिल्ली में मौजूद प्रधानमंत्री आवास, राष्ट्रपति भवन, संसद और विदेशी दूतावासों की सुरक्षा का हवाला देकर दिल्ली को आखिर कब तक केंद्र शासित प्रदेश बनाकर उसके अधिकारों से वंचित रखा जा सकता है? वक्त आ गया है कि नई दिल्ली को दिल्ली से अलग किया जाए और दिल्ली को पूर्ण राज्य बनाया जाए जिससे चुनी हुई सरकार की जवाबदेही भी मजबूत हो। 


1. कब कब हुई दिल्ली को पूर्ण राज्य का दर्जा दिए जाने की मांग?

2013 में दिल्ली में हुए विधानसभा चुनाव के दौरान बीजेपी ने दिल्ली को पूर्ण राज्य का दर्जा दिए जाने की अपने घोषणापत्र में प्रमुखता से रखा था। तत्कालीन प्रदेश अध्यक्ष डॉक्टर हर्षवर्धन ने 2013 में विधानसभा चुनाव के दौरान दिल्ली को पूर्ण राज्य दिए जाने की मांग की थी। मई 2014 में लोकसभा का चुनाव जीतने के बाद उस समय दिल्ली प्रदेश अध्यक्ष रहे डॉक्टर हर्षवर्धन ने बयान दिया था कि वह प्रधानमंत्री के पास जाकर दिल्ली को पूर्ण राज्य का दर्जा दिए जाने की मांग करेंगे। मोदी सरकार में मंत्री और दिल्ली में पूर्व प्रदेश अध्यक्ष रहे विजय गोयल ने भी दिल्ली को पूर्ण राज्य का दर्जा दिए जाने की मांग कई बार दोहराई। 21 सितंबर 2006 को दिल्ली में चल रही सीलिंग के दौरान तत्कालीन बीजेपी प्रदेश अध्यक्ष और मौजूदा मोदी सरकार में मंत्री डॉक्टर हर्षवर्धन ने उस समय कांग्रेस सरकार को आड़े हाथों लेते हुए दिल्ली को पूर्ण राज्य का दर्जा दिए जाने की मांग करते हुए बयान जारी करके यह कहा थी कि, "जब केंद्र में एनडीए की सरकार थी तब दिल्ली की मुख्यमंत्री शीला दीक्षित ने संसद की ओर मार्च करते हुए दिल्ली को पूर्ण राज्य का दर्जा दिए जाने की मांग की थी। तत्कालीन गृह मंत्री लालकृष्ण आडवाणी ने दिल्ली को पूर्ण राज्य का दर्जा दिए जाने को लेकर एक मसौदा संसद में पेश किया जिसे प्रणब मुखर्जी की अध्यक्षता वाली समिति के पास विचार करने के लिए भेजा गया था"। साल 2006 में बीजेपी के दिल्ली प्रदेश अध्यक्ष द्वारा जारी एक बयान में कहा गया था कि जब दिल्ली और केंद्र में कांग्रेस की ही सरकार है ऐसे में दिल्ली को पूर्ण राज्य का दर्जा दिए जाने में क्या अड़चन है? वहीं 2013 में दिल्ली विधानसभा चुनाव के दौरान नवंबर में तत्कालीन मुख्यमंत्री शीला दीक्षित ने दिल्ली के लिए कांग्रेस का घोषणापत्र जारी करते हुए दिल्ली के लिए पूर्ण राज्य का दर्जा दिए जाने की मांग की थी। मैनिफेस्टो लॉन्च के दौरान शीला दीक्षित ने कहा था कि दिल्ली में सरकार की व्यवस्था और कई विभागों के चलते दिल्ली का विकास कार्य प्रभावित होता है। शीला दीक्षित ने कहा था कि अगर दिल्ली पूर्ण राज्य होता तो विकास बेहतर तरीके से संभव हो पाता।साल 1998 में दिल्ली तो पूर्ण राज्य का दर्जा दिए जाने की मांग सबसे पहले उठी थी। लेकिन साल 2003 में दिल्ली को पूरे अधिकार दिए जाने को लेकर पहली बार मसौदा संसद में आया। अप्रैल 2006 में बीजेपी के पूर्व मुख्यमंत्री और तत्कालीन दिल्ली प्रदेश अध्यक्ष मदन लाल खुराना ने तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह से दिल्ली को पूर्ण राज्य का दर्जा दिए जाने की मांग को लेकर बिल लाने की मांग की थी। साल 2003 में केंद्र में बैठी BJP सरकार में उप प्रधानमंत्री और गृहमंत्री लालकृष्ण आडवाणी ने संसद में दिल्ली को पूर्ण राज्य का दर्जा दिए जाने का कानून पेश किया था। उस समय इस बिल के प्रावधानों को लेकर तत्कालीन दिल्ली के मुख्यमंत्री शीला दीक्षित ने केंद्र सरकार के इस कदम को राजनीतिक करार दिया था। 

2. क्या था प्रस्ताव? 

दिल्ली को पूर्ण राज्य का दर्जा दिए जाने के मसौदे के लिए लंबी चर्चा और प्रक्रिया से गुजरने के बाद तीन अलग तरीके के प्रावधान सामने आए थे। प्रावधान यह भी था कि दिल्ली केंद्र शासित प्रदेश होने के नाते पूर्ण राज्य का दर्जा दिए जाने के बावजूद भी दिल्ली पुलिस और एनडीएमसी जो कि वीवीआईपी इलाका है उसे केंद्र सरकार के अधीन रखा जाए जबकि जमीन यानि डीडीए, नगर निगम और रेवेन्यू विभाग को दिल्ली की चुनी हुई सरकार के सुपुर्द कर दिया जाए। दूसरे प्रावधान के तहत दिल्ली पुलिस के उच्च अधिकारियों को उपराज्यपाल के जरिए केंद्र के अधीन रखने काप्रस्ताव किया गया था। उसी दौरान तत्कालीन केंद्रीय श्रम मंत्री साहिब सिंह वर्मा और दिल्ली की मुख्यमंत्री शीला दीक्षित भी दिल्ली को पूर्ण राज्य का दर्जा दिए जाने के मसौदे पर एक साथ खड़े थे। एक प्रावधान में लाइसेंसी विभाग और दिल्ली का ट्रैफिक पुलिस विभाग भी चुनी हुई दिल्ली की सरकार को देने का प्रस्ताव किया गया था। 2003 के उस कानून में आर्टिकल 371 J clause 3 के तहत राष्ट्रपति को यह अधिकार दे दिया गया था कि कि वह दिल्ली की चुनी हुई सरकार के एग्जीक्यूटिव शक्तियों को नफरत पलट सकते हैं बल्कि चुनी हुई दिल्ली सरकार को राष्ट्रपतिके आदेशों को मानना होगा। प्रथम युद्ध किया गया था कि दिल्ली सरकार में काम कर रहे नौकरशाहों की वार्षिक गोपनीय रिपोर्ट भी दिल्ली सरकार में मुख्यमंत्री लिखेंगे ऐसे में नौकरशाहों को डर सता रहा था कि अगर उनकी गोपनीय रिपोर्ट मुख्यमंत्री के अधीन होगी तो जाहिर है नौकरशाही भी मुख्यमंत्री के आदेशों की गुलाम हो जाएगी। इतना ही नहीं इस कानून में आईएएस अधिकारियों के ट्रांसफर और पोस्टिंग की शक्तियां भी दिल्ली की सरकार को नहीं दी गई थी। इस कानून पर उस समय हो रही चर्चा को लेकर अलग-अलग छपी रिपोर्ट की मानें तो तत्कालीन मुख्यमंत्री शीला दीक्षित को इस कानून पर उतनी ही आपत्ति थी जितना आज दिल्ली के मौजूदा मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल को अधिकारियों के ट्रांसफर पोस्टिंग की शक्तियां उपराज्यपाल को ट्रांसफर कर दिए जाने को लेकर है। उस समय केंद्र सरकार का यह कानून राजनीतिक विवाद का केंद्र बन गया और तब से लेकर आज तक दिल्ली को पूर्ण राज्य का दर्जा दिए जाने की मांग बीजेपी और कांग्रेस के घोषणा पत्रों में ही सीमित होकर रह गई। 


3. अब तक क्यों नहीं मिला दिल्ली को पूर्ण राज्य का दर्जा? 

दिल्ली को पूर्ण राज्य का दर्जा दिए जाने के पीछे सबसे बड़ा कारण बताया जाता है दिल्ली का राष्ट्रीय राजधानी होना। करण बनाया जाता है कि राष्ट्रीय राजधानी में प्रधानमंत्री रहते हैं राष्ट्रपति रहते हैं देश की संसद है और साथ ही दुनियाभर के डिप्लोमैट और उनके दूतावास दिल्ली में मौजूद हैं। हवाला दिया जाता है कि ऐसी स्थिति में अगर दिल्ली को पूर्ण राज्य का दर्जा दिया गया तो लॉ एंड ऑर्डर समेत पुलिस का नियंत्रण भी राज्य की सरकार के अधीन होगा और वही जमीन राज्य सरकार के अधीन होने की स्थिति में केंद्र सरकार जमीन से जुड़े नीतिगत फैसले नहीं ले पाएगी और उसे राज्य सरकार के रहमों करम पर जीना होगा। केंद्र की नौकरशाही मानती है कि अगर दिल्ली को पूर्ण राज्य का दर्जा मिल गया तो बड़े नौकरशाहों के तबादले और उनके खिलाफ कार्यवाही का अधिकार भी राज्य सरकार को मिल जाएगा वहीं राज्य की पुलिस राज्य सरकार के अधीन होने की स्थिति में केंद्र सरकार के कर्मचारियों पर कार्यवाही करने का अधिकार भी राज्य की सरकार को मिल जायेगा जो उनके अधिकारों के खिलाफ होगा। 


4. केजरीवाल को क्यों चाहिए दिल्ली के लिए पूर्ण राज्य का दर्जा? 

दिल्ली में सरकार बनाने के बाद अरविंद केजरीवाल ने पंजाब का रुख किया था ताकि वह एक पूर्ण राज्य के जरिए अपना मॉडल देश भर में सामने रख सके और अपनी राजनीतिक महत्वकांक्षा को उस मॉडल के जरिए पूरा कर सकें। पंजाब में केजरीवाल को सफलता नहीं मिली वहीं दिल्ली में भी उनके अधिकारों पर मोदी सरकार ने कैंची चला दी। केजरीवाल को लगता है कि अगर दिल्ली को पूर्ण राज्य का मौका मिला तो पुलिस नौकरशाही और व्यवस्था बदलने की शक्तियां उनके अधीन होगी और सरकार चलाने का जो मॉडल उनके पास है उस मॉडल को वह राजधानी के जरिए पूरे देश को दिखा सकेंगे और खुद को एक बेहतरीन शासक साबित कर सकेंगे। जाहिर है केजरीवाल की महत्वकांक्षा की लड़ाई की शुरुआत दिल्ली से ही शुरु होती है। 


5. कैसे मिलेगा दिल्ली को पूर्ण राज्य का दर्जा? 

आमतौर पर दिल्ली को पूर्ण राज्य का दर्जा दिए जाने के प्रस्ताव में यह कहा गया है के दिल्ली में संसद, राष्ट्रपति भवन, प्रधानमंत्री आवास और विदेशी दूतावासों वाले एनडीएमसी इलाकों यानि नई दिल्ली को सीधे केंद्र सरकार के अधीन रखा जाए जबकि दिल्ली के तीनों नगर निगम, दिल्ली विकास प्राधिकरण और दिल्ली पुलिस को दिल्ली की चुनी हुई सरकार के अधीन किया जाए जिसकी सुरक्षा की जिम्मेदारी रिजर्व पैरामिलिट्री के सुपुर्द कर दी जाए। अलग पुलिस कमिश्नरेट का गठन किया जाए और पैरामिलिट्री के साथ साथ नई दिल्ली पुलिस का गठन किया जाए। 


दिल्ली में किसी भी तरह की इमरजेंसी में केंद्र और राज्य सरकार के बीच समन्वय बिठाने के लिए केंद्र और राज्य सरकार के बीच एक काउंसिल का भी गठन किया जाए जो एक दूसरे के अधिकारों पर हमला किए बिना हर स्थिति को चर्चा के जरिए निपटारा कर सके। दिल्ली विकास प्राधिकरण को राज्य सरकार के अधीन किए जाने की स्थिति में केंद्र सरकार को दिल्ली के हर इलाके में जमीन की जरूरत की स्थिति में राज्य सरकार केंद्र को जमीन देने के लिए बाध्य हो। दिल्ली का मास्टर प्लान बदलने के लिए केंद्र सरकार का प्रतिनिधित्व जरूरी हो। साथी दिल्ली विधानसभा को नई दिल्ली इलाके को छोड़कर पूरे राज्य के लिए हर तरह के कानून दूसरे राज्यों की तरह ही बनाने की शक्ति हासिल हो। दिल्ली को पूर्ण राज्य का दर्जा दिलाने के लिए संसद में केंद्र सरकार को कानून लाना होगा और उस कानून को राष्ट्रपति की मंजूरी के बाद दिल्ली को पूर्ण राज्य बन सकता है। 


आशुतोष मिश्रा 


Wednesday, January 10, 2018

क्या आपको सिर्फ आधार लिंक करवाने के लिए चुना था मोदी जी?

क्या आपको सिर्फ आधार लिंक करवाने के लिए चुना था मोदी जी?

नीतिगत मामले में लगातार अपना रुख बदलना राजनीति में कोई नई बात नहीं है। राजनीतिक पार्टियां विपक्ष में जिन नीतियों के खिलाफ खड़ी होती हैं, सरकार में आते ही उन्ही नीतियों को लागू करने से नहीं हिचकिचातीं, खासकर उनका फायदा जब निजी हो। लेकिन सवाल तब उठते हैं जब सत्ता में आए राजनीतिक दल उन नीतिगत मामलों पर यू-टर्न मार लेती है जिसके विरोध में कभी जमीन आसमान एक कर दिया था। मोदी सरकार यू टर्न मारने का मानो रिकॉर्ड बनाने पर उतारू है। कौन-कौन सी नीतियां गिनाएं जिस पर बीजेपी ने विपक्ष में रहते कड़ा विरोध जताया और सत्ता में आते ही उन्हीं नीतियों पर चल पड़ी।
  जिन आर्थिक नीतियों पर तत्कालीन गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी और विपक्ष में बैठी बीजेपी आए दिन तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और उनकी कांग्रेस सरकार को कोसते रहते थे, आज क्या मजबूरी है कि मौजूदा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और केंद्र में उनकी बीजेपी की सरकार उन्हीं मुद्दों और उन्हें नीतियों पर आगे चल रही है? गुजरात के मुख्यमंत्री रहते हुए नरेंद्र मोदी ने ऐसा एक दिन भी नहीं छोड़ा जब उन्होंने जीएसटी का विरोध ना किया हो। आज प्रधानमंत्री बनने के बाद नरेंद्र मोदी उसी जीएसटी का गुणगान करते हैं। मनमोहन सिंह सरकार द्वारा लागू किए गए आधार को बीजेपी और उस समय गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी ने इसे देश के खिलाफ खतरा बता दिया था। विडंबना देखिए आज नरेंद्र मोदी सरकार पुरे देश को उसी आधार के खतरे में जबरदस्ती झोंक रही है। आधार पर यह सरकार ऐसे दंडवत है कि अचंभा नहीं होगा जल्दी ही यह नियम लागू हो जाएगी शौचालय जाने से पहले भी आधार दिखाना अनिवार्य होगा।
   बीजेपी और मोदी ने राष्ट्रगान और राष्ट्रवाद को मुद्दा बनाकर वोट हथियाए और फिर सुप्रीम कोर्ट में पलटी मारते हुए कह दिया कि सिनेमाघरों में राष्ट्रगान बजाना जरूरी नहीं। राष्ट्रवाद की पराकाष्ठा पर भी नजर डाल लेते हैं। मोदी समेत बीजेपी के नेता अपने खिलाफ होने वाली हर आवाज़ को पाकिस्तान का एजेंट करार दे देते हैं। मोदी हर चुनाव में जिस पाकिस्तान का नाम लेकर वोट मांगते हैं उसी पाकिस्तान के प्रधानमंत्री के घर होने वाली शादी में अचानक मुंह मीठा करने चले जाते हैं। जिस पाकिस्तान को पानी पी पीकर मोदी और बीजेपी के नेता कैमरे के आगे कोसते हैं उसी पाकिस्तान के सुरक्षा सलाहकार से बैंकॉक में अपना सुरक्षा सलाहकार भेजकर गुपचुप मीटिंग करवाते हैं।
   बीजेपी शासित राज्यों में दलितों और अल्पसंख्यकों पर अत्याचार की खबरें लगातार आ रही हैं। कुछ मंचों से भाषण में छोटे-मोटे बयान के अलावा अब तक कभी सुनने में नहीं आया कि प्रधानमंत्री ने अपनी पार्टी शासित किसी भी राज्य के मुख्यमंत्री को फोन करके ऐसी घटनाओं में सख्त कार्यवाही करने के निर्देश दिए हों।
   किसानों की दुर्दशा पर भी मोदी की चुप्पी देश को खल रही है। गुजरात के मुख्यमंत्री रहते हुए वह आखरी वाकया था जब नरेंद्र मोदी ने किसानों के मुद्दे पर सरकार को घेरा था। प्रधानमंत्री बनने से पहले चुनाव में वादा किया कि किसानों को उनकी लागत का 50 फ़ीसदी मुनाफा जोड़कर कीमत दी जाएगी। 50 फ़ीसदी मुनाफा तो छोड़िए किसान को उसकी लागत के बराबर भी मोल नहीं मिल पा रहा है। कर्जे में डूबता किसान खुदकुशी करने पर मजबूर है लेकिन खुदकुशी करने वाले किसानों पर प्रधानमंत्री का ट्वीट आखरी बार तब आया था जब दिल्ली के जंतर मंतर पर विरोधी दल की रैली में एक किसान ने खुदकुशी की थी। आज आलम यह है कि किसान अपना हक मांगता है तो बीजेपी शासित राज्य में उसे गोली मिलती है।
   जिन मुद्दों पर मनमोहन को मौनमोहन की संज्ञा दे दी थी आज सरकार में रहते उन्हीं मुद्दों पर बीजेपी और मोदी, मनमोहन की चुप्पी को भी मात दे रहे हैं।
    राजनीति में दोगलापन नई बात नहीं है। एफडीआई पर ही मोदी और बीजेपी की दोहरी नीति देख लीजिए। गुजरात के मुख्यमंत्री रहते हुए मोदी ने मनमोहन सिंह सरकार द्वारा 100 प्रतिशत एफडीआई लागू करने को देश विरोधी करार देते हुए कहा था कि कांग्रेस की सरकार देश को विदेशी हाथों में बेच रही है। विदेशी निवेश के खिलाफ विपक्ष में बीजेपी ने सडकों पर लेट कर प्रदर्शन किया था। मजे की बात देखिए आज के वित्त मंत्री अरुण जेटली विपक्ष में रहते हुए एफडीआई के खिलाफ बोलते हुए यहां तक कह गए थे कि वह अपनी आखिरी सांस तक एफडीआई का विरोध करेंगे।
   तो मोदी की सरकार ने सबसे बडी राजनीतिक पलटी मारते हुए 100 प्रतिशत एफडीआई को मंजूरी दे दी है। पूरी बीजेपी अब सफाई तक नहीं दे पा रही है कि जिस एफडीआई से मनमोहन सिंह की सरकार देश को विदेशी कंपनियों को बेच रही थी क्या अब वो कंपनियां राष्ट्रवादी हो गई हैं या फिर मोदी सरकार राष्ट्रहित में देश को विदेशी कंपनियों के हाथों बेच रही है? आंतरिक सुरक्षा से लेकर आर्थिक सुरक्षा तक मोदी सरकार दूर-दूर तक दूर दृष्टि से कोई ताल्लुक रखते नहीं पाई जाती। अगर कांग्रेस की नीतियों पर देश को आगे चलना था तो देश ने मोदी को क्यों चुना?

तो फिर यह सवाल क्यों न पूछें कि मोदी जी देश ने आपको क्या सिर्फ आधार से लिंक करवाने के लिए चुना था?

आशुतोष मिश्रा

Saturday, December 30, 2017

दोस्तों के नाम नए साल का संदेश

दोस्तों आप सभी को आने वाला नया साल मुबारक हो। ईश्वर से प्रार्थना करूंगा कि आने वाले साल में आप सभी के घर में खुशियां आए आप सब अपने परिवार अपने समाज और अपने देश के लिए लड़ने की शक्ति हासिल करें और हर बुराई से एकजुट होकर लड़ें। सोशल मीडिया पर 4 साल के मेरे इस सफर में 50 हजार से ज्यादा दोस्तों का प्यार मिला है। आप लोगों के साथ अब तक की यात्रा बेहद दिलचस्प रही। आप सभी दोस्तों में हर विचार धारा के प्रतिनिधि शामिल हैं। मेरी हर उस खबर जो आपको अच्छी ना लगी हो या जिससे आपकी भावनाएं आहत हुई, उस पर आप ने मुझे डांटा, गालियां भी दी, अभद्रता भी की, मुझे और मेरे परिवार को धमकी भी दी।
   लेकिन सोशल मीडिया की इस दुनिया में ऐसे दोस्त भी मिले जो मुझे छींक आ जाने पर भी डॉक्टरी सलाह से लेकर दुआओं की झड़ी लगा रहे थे। कश्मीर से लेकर असम तक मेरी न्यूज़ रिपोर्ट पर मेरा हौसला बढ़ा रहे थे। अच्छी खबर पर तारीफ करते थे। कई बार भावनात्मक सपोर्ट देते थे। मेरा परिवार बहुत छोटा है लेकिन इस सोशल मीडिया पर मुझे इतना बड़ा परिवार मिला कि मैं कभी खुद को अकेला समझ ही नहीं पाया। लोग कहते हैं कि सोशल मीडिया सिर्फ नफरत फैलाने का साधन है। मैं इस बात से बिल्कुल इत्तेफाक नहीं रखता क्योंकि सोशल मीडिया पर मिले इतने दोस्तों से भरा मेरा यह परिवार हमेशा मेरे साथ खड़ा रहा। जैसे किसी गुलदस्ते में सिर्फ एक रंग के फूल हो तो वह गुलदस्ता ही बेकार लगने लगता है इसी तरह इन दोस्तों में हर विचारधारा से प्रेरित और प्रभावित लोगों के समूह ने मुझे लगातार सक्रिय बनाए रखा। आपके इस प्यार के लिए मैं हमेशा आपका आभारी रहूंगा। नए साल पर आप से निवेदन है कि जब भी मुझसे कोई अच्छा काम हो तो उस पर तारीफ करें या ना करें लेकिन जब भी मैं कोई गलत काम करूं तो उसकी आलोचना करें और मेरी हर गलतियों पर मुझे फटकार लगाएं। यदि आपको लगे कि मेरे अंदर अभिमान जगह बना रहा है तो तुरंत चेतावनी दें। इतने हजारों दोस्तों का प्यार बड़ी किस्मत वालों को मिलता है। आप सब को एक बार फिर नए साल की ढेरों शुभकामनाएं।
Happy New Year

आशुतोष

Wednesday, November 1, 2017

राष्ट्रवादी खिचडी खाइए...देश का हाज़मा खराब है

देश मर्ज इतना गहरा है कि डॉक्टर लगातार कडवी दवा देकर इलाज कर रहे हैं। महंगाई का एलोपैथी से नब़्ज पकड नहीं आई तो नोटबंदी की होम्योपैथी भी आज़माई गई। सेहद बिगडी तो हकीम ने जीएसटी की नैचुरोपैथी भी आज़माई ली है। देश का मर्ज़ है कि ठीक होने का नाम नहीं ले रहा। नादान लोग कह रहे हैं कि दवाइयों का साइड इफेक्ट हो गया है। लेकिन
हकीम से जलने वाले तो ये भी कह रहे हैं कि मर्ज़ कुछ और था दवा कोई और दे दी। अब उनकी क्यों सुनें जो हकीम से खार खाते हैं। वैद्यशाला के खाते में धन तो आ रहा है ना! मरीज का जितना ज्यादा और लंबा इलाज, अस्पताल की उतनी ही कमाई। अब गणित तो सीधे-सीधे यही कहता है जी। अब कुछ लोग यहां तक कह रहे हैं कि अस्पताल में जो पैसा आया है उससे डॉक्टर साहब अपने परिवार के बीमार लोगों की हालत ठीक करेंगे। अब परिवार का ख्याल रखना गुनाह है क्या जी? परिवार ने इतना निवेश किया है तो उनकी मर्ज़ तो पहले ठीक करना पडेगा ना? पहले वाले डॉक्टर ने भी तो यही किया था। उधर जो मर्ज़ नहीं है वो गालों पर ग्लो लेकर चलेगा लेकिन अस्पताल को मर-मर कर और भर-भरकर देने वाले का इलाज ही नहीं हो रहा। हकीम लगातार एक्सपेरीमेंट करने के मूड में है। विदेशी रिपोर्ट कह दी है कि इस अस्पताल में इलाज करने के लिए माहौल बढिया है। डॉक्टर गदगद हो गए और टेबल पर रखी उस विदेशी रिपोर्ट को धीरे से कचरे के डब्बे में डाल गए जिसपर लिखा था कि अस्पताल की दवा का असर किसी मरीज पर नहीं हो रहा है बल्कि झारखंड में कुछ तो बिना इलाज के ही मर गए।
       डॉक्टर सिर्फ दवा ही नहीं सलाह और हौसलों के जुमले भी बांटता है जिससे मरीज़ को इलाज पर उम्मीद हो जाए और उसे लगे कि दवा का असर हो रहा है और वो ठीक हो रहा है। देश के मर्ज़ को साथ भी यही हो रहा है। जुमलों का सीरप डिब्बा भर के पिलाया जा रहा है। जिनके गले से नीचे नहीं उतर रहा उन्हे वही सीरप राष्ट्रवादी डिब्बों में भरकर पिलाया जा रहा है़। जो पीने से मना करे उसे पाकिस्तानी अस्पताल भेजने की व्यवस्था की जा रही है। धैर्य रखिए राष्दवा का नुस्खा नया है। इसका फायदा डॉक्टर को अस्पताल में नहीं बाहर ज्यादा हुआ है।
   लेकिन मर्ज़ इतना बेगैरत हैं जो इन तमाम दवाओं से भी ठीक होने का नाम नहीं ले रहा है। बडा ही देशद्रोही किस्म का मर्ज़ है जो बीमार रहकर हकीम को बदनाम करने की कोशिश कर रहा है। लेकिन हकीम ने हिम्मत नहीं हारी है। हकीम अब मर्ज़ को जड से खत्म करने के लिए मरीज़ को खिचडी खाने को कह रहा है। इस में खिचडी राष्ट्रवाद का नमक, मिर्च और मसाला होगा। हकीम से खिचडी आपको नहीं देगा बल्कि खिचडी का इंतजाम आपको खुद करना होगाा। क्या हुआ जो सब्जी और चूल्हा तनिक महंगा हो गया है। मर्ज़ भी तो गहरा है। बीरबल की खिचडी भले ना पकी हो। ये खिचडी ज़रूर पकेगी और मर्ज़ इसीसे खत्म होगा। है कि हकीम की हिम्मत की दाद दीजिए। खिचडी से ठीक ना हुआ तो अगले इलाज की तैयारी चल ही रही होगी। बस तबतक कहीं दर्द से मरीज़ की मौत ना हो जाए।

Friday, May 26, 2017

तीन साल "बेमिसाल" - मोदी सरकार के 3 साल पर एक नज़र

भारत की अब तक की सबसे मजबूत मोदी सरकार के 3 साल पूरे हो चुके हैं। बीजेपी पूरे देश में जश्न का जलूस निकाल रही है। जमीन पर इन 3 सालों में देश को क्या मिला उसका तो नहीं पता, लेकिन अपना हर संभव बखान करने के लिए BJP कुछ न कुछ मुद्दा और नारा ढूंढ ही लेगी, क्योंकि उसे पता है इन मुद्दों पर ना तो जनता को सवाल पूछने की इजाजत है और ना ही मीडिया उन मुद्दों पर सवाल करने की हिम्मत करेगा। हां मैं भी मानता हूं कि मोदी क्या यह 3 साल का कार्यकाल सफल रहा है और सफलता का सबसे बड़ा पैमाना यह है कि इन 3 सालों में प्रधानमंत्री, उनकी सरकार, उनके मंत्री और बीजेपी ने जो कुछ भी कहा, मीडिया ने उस बयान को सरकार का दावा जैसा नहीं बल्कि ब्रह्म वाक्य के तौर पर प्रस्तुत किया। मोदी सरकार की सबसे बड़ी कामयाबी ही शायद यही है कि इन 3 सालों में कश्मीर से लेकर कन्याकुमारी तक की हर समस्या के लिए विपक्ष, सेक्युलर, लिबरल, कांग्रेस , JNU या फिर केजरीवाल जिम्मेदार है। इतना ही नहीं मोदी सरकार के कार्यकाल की सबसे बड़ी सफलता यही है कि इन 3 सालों में उनके किसी भी फैसले को मीडिया ने सवालों और वास्तविकता की कसौटी पर परखने की बजाय उसका एक तरफा प्रचार किया। मोदी सरकार के किसी भी फैसले पर मीडिया का आलोचना तो छोड़िए एक सवाल भी नहीं उठाना ही उनकी सबसे बड़ी जीत है। 
    वरना ऐसा क्या बदल गया कि भारत की सीमाओं से लेकर कश्मीर के अंदरूनी मामले तक और देश में बढ़ती बेरोजगारी से लेकर आसमान छूती कीमतों तक जहां 2014 तक नई दिल्ली और नई दिल्ली में बैठे प्रधानमंत्री और उनकी सरकार जिम्मेदार होती थी अब उन्हीं मसलों पर नई दिल्ली नहीं बल्कि स्थानीय मुद्दे जिम्मेदार होते हैं। ऐसा क्या बदल गया देश की अंदरूनी सुरक्षा की जिम्मेदारी पहले सरकार की होती थी लेकिन अब सुरक्षा पर मंडरा रहे खतरे पर जवाब कन्हैया और उमर खालिद से मांगा जाता है। नोटबंदी का फैसला यकीनन ऐतिहासिक था। 8 मई को अपने भाषण में प्रधानमंत्री मोदी ने कहा कि नोटबंदी से कालेधन पर लगाम लगेगी और राजनीतिक दलों का काला पैसा महेश काली स्याह बनकर रह जाएगा। प्रधानमंत्री के भाषण खत्म होने के तुरंत बाद तुरंत भारतीय मीडिया ने नोटबंदी को कालेधन का दुश्मन साबित कर दिया। एक चर्चा या एक सवाल भी नहीं उठा कि प्रधानमंत्री जो दावा कर रहे हैं उसके लिए सरकार की तैयारी आंकड़े और रिसर्च कितनी है। मीडिया ने एक सवाल नहीं पूछा कि आखिर भारत के सिस्टम में कितना काला पैसा है और नोटबंदी के बाद कितना काला पैसा सिस्टम में वापस आएगा। प्रधानमंत्री ने जो कहा उसे भारतीय मीडिया ने जस का तस सवा सौ करोड़ की आबादी के सामने परोस दिया। इतनी भी नैतिकता नहीं दिखाई कि जो प्रधानमंत्री कह रहे हैं उसे सरकार का दावा तक कहा जाए बल्कि उसके उलट भारतीय मीडिया देश के जनमानस को यह बताने में जुट गई कि जो प्रधानमंत्री कह रहे हैं वही अटल सत्य है और आप मान लीजिए कि नोटबंदी से काला धन खत्म हो जाएगा। पहले दिन से लेकर आज 6 महीने से ज्यादा वक्त बीतने के बाद भी वही मोदी सरकार यह बताने में आनाकानी कर रही है और बदले झांक रही है कि आखिर नोटबंदी के बाद भारत की अर्थव्यवस्था में कितना काला पैसा सिस्टम के अंदर आया और कितना काला पैसा बर्बाद हुआ। 
  तो आप जरा इन 3 सालों के कामकाज पर एक नजर डालते हैं। 
देश का सबसे बुनियादी मसला है रोजगार और जरा सरकार से यह जवाब मांग कर देखिए कि क्या इन 3 सालों में पिछले किसी भी शासन की तुलना में लोगों को मिलने वाले रोजगार में 1% की बढ़ोतरी हुई है। आंकड़े बताते हैं कि मोदी सरकार के इन 3 सालों के राज के दरमियान नौकरियों में कमी हुई है। हाल ही में आई रिपोर्ट कि अगर मानें तो आईटी सेक्टर में सालाना 300000 नौकरियों तक की कटौती हो सकती है। लेकिन क्या रोजगार की समस्या पर आप कहीं कोई चर्चा देख रहे हैं या फिर कहीं सरकार रोजगार के सवालों पर जवाब देने के मूड में दिखती है जवाब है नहीं। 
देश के दूसरे सबसे बड़े मुद्दे पर ध्यान देते हैं वह है महंगाई। आपकी कमाई आपके घर के खर्च में सीधा रिश्ता है। इन 3 सालों में वह दौर आया था जब अरहर की कीमतें ₹60 से ₹170 तक पार कर गई थी। बाजार चाहिए और देखिए अरहर की दाल की कीमतें क्या हैं? 
3 सालों के वक्त में सवा सौ करोड़ की आबादी वाले हिंदुस्तान में शिक्षा और स्वास्थ्य के क्षेत्र में अगर कायापलट नहीं की जा सकती तो कम से कम एक नई क्रांति की शुरुआत जरूर की जा सकती है। क्या आपके पास जवाब है कि इन 3 सालों में  शिक्षा और स्वास्थ्य के क्षेत्र में मोदी सरकार ने कौन सी नई योजनाएं शुरु की जो आम जनमानस तक पहुंच कर उन्हें सीधा फायदा दे सके?
भ्रष्टाचार- यूपीए-1 के कार्यकाल में देश का मीडिया लगभग इसी तरह केंद्र सरकार की शरण में था। लेकिन यूपीए-2 में वह बदलाव देखने को मिला जब जनता और मीडिया दोनों ने भ्रष्टाचार के मसले पर कांग्रेस नेतृत्व वाली यूपीए-2 सरकार पर सवाल उठाए। सवालों का जवाब देने में नाकामयाब सरकार के खिलाफ जंतर मंतर पर आंदोलन भी हुआ। सवालों का जवाब देने में नाकामयाब सरकार के खिलाफ जंतर-मंतर पर आंदोलन भी हुआ उस आंदोलन मौजूदा कांग्रेस सरकार के खिलाफ नफरत का एक बीज बोया जिसकी फसल बीजेपी और नरेंद्र मोदी ने 2014 में काटी। इन 3 सालों में जरा पूछिए केंद्र सरकार से कि कहां है देश का लोकपाल। क्यों लोकपाल की नियुक्ति को नेता विपक्ष की स्थिति ना होने के बहाने से लटकाया जा रहा है। क्या इन 3 सालों में देश से भ्रष्टाचार खत्म हो गया है? या फिर इस सरकार में भ्रष्टाचार उतना गंभीर अपराध नहीं है जितना पिछली सरकार में था। देश की सबसे बड़ी जांच एजेंसी सीबीआई खुद राजनीतिक और आपराधिक आरोपों से घिरी हुई है। देश के आयकर विभाग पर राजनीतिक होने के आरोप लग रहे हैं। यानी जनता के पास मोदी सरकार के राज में भ्रष्टाचार के खिलाफ शिकायत करने के लिए कोई निष्पक्ष तंत्र मौजूद नहीं है। सोचिए अगर देश का लोकपाल होता तो क्या उसके दरवाजे पर इस सरकार के खिलाफ हजारों शिकायतें नहीं पहुंचती। और अगर वह शिकायतें पहुंचती तो क्या इस सरकार पर भ्रष्टाचार के आरोप नहीं लगते? तो क्यों ना माने कि यह वही वजह है जिसकी वजह से लोकपाल आज भी सरकार की फाइलों के ढेर में दबा बैठा है। 
कटप्पा ने बाहुबली को क्यों मारा हिंदुस्तान को इसका पता चल गया लेकिन आज तक यह पता नहीं चल पाया कि मोदी सरकार ने नोटबंदी क्यों लागू की। रिजर्व बैंक बार बार आरटीआई से मांगी जाने वाली जानकारियों को अलग-अलग बहाने से ठुकरा रहा है। रिजर्व बैंक की माने तो नोटबंदी के कारण और उसके बाद सिस्टम में आए गए काले पैसों का ब्यौरा जारी करने से देश की सुरक्षा पर खतरा मंडरा सकता है। पर मजे की बात यह है कि इस हास्यास्पद जवाब की आलोचना तो छोड़िए सिस्टम में ऐसी चुप्पी बंधी है जैसे मानो आंकड़े सामने आ गए तो सरकार गिर जाएगी। क्या मोदी सरकार ने यह दावा नहीं किया था कि नोटबंदी से काला पैसा खत्म हो जाएगा काले धन के खेल में लिप्त नेता जेल जाएंगे उनका पैसा बर्बाद हो जाएगा और हिंदुस्तान जन्नत बन जाएगा। जरा देखिए अपने आसपास और नोटबंदी के बाद के इन 6 महीनों में हुए घटनाक्रमों पर नजर डालिए। नोटबंदी के बाद भी कई राज्यों में चुनाव हुए क्या वहां पर काले पैसे का इस्तेमाल नहीं हुआ। नोटबंदी के दौरान काले पैसों के खेल में सबसे ज्यादा पकड़े जाने वाले लोग क्या केंद्र में शासित सत्ता दल के ही नहीं थे? जरा देखिए कि नोटबंदी के बाद कितनी राजनीतिक दलों के नेता कंगाल हुए या सलाखों के पीछे गए। 
ऐसा पहली बार हुआ है जब किसी शासनकाल में सोशल मीडिया पर सत्ताधारी दल के कार्यकर्ताओं और समर्थकों ने अभद्रता और आतंक की सारी मर्यादाएं तोड़ दी हैं। महिलाओं के खिलाफ बदसलूकी गाली गलौज से लेकर सरकार से सवाल पूछने वाले पत्रकारों के खिलाफ सोशल मीडिया पर सत्ताधारी दल के गुंडों द्वारा दिनदहाड़े हमले हो रहे हैं। लेकिन सबसे गंभीर स्थिति तब उठती है जब इस तरह के असामाजिक तत्वों को खुद देश के प्रधानमंत्री सोशल मीडिया पर फॉलो करते हैं।
देश की आंतरिक समस्याएं बढ़ रही हैं। उत्तर प्रदेश से लेकर झारखंड तक बीजेपी शासित राज्यों में जातीय हिंसा और अराजकता गंभीर स्थिति तक पहुंच चुकी है। मैनचेस्टर में हुए आतंकी हमले पर भारत के प्रधानमंत्री दुख जताते हैं लेकिन उनके आवास से महज कुछ सौ किलोमीटर की दूरी पर मारे जा रहे लोगों के लिए संवेदना प्रकट करने के लिए उनके पास शब्द शायद नहीं हैं। क्या ऐसा पहली बार नहीं हो रहा है जब गाय और गोबर को इंसानी जान से ज्यादा तवज्जो दी जा रही हो। 
जन्नत कहे जाने वाले कश्मीर कश्मीर की स्थिति 90 के दशक वाली स्थिति में पहुंच गई है। जिस कश्मीर में बीजेपी के ही नेता और पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेई आदर्श हुआ करते थे आज उसी कश्मीर में मौजूदा मोदी सरकार के खिलाफ इतना असंतोष क्यों है। नई दिल्ली और श्रीनगर के बीच भरोसे की इतनी कमी शायद ही पहले कभी देखी गई हो। लेकिन इन मसलों पर सरकार से सवाल पूछे भी तो पूछे कौन। कश्मीर के नाम पर राष्ट्रवाद की खेती जम्मू से लेकर कन्याकुमारी तक की जा रही है क्योंकि इस खेती से वोटों की फसल लहलहाएगी।
एक नजर इन 3 सालों की विदेश नीति पर भी डाल ही लेते हैं। प्रधानमंत्री ने इन 3 सालों में विदेश यात्राओं और उन पर होने वाले जनता के पैसों के खर्च के पिछले सारे रिकॉर्ड तोड़ दिए हैं। सरकार के विदेश मंत्रालय में आरटीआई डालिए और पता कीजिए कि इन 3 सालों में प्रधानमंत्री के विदेश दौरों से देश को सीधे तौर पर क्या मिला। इन 3 सालों में नेपाल जिसके साथ भारत का रोटी-बेटी जैसा संबंध था उसने कड़वाहट घुल चुकी है।
इन 3 सालों में शासन का वह चेहरा पहली बार सामने देखने को मिला है जब देश की समस्याएं कम होने की वजह लगातार बढ़ रही हैं सामाजिक असंतोष बढ़ रहा है, लोगों के बीच नफरत राजनीतिक मकसद से फैलाई जा रही है। लेकिन न जाने यह सरकार कौन सा जादू कर रही है जिससे आपको भूखे पेट भी पेट भरे होने का एहसास हो रहा है। दर्द से करा रहे हिंदुस्तान ने कभी ऐसा फील गुड शायद नहीं किया था। और इसीलिए कह सकता हूं कि मोदी सरकार के 3 साल वाकई बेमिसाल।
आशुतोष मिश्रा

Tuesday, March 21, 2017

क्योंकि हमें जनादेश मिला है......

जनादेश का सम्मान किसी भी संवैधानिक राष्ट्र के जिंदा और स्वस्थ होने का प्रमाण होता है कोई भी जनादेश सवाल पूछने या सवाल उठाने के मौलिक अधिकार से ऊपर नहीं हो सकता। जनादेश दरअसल जिम्मेदारी का ही लोकतांत्रिक पर्याय है़। लेकिन आज माहौल बदल चुका है या यूं कहें कि माहौल बदलने की कोशिश धडल्ले से जारी है। इस बदले हुए माहौल में सत्ता परम सत्य है और सत्ताधारी हरिशचंद्र से भी बडे सत्यवादी, क्योंकि हमें जनादेश मिला है।
    अब मोमबत्ती जलाने से भी दिल नहीं पसीजते बल्कि अब हर सवाल पर इंसाफ मांगने के लिए जलने वाली मोमबत्ती की लौ बुझाने वाली सेना राष्ट्रवाद के नाम पर हाथ में चाबुक लिए घूम रही है। इस माहौल में राम राज्य के नाम पर जनादेश तो मिला लेकिन राज्य बदलने की उम्मीद दूर दूर तक नहीं दिखती।
  जनता को आजादी देने के नाम पर मिले जनादेश के बाद प्रजा को अनदेखे डर से डराने की कोशिश का दौर है ये। स्याही फेंकने वालों को सम्मान और स्याही से लिखने वालों पर स्याही फेंकने का दौर है ये। स्याह इतिहास की ओर देश को धकेलने का दौर है क्योंकि अंधेरा होगा तो ना आप कुछ देख पाएंगे ना आपको कुछ देखने दिया जाएगा। स्याह अंधेरे में दोस्त और दुश्मन कोई नजर नहीं आएगा।
  बस लौ बुझाने वालों की आवाज आएगी और उनके बताए रास्ते पर चलने को मजबूर हो जाएंगे, ये जाने बिना कि वो रास्ता किस तरफ जाता है। ये जाने बिना कि वो रास्ता आगे कुंए की ओर जाएगा या खाई में।
   ये सत्ता के साथ सुख भोगने का दौर है। सत्ता का वो सुख जो मृगमरीचिका की तरह दिखता तो है लेकिन मिलता नहीं। सत्ता सार्थक सत्य है और ये आत्म ग्यान उन सभी आत्माओं को मिल चुका है जो चंद लम्हों पहले मुल्क के लिए निजाम से बगावत कर चुके थे और भीड को उम्मीद दे रहे थे कि सवाल जिंदा हैं और इंसान भी, ईमान जिंदा है और रूह भी। लेकिन बदलते दौर के साथ बदले निजाम के साथ उन सभी रूहों को नए निजाम में ही इंसाफ का चेहरा नजर आने लगा।

     ये वो दौर है जब सूट बूट वाला जनता का सिपाही सत्ता का जयकार करता है और सवाल उठाने वालों पर शब्दों के हंटर से प्रहार करता है। ये वो दौर है जब लोकतंत्र के हर खंबे टूट रहे हैं और जो अटूट है उसमें दीमक लगाने की कोशिश की जा रही है। जम्हूरियत के लौह खंभे सत्ता की नमी से जंग खाने लगे हैं और जनता की जंग भूलकर सियासत से निकाह कर चुके हैं। और ये सब इसलिए क्योंकि हमें जनादेश मिला है।

ये वो दौर है जब कमजोर किसी कोने में खडा सूख चुके आंसुओं भरे सुर्ख आंखों से सियासत की ओर सवालिया निगाह डालता है लेकिन बुद्धू बक्से में सजे धजे जीव कहते हैं वो भीड तो सत्ता का स्वागत करने खडी है। ये वो दौर है जब सत्ता हीरो है और विपक्छ विलेन। ये वो दौर है जिसमें गुणगान करना धर्म है और सवाल पूछना अधर्म। ये वो दौर है जिसमें चाटुकारिता परम सुख है और सवाल राष्ट्रद्रोह। ये सब इसलिए क्योंकि हमें जनादेश मिला है।

ये उस दौर की शुरूआत है जब अंधेरा मुल्क की किस्मत बन जाएगा और इस अंधेरे को रामराज्य कहकर ढिंढोरा पीटा जाए। जो इस अंधेरे में चकम सुख प्राप्त करने लगे उसे क्या फर्क लेकिन जिंदा रूहों तो सुकून मयस्सर नहीं होने का दौर है ये। क्योंकि हमें जनादेश मिला है।

डरती नहीं जम्हूरियत लाशों के मैदानों से
खतरा है मुल्क को मर चुकी जिंदा रूहों से

आशुतोष मिश्रा

Saturday, November 5, 2016

सवालों का नोटिस लीजिए, दीजिए नहीं साहब!


लोकतंत्र में बिना आवाज के स्टार्ट अप शुरू करना है!
   सवालों का नोटिस लेने वाले सरोकार सवालों पर नोटिस दे रहे हैं, २०१६ में दुनिया के सबसे महान और सबसे बडे लोकतंत्र का ये भी एक कडवा और भयावह चेहरा है। 
    हालात को इमरजेंसी करार दे दूं तो ट्रोल देशद्रोही करार दे देंगे। चलन नया शुरू किया है सरकार के सिपहसालारों ने। सवाल करना देशद्रोह है और जितना जल्दी यह समझ में आ जाए उतना ही बेहतर है। 
  "सर बागों में बहार है!" इस सवाल और इसका जवाब आपके लिए अच्छा है लेकिन जहां आपने पूछा "सर क्या बागों में बहार है?" समझिए आप अफजल गुरू के रिश्तेदार, हाफिज सईद के हमदर्द और पाकिस्तान प्रेमी जैसे ना जाने क्या क्या शब्दों से संवार दिया जाएंगे। 
      आजकल ट्रोल्स का जमाना है। हर पार्टी और सरकार के पास अपनी ही ट्रोल आर्मी है। ये आपको ईमानदारी से लेकर राष्ट्रभक्त तक हर बात का सर्टिफिकेट दे सकते हैं। इनके आकाओं पर आपने अगर सवाल उठाया तो आपको चरित्र के इतने टुकडे बिखेरेंगे कि आप सामाजिक जीवन में शर्मिंदा महसूस करने लगेंगे।
    रवीश सही कहते हैं, "दिल्ली" में कार्बन की मात्रा बढ गई है। सारे एक्सपर्ट कह रहे हैं PM10  से ज्यादा  PM 2.5 जानलेवा है। अब ये मत समझिएगा कि मैं PM10 को सरकार या पार्टी और PM2.5 को ट्रोल कहने की कोशिश कर रहा हूं। बाकी अगर आप आज के राजनीति को प्रदूषण कहना चाहते हैं तो आपकी मर्जी। 
     ताजा ताजा और नया नया सरकार ने इंट्रोड्यूस किया है और वो है "बैन"!
     मने सोचिए जरा! टीवी पर बैन लगा के वो सोचते हैं सच दब जाएगा? इंडिया है साहब! नया वाला इंडिया! हमारा इंडिया। 
     ७५ में तो पैदा तो नहीं हुए थे लेकिन इतिहास कहता है कि वो लोकतंत्र का काला दिन था। नेताओं को जेल में डाल दिया गया, अखबार बंद हुए, अदालत ठप्प हुए और सत्ता का दमनचक्र शुरू हुआ। अब 75 को इतिहास के पन्नों में खोजने की जरूरत नहीं है। बहुत कुछ सामने है।
   राज्य को मुख्यमंत्री और उपमुख्यमंत्री को हिरासत में लेना, विरोधी दल के नेता को गिरफ्तार करना वो भी इसीलिए क्योंकि वो किसी मृतक के परिवार से मिलने जा रहे थे?
    अगले दिन खबर आती है कि एक बडे विश्वसनीय चैनल को 24 घंटे के लिए बंद करने के आदेश दिए गए हैं। 
पठानकोट की कवरेज से ज्यादा क्या पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी को बुलाना गलत नहीं था।लेकिन वो तो रणनीति थी! है ना? वाह रे मापदंड!
  पत्रकारिता में मरे पडे लोगों की भीड में कुछ लोगों ने सवाल उठाया तो सरकार और उनकी फौज ने नेशनल सिक्योरिटी जैसे बडे बडे शब्दों को तीर चला दिए। लगा शायद सरकार सबक लेगी और नोटिस का दौर रुकेगा लेकिन तबतक २ और चैनल बंद करने का नोटिस प्राप्त कर चुके थे। यकीन कीजिए कि ये 2016 ही है। 
      अब ७५ और १६ के बीच मैं फर्क करने की कोशिश करता हूं तो मुझे ना जाने क्यों दिखता है कि सरकार अपनी हे देशवासियों के खिलाफ सर्जिकल स्ट्राइक पर आमादा है।
ये इमरजेंसी नहीं है लेकिन उससे कम दिखती है क्या? 
    जो अथॉरिटी हैं क्या उनकी जिम्मेदारी नहीं है जवाब देना? और अगर है तो सवाल पूछना देशद्रोह कैसे है? 
    एनकाउंटर में 8 सिमी सदस्य मारे गए, गंभीर आरोप थे उनपर लेकिन कोई सजायाफ्ता नहीं। एनकाउंटर सीधे-सीधे फर्जी नजर आता है, लेकिन जैसे सवाल उठाओ तो राष्ट्रद्रोही करार दे दिए जाएंगे। हवाला दिया जाता है कि फोर्सेस पर सवाल उठाने से उनका मनोबल गिरता है। 
   अरे क्या फर्जी और राजनीतिक एनकाउंटर नहीं होते? क्या पुराने सारे एनकाउंटर असली हैं? पुलिस कबसे सवालों से परे हो गई? 
   पुलिस मतलब ही सरकार होता है और सरकार से ही सवाल पूछे जाते हैं। सवाल से ही तो जिंदा और मुर्दा होने का फर्क पता चलता है। 
      सवाल उठाना सिर्फ धर्म नहीं हमारा अधिकार है, और संविधान द्वारा दिए गए अधिकारों पर हमला ही राष्ट्रद्रोह है। वो सारी सरकारें राष्ट्रद्रोही हैं जो सवाल पूछने पर हमला करती हैं। 
     नोटिस, गिरफ्तारी, विरोध और प्रदर्शन पर भी जब आवाज अनसुनी कर दी जाए तो समझिए आप अहंकार के दायरे में घुस चुके हैं। लेकिन यहां तो अहंकार अपनी सारी मर्यादाएं तोड रहा है।
    याद रखिए हिंदुस्तान का इतिहास गवाह है, इस देश ने बहुत गुनाह माफ किए लेकिन अहंकार कभी माफ नहीं किया। रामायण और महाभारत भी अहंकारी के साथ हुए परिणाम को बयान करते हैं। वक्त है संभल जाइए।