Monday, March 29, 2010

सानिया, सोहराब और शोएब...




मेरे प्यारे भाईलोग और सिर्फ भाईलोग...आज मैंने टीवी पर एक हटके खबरे देखेला है। बोले तो देखा है। खबर देखतेइच अपुन का दिमाग खराब हो गया। मैंने क्या देखा कि सीरे टीवी चैनल चीख-चीख कर कह रहे थे कि सानिया मिर्जा शादी कर रहेली है। भाईलोग मेरेको अभी भी याद है कुछ महीने पहले इच सानिया ने अपने मंगेतर सोहराब मिर्जा से रिश्ता तोड़ा था। अभी सोहराब का जख्म भी नहीं भरा होगा कि सानिया नए जोड़े के साथ शादी के कोर्ट में कूद गएली है। बोले तो शादी कप में शानिया का डबल्स अवार्ड। अपुन के कान में सुनने को आया है कि सानिया मिर्जा के साथ जिंदगी का गेम खेलने वाला नया प्लेयर है पाक क्रिकेटर शोएब मलिका। भिड़ू लोग शोएब क्रिकेट कमाल का खेलता है। अभी सानिया के साथ ये उसका कौन सा गेम है मेरेको भी समझ में नहीं आ रहेला है। ये न्यूज के बाद सिर्फ मेराइच नहीं बल्कि इंडिय़ा और पाकिस्तान में भी काफी लोगों का दिल टूट गएला है। बेचारा दिल सानिया की मिनी स्कर्ट और उसकी नोज़रिंग पर मरता था। अभी सोहराब की जगह शोएब कैसे आ गया मै वहीच जबाव खोज रहेला हूं। तो एक अखबार में मेरे को जवाब मिला। अभी भिड़ू लोग तुम लोग सोचेगा कि मैं अखबार पढ़ता भी हूं क्या। तो भाईलोग मैं बतादूं मेरे को पढ़ना अच्छा लगता है। अभी क्या है हर किसी को पढ़ना लिखना मांगता है। तो मेरे को भी पड़ना मांगता है सोचके मैं भी अखबार पढ़ना शुरू किया। तो मैंने क्या पढ़ा कि
जनवरी में सोहराब से सानिया की सगाई टूटी और फिर सानिया फरवरी में दुबई में एक टूर्नामेंट में खेलने के वास्ते गई।
इधर शोएब मलिक की पाक क्रिकेट ने वाट लगा दी थी। आपको मालूम इच होगा कि पाकिस्तान क्रिकेट बोर्ड ने ऑस्ट्रेलिया दौरे में पिटने के बाद शोएब पर एक साल का बैन लगा दिया है। तो वाट लगने के बाद शोएब भी दुबई चला गया। शोएब का कुबई में भी एक घर है। तो भिड़ू उधरीच रहने को चला गया। इधर जब सानिया टेनिस खेल रही थीं तभी शोएब की मुलाकात सानिया से हुई। अभी दोनों के बीच कुछ-कुछ हुआ। बोले तो दोनों की दो-दो आंखें मिलकर चार होने लगीं। अभी आप लोग भी किसी ना किसी से लव तो कियाइच होंगा। अपुन ये नहीं पूछ रहेला है कि वो सच्चा था या फिर टाइमपास। बोले तो लव क्या है ये अभी केजी के बच्चे को भी पता है। तो वहीं हुआ इन दोनों खिलाड़ियों के बीतच में। बोलेतो लव एट फर्स्ट साइट....
इधर सानिया अपने सोहराब को छोड़कर आई थी तो उधर गेम में वाट लगने से सोएब भी काफी टेंशन में था। अभी ऐसे माहौल में दोनों की मुलाकात दवाई बनने लगी। जास्ती मजा लेने का नहीं...उधर शोएब का भी दिल कुछृ-कुछ टूटेला टाइप का ही था। शोएब मलिका का टक्कर मिस इंडिया और ऐक्ट्रेस सयाली भगत से भी था। उसके बाद उसका टांका भिड़ा हैदराबाद की आयशा सिद्दकी के साथ। पन कुछ हुआ नहीं उलटे सोएब टेंशन में आ गया। अभी हैदराबाद से शोएब का क्या लफड़ा है अपने को भी समझ में नहीं आता। हैदराबाद की सनसनी सानिया पर शोएब का दिल आ गया। इधर दुबई में दोनों के दिल बीच में लफड़ा चलने लगा। इतना ही नहीं इस कपल ने अक्खे दुबई का टूर किया। और जभी दोनों को लगा कि अभी सिंगल खेलने की बजाए कपल्स खेलना चाहिए तो घर वालों के सामने इन दोनों ने प्रपोजल रख दिया। अभी मियां-बीवी राजी तो क्या करेगा काजी वाली कहावात ओ आपने सुनीच होगी। बेटे की खातिर शोएब की मां हैदराबाद आई और सानिया की मां से बातचीत की। अभी बात बनगएली होगी इसीलिए दोनों अप्रैल में शादी कर रहेले हैं। अभी मेरेको तो नहीं बुलाया पन भिड़ू अगर कोई भी शादी में गया तो प्लीज़ मेरेको भी बताने का कि उधर क्या हुआ। अभी क्या है मैं भी सानिया का फैन रहेला हूं लेकिन सानिया अपने इस फैन को तो बुलाएगी नहीं। सुना है 7 अप्रैल को शोएब अपना फुलटू फैमिली के साथ इंडिया आ रहेला है। हैदराबाद में दोनों की शागी होगी और पाकिस्तान में दावत।
अभी सानिया शादी के बाद टेनिस खेलेगी क्या नहीं ये मेरे को नहीं मालूम। क्या है कि सोहराब ने भी सानिया को बोला था शादी के बाद खेलना है कि नहीं तुम खुदीच डिसाइड करो। ठीक यही बाद शोएब ने भी सानिया को बोलेला है। पन आगे क्या होएंगा ये दोनों को भी मालूम नहीं है। इधर सानिया चाहती है कि लंदन ओलंपिक में खेले। दो भाई लोग सानिया-शोएब को मेरी ओर से all the best.

Friday, March 26, 2010

महानायक पर महाभारत !




हमने इस शख्सियत को सदी का महानायक घोषित किया है। सदी का सबसे बड़ा सितारा है ये। बॉलीवुड इसे शहंशाह मानता है। लेकिन कुछ मतलब परस्त इस शख्स से किनारा करने लगे हैं। माजरा समझने के लिए इतना ही मजमून काफी है। अमिताभ बच्चन के साथ जो कुछ भी हुआ और जो कुछ भी किया गया इसका जिम्मेदार कौन है ? मुंबई में अमिताभ बच्चन सी-लिंक के उद्घाटन में क्या गए हंगामा हो गया। हंगामा ऐसे जैसे आतंकियों ने पुल को उड़ा दिया हो। मुंबई से शुरू हुई हलचल ने दिल्ली को हिला दिया। यकीन ना आए तो कोई पर्यावरण मंत्री जयराम रमेश से पूछे। अमिताभ को स-लिंक के उद्घाटन समारोह में शामिल होने के लिए न्यौता दिया गया या नहीं सवाल अब ये नहीं रहा। सवाल ये है कि आखिर अभिनय की दुनिया की सबसे बड़ी शख्सियत के साथ नामजोड़कर ओछी राजनीति क्यों ? अमिताभ के समारोह में शामिल होने से महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री को ऐतराज हुआ। अमिताभ को मंच पर जगह घेरे देखकर महाराष्ट्र प्रदेश के कुछ कांग्रेस नेताओं को तीर चुभने लगा। एक वजह ये भी हो सकती है कि समारोह में कांग्रेस का मुख्यमंत्री सदी के सबसे बड़े नायक के साथ खड़ा होने का सम्मान पा रहा था लेकिन छुटऊभैये नेताओं को ये गंवारा नहीं हो रहा था। इसलिए भी अमिताभ के आने का मुद्दा बड़ा बना दिया गया। मुद्दा इसलिए बना क्योंकि अमिताभ गुजरात के ब्रांड एंबेसडर हैं। अमिताभ पर आरोप है कि उनकी विचारधारा नरेंद्र मोदी से मेल खाती है। इसलिए क्योंकि उन्होने गुजरात का ब्रांड एंबेसडर बनान स्वीकार किया। इस बेतुके तर्क पर आप चाहें तो हंस भी सकते हैं। गुजरात की विकास दर अन्य राज्यों की तुलना में बेहतर है। मोदी ने राज्ज में निवेश को बढ़ावा दिया। नौकरी और व्यवसाय की उपलब्धता के चलते गुजरात में पलायन अन्य राज्यों की अपेक्षा बेहद कम है। और शायद यही वजह है कि गुजरात में कांग्रेस को कभी भी सफलता नहीं मिली और आगे भविष्य में भी आसार नज़र नहीं आते। कांग्रेस इस तथ्य को भलीभांति महसूस करती है। राज्य में निवेश और बढ़े और उसकी अच्छी ब्रांडिंग हो इसलिए मोदी ने बिगबी को राज्य का ब्रांड एंबेसडर बनाया। तो आखिरकार इस मुद्दे को लेकर अमिताभ बच्चन ये सवाल क्यों पूछें कि मैंने क्या किया ? आप गुजरात जाकर वहां के हालात देख सकते हैं। आम आदमी की कार लखटकिया नैनो का सपना पूरा गुजरात से हुआ। मोदी राजनीति जरूर करते हैं लेकिन अपने राज्य को विकास का तोहफा देने के बाद। शायद यही कांग्रेस की आंख में खटकता है। सवाल ये उठता है कि अगर कोई शख्स किसी राज्य विशेष को प्रमोट करता है तो क्या जरूरी है कि वो उस राज्य के नेतृत्व की विचाराधारा से भी समानता रखता हो ? जवाब ना भी हो सकता है लेकिन राजनीति में सिर्फ अपना फायदा देखा जाता है। और मुंबई में कांग्रेस ने यही किया। अमिताभ पर आरोप लगा दिया कि उनके विचार मोदी से मिलते हैं इसलिए उन्हे कांग्रेस के समारोह में नहीं आना चाहिए था। सवाल एक और, क्या कांग्रेस संविधान से ऊपर है जो ये निर्णय ले कि कौन सा शख्स किस जगह पर जाए ? जवाब आप दीजिए और सवाल कांग्रेस से पूछिए। मैं मोदी विचाराधारा से बिलकुल सहमत नहीं हूं। किसी धर्म विशेष के खिलाफ या पक्ष में नहीं हूं। लेकिन जो सच मुझे नज़र आता है उसे जाहिर करने से पीछे मैं नहीं हटूंगा। बिना गलती के अमिताभ बच्चन को सज़ा दी जा रही है। कांग्रेसी नेता अपनी गंदी राजनीति का कीचड़ अमिताभ के दामन पर डालकर मीडिया में ध्यान का केंद्र बनने की कोशिश कर रहे हैं। कांग्रेस वो दिन भूल गई जब नेहरू ने बिग के बड़े भाई अजिताभ बच्चन के लिए निजीतौर पर सेवाईं दी थीं। समारोहों में उनका खास ख्याल रखा जाता था। वहीं कांग्रेस आज बच्चन के नाम को दागदार कर रही है। महाराष्ट्र में एनसीपी के साथ कांग्रेस ने साझा सरकार बनाई है और उसी साथी पक्ष के नेता ने ही बच्चन को आमंत्रित किया था। स्टेज पर बच्चन के साथ बैठते समय मुख्यमंत्री अशोक चव्हाण को दिक्कत नहीं हुई क्योंकि वो विरोधी पार्टी के चहेते के साथ बैठे थे। शायद ये बात उनके जेहन में भी नहीं थी लेकिन जैसे ही पार्टी के छुटभैयों ने आलाकमान से शिकायत की चव्हाण बिगबी के जन्मजात विरोधी की तरह बर्ताव करने लगे। इसके पहले भी टैक्सी ड्राइवरों के लाइसेंस के मामले में अशोक चव्हाण पर पलटने का आरोप लग चुका है। मुंबई में मची हलचल दिल्ली तक पहुंच गई। दिल्ली में पर्यावरण के मुद्दे पर आयोजित एक कार्यक्रम में पर्यावरण मंत्री जयराम रमेश को आना था। इसी समारोह में अमिताभ बच्चन को भी बतौर मुख्य अतिथि बुलाया गया था। लेकिन बिगबी के साथ बैठने पर मचे कोहराम का नतीजा रमेश देख चुके थे इसलिए ऐन वक्त पर आने से कन्नी काट गए। लोगों को कहा कि तबीयत खराब है लेकिन उसी वक्त कहीं और रमेश साहब मीडिया से मुखातिब हो रहे थे। खैर जो कुछ भी हुआ उसमें गलती किसकी है कांग्रेस अभी भी इसी में लगी हुई है। जल्द ही महाराष्ट्र में एक और समारोह है जिसमें चव्हाण साहब के साथ अमिताभ बच्चन को भी बुलावा भेजा गया है। देखते हैं क्या करेंगे सीएम साहब ?

Monday, March 22, 2010

दिल्ली को लूट लिया !




कुछ ही महीनों में देश कॉमनवेल्थ खेलों की मेज़बानी करेगा। अगर इस दरम्यान आप दिल्ली आते हैं तो आपके लिए राजधानी बिलकुल नई होगी। जिन सड़कों पर धूल और गंदगी कभी आपने देखी होगी वो सड़कें आपको किसी और देश में होने का अहसास कराएंगी। सड़कों पर कदम-कदम पर बने फ्लाईओवर के चलते आप रास्ता भी भूल सकते हैं। कॉमनवेल्थ गेम्स की मेजबानी के लिए पिछले तीन सालों से दिल्ली में कई बदलाव किए जा रहे हैं। पूरे शहर को मेट्रो जैसे क्रांतिकारी परिवर्तन में ढालने के बाद नई-नई लो-फ्लोर बसें और सड़कों से किलर या फिर कहें जानलेवा ब्लू-लान बसों को हटाना एक अच्छी पहल माना जा सकता है। लेकिन खेलों के नाम पर अरबों रुपए भी स्वाहा किए गए हैं। आलम ये है कि दिल्ल सरकार का खजाना अब खाली हो चुका है। महज तीन साल पहले दिल्ली सरकार के पास 11,000 करोड़ रुपये का फंड था, लेकिन लुटी-पिटी दिल्ली के पास आज फंड के नाम पर बचे हैं केवल 200 करोड़ रुपये। खबरों की मानें तो इस बार सरकार को 3 हजार करोड़ से भी ज्यादा का घाटा हुआ है। इतना ही नहीं दिल्ली को खूबसूरत बनाने के नाम पर राजधानी को 27 हजार करोड़ रुपए का कर्ज भी झेलना पड़ रहा है। क्या कोई शीला दीक्षित और सरकारी महकमें के अधिकारियों से ये पूछेगा कि आखिर जनता के खून-पसीने की कमाई किसने डकार ली? आखिर कहां गया सरकारी खजाना? लेख लिखे जाने के दो दिन पहले ही दिल्ली में दूध के दाम 2 रुपए तक बढ़ गए। 1 लीटर दूध के लिए अब 30 रुपए तक देने पड़ रहे हैं। सब्जी, अनाज, फल हर चीज़ के दाम जेब पर भारी पड़ रहे हैं। लेकिन जो सरकारी बंगले में रहते हैं और सब्सिडी के अलावा ऊपर से भी खाते हैं उनके लिए इसकी चिंता करना ज़रूरी नहीं है। जनता पर पड़ते बोझ से कहीं सरकार की कुर्सी ना हिलने लगे इसलिए सरकार परेशान ज़रूर है। मीडिया के सवालों का जवाब देने से अधिकारी और नेता दोनों ही बच रहे हैं। दिल्ली पर हाथ का कब्जा है, इसलिए पैसा पानी की तरह यमुना में बहा दिया गया। काम कितना हुआ इसकी सुध लेने के नाम पर भी पैसा बहाया गया। परवाह किसी को नहीं थी। दिल्ली सरकार के बजट में खर्चों की भारी लिस्ट है। वजीराबाद एक इलाका है दिल्ली में। सरकार यहां एक सिग्नेचर ब्रिज बनाना चाहती है। खर्चा आएगा लगभग 1200 करोड़ रुपए। हालांकि इस ब्रिज के लिए केंद्र सरकार भी मदद आर्थिक मदद करेगा। बावजूद इसके दिल्ली सरकार को 700 करोड़ रुपए खर्च करने होंगे। इस पुल को दिल्ली की शान के नाम पर बनाया जा रहा है। सरकार की जेब खाली है लेकिन महज दिखावे के नाम पर करोड़ों रुपए स्वाहा करने की तैयारी की जा चुकी है। इस पुल से दिल्ली के लोगों का भला तो होने से रहा लेकिन नेताओं और अफसरों के वारे-न्यारे ज़रूर होंगे। और जब अपनी जेब भरती हो तो अधिकारियों और नेताओं के पास जनता की सुध लेने की सुध कहां? दिल्ली में ही गीता कॉलोनी के पास भी हाल ही में एक पुल बनाया गया है। इस पुल की कुल लागत लगभग 100 करोड़ रुपए रही। महज 100 करोड़ रुपए दिल्ली को एक ज़बरदस्त पुल का तोहफा मिला। पुल की लंबाई भी ज्यादा और 4 लेन हाइवे से भी ज्यादा जगह है इस पुल पर और खूबसूरती के क्या कहने। लेकिन इस पुल के खर्चे और आसानी से दिल्ली सरकार खुश नहीं है। आपको बतादें कि इस पुल की वजह से इलाके में ट्रैफिक नाममात्र रह गया है। गीताकॉलोनी से दरियागंज सेकेंडों में पहुंचा जा सकता है। दिनभर अगर 10 हजार गाड़ियां इस रास्ते से गुजरें तो लाखों रुपए का पेट्रोल बच जाता है। लेकिन सरकार इसे महत्व नहीं देती। उन्हे तो सिग्नेचर ब्रिज ही चाहिए। भले ही दिल्ली पर कर्ज बढ़ता रहे। आखिर इन पांच सालों में उन्हे अपनी पीढ़ियों के लिए धन भी तो जमा करना है। मैंने अखबार में पढ़ा कि सरकार ने लालकिले के पीछे रिंग रोड बाइपास के लिए 655 करोड़ रुपये और बारापूला नाले पर बनने वाले रोड पर 550 करोड़ रुपये खर्च करने का मन बनाया है। हालांकि यहां इतने बड़े प्रोजक्ट की ज़रूरत नहीं है। और अगर है भी तो इसे खेलों के बाद भी बनाया जा सकता है। दिल्ली बदल रही है। रेडियो पर सरकार चीख-चीख कर कह रही है। ऐसा लगता है जैसे लोगों की आंखें नहीं है और वो बदलाव को देख नहीं सकते। खैर राजधानी में सड़कों के आसपास खूबसूरती के नाम पर 500 करोड़ रुपये खर्च किए जा रहे हैं। पूरी दिल्ली में करीब 280 करोड़ रुपये की लागत से स्ट्रीट लाइट के खंभे बदले गए हैं। ये खंबे थोड़े खूबसूरत लगते हैं, नए जो हैं। सरकार ने दलील दी है कि कॉमनवेल्थ गेम्स के दौरान पूरी दिल्ली में एक जैसे खंभे हों, लेकिन मजे की बात है कि जितने भी खंभे शहर में लगाए गए हैं, उनके डिजाइन एक जैसे नहीं हैं। ब्लू-लाइन से शबर को निजात दिलाना एक अच्छी पहल थी। लेकिन इसके लिए सरकार ने लो-फ्लोर के नाम पर लूट मचा दी। जो बसें सरकार 20 लाख रुपए में खरीद सकती थी उसे खरीदने के लिए 52 करोड़ रुपए खर्च किए गए। आखिर ये पैसा इन सफेदपोश चोरों के खून-पसीने का नहीं था। सरकार ने लो-फ्लोर बसों के लिए 2000 करोड़ रुपए बर्बाद कर दिए। करोड़ों रुपए की बचत से सरकार कई महीनों की किश्त दे सकती थी। लेकिन अगर ऐसा किया जाता तो करोड़ों रुपए अपनी जेब आने का रास्ता नहीं बनता। दिल्ली जलबोर्ड घाटे में हैं। लेकिन उसे रोकने के लिए सरकार के पास वक्त नहीं है। डीटीसी का घाटा कम करने के लिए दिल्ली की जनता पर बढ़े हुए किराए का बोझ डालव दिया गया। बावजूद इसके 500 करोड़ रुपए डीटीसी को देने पड़ रहे हैं। हर मर्ज की दवा होती है। लेकिन सरकार बीमारी को ठीक करने के बजाए हरकदम एक नया मर्ज इजाद करने में जुटी है। खेलों में कुछ महीने बचे हैं। शहर भर में निर्माण कार्य धड़ल्ले से हो रहे हैं। करोड़ों का खर्चा अरबों तक पहुंच गया है। खेलों में स्टेडियम में लगाई जाने वाली घास लाने के लिए अफसरान जनता का पैसा किस तरह खर्च किया इसका अंदाजा इस बात से ही लगाया जा सकता है कि अफसर हर एक दौरे के लिए बिजनेस क्लास में बैठकर दिल्ली से कोलकाता का सफर करते रहे। एक बार घास लाने के बाद उसे तबतक इस्तेमाल में नहीं लाया गया जबतक कि वो सड़ नहीं गया। घायस जब सड़ गई तो अधिकारी फिर से दिल्ली-कोलकाता करते रहे। करोड़ों रुपए की घास बर्बाद करने के बाद फिर उसी क्रिया को दोहराया गया। लेकिन जिस घास को कोलकाता से करोड़ों रुपए देकर मंगाया जा रहा था वो दिल्ली में ही यमुना किनारे भारी मात्रा में मौजूद है ये देखने की जेहमत किसी ने नहीं उठाई। इनका मकसद था सरकारी खजाने को खाली करना। अब जब सरकारी कंगाल हो रही है तो नए-नए रास्ते निकाले जा रहे हैं कि कर्ज लेकर भी अपनी जेब भरी जाए। दिल्ली वालों, आप तैयार रहें क्य़ोंकि सरकारी खजाना आपके ही पैसों से भरा जाएगा।

Sunday, March 21, 2010

चलो इलाहाबाद चलें !




इलाहाबाद का नाम सुनते ही संगम नगरी का चेहरा सामने आ जाता है। जो लोग इस तीर्थ को देख चुके हैं उनकी यादें एक बार फिर ताजा हो जाएंगी। लेकिन जिन्होंने इस इस देवनगरी के दर्शन नहीं किए हैं उन्हे मैं इलाहाबाद का दर्शन कराउंगा। 26 साल तक मैंने केवल इस नगरी का नाम सुना था। कुछ ऐसा संयोग बना कि अब मैं अक्सर इलाहाबाद जाता रहता हूं। दिल्ली से प्रयागराज एक्पप्रेस में रात 9 बजकर 25 मिनट पर मैं चला। इसे वीआईपी ट्रेन कहते हैं और अगर कोई प्राकृतिक आपदा ना आए तो ट्रेन अक्सर वक्त पर य़ानि अगले दिन सुबह साढे 6 बजे आपको संगम नगरी पहुंचा देती है। तो साहेबान अगले दिन मैं भी वक्त पर इलाहाबाद पहुंच गया। स्टेशन से बाहर निकलते ही आपको अंदाज़ा हो जाएगा कि आप उत्तरप्रदेश में आ गए हैं। जनाब इलाहाबाद में मैं आपका स्वागत करता हूं। रेलवे स्टेशन से बाहर आइए। यहां आनेवाले ज्यादातर मुसाफिर संगम की ओर बढ़ते हैं। तो चलिए आपको भी संगम ले चलता हूं। हिंदुस्तान की ज्यादातर आबादी ये जानती है कि इलाहाबाद में संगम कहां है और इसका नाम संगम क्यों पड़ा। संक्षिप्त में आपको मैं भी बतादूं, इलाहाबाद में जिस जगह पतित पावनी गंगा, जीवन दायिनी यमुना और पवित्र सरस्वती आपस में मिलती हैं उसे संगम कहते हैं। रेलवे स्टेशन के बाहर तीन पहिए वाले ऑटोरिक्शा (विक्रम) वाले आपका स्वागत करेंगे। एक साथ वो आपपर झपटेंगे। अपने विवेक से काम लें और सही जगह देखकर विक्रम की सवारी का मजा लें। हां अपने सामान की जिम्मेदारी आपकी ही होगी ये बताने की जरूरत नहीं है। तो जनाब इलाहाबाद की गलियों से आप गुजरें। जर्जर होती पुरानी इमारतों के बीच से आप चल रहे हैं। सड़कें पतली हैं और गाड़ियों का काफिला दोनों ओर से गुजर रहा है। किस्मत अच्छी रही तो ज्यादा ट्रैफिक जाम नहीं मिलेगा। बाजार, गली, मोहल्ला पार करने के बाद आपको खुली सड़क भी मिलेगी। बीच-बीच में कई सारे छोटे-छोटे मंदिर भी मिलेंगे। लोगों ने अपने पसंदीदा देवताओं की श्रद्धा के हिसाब से मंदिर बना रखे हैं। चाहें तो रिक्शा में बैठे-बैठे ही सिर झुकाकर आस्था प्रकट कर लें। लोग अक्सर ऐसा करते हैं। हां अगर जोर-जोर से मंदिरों में लाउडस्पीकर पर फिल्मी धुनों पर भजन बज रहे हों तो परेशान ना हों। आस्था प्रकट करने का लोगों का अपना-अपना तरीका। मंदिरों के जमघट पार करने के बाद आप रूबरू होंगे पुराने पुल से। आप चाहें तो नए पुल से भी जा सकते हैं। लेकिन वहां से में आपको बाद में ले चलुंगा। तो साहब हम पहुंच गए पुराने पुल पर। अंग्रेजों के जमाने से चला आ रहा पुल हिलता जरूर है लेकिन अभी तक गिरा नहीं है। आए दिन सरकारी खर्चे पर इसकी मरम्मत भी होती है। मरम्मत के बहाने स्थाई ठेकेदार की दुकानदारी भी चल जाती है। पुल के ऊपर से ट्रेनें भी गुजरती हैं। अगर उसी दौरान नीचे से आप भी गुजर रहे होंगे तो शोर से आपको तकलीफ भी हो सकती है। बहरहाल अब पुल से अपने दोनों ओर देखिए। पुल के नीचे यमुना मैया आपको दर्शन देंगी। अगर वक्त सुबह का है सूरज की रोशनी के चलते आपको यमुना का पानी काला नहीं दिखाई देगा। हाथ जोड़कर उनसे माफी मांगिए कि हे यमुना मैया हम तुम्हारा पानी काला होने से नहीं बचा सकते, हमें माफ करो। ऑटो में बैठै-बैठे आप देख सकेंगे कि कैसे स्थाई लोगों के साथ बाहर के मुसाफिर भी अपने घर का बचा-खुचा सामान यमुना नदीं में प्रवाहित करके पुण्य प्राप्त करने का लाभ महसूस करते हैं। उन्हे ये मत कहिएगा कि आपने कचरा नदी में क्यों बहाया। वो आपसे नाराज़ हो सकते हैं। उन्हे लगता है कि उनके घर की गंदगी यमुना स्वीकार करेंगी और उन्हे यश का प्रसाद देंगी। अपने बाईं ओर थोड़ी दूर देखने की क्षमता अगर आप में होगी तो आप संगम भी देख सकेंगे। ध्यान देंगे तो आपको गंगा मैया की कराह भी सुनाई देगी जो अपने बेटों से कहती है कि मेरा दर्द सुनो। मुझे बचाओ, मेरा अस्तित्व खतरे में है। लेकिन हम हिंदुस्तानी हैं, दूसरों की दर्द की परवाह किए बगैर सतत आगे बढ़ते जाना हमारी आदत में शामिल है। किसी और की पीड़ा सुनने के लिए हमारे पास वक्त नहीं है। तो दर्द और मायूसी से बाहर निकलें। पुराना पुल पार हो चुका है। आगे बढ़ें,तो गुलाब के फूलों की मंडी से गुजरेंगे। खुशबू से आपको अच्छा महसूस होगा। थोड़ा और आगे आएंगे तो एक बड़ा चौराहा पड़ेगा। यहां से सीधा रास्ता आपको नैनी, बनारस और विंध्याचल की ओर ले जाएगा। बाईं सड़क आपको नए पुल से होते हुए वापस इलाहाबाद शहर की तरफ ले जाएगी। दाईं तरफ की सड़क पर ध्यान ना दें। वहां आपको सड़क किनारे कई ट्रक दिखाई देंगे। और ड्राइवरों से बातचीत करते पुलिस वाले। उनके बीच होनेवाले लेन-देन को बिलकुल ना देंखें। नहीं तो आप उन्हे घूसखोर कहेंगे। और अगर आपने ऐसा किया तो आपका सफर प्रभावित हो सकता है। इसलिए बिलकुल भारतीय बनकर आगे बढ़े। चलिए अब इसी चौराहे से संगम की ओर चला जाए। नए पुल पर आपका स्वागत है। देश में विदेशी तरीके से बना ये पुल आपको बेहद खूबसूरत लगेगा। इस पुल से आप नीचे यमुना का गंदा पानी भी देख सकेंगे। इक्का-दुक्का मछुआरे भी अपनी छोट-छोटी नाव में दिखाई देंगे। पुल पर बने बड़े-बड़े खंबे और खंबों से लगे लंबे-लंबे तार आपको किसी दूसरे देश में होने का अहसास कराएंगे। इस पुल पर अगर कुछ देर रुकने की इच्छा है तो उसे रिक्शावाले को व्यक्त ना करें। क्योंकि वो रुकेगा नहीं। हां अगर आप चाहें तो रिक्शा रोक लें और कुछ देर रुककर दूसरा रिक्शा लें। यहां कुछ तस्वीरें आप ले सकते हैं। आपनी यात्रा की यादगार के लिए। आब आगे चलिए...पुल पार करने के बाद सड़क के दाईं ओर बनी पतली सड़क पकड़ लें। ये रास्ता आपको संगम की ओर ले जाएगा। लगभग 2 किलोमीटर चलने के बाद आप पहुंचेंगे तीर्थराज प्रयाग नगरी के संगम पर। कथा में वर्णित तीन की बजाए आपको दिखेंगी केवल 2 नदियां और उनका संगम। नदी के किनारे आते समय अपने आस-पास की दुकानों को देखिए। यहां पूजा-पाठ से जुड़ा हर सामान आपको मिलेगा। थोड़ा और नीचे गए तो मचान के नीचे तख्ता लगाकर आपको साधू बाबा भी दिखेंगे। ये प्राणी यहां भारी मात्रा में पाए जाते हैं। आपकी इच्छा हो या ना हो ये आपको अपना चेला बना ही लेंगे। चलिए टीका लगवाइए और इन्हे दस-पांच रुपए देकर आगे बढ़िए। अब अपने जूते उतारकर पवित्र यमुना के ठंडे पानी में पैर डालिए। उस अहसास का वर्णन करना मेरे लिए भी कठिन है। अपने सामने थोड़ी दर पर देखिए जहां गंगा और यमुना का मिलन होता है। यहां नाव वाले भी मिलेंगे। किसी नाव में बैठिए, 10 रुपए दीजिए और संगम पर पहुंच जाइए। नाव पर बैठे-बैठे ही संगम की धारा को अपने हाथों से स्पर्श कीजिए। गंगा और यमुना की महानता आपको खुद-बखुद समझ में आ जाएगी। उस पवित्र धारा में 3 डुबकी लगाइए और प्राचीन कथाओं के अनुसार अपने पापों को धो लीजिए। शीतल जल में स्नान के बाद आप एक बार ये महसूस करेंगे कि इस धारा का जल सदैव निर्मल रहे इसके लिए आपभी कुछ प्रयास करेंगे। लेकिन नदी से बाहर आने के बाद आपकी याद्दाश्त कुछ कमजोर हो जाएगी। चिंता ना करें, इसका भी बंदोबस्त बाहर है। यहां कई बड़-बड़े सरकारी घड़े रखे हैं। और किनारे लगे बड़े-बड़े बैनरों पर लिखा है कि नदी में कचरा ना डालें। लेकिन इसकी परवाह किए बिना लोग गंगा-यमुना में कचरा डालकर पवित्र होने का मौका खोना नहीं चाहते। अब चाहे तो क्रोध कीजिए या फिर अफसोस कीजिए लेकिन लोगों को कुछ मत कहिए। बेवजह नाराज हो जाएंगे। नदी से बाहर ऊपर की तरफ आईए। सामने एक राजा का किला है। कभी लोग परिवार के साथ घूमने आते थे, आजकल शहर के रोमियो-जूलियट के लिए पनाहगार है किला। जिस ओर नहीं जाना उसका जिक्र क्या करना लेकिन फिर भी मन में कुछ और चल रहा है तो जाइए घूम आइए। वापस आकर संगम किनारे बने मंदिरों के दर्शन भी कर लें। यहां एक बजरंगबली का भी मंदिर है। सुना है कि ये मंदिर बरसात के समय एक बार पानी से जरूर भरता है। गंगा मैया हनुमानजी को अपना दर्शन देती हैं। यहां अपनी इच्छानुसार पूजा-प्रार्थना कीजिए। पंडित जी बाहर मिलेंगे ही..आप चाहें तो हवन वगैरह भी करवा सकते हैं। अब संगम से बाहर निकलें तो इलाहाबाद बाजार की ओर चलें। सबसे पहले चलते हैं चौक बाजार में। यहां आपको इलाहाबाद का हर रंग मिलेगा। चौक बाजार खाने-पीने की चीजों के लिए प्रसिद्ध है। बाजार के एक ओर चा वालों का कब्जा है दूसरी ओर मिठाई वालों का। यहां की चाट अगर आपने एक बार चख ली तो दिल्ली और बंबई वालों की चाट का जाएगा आपको दोबारा नहीं भाएगा। तरह-तरह के चाट मिलते है यहां। गोलगप्पों के साथ-दही वड़ा भी काफी मशहूर है। जी ललचाए और अगर रहा ना जाए तो किसी भी चाट की दुकानपर जाइए और टूट पड़िए। लेकिन चाट की दुकानपर जाकर टमाटर वाली चाट एक बार जरूर खाएं वो भी बिना मीठी चटनी के। चाट की कीमतें इतनी सस्ती हैं कि अगर 20 रुपए में आप हर तरह की चाट का जाएका ले सकते हैं। गोलगप्पे, आलूचाट, टिक्की और टमाटर चाट खाने के बाद भी 20 रुपए खर्च नहीं होंगे। कम कीमत में उम्दा जाएका लेने के बाद मोहन जाचा की लस्सी जरूर पीजिए। इनकी दुकान काफी प्रसिद्ध है। 2 तरह की मलाई के साथ खड़ी चम्मच वाली लस्सी मिलेगी यहां। खड़ी चम्मच से अर्थ है कि लस्सी इतनी गाढ़ी कि चम्मच डालने पर वह गिरेगा नहीं। लस्सी में केसर और गुलाबजल पड़के बाद इसका जाएका और भी बढ़ जाएगा। मोहन चाचा की लस्सी के बाद सामने की दुकानों पर आप लाल पेड़े का स्वाद लेना ना भूलें। इसका स्वाद आपको जिंदगी भर याद रहेगा। यहां एक और मिठाई भी प्रसिद्ध है। परवर वाली मिठाई। ये मिठाई आपने शायद ही खाई होगी। इसका जाएगा आपके लिए यादगार रहेगा। चाहें तो इसे पैक भी करा सकते हैं लेकिन ये ज्यादा दिन नहीं टिकता। परवर मिठाई पैक कराइए और अब जाएगा लीजिए दही जलेबी का, मजा आ जाएगा। अब इस बाजार से बाहर निकलकर आगे बढ़े। आगे मिलेगी बताशेवाली गली। सफेद-सफेद बताशे आपको गांवों के मेलों की याद दिलाएंगै। सिक्के के बराबर बताशे के साथ आपको पूड़ी के बराबर के बताशे भी आपको बताशामंडी में मिल जाएगा। साइकिलरिक्शों के जमघट और भीड़-भाड़ से बाहर निकलें। अब आगे चलते हैं सिविल लाइंस की ओर। इलाहाबाद के लोग यहां से कपड़ों की खरीददारी करते हैं। यहां बिगबाजार भी है। शहर आधुनिकीकरण की ओर बढ़ रहा है। यहां भी हनुमान जी का मंदिर है। दर्शन कीजिए और यहां मिलनेवाली मिठाईयों का भी जाएका लीजए। चाहें तो पास ही में एल्फ्रेड पार्क भी जा सकते हैं। शहीद चंद्रशेखर आजाद ने यहीं कुर्बानी दी थी। इन खास जगहों के दर्शन के बाद वापस रेलवे स्टेशन लौटें और वापस अपने घर की गाड़ी पकड़ें।

Tuesday, March 9, 2010

डॉन का पासवर्ड शूटरों के पास




कोई भी डॉन अपने सारे राज अभी तक कभी भी अपने शूटरों को नहीं बताता था, लेकिन ऐडवोकेट शाहिद आजमी की हत्या को अंजाम देने के लिए अंडरवर्ल्ड डॉन भरत नेपाली ने अपने शूटरों को अपना पासवर्ड तक बता रखा था। आजमी की 11 फरवरी को हत्या कर दी गई थी। इस हत्याकांड में पुलिस ने देवेंद्र जगताप, विनोद विचारे और पिंटू दगड़े नामक तीन आरोपियों को गिरफ्तार किया था, जबकि हंसराज सोलंकी नामक चौथी आरोपी अभी तक फरार है। क्राइम ब्रांच के एक अधिकारी के अनुसार जब थाईलैंड में बैठे भरत नेपाली ने शाहिद आजमी की हत्या का फैसला कर लिया, तो गुगल सर्च से शाहिद आजमी की फोटो निकालकर अपने ई-मेल पर पेस्ट कर दी। बाद में उसने वीओआईपी कनेक्शन के जरिए अपने मुख्य शूटर देवेंद्र जगताप और विनोद विचारे को फोन किया और दोनों को ही अपना पासवर्ड बता कर कहा कि वे उसके (भरत नेपाली) ई-मेल को ओपन कर शाहिद आजमी की फोटो गौर से देखें। इसी दौरान भरत नेपाली ने जगताप और विचारे को शाहिद आजमी के कुर्ला के घर का पूरा पता भी लिखा दिया और सलाह दी कि उसके घर और दफ्तर की फौरन रेकी करो। यही नहीं, दोनों को भरत नेपाली ने यह भी बताया कि वे शाहिद आजमी को किसी बहाने कोर्ट में जाकर भी गौर से देख लें, ताकि मर्डर के वक्त कोई भी गड़बड़ न हो। इसके बाद जगताप और विचारे अपने दो साथियों पिंटू दगड़े और हंसराज सोलंकी के साथ कई दिन तक शाहिद आजमी के घर और दफ्तर की रेकी करते रहे। जिस 11 फरवरी को दोनों ने शाहिद आजमी का मर्डर किया, उसके ठीक एक दिन पहले जगताप ने यह कहकर पवई के पीसीओ से आजमी को फोन लगाया कि मेरा भाई ठाणे जेल में बंद है, उसी सिलसिले में मुझे आपसे अरजेंट मिलना है। इस पर आजमी ने जगताप को अगले दिन शाम को दफ्तर आने को कहा। जगताप इसके बाद पिंटू और सोलंकी को लेकर अगले दिन शाम को आजमी के दफ्तर पहुंच गया और फिर तीनों ने कई राउंड गोलियां चलाकर आजमी का कत्ल कर दिया। अब तक आतंकवादी किसी साजिश के लिए एक ही पासवर्ड का इस्तेमाल करते थे, पर किसी अंडरवर्ल्ड सरगना द्वारा अपने शूटरों को अपना पासवर्ड बताने का शायद यह पहला मामला है। क्राइम बांच के एक अधिकारी के अनुसार कई साल पहले अरुण गवली को बॉलीवुड के शेट्टी नाम के एक डुप्लीकेट (डमी रोल करने वाला) का मर्डर करना था। उस डुप्लीकेट का फोटो गवली के पास था नहीं, इसलिए गवली अपने शूटर को बॉलीवुड की फिल्म दिखाने ले गया, जिसमें उस शेट्टी ने डुप्लीकेट का रोल किया था। पर फिल्म देखकर भी शूटर उस डुप्लीकेट को सही से पहचान नहीं पाया और गलती से उस डुप्लीकेट के हमशक्ल का कुछ दिन बाद मर्डर कर दिया। दरअसल अब अंडरवर्ल्ड पूरी तरह आतंकवादियों की तर्ज पर अपना काम कर रहा है, इसलिए सिर्फ पासवर्ड नहीं, 26/11 के बाद वीओआईपी कनेक्शन का इस्तेमाल भी अब अंडरर्वल्ड में आम हो गया है।

Monday, March 8, 2010

बहुत चालाक है कांग्रेस !




साल 2010 का बजट कितनी खुशियां लाया, ये किसी मध्यवर्गीय परिवार से पूछिए। उस परिवार से जो 20हजार में अपनी सारी जरूरत पूरी कर लेता है। सरकार के टैक्स के साथ बच्चों की पढ़ाई, बहन-बेटी की शादी, पत्नी और माता-पिता की दवाई के साथ घर की जरूरतें, ये तमाम जरूरत वो परिवार महज 20 हजार रुपए मासिक आमदनी में पूरी कर लेता है। इस बजट से उसने जो उम्मीदें की वो टूट गई होंगी। घर में अगर गाडी है तो इस बजट के वार ने उसे घायल जरूर किया होगा। बजट में पेट्रोल-डीजल महंगा हो गया। नतीजा तमाम जरूरत की चीजों के दाम आसमान पर पहुंच गए। यूपीए सरकार ने आम जनता खून चूस-चूस कर अपनी जेबें भर लीं। सरकार के तमाम मंत्री देश-विदेश का जायजा लेते रहे। लेकिन महंगाई के बोझ तले जनता की सुध लेने की किसी ने नहीं सोची। सरकार को जगाने के लिए देश की दूसरी राजनीतिक पार्टियां एकजुट होने लगीं। हालांकि इनका मकसद देश के साथ हमदर्दी नहीं बल्कि जनता की तकलीफों की लौ में अपनी रोटियां सेंकना था। तो जनाब देश की दूसरी पार्टियां सरकार के खिलाफ लामबंद होने लगीं। सरकार को डर सताने लगा। मामला इसके पहले गंभीर हो जाए, कांग्रेस ने फूट डाले राज करो की नीति अपनाई। नतीजा महिला आरक्षण बिल का सामने आना। सन 96 में जिस विधेयक को लेकर सरकार घिरी थी, उसी विधेयक के जिन्न को यूपीए ने अपने फायदे के लिए फिर जगाया। महिला आरक्षण बिल को संसद के इसी सत्र में पास कराने की कवायद शुरू हो गई। महंगाई पर सरकार को घरने के लिए पूरी ताकत लगाने वाला विपक्ष महिला आरक्षण बिल के वार से चकनाचूर हो गया। पार्टियों की एकता गर्त मे चली गई। पने ही परा होने लगे। महिलाओं के खिलाफ बोलकर कोई भी पार्टी अपना वोटबैंक खत्म करने का रिस्क नहीं लेना चाहती थी। इसलिए बीजेपी और लेफ्ट ने बिल का समर्थन कर दिया। लेकिन कई क्षेत्रीय पार्टियों में बगावत के सुर उठने लगे। जेडीयू में भी दरार पड़ी। तो समाजवादी पार्टी भी बिल के खिलाफ हो गई। इन पार्टियों की मजबूरी ये है कि अगर महिला आरक्षण बिल पास हो जाता है तो इनके पास महिला चेहरे ऐसे नहीं हैं जिसे सामने रहकर ये वोट हथिया सकें। जाहिर है इनके अस्तित्व पर खतरा हो सकता है। इसके उलट लेफ्ट और बीजेपी के पास ऐसे चेहरे हैं जिसे वो कैश करा सकते हैं। लेकिन कामयाबी पर सवाल अभी भी है। लेकिन आरक्षण बिल का निवाल ना ही ये पार्टियां निगल सकती हैं और ना ही उगल सकती हैं। इसलिए नाराजगी झेलने से अच्छा है कि बिल के समर्थन में आ जाएं। इस बिल का प्रस्ताव रखते ही विपक्ष समेत सारे देश का ध्यान महंगाई से हट चुका है। देश के विकास का दम भरने वाली कांग्रेस देश को खोखला होने से बचाने के बजाए अब अपनी राजनीतिक जमीन को मजबूत कर रही है। हम किसी के उद्देश्य के खिलाफ नहीं हैं। लोकतंत्र में कोई भी अगुवाई कर सकता है। लेकिन पहले अपना फर्ज तो पूरा करे। महंगाई दर गिरती रही लेकिन कीमतों ने आसमान से नीचे उतरने का नाम ही नहीं लिया। कृषि मंत्री शरद पवार कहते हैं कि रबी की फसल आने के बाद महंगाई कम होगी। चीनी के दाम भगवान पर छोड़कर शरद पवार भी निश्चिंत हैं। आखिर उन्हे तो 9 घंटे की नौकरी के बाद महीने की तनख्वाह पर गुजारा तो नहीं करना है। आम आदमी पिसता है तो पिसे। उन्हे क्या ? भगवान ने चाहा तो रबी की फसल जल्द ही बाजार में आ जाएगी। लेकिन इस बात का यकीन कौन दिलाएगा कि बिचौलिए और दलाल इस फसल में सेंध नहीं लगाएंगे। आखिर सरकार ने महंगाई के लिए इन्हीं दीमकों को जिम्मेदार ठहराया था। जब महंगाई पर सारा देश अपना सुर एक कर रहा था तो कांग्रेस ने नया शिगूफा छेड़कर सबका ध्यान दूसरी ओर कर दिया। आम जनता के दुख को समझने का दम भरने वाले नेताओं के सुर भी बदल गए। अब महंगाई की लड़ाई कौन लड़ेगा। आम जनता की आवाज सरकार तक नहीं पहुंचेगी, इतना तो देश जानता ही है। इसलिए अब ये आवाज राख के नीचे दब गई है। लेकिन सरकार ये ना भूले कि चिंगारी पर सिर्फ राख पड़ी है। आग तो अंदर बाकी है...

कलयुग में राम राज !




कलयुग में राम राज! सुनकर थोड़ा अजीब लगता है,पर ये सच है। राजा हरदौल की पवित्र नगरी बुंदेलखंड के ओरछा में अब भी 'राम राज' कायम है। यहां लोग मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम की पूजा राजा के रूप में करते हैं। यही नहीं मध्य प्रदेश की पुलिस चारों पहर की आरती में भगवान श्रीराम को 'गार्ड ऑफ ऑनर' देती है। बुंदेलखंड के टीकमगढ़ जिले में राजा हरदौल की पवित्र नगरी ओरछा है। कहा जाता है कि यहां कभी बुंदेला राजा जुझार सिंह ने अपने सेनापति पहार सिंह के बहकावे में आकर अपने ब्रह्माचारी भाई राजा हरदौल को भोजन में जहर खिलाकर मरवा दिया था। किवदंती के मुताबिक राजा हरदौल अमर हो गए थे। इस नगरी में मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम को राजा की पदवी दिए जाने के पीछे एक लोककथा प्रचलित है। झांसी की उर्मिला पटेल बताती हैं कि मान्यता के अनुसार संवत् 1600 में बुंदेला महाराजा माकुर शाह की पत्नी महारानी कुंअरि, गणेश और राम की प्रतिमा अयोध्या से ओरछा लाई थीं। उस वक्त राम ने शर्त रखी थी कि ओरछा में राजतंत्र नहीं बल्कि उन्हीं की सत्ता होगी। शर्त मानकर महाराजा माकुर ने ओरछा राज्य में 'राम के राज' की घोषणा कर दी। महाराजा के शासनकाल में चारों पहर की आरती में भगवान श्रीराम को 'गार्ड ऑफ ऑनर' दिया जाने लगा। राजाओं की पुरानी परंपरा को मध्य प्रदेश पुलिस बखूब निभा रही है। ओरछा तीर्थ नगरी के रूप में प्रसिद्ध है और देश के कई हिस्से से लोग यहां पूजा अर्चना के लिए आते हैं। यहां मंदिर की सुरक्षा के लिए मध्य प्रदेश सरकार की ओर से जवान तैनात किए गए हैं जो कि रोजाना आरती के समय गार्ड ऑफ ऑनर देते हैं।
सौ.नवभारत टाइम्स

क्या बिक गए तुम ?




देश की आधी आबादी की आवाज़ है...
आधा देश बुला रहा है...
अब बराबरी का हक दो...
मंगलवार को ये तमाम लाइनें तमाम न्यूज चैनलों के स्लग के रूप में दिखाई दे रही थीं। मामला था महिलाओं आरक्षण विधेयक से जुड़ा हुआ। दिन भर हंगामा चलता रहा। विपक्ष के कुछ नेताओं ने संसद में हंगामा किया। टीवी चैनलों की फुल स्क्रीन पर लिखा गया, संसद शर्मसार हुआ। नेताओं ने संसद की मर्यादा का नुकसान किया। ऐसा लगा कि नेताओं ने किसीकी हत्या कर दी हो। शाम को घर पहुंचते ही फिर से टीवी चालू किया। देश के नामी न्यूज चैनलों ने बड़े-बड़े नेताओं को बैठाकर अपनी टीआरपी बढ़ाने का माहौल बना लिया था। एक दूसरे का झगड़ा इनके लिए पैसा लाता है। हालांकि अब ये बात टीवी देखने वाले तमाम लोग जानते हैं। मैंने एक अंग्रेजी चैनल लगाया। देश में काफी नाम है इस चैनल का। अच्छी खासी व्यूअरशिप भी है। खबरों में हमेशा आगे रहने वाले इस चैनल की हरकतें मैं बेहद बारीकी से देख रहा था। महिला आरक्षण बिल लाने वाली कांग्रेस की नीयत पर सवाल उठाने के बजाए उस एक चैनल के अलावा देश के सभी बड़े चैनल विपक्ष को कोस रहे थे। मानो बिल का बहिष्कार करके उन्होने देश के साथ गद्दारी कर दी हो। अपनी राजनीति की दुकान चलाने की मजबूरी ने ही उन्हे बिल का विरोध करने पर मजबूर किया। जिन पार्टियों में महिला चेहरे नहीं हैं उनकी दुकानदारी इस बिल से प्रभावित हो सकती है। शायद यही वजह है कि विरोध के स्वर सुने गए। लेकिन चैनल के पत्रकार कबसे कांग्रेसी प्रवक्ता बन गए। बिल पर सार्थक बहस देखने के लिए मैंने तमाम चैनलों पर गौर किया। लेकिन कहीं भी सार्थकत नज़र नहीं आई। लालू यादव ने अगर अपना मत रखा तो चैनलों ने उसे गलत बता दिया। आखिर सही-गलत का फैसला करने के हक उन्हे किसने दिया। चैनलों का रवैया ऐसा था मानों कांग्रेस हाईकमान ने तमाम चैनलों में शेयर ले रखा हो। ऐसा लगा मानो विपक्ष के नेताओं को सिर्फ जलील करने के लिए बुलाया हो। मैं कांग्रेस या दूसरे दलों का विरोधी नहीं हूं। लेकिन अगर आपने किसी को चर्चा के लिए बुलाया होलतो उसे बोलने का मौका तो मिलना चाहिए। चैनलों में वक्त की कीमत भी समझ सकता हूं। लेकिन मेहमान से ज्यादा मेजबान का बोलना इसे खारिज कर देता है। मानो चैनलवाले कांग्रेस के खिलाफ कुछ सुनना ही नहीं चाहते। महिला बिल पास हो, सारा देश ये चाहता है लेकिन बिल पास होने से पहले मीडिया ने इतना बवाल क्यों किया। कौन देगा इसका जवाब। इसलिए क्योंकि आपके पास सैटेलाइट की ताकत है..या इसलिए क्योंकि आपके पास जनता का विश्वास है...आप खुद खुदा बन बैठे। लोकतंत्र में बोलने का हक हर किसी को है। तरीका गलत हो तो समर्थन हम भी नहीं करते। गंदी राजनीति की निंदा और विरोध हम भी करते हैं। लेकिन चौथे स्तंभ को किसी पार्टी का सरेआम साथ देना दुखद लगता है। मानो मीडिया बिक गई हो। संसद में हंगामा करने वाले नेता टीवी पर गुंड़ों के रूप में दिखाई दिए। लेकिन यही काम अगर कांग्रेस ने किया होता तो शायद वो वीर क्रांतिकारी कहलाते। कांग्रेसियों का विरोध भी सही हो जाता। कहीं कांग्रेस कार्यकर्ताओं पर लाठीचार्ज होता है तो खबरें ऐसी चलाई जाती हैं मानों भगत सिंह के साथियों पर अंग्रेजों ने लाठी चार्ज कर दिया है। कृपाशंकर सिंह और संजय निरूपम की बात सही लगती है लेकिन रविशंकर प्रसाद की दलील सुनी भी नहीं जाती। कौन सही है कौन गलत इसका फैसला जनता पर छोड़ना चाहिए। तराजू बराबर रखकर खबर बेची जाए, टीआरपी तब भी आती है। तरीके और भी हो सकते हैं। बिल सही है या गलत इसके लिए चर्चा तो होनी ही चाहिए। लेकिन पहले हर किसी की बात तो सुनी जाए।

Thursday, March 4, 2010

भाई बोल रहा हूं...




मुंबई...सपनों का शहर... वो दुनिया जहां जाना हर किसी का सपना होता है। चाहत इतनी कि इसे मायानगरी कहते हैं। हर दिन यहां लाखों मुसाफिर आते हैं। कुछ को मंजिल मिलती है तो कुछ बेमंजिल हो जाते हैं। किसी की किस्मत चमकती है तो कोई ठोकरें खाता है। किसी के अरमान पूरे होते हैं तो कई हताश हो जाता है। जिसके सपने पूरे हुए वो बादशाह जिसका टूट गया वो फकीर। हार बर्दाश्त नहीं होती तो फकीर बादशाह बनने की कोशिश करता है। कोशिश के लिए कदम कहीं भी चल पड़ते हैं। उस रास्ते पर भी जिसकी मंजिल सलाखों के पीछे खत्म होती है, या फिर वहां जहां है सिर्फ अंधेरा। फिर पैदा होता है एक नया बादशाह। सपना..मुंबई पर राज करना। अपने सपनों के लिए कई लोगों को घर बर्बाद करना भी कबूल है। मुंबई अंडरवर्ल्ड में कुछ ऐसा ही होता है। वरना दाउद इब्राहिम आज खुद को बेताज बादशाह नहीं कहता। छोटा राजन और छोटा शकील का नाम भी नहीं होता। लेकिन इनका नाम है मतलब पर्दे के पीछे एक कहानी ऐसी जरूर है जो इन किरदारों को पैदा करने का काम करती है। बहरहाल अंडरवर्ल्ड का खात्मा करने के लिए मुंबई पुलिस जीतोड़ मेहनत कर रही है। लेकिन एक कहावत है...घर के भेदी लंका ढाए... मतलब समझाने की जरूरत नहीं है। खाकी के पीछे कई चेहरे इन बेताज बादशाहों के मोहरे का काम करते हैं। इन्हे वर्दीवाला गुंड़ा भी कहा जाता है। मुंबई पुलिस के कई अधिकारियों पर आरोप लग चुके हैं। मसलन सब इंस्पेक्टर दया नायक, अकेले 83 लोगों को मार गिराया...इन पर है अंडरवर्ल्ड से साठगांठ का आरोप। विजय सालस्कर जैसे कई एनकाउंटर स्पेशलिस्टों पर ऐसे आरोप हैं। अकेले विजय सालस्कर ने ही अंर नाइक, जग्गू शेट्टी, साधु शेट्टी, कुंदन सिंह रावत और जहूर माखंडा जेसे अपरादिय़ों को मौत की नींद सुला दी। खाकी पहनकर सरकारी तरीके से शूटआउट करने वाले अंडरवर्ल्ड के इन मोहरों के खिलाफ सबूत मिलते भी नहीं मिलते। और इन्ही की शय पर अंडरवर्ल्ड फल-फूल रहा है। माया डोलस के एनकाउंटर के बाद अंडरवर्ल्ड के हौसले पस्त भी हुए थे। लेकिन वक्त बीतने के साथ ही काली दुनिया के शैतान फिर जाग उठे हैं। पिछले साल से अंडरवर्ल्ड एक बार फिर मुंबई पर हावी होने लगा है। नई कहानी आपको बताते हैं।
मुंबई के कांदिवली में रहने वाले एक बिल्डर को हाल ही में अंडरवर्ल्ड का फोन आया है। फोन करने वाले अपना नाम एजाज लकड़ावाला बताया। अब इन दोनों के बीच क्या बातचीत हुई वो आपको बताते हैं..
एजाज- खैरियत भाईजान
फैजल शेख (नाम बदला हुआ)- बस अल्लाह का करम है
एजाज- एजाज भाई बोल रहा हूं
फैजल शेख (नाम बदला हुआ)- : एजाज भाई लकड़ावाले ? हां बोलो
एजाज- : रफीकभाई से मैसेज ले लेना और बात कर लेना। अपने वाले हो तो फोन करके बताया, नहीं तो दूसरी बात रहता है, बात अलग हो जाती है। जवाब दे देना।
फैजल शेख (नाम बदला हुआ)- : बराबर
एजाज- : आपकी इज्जत कर रहा हूं, किसीको बीच में डाला तो मैं किसीकी इज्जत नहीं करुंगा। फैसला मुझको करना है। आपकी तरफ से एक करोड़ गुडलक करवाओ। वो जो जगह करवाया है उसमें इनवॉल्व नहीं हो रहा हूं। वो अहमदाबाद वाले बुकी का।
ये है बातचीत एजाज लकड़ावाला और मुंबई के उस बिल्डर के बीच। एजाज ने बतौर प्रोटेक्शन मनी 1 करोड़ रुपए मांगे हैं। जिसे उसने नया नाम दिया है..गुडलक। पैसा नहीं मिला को इस बिल्डर का भगवान ही मालिक है। अंजाम शायद हमसब जानते हैं।
मुंबई अंडरवर्ल्ड में इस समय कई लोग सक्रिय हैं। गैंगवार की खबरें भले कम हो गई हों लेकिन इनका आतंक कभी भी कम नहीं हुआ।
एजाज लकड़वाला वो नाम है जो कभी छोटा राजन के साथ काम करता था। फिलहाल कनाडा में हैं और वहीं से अपना गैंग ऑपरेट करता है। एजाज पर 2003 में बैंकॉक में अपने ही बॉस छोटा राजन पर हमला करवाने का आरोप है।
रवी पुजारी--छोटा राजन का पुराना साथी। बैंगलोर से अपना गिरोह चलाता है। दक्षिण कर्नाटक और मुंबई में भी रवी पुजारी गिरोह सक्रिय है।

हेमंत पुजारी- कभी राजन के साथ काम करता था। अब मुंबई के पश्चिमी उपनगरों के होटल व्यवसायी और बिल्डरों से एक्स्टॉर्शन वसूलने का काम करता है।

भारत नेपाली और संतोष शेट्टी- छोटा राजन के दो खारस गुर्गे। क्रिमिनल लायर शहीद आज़मी और नेपाल के बिदजनेसमैन जमील शाह की हत्या के बाद ये राजन के करीबी बन गए।

यूसूफ बचकाना और राजन रामानुजम एलियास कालिया राजन--फिलहाल राजन के यो दोनों गुर्गे जेल मे हैं लेकिन राजन के बेहद करीबी हैं। जेल में भी इनके लिए खास सुविधाएं देने का काम राजन का है। जेल के अंदर से ही राजन के बाकी गुर्गों की मदद का काम करते हैं।

डीके राव: छोटा राजन का खास गुर्गा। आर्थर रोड के अंडा सेल में सड़ता रहा। जेल से फिलहाल बाहर है। जेल क अंदर से ही वो राजन के लिए नेटवर्किंग का काम करता रहा।

फरीद तानाशाह: राजन का भरोसेमंद साथी। कभी इंटेलिजेंस के साथ था आजकल राजन के साथ मिलकर अंडरवर्ल्ड में सक्रिय है।
मुंबई अंडरवर्ल्ड के ये कुछ खास चेहरे हैं। दाउद के बाद इन सबका नंबर आता है। फिलहाल ये तमाम गैंगस्टर मुंबई में सेंध लगा रहे हैं। आंकड़ों पर नजर डालें तो साल 2008 में एक्सटॉर्शन के 240 मामले दर्ज किए गए। 2009 में ये आकंड़ा 296 तक पहुंच गया। 2008 में 162 अपराधियों को इसी मामले में गिरफ्तार किया गया जबकि 2009 में ये आंकड़ा 196 तक पहुंच गया।
दाउद इब्राहिम, छोटा शकील, चोटा राजन, अरुण गवली मुंबई में फिलहाल ज्यादा सक्रिय हैं। इनके अलावा गुनाह की इस दुनिया में कई और छोटे-मोटे नाम भी लगातार जुड़ रहे हैं। लेकिन मुंबई पुलिस है कि हाथ पर हाथ धरे बैठी है।

Wednesday, March 3, 2010

दांव पर ज़िंदगी...




मुंबई हमलों के दौरान मुंबई पुलिस के जांबांज अधिकारी हेमंत करकरे की मौत इसलिए हुई क्योंकि उनकी बुलेटप्रूफ जैकेट ने उन्हे धोखा दे दिया था। जिस कवच को पहनकर करकरे आतंकियों का सामना करने गए थे वो कवच लगभग नकली निकला। उसने करकरे का साथ नहीं दिया। और करकरे साहब को शहादत मिल गई। देश ने उन्हे सलाम किया। लेकिन उनके कवच की नाकामयाबी पर सवाल किसी ने नहीं उठाया। महाराष्ट्र विधानसभा में बुलेटप्रूफ जैकेट का मुद्दा जिस तरह से उठा उसी तरह कब्र में चला गया। करकरे की शहादत भी मुंबई भूल चुका है। वरना उनकी शहादत के ज़िम्मेदार अपनी किस्मत को कोस रहे होते। अधिकारी से लेकर सरकार तक हर किसी को जवाब देना पड़ता। लेकिन हम उस देश के नागरिक हैं जिसने महात्मा गांधी की शहादत को भी भुला दिया। तो फिर करकरे साहब क्या चीज हैं। लेकिन मेरा दिल रोता है। आवाज उठाना चाहता है उस शोर के खिलाफ जिसकी वजह से सच्चाई के सुर दब जाते हैं। करकरे की मौत के बाद देशभर में बुलेटप्रूफ जैकेटों को लेकर कोई हलचल शुरू हुई तो वो थी सियासी हलकों में। एक दूसरे पर उंगली उठी। लेकि हुआ कुछ भी नहीं। क्योंकि चोर-चोर मौसेरे भाई। तो फिर आरोप लगाएं किस पर ? क्या हुआ अगर एक अधिकारी बुलेटप्रूफ जैकेट होने के बाद भी मारा जाता है...क्या हुआ जो एक पत्नी का सुहाग मिट गया..तो क्या हुआ अगर इस देश ने अपना एक बहादुर लाल खो दिया...तो क्या हुआ अगर एक बेटे ने अपना पिता खो दिया.....जैकेटों की दलाली में जो पैसे आए उससे हमारा घर तो चल ही रहा है। ये लाइनें मैंने जिसके संदर्भ में लिखीं उसे आप भी समझ सकते हैं। लखनऊ में एक आलाअधिकारी ने बुलेटप्रूफ जैकेट का परीक्षण किया। साधारण राइफल से मारी गई गोली का मुकाबला भी वो जैकेट नहीं कर सकी जिसे उत्तरप्रदेश सरकार ने मान्यता दी थी।
दबा-सहमा पुलिस अधिकारी ना तो कुछ कह पाया और ना ही कुछ कर पाया। लेकिन इतना समझ गया कि फिर कहीं किसी ददुआ से मुकाबला हुआ तो जान बचाने वाली बुलेटप्रूफ जैकेट से उम्मीद ना ही किया जाए। शून्य से 30 डिग्री से भी ज्यादा नीचे के तापमान पर 24 घंटे होकर हमारे लिए अपना घरबार छोड़कर गए देश के जवानों पर भ्रष्ट अधिकारी और नेताओं को रहम नहीं आता। पाप की कमाई से घर भरने वाले इस सिस्टम से जुड़े तार अपनों का खून चूसने के लिए तैयार हैं। इन जवानों के लिए हर साल ठंड से बचने के लिए नए कपड़े बनाए जाते हैं। नए जूते भी आते हैं। लेकिन कड़कती ठंड के सामने इन तमाम जीवनरक्षक चीजों का महत्व कम हो जाता है। सवाल इनकी गुणवत्ता पर फिर उठता है। मामला सेना के किसी अधिकारी या फिर मामले से जुड़े मंत्रालय तक आता है। और फिर ढाक के तीन पात... हथियारों के मामले में भी सवाल उठता रहा है। बोफोर्स कांड इस बात का सबसे बड़ा उदाहरण है। रूस और चीन से हथियार खरीदने के हर मामले में पर्दे के पीछे कोई ना कोई कहानी जरूर रही है। बहरहाल अर्द्धसैनिक बलों के लिए खरीदे गए बुलेटप्रूफ जैकेटों को परखने में
पुराने तरीके अपनाए जाने से पूरी प्रक्रिया पर सवालिया निशान लगने के बाद गृह मंत्री पी. चिदंबरम ने बुलेटप्रूफ जैकेट की खरीददारी रद्द करने का आदेश दिया था। हाल ही में सीआरपीएफ के लिए 59 हजार बुलेटप्रूफ जैकेट खरीद के दौरान इसके चयन की जिम्मेदारी चंडीगढ़ स्थित डीआरडीओ की लैब स्पार्क रेंज को सौंपी गई थी। सूत्रों के मुताबिक, बुलेटप्रूफ जैकिट सप्लाई करने की होड़ में नौ कंपनियां शामिल हैं। 26/11 के मुंबई हमलों के दौरान एटीएस प्रमुख करकरे की बुलेटप्रूफ जैकेट पहनने के बावजूद आतंकवादी की गोली लगने से मौत के बाद चिदंबरम ने जैकेटों को दोबारा टेस्ट करने के आदेश दिए थे। लेकिन रक्षा सूत्रों का कहना है कि परीक्षण में वे ही तकनीकी अधिकारी शामिल हैं जिन्हें पहले दौर के परीक्षण में जिम्मेदारी दी गई थी। आरोप है कि कुछ खास कंपनियों के बुलेटप्रूफ जैकेट को बेहतर सिद्ध करने के लिए दूसरी कंपनियों के बुलेटप्रूफ जैकेट को पहले अत्यधिक तापमान दिखाने के बाद उस पर बुलेट चला कर टेस्ट किया जा रहा है। इस वजह से कुछ जैकेट कसौटी पर खरे नहीं उतर पा रहे हैं। बुलेटप्रूफ जैकेट पहनने वाले जवानों का जीवन इसकी मजबूती पर टिका होता है। इसलिए इसके चुनाव में अधिकारियों को पूरी पारदर्शिता बरतनी चाहिए। सूत्रों का कहना है कि परीक्षण के दौरान सभी कंपनियों के प्रतिनिधियों और रक्षा विशेषज्ञों की मौजूदगी में ये परीक्षण होने चाहिए ताकि जवानों को श्रेष्ठ उपलब्ध बुलेटप्रूफ जैकेट मुहैया हो सके। देश के विभिन्न हिस्सों में आतंकवाद से लड़ रहे थलसेना के जवानों के लिए भी भारी संख्या में मौजूदा जैकेटों से मजबूत और हल्के बुलेटप्रूफ जैकेट खरीदने की प्रक्रिया शुरू होगी। यदि डीआरडीओ ने किसी घटिया बुलेटप्रूफ जैकेट को मंजूरी दे दी तो इसे भविष्य में भी ऑर्डर मिलते रहेंगे जिससे जवानों को जिंदगी खतरे में पड़ सकती है। यानि फिर किसी करकरे की ज़िंदगी दांव पर लग सकती है...

अब तारीख पर तारीख नहीं !




मोहन सिंह आज बड़ा खुश लगा रहा है। जिला कचहरी में चल रहा उसका बरसों पुराना केस आज वो जीत गया। अदालत में वकील साहब को उसने मिठाई खिलाई। वकील साहब के घर भी गया था। बड़े साहब उमाकांत को भी उसने मिठाई खिलाई। आखिरकार जमीन के कागजात लेकर वो अपने घर पर गया। लालजी की फोटो के आगे उसने कागज रखा और उन्ह प्रणाम किया। मोहन सिंह की मां और पत्नी आज बड़े खुश थे। मोहन सिंह की मां की आंखों से आंसू निकले। वो भी लालाजी की फोटो के आगे जाकर रोने लगी। उसके मुंह से निकला, अगर आप आज ज़िंदा होते तो इस जीत का मजा ही कुछ और होता। अब जाकर मेरी समझ में आया कि लालाली मोहन सिंह के पिता हैं। और जो केस मोहन 20 बरस की उम्र में जीता है उसकी शुरूआत तब हुई थी जब उसके पिताता यानि लालाजी 20 बरस के थे। 55 की उम्र में उनका निधन हो गया। तब मोहन की उम्र केवल 15 साल थी। लालजी की मौत के साथ ही उनके वकील उमाकांत भी रिटायर की उम्र तक पहुंच गए थे। इसलिए केस की ज़िम्मेदारी नई पीढ़ी की हाथ चली गई थी। अदालत में चक्कर पे चक्कर और तारीख पर तारीख लेने के बाद 30 साल का इंतजार ही था जिसकी बदौलत उन्हे 1 बीघा जमीन के केस में जीत मिली। उस एक बीघा जमीन के लिए लालाजी और मोहन सिंह ने 2 लाख रुपए से ज्यादा खर्च कर दिए। आज पचा चला कि उस जमीन की कीमत 50 हजार से भी ज्यादा नहीं है। ये भूमिका इसलिए दी ताकि अदालत से आपको रूबरू कर सकूं। इतना मैं भी जानता हूं कि अदालती प्रक्रिया के बारे में आपने भी बचपन से ही सुना होगा कि कोर्ट कचहरी के चक्कर में ना ही पड़ो तो अच्छा है। मैं भी ज्यादा नहीं कहुंगा क्योंकि जेल की दीवारें मुझे अच्छी नहीं लगतीं। बहरहाल अदालतों की कार्रवाई में पीढ़ियां ना बदलें इसलिए सरकार ने हाल ही में आनन-फानन में जजों की नियुक्ति की। लेकिन ढाक के तीन पात रहा सबकुछ। लेकिन एक बार ऊंट ने फिर करवट ली है। हायर जुडिशल सर्विसेज़ में जवाबदेही और मानक स्थापित करने के लिए प्रस्तावित नए कानून के तहत जजों को किसी मामले में बहस पूरी होने के बाद तीन महीने के अंदर अपना फैसला सुनाना होगा। कानून मंत्रालय के प्रस्तावित जुडिशल स्टैंडर्ड ऐंड अकाउंटेबिलिटी बिल 2010 का उद्देश्य न्यायिक सेवाओं में मानक स्थापित करना और ऐसी प्रणाली बनाना है जिससे सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट के जजों के खिलाफ दुर्व्यवहार और अयोज्ञता की शिकायतों को दूर किया जा सके। इस विधेयक में जजों की संपत्ति और दायित्वों की घोषणा का भी प्रावधान किया गया है। केंद्रीय मंत्रिमंडल की स्वीकृति के बाद इस विधेयक को वर्तमान बजट सत्र के दौरान इसे संसद के समक्ष पेश किए जाने की संभावना है। प्रस्तावित कानून में कहा गया है कि बहस पूरी होने के तीन महीने की समय सीमा के अंदर जज को अपना फैसला देना होगा। विधेयक के मसौदे में कहा गया है कि उच्च न्यायिक सेवाओं के सदस्यों को अपने न्यायिक कार्य के दौरान निष्पक्ष रहना चाहिए या उनके द्वारा दिए गए निर्णय धर्म, नस्ल, जाति, लिंग या जन्म स्थान से प्रभावित नहीं होने चाहिए। विधेयक के अन्य दिशा निर्देशों में कहा गया है कि जज चुनाव नहीं लड़ सकते, वे किसी क्लब या संगठन के सदस्य नहीं हो सकते, बार कांउसिल के किसी सदस्य के साथ घनिष्ठता नहीं बढ़ा सकते, अपने संबंधियों के अलावा और किसी से उपहार या मेहमाननवाजी नहीं स्वीकार कर सकते और उन कंपनियों के मामलों की सुनवाई नहीं कर सकते जिनके शेयर उनके पास हैं। प्रस्तावित कानून में कहा गया है कि जज को अपने किसी निर्णय के संबंध में मीडिया को इंटरव्यू नहीं देना चाहिए। इसके अलावा जजों को राजनीतिक मसलों पर किसी सार्वजनिक बहस में भाग नहीं लेना चाहिए। जजों द्वारा न्यायिक मानकों को गिराने वाले किसी भी कदम के लिए उनके खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई की जाएगी। जजों के विरूद्ध दुर्व्यवहार या भ्रष्टाचार की शिकायत को तीन जजों की जांच समिति के समक्ष पेश किया जाएगा। जांच समिति यदि जज के खिलाफ किसी शिकायत को वाजिब पाती है तो उसे न्यायिक निगरानी समिति के पास भेजा जाएगा। यह समिति मामले की जांच कर जांच रिपोर्ट को राष्ट्रपति के पास उक्त जज के खिलाफ कार्रवाई के लिए भेजेगी। राज्यसभा के सभापति के रूप में उप राष्ट्रपति न्यायिक निगरानी समिति की संभवत: अध्यक्षता करेंगे। इस समिति के अन्य सदस्यों में भारत के चीफ जस्टिस, सीजेआई द्वारा नामांकित हाई कोर्ट के एक चीफ जस्टिस और राष्ट्रपति द्वारा नियुक्त किए गए दो नामचीन कानून के जानकार शामिल होंगे। भारत के सभी 21 हाई कोर्ट्स में एक-एक जांच समिति का गठन किया जाएगा। विधेयक के मुताबिक जज के दुर्व्यवहार के अनुसार उसे चेतावनी, फटकार या प्रतिबंध की सजा दी जा सकती है। लेकिन यदि न्यायिक मानकों के उल्लंघन की प्रकृति गंभीर है तो उसके खिलाफ महाभियोग लगाया जा सकेगा। इस विधेयक के बाद अदालत में तारीखों के दान पर रोक लगेगा या नहीं इसके लिए हमें विधेयक के लागू होने तक का इंतजार करना पड़ेगा।