Sunday, January 31, 2010

भारत के 'तालिबान'



अफगानिस्तान और पाकिस्तान की बुनियाद में तालिबान पहले ही सेंध लगा चुका है। तालिबान नाफरमानी करने वालों को ऐसी सज़ा देता है जिसे देखकर रूह कांप उठे। तालिबान के लिए सज़ा देने की कोई वज़ह ज़रूरी नहीं है। उसे बस अपनी मनमर्ज़ी करनी है। तालिबान का अपना कनून है। भारत शुक्र मनाता है कि उसकी धरती पर तालिबान ने कदम अभी तक नहीं रखा है। लेकिन ऐसा नहीं है। तालिबान हमारे देश में भी है। हमारे बीच है और हमारे कानून की धज्जियां डंके की कोट पर उड़ाता है। ज्यादादूर नहीं देश की राजधानी के पास हरियाणा में समान गोत्र में शादी करने वाले जोड़ों पर पंचायतों का तुगलकी फरमान थमने का नाम नहीं ले रहा है। पंचायतों के रूप में उभरे इस तालिबान के फरमान के खिलाफ जाने की हिम्मत सरकार के पास भी नहीं है। पंचायती तालिबान का ताजा शिकार बने हैं रोहतक के खेड़ी गांव के सतीश और कविता। दोनों की शादी ढाई साल पहले हुई थी और उनका 10 महीने का एक बेटा भी है, लेकिन पंचायत ता तुगलकी फरमान सुनिए। पंचायत ने दोनों को भाई-बहन की तरह रहने का आदेश सुनाया है। रोहतक में खेड़ी गांव के आजाद सिंह के बेटे सतीश बेरवाल की शादी झज्जर जिले के भागी गांव के राजवीर की पुत्री कविता के साथ हुई थी। कविता का गोत्र बैनीवाल है और खेड़ी गांव में बैनीवाल और बेरवाल का भाईचारा माना जाता है। ग्रामीणों को जब कुछ दिन पहले कविता के गोत्र की जानकारी मिली तो रास नहीं आया और स्थिति तनावपूर्ण होने पर शनिवार को पंचायत हुई। पंचायत ने इस मामले में अंतिम फैसले के लिए 21 सदस्यीय कमेटी गठित की। कमेटी ने पति-पत्नी का रिश्ता तत्काल प्रभाव से तोड़ दिया और उन्हें पंचायत में भाई-बहन के रूप में मान्यता दी। सतीश और कविता ने एक दूसरे को भाई-बहन भी कहा। इसके साथ ही पंचायत ने सतीश को उसके परिवार की पैतृक चल-अचल संपत्ति से बेदखल करते हुए गांव निकाले का फतवा भी सुना दिया। पंचायत ने सतीश और कविता के 10 महीने के पुत्र रौनक की परवरिश के लिए आजाद सिंह को 28 फरवरी तक तीन लाख रुपये देने का फैसला भी सुनाया। पंचायत के फैसले को स्वीकार करते हुए कविता के परिजन उसे अपने साथ ले गए। इससे पहले उत्तर प्रदेश के बिजनौर जिले में पंचायत के फरमान पर एक प्रेमी जोड़े की पिटाई की गई और युवती से जबरन युवक को राखी बंधवाकर दोनों को गांव से बाहर निकाल दिया गया।
पंचायत ने पहले गांववालों से प्रेमी जोड़े की पिटाई करवाई और युवक से कहा कि वह युवती को पंचायत के सामने बहन कहे। फिर युवती से जबरदस्ती युवक को राखी बंधवाई। इसके बाद दोनों को गांव से निकल जाने का फरमान सुनाया। पंचायतों के प्यार पर ऐतराज़ है। प्यार के दुश्मन सिर्फ फिल्मों में नहीं हैं। असल ज़िंदगी में भी प्यार के पहरेदार मौजूद हैं। जिन्हे प्रमकरने वालों से नफरत है। सरकारें भी इम पंचायतों के आगे कमज़ोर हैं। भारत चांद पर घर बसाने की सोच रहा है। 21वीं सदी में हम दुनिया की सबसे बड़ी ताकत बनने की राह पर है। लेकिन कुछ ऐसी ताकते हैं जो भारत को अंदर से खोखला कर रही हैं। और पंचायतें इसका सबसे बड़ा उदाहरण हैं। देश का कानून मानो इनके लिए बना ही नहीं है। केवल अपना कानून मानती है पंचायत। सर्वसिक्षा अभियान का मंत्र यहां काम नहीं करता। नाफरमानी के लिए काफी सख्त सज़ा का प्रावधान है। इसलिए ज़रूरत है देश केअंदर पनप रहे इस तालिबान को खत्म करने की।

Friday, January 15, 2010

जेल में मौज ?



कैदियों को मिल सकती है पत्नी से सेक्स की इजाजत....
जैसे ही ये खबर पढ़ी तो ख्याल आया कि सरकार क्या जेल को जेल नहीं बनाना चाहती। जेल जाने वाले खूंखार मुजरिमों को सज़ा फिर क्यों दी जाती है। और अगर सज़ा दी जाती है तो फिर उन्हे इतनी आज़ादी.. क्या उचित है? बहरहाल एचआईवी पॉजिटिव कैदियों की बढ़ती संख्या के मद्देनजर बंबई हाई कोर्ट ने महाराष्ट्र सरकार से इस बात की संभावना की पड़ताल करने को कहा है कि क्या कैदियों को जेल में एकांत में अपनी पत्नी के साथ यौन संबंध बनाने की इजाजत दी जा सकती है। एचआईवी पॉजिटिव कैदियों को इलाज सुविधा मुहैया कराने के संबंध में दायर जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए जस्टिस पी. बी. मजूमदार और जस्टिस आर.जी. केतकर ने राज्य सरकार से 2 से 3 साल से जेल में बंद कैदियों को यह सुविधा मुहैया कराने की संभावना तलाशने को कहा जिसके तहत उन्हें हर महीने कुछ समय के लिए बिल्कुल एकांत में अपनी पत्नी से मिलने की इजाजत दी जाए। जजों ने सरकार से मुद्दे की पड़ताल करने को कहा क्योंकि उनका मानना है कि एचआईवी पॉजिटिव मामले असुरक्षित या अप्राकृतिक यौन संबंध बनाने की वजह से भी हो रहे हैं। जस्टिस मजूमदार ने कहा, 'कैदी की शारीरिक जरूरतें हो सकती हैं। इस बात को देखें कि क्या एक कैदी को अपनी पत्नी के साथ एक या दो दिन बिताने के लिए अलग स्थान दिया जा सकता है। यानि अपराधी को जेल और घर के बीच फर्क अब नज़र नहीं आएगा। समाज का कानून तोड़ने के बाद किसी को जेल भेजा जाता है। ताकि वो सज़ा पाकर सुधरने की कोशिश करे। ये बात और है कि भारतीयों जेलों में सुधरने वाले कैदियों की संख्या ना के बराबर है। अलबत्ता जेलों से अपराधी तराशकर बाहर की दुनिया में ज़रूर भेजे जाते हैं। अब सरकार के इस कदम के बाद उनकी सज़ा शायद सज़ा ना रह पाए। उनके मन से कानून का बचा-खुचा डर भी खत्म हो जाए। समाज की व्यवस्था को बनाए रखने के लिए ही संविधान में सज़ा का प्रावधान बनाया गया। अब अपराधियों के सरोकार ये दलील भी देंगे कि क्या अपराधी इंसान नहीं हैं ? बेशक वो इंसान हैं। लेकिन उन्होने ग़लती नहीं अपराध किया है। और इसीलिए उन्हे कानून से बतौर सजा के लिए जेल भेजा है। मैं उनकी बात नहीं कर रहा हूं जो मासूम हैं और बिना अपराध जेल भेज दिए जाते हैं। लेकिन उनके बारे में क्या..अपराध जिनकी फिदरत है। ऐसे इंसान सामाजिक व्यवस्था को बिगाड़ते हैं। अकारण ही दूसरों को नुकसान पहुंचाते हैं। तो क्या ऐसे लोगों से दरियादिली रखना उचित है ? जवाब सरकार भी खोज रही है और हम भी....

'मंगल' पर बंगला बने न्यारा...




काफी समय पहले आपने स्टार ट्रैक सीरियल में स्टारशिप एंटरप्राइज को अंतरिक्ष के काले सन्नाटे में आगे बढ़ते हुए देखा होगा। आपने ये भी देखा होगा कि यह यान किस तरह पलक झपकते एक ग्रह से दूसरे ग्रह पर पहुंच जाता है। काश, अंतरिक्ष यात्रा इतनी आसान होती। अंतरिक्ष में इंसानों की लंबी उड़ानें अभी तक हमारे कल्पना लोक में हैं। लेकिन एक दिन ऐसा आएगा जब पृथ्वी अपनी बढ़ती आबादी की जरूरतों को अपने सीमित संसाधनों से पूरा नहीं कर पाएगी। तब मनुष्य को पृथ्वी से बाहर निकलने के बारे में सोचना पडे़गा। स्पेस एक्सपर्ट स्टीवन कट्स का कहना है कि अंतरिक्ष में दूसरी जगह डेरे जमाने की बात पहले मूर्खतापूर्ण लगती थी, लेकिन आज स्थितियां बदल गई हैं। पर सवाल है कि हम कब जाएंगे, कहां जाएंगे और हमारे वहां पहुंचने पर स्थितियां कैसी होंगी? हमारे सौर मंडल के ज्यादातक ग्रह गैस के बर्फीले पिंड हैं। इन ग्रहों पर बस्तियां बसाने की बात सोची नहीं जा सकती। चार ग्रह ऐसे हैं जो ठोस चट्टान हैं, जिनमें हमारी पृथ्वी भी शामिल है। सूरज के सबसे नजदीक है बुध। यह नन्हा सा पिंड है, लेकिन बेहद गर्म। जीवन यहां मुश्किल है। वहीं शुक्र का आकार लगभग पृथ्वी जितना ही है और अगर यहां पृथ्वी जैसा वातावरण बना दिया जाए तो बस्तियां बसाने की बात सोची जा सकती है। शुक्र के पक्ष में एक और बात यह है कि यहां का गुरुत्वाकर्षण लगभग पृथ्वी जितना ही है। ये बड़ी बात है, क्योंकि गुरुत्वाकर्षण ऐसी चीज है जो किसी दूसरे ग्रह पर पुनर्निर्मित नहीं की जा सकती। लेकिन शुक्र के नकारात्मक पक्ष भी हैं। ग्रह की सतह पर दबाव जितना ज्यादा है कि तत्काल जान जा सकती है। सतह के तापमान को पृथ्वीवासी झेल नहीं सकते। यहां जीने लायक वातावरण का निर्माण करना एक बहुत बड़ी वैज्ञानिक चुनौती होगी। चांद हमारे सबसे नजदीक है और बहुत जल्द हम वहां पहुंच जाएंगे। हमारे चंद्रयान और नासा ने वहां इतना पानी ढूंढ ही लिया है कि मनुष्य अपनी बस्तियां स्थापित कर सके। लेकिन चांद को कॉलोनाइज करने से पहले हमें ये भी सोचना होगा कि वहां का भूभाग अफ्रीकी महाद्वीप से बड़ा नहीं है, जबकि मंगल का आकार पृथ्वी के बराबर है। दूसरी बात यह है कि चंद्रमा पर जिंदगी बसर करना आनंददायक नहीं होगा। साइंस फिक्शन पर वर्णित प्रेशराइज्ड शहरों का निर्माण सैद्धांतिक तौर पर संभव तो है किंतु हमें चांद की ग्रेविटी का भी ध्यान रखना होगा। चांद की ग्रेविटी पृथ्वी का छठा हिस्सा है। यही वजह है कि चांद पर पहला कदम रखने वाले नील आर्मस्ट्रांग बार-बार उछलते हुए नजर आए थे। एक खराब बात यह भी है कि चांद पर रात और दिन का चक्र पूरा होने में चार हफ्ते लग सकते हैं। इसका मतलब यह है कि वहां पूरे 14 दिन रात चलेगी। अंतरिक्ष में बस्तियां बसाने की तमाम योजनाएं ऊर्जा के लिए सोलर पावर पर निर्भर रहेंगी। ऐसी स्थिति में चांद पर दो हफ्ते चलने वाली रात एक बड़ा सिरदर्द बन सकती है। फिर भी चंद्रमा के पक्ष में एक बात यह है कि वह हमारे सबसे नजदीक है और रिस्क फैक्टर भी अन्य जगहों की तुलना में कम है। लेकिन अंतरिक्ष यात्रियों के समक्ष ऑस्टियोपोरोसिस एक बड़ी समस्या होगी। डर यह है कि छह महीने तक स्पेसक्राफ्ट में रहने के बाद जब अंतरिक्ष यात्री मंगल पर कदम रखेगा तो कहीं उसके पांव की हड्डी न टूट जाए। मंगल जाने वाले यान में ग्रेविटी की नकल पैदा करना एक बड़ा तकनीकी चैलेंज होगा। संभव है धीरे-धीरे यह टेक्नॉलजी विकसित हो जाए, लेकिन शुरुआती अंतरिक्ष यात्रियों को शायद ये सुविधा न मिल पाए। मंगल जाने वाले अंतरिक्ष यात्रियों को ठीक वैसी ही दवाओं पर रखना पड़ेगा, जो अभी पृथ्वी पर बुजुर्गों को ऑस्टियोपोरोसिस के इलाज के लिए दी जाती हैं। मंगल एक बड़ा ग्रह है। वहां कोई उपयोगी खोजबीन और जांच-पड़ताल करने के लिए परमाणु ऊर्जा चालित वाहन की जरूरत पड़ेगी। मंगल पर रात-दिन का क्रम लगभग पृथ्वी जैसा है। वहां पेड़-पौधे उगाने के लिए ग्रीन हाउस निर्मित किए जा सकते हैं। पेड़-पौधे न सिर्फ भोजन उपलब्ध कराएंगे, बल्कि कार्बन डाइऑक्साइड को ऑक्सिजन में भी बदलेंगे। अभी तक की गई खोजबीन के आधार पर फिलहाल मंगल की सतह पर ज्यादा पानी नहीं है। हां, वहां की ध्रुवीय टोपियों के इर्दगिर्द पानी जरूर है। मंगल पर उतरने वाले अंतरिक्ष यात्री पानी के स्त्रोतों का पता लगा ही लेंगे। पानी हमें सिर्फ पीने या सिंचाई के लिए ही नहीं चाहिए। यह रॉकेट ईंधन के लिए भी महत्वपूर्ण होगा। यदि मंगल की सतह पर पानी मिलता है तो इससे वहां भविष्य में कॉलोनियां बनाने का अच्छा आधार मिल जाएगा।
यदि हम सचमुच अंतरिक्ष में वैकल्पिक बस्तियां बसाने के लिए कोई जगह तलाश रहे हैं तो वह मंगल ही है।

Wednesday, January 13, 2010

नेता बनना है ?


भारत भाग्य विधाता कौन....आम आदमी। ये तो सदी का सबसे बड़ा जोक होगा। पैसा हो सकता है,मगर उसे चलाने वाले कौन....उद्योगपति। मगर उनके भी हित कहीं और से सधते हैं। सही समझ रहे हैं आप लकदक खादी में सजे,चेहरे पर लालामी और माथे पर तमाम परेशानियों की वजह से कुछ सिलवटें लिए नेता ही तय करते हैं समय की रफ्तार। मगर नेता बनना इतना आसान तो नहीं। कोई फिक्स रास्ता नहीं,कोई फिक्स कोर्स नहीं और आगे बढ़ने का कोई श्योर शॉट जरिया नहीं। मगर कुछ बातें ऐसी हैं, जिनका आप तन, मन और धन अरे हां नेता बनने में धन की भी अहम भूमिका है। इसलिए इनका पालन करें तो आपको भारत का नहीं तो अपने भाग्य का समृद्ध विधाता बनने से कोई नहीं रोक सकता। तो इस बार जानिए नेता बनने के कुछ नुस्खे, जिनका इस्तेमाल खालिस नकल के बजाय कुछ अकल लगाकर किया जाए, तो आपको नेता बनने से कोई नहीं रोक सकता। आप कह सकते हैं कि यह बात सीधे तौर पर भी तो कही जा सकती थी, तो यह आपके लिए पहला सबक है कि नेता सीधे-सीधे कोई बात नहीं कहते। बेबाकी काम आती है, मगर बाद की स्टेज में। शुरुआत में लच्छेदार जुबान का ही भरोसा होता है।
कोई पैदाइशी नेता नहीं होता। नेता बनने के लिए बहुत लगन से काम करना होता है। शतरंज की बिसात की तरह सिर्फ अपने नहीं, दूसरों के मोहरे पर भी नजर रखनी होती है। आप नेता बनना चाहते हैं, अच्छी बात है, मगर पूरी तैयारी के साथ सफर शुरू नहीं किया तो किसी छोटे-मोटे मोर्चे के उप-सह सचिव बनकर ही रह जाएंगे। तो सबसे पहले खुद से यह पूछें कि आप नेता क्यों बनना चाहते हैं? अगर जवाब है देश या समाज के लिए कुछ अच्छा करना है, वगैरह-वगैरह तो आप सोशल वर्क में जाइए, राजनीति को आपकी जरूरत नहीं है। आप नेता बनना चाहते हैं क्योंकि आपको लगता है कि आप बेहतर शासन कर सकते हैं और आपमें लोगों की जिंदगी में रोशनी भरने की काबिलियत है। अभी एक कसौटी और बाकी है। नेतागीरी में जीजान से जुटने से पहले यह भी जान लें कि आपको किस तरह की राजनीति करनी है। फायर ब्रैंड या शालीन दिखने वाली। सोशल वर्क वाली या जाति या क्षेत्र के इर्द-गिर्द घूमने वाली। इससे आगे का रोड मैप बनाने में आसानी होगी और पार्टी चुनने में भी।
नेता कौन, वही जो लोगों के काम करा सके, उनकी बिगड़ी बात को बना सके। काम बनाने का एक ही तरीका है कि जिससे काम बनता हो, उसे आप जानते हैं। यह न्यूक्लियर रिऐक्शन की तरह लगातार चलने वाली प्रक्रिया है। मसलन, आपके पड़ोस में भाटिया साहब हैं। उनके लड़के ने गाड़ी खरीदी है, मगर लाइसेंस नहीं बनवाया। भाटिया साहब ने राह चलते चिंता जताई, आपने कहा, अरे लड़के को कल ही ट्रांसपोर्ट ऑफिस भेज दीजिए। वहां बड़े बाबू हैं शर्मा जी। अपने बड़े भाई की तरह हैं। काम हो जाएगा। जब लड़का जाने लगा तो कहिए बेटा काम तो हो जाएगा, साथ में राधाकिशन बर्फी का डिब्बा लिए जाना, शर्मा जी को पसंद है। तो काम बन गया। शर्मा जी खुश कि अपने जानने वाले का काम कर दिया, वैसे भी दिन में हजारों सिफारिशी आते हैं। भाटिया साहब खुश कि जहां दो-चार हजार लगने थे, मिठाई के डिब्बे से काम चल गया और उनका लड़का खुश कि अंकल का नेटवर्क बहुत सही है। अगली बार आपको माता का जागरण या ब्लड डोनेशन कैंप करवाना है, तो भाटिया साहब का लड़का आपके काम आएगा, साथ में चार और लड़कों को लाएगा और आगे भी डीएल बनवाने के लिए आपके पास और दोस्तों के साथ हाजिर होता रहेगा। आपने देखा कि एक बड़े बाबू से जान-पहचान कितने काम की साबित हुई। यही है नेतागीरी का पहला और सबसे महत्वपूर्ण सबक - ज्यादा से ज्यादा लोगों से जानपहचान यानी नेटवर्किंग। याद रखें दुनिया में हर रिश्ता काम का है, फिर चाहे वह फूलवाला या ऑटोवाला ही क्यों न हो। आजकल सबके पास मोबाइल फोन हैं। सबको काम पड़ता है, मगर पूछ उस आदमी की है, जो सही वक्त पर सही आदमी तक पहुंचने में आपकी मदद करे। कोई रात में बीमार है, आपके पास अस्पताल का भी नंबर है और ऐंबुलेंस वाले का भी। दो-चार घटनाओं के बाद ऐंबुलेंस सर्विस वाले भी आपको जानने लगेंगे, ड्राइवर भी और डॉक्टर भी। किसी की बिटिया का ब्याह है, तो आपको अच्छे हलवाई के बारे में जानकारी है। हलवाई भी खुश कि साहब ने काम दिलवाया, जानने वाले भी खुश कि रेट कम करवाया और आप, अजी आप व्यवहार कमा रहे हैं। नेटवर्किंग यानी आपके पास ज्यादा से ज्यादा लोगों के फोन नंबर हों, उनका नाम-धाम और काम पता हो और उनके साथ आपका अच्छा व्यवहार हो। यह दुनिया कारोबार की तरह है, जो आपके काम आ रहा है, उसे भी काम पड़ेगा। आप सिर्फ एक तार को दूसरे से जोड़ने का काम कर रहे हैं। नेटवर्किंग के लिए सबसे जरूरी चीज है बातें बनाने की कला। ट्रेन में बैठे हैं, तो चर्चा शुरू कर दी। चाचा दिल्ली जा रहे हैं क्या, हां जी, ओह अच्छा हम भी तो वहीं जा रहे हैं। अच्छा बिजनस है आपका, किस चीज का, ओह बहुत अच्छे प्लाई सप्लाई करते हैं। अरे भाई हमारे ऑफिस में दो नए ब्लॉक बनने हैं, बॉस कह रहे थे कि कहीं से ठीक रेट और कमिशन के साथ बात बने, तो आजमाएं। या फिर अरे बहन जी (भाभी जी नहीं) स्कूल में टीचर हैं आप, अच्छा बहुत अच्छे। जी मैं तो कंस्ट्रक्शन का काम देखता हूं। वगैरह-वगैरह।
इस मुलाकात के बाद तीज-त्योहार पर एसएमएस। कभी माता के जागरण में उन्हें आने का न्योता और फिर जब किसी के बच्चे का ऐडमिशन नहीं हो रहा, तो वही ट्रेन वाली बहन जी का लिंक काम आ सकता है। किसी को घर बनवाना है, तो भाई साहब की दुकान से कुछ सस्ती प्लाई मिल जाएगी। सोचिए मत, आप मतलबी नहीं हैं, आप तो लोगों के काम आ रहे हैं, खुदा के बंदे हैं। तो यह है नेटवर्क की महिमा। धीमे-धीमे आपके तार उलझते और लंबे होते जाएंगे, कोई बाबू, कोई अधिकारी, कोई सप्लायर, कोई प्रफेसर, सब आपस में जुड़े हैं क्योंकि उन्हें आप जोड़ रहे हैं। और उन्हें साथ रखने वाली चीज है आपका व्यक्तित्व और व्यवहार। सुख-दुख में साथ खड़े होने का एहसास और उनकी चीजों के प्रति प्रशंसा का भाव।
सबक नंबर दो कह सकते हैं इसे। आपको पता होना चाहिए कि किस विचार की राजनीति करनी है। सेक्युलर दिखना है या हिंदूवादी। समाजवादी या फिर विकासवादी। अपनी जाति, पढ़ाई-लिखाई और विधानसभा के समीकरणों के हिसाब से रास्ता चुनें। जैसे शहरी इलाकों में विकास की राजनीति का जुमला आजकल चल रहा है। उसी तरह गांवों में जातियों की भागीदारी का फॉर्म्युला सुपरहिट है। तो एक बार आपने तय कर लिया कि किस कंपनी ओह सॉरी पार्टी की फ्रेंचाइजी लेकर शुरुआती दौर में काम करना है, उसके बाद रास्ता कुछ आसान हो जाता है। उस पार्टी में लोकल लेवल पर कितने गुट हैं, किसकी हैसियत कितनी है, किसके साथ आपको सहूलियत होगी, वगैरह देखने के बाद सक्रिय हों। चूंकि आप नेटवर्किंग वाले यानी काम के बंदे हैं, इसलिए हर पार्टी और हर नेता आपकी राह देख रहा है। दूसरी बात, आपकी फैमिली को पता हो कि आपको नेतागीरी का चस्का लग चुका है और यह आसानी से जाने वाला नहीं। तो अब उनके लिए फ्यूचर में मलाई खाने और लालबत्ती का सुख पाने की खातिर त्याग का वक्त आ गया। मां-बाप, बीवी-बच्चों को समझा दें कि अब उनका जीवन इलाके, विधानसभा और देश के लिए है। रात के दो बजे कोई मदद के लिए आ जाए, तो जवाब बाद में दें, पैरों में चप्पल पहले पहन लें।
अरे हम किसी तख्तापलट की बात नहीं कर रहे, बस एक बेसिक मंतर सिखा रहे हैं। जिसके पास भीड़ है, वही हिट है, चाहे सिनेमा हो या फिर पॉलिटिक्स। आपने देखा होगा, मोहल्ले के भइया जी या इलाके के पार्षद या फिर विधायक जी को। उनकी एक आवाज पर सैकड़ों लौंडे-लफ्फाड़े जुट जाते हैं बाइक पर सवार होकर। मरने-मारने को तैयार दिखते। रैली है, प्रदर्शन है या फिर पार्क में कल्चरल प्रोग्राम, यही युवा काम आते हैं। तो आपको भी इन्हीं पर फोकस करना है। कैसे करना है, यह आप तय करें। सामने वाले पार्क में पार्षद जी से कहकर एक वॉलीबॉल कोर्ट बनवा सकते हैं। कल्चरल नाइट का रसीद-कट्टा बनवाकर लड़कों को 10 फीसदी कमिशन पर दे सकते हैं और फिर आगे की सीटों से लेकर डांसर लाने तक का इंतजाम साथ में कोई हरकत न हो, इसकी जिम्मेदारी उनकी।
मोहल्ले के लड़के के साथ कोई बात हो जाए, इलाके की किसी महिला के साथ कोई ऊंची आवाज में बात कर ले या आपके एरिया में रेहड़ी लगाने वाले को कोई परेशान करे, इस फौज के साथ पिल जाइए। ध्यान रखिए लोग जिससे थोड़ा सा डरते भी हैं, उसकी थोड़ी ज्यादा इज्जत भी करते हैं। और बड़े नेताओं को भी ऐसे ही लोग चाहिए जो यूथ को और फिर उसके सहारे बूथ को मैनेज कर सकें।
इसके साथ-साथ कुछ रिटायर्ड और ईमानदार मगर सम्मान के इच्छुक बुजुर्ग भी हों, जो पैसे का कामकाज संभालें। मंच पर शुरुआती भाषण में आपकी कोशिशों की तारीफ करें और फिर आखिरी में दस लोगों के बीच कहें कि अरे भाई फलाने जी तो बड़े भले आदमी हैं। ये पॉलिटिक्स के धंधे का ओपन सीक्रेट है। जिसके पास धनपशु नहीं, उसकी नेतागीरी ज्यादा दिन चल नहीं पाती। धनपशु यानी ऐसे लोग, जिनके पास पैसा है, मगर उसकी निकासी का सही रास्ता नहीं। उन्हें लोगों की मदद करनी है, मगर तभी जब लोग एहसानमंद दिखें, उनका जयकारा लगाएं। उन्हें मंच पर स्मृतिचिह्न चाहिए, लोगों के बीच पहचान चाहिए। आप उन्हें यह सब दिलाएंगे, बदले में कभी चंदा, कभी गाड़ी तो कभी दूसरा सहयोग पाएंगे। धनपशु भी संभावनाशील लोगों पर ही दांव लगाते हैं। तो आपके पास ऐसे आसामी होने चाहिए, जो गरीबों के विवाह से लेकर, अनाथालय में फलों के बांटने तक की सारी पूंजी जुटाएं। पूंजी उनकी-प्रयास आपका और बन गया काम। इस काम में खासी सावधानी बरतनी होती है क्योंकि अब धनपशुओं को लगता है कि जब हमारे पास पैसा हो, तो सब कुछ हम ही क्यों न करें। मगर आपके पास है मीठी बोली और शातिर दिमाग। तो ज्यादा डरने की भी जरूरत नहीं है। जंगल में मोर नाचा किसने देखा। मगर आपके घर के किचन की खिड़की की रेलिंग पर कौआ भी बैठ गया और मीडिया ने देख लिया तो समझो पूरी दुनिया ने देख लिया। मीडिया को सेट करना मेहनत का काम भी है और आसान भी। इलाके के पत्रकारों के साथ यारी गांठिए। ये पत्रकार सम्मान के अलावा खबरों के भूखे होते हैं। तो उन्हें खबरें भी दीजिए। तीज-त्योहार मिठाई भिजवाना न भूलें। जब पत्रकारों से याराना कायम हो जाएगा, तो आपके छोटे-बड़े कदम को या कहें कि आपकी प्रेस विज्ञप्तियों को पर्याप्त जगह मिलने लगेगी। ध्यान रखें आज जो छोटा पत्रकार है, कल संपादक भी हो सकता है। बहुत लीला है उस दुनिया में। तो सभी के साथ संपर्क में रहें। कोई टीवी वाला इलाके में आए, तो उसकी मदद करें। फौरन नंबरों का आदान-प्रदान और चाय-पानी के लिए पूछें। जैसे-जैसे आपकी नेतागीरी आगे बढ़ेगी, मीडिया के ये रिश्ते काम आएंगे। कहीं काम नहीं हो रहा और आपने कहा कि पेपरबाजी करवा दूंगा तो काम बन जाएगा। नहीं बने तो पेपरबाजी करवा दें, पत्रकार भी खुश और आपकी हनक भी बरकरार। हमेशा याद रखें, जिसने मीडिया को साध लिया, वही सिकंदर है। बचपन में सुनी कहानी को नए संदर्भों में याद करने का वक्त आ गया है। गणेश परिक्रमा यानी किसी नेता या अधिकारी के आगे-पीछे करना, मगर स्मार्ट तरीके से। पहले यह तय करना जरूरी है कि जिसे आप फौरी तौर पर अपना आराध्य मान बैठे हैं, उसका मिजाज कैसा है। उसी के हिसाब से कभी इलाके की मशहूर गुझिया लेकर पहुंचें, कभी गुलदस्ता लेकर। बच्चों के लिए भी कुछ ले जा सकते हैं। तब तक बड़े लोगों से समय निकालकर, वजह निकालकर मिलते रहें, जब तक आपकी ऐसी हैसियत न हो जाए कि लोग आपसे मिलने आएं। और ऐसा होने पर भी गणेश परिक्रमा का मंतर न भूलें। अब आराध्य ज्यादा शक्तिशाली और काबिल लोग हो जाएंगे, तरीका भी शायद कुछ बेहतर आजमाना पड़े। किस्सा कोताह यह कि आपको जब पता चल जाए कि मेरे मुकद्दर की चाबी फलाने जी के पास है, तो फलाने जी को जो पसंद हो, उसके बारीक ब्यौरों को आप घुट्टा मार कर पी जाएं और वैसे ही करें, जैसा उन्हें पसंद हो, मगर इस सावधानी के साथ कि उन्हें आपकी चापलूसी या अपनी सुविधा के लिए कहें तोउनके प्रति आपके श्रद्धाभाव पर शक न हो। यह गुरुमंत्र कान में फूंक लें। सब कुछ छूट जाए, विचारधारा, नेता जी या फिर रुपया-पइसा, मगर जनता का साथ न छूटे। जनता साथ है तो आप निर्दलीय भी चुनाव जीत सकते हैं, नई पार्टी बना सकते हैं, आंदोलन खड़ा कर सकते हैं, कुल मिलाकर यह कि इतिहास की धारा बदल सकते हैं। मगर जनता साथ छूटी तो राजनीति अमर चित्र कथा की तरफ सिर्फ किताबों में नजर आएगी। यह जनता शातिर भी है और भोली भी। इसलिए जब भी कोई किसी काम के लिए आए, तो न तो बोलें ही न। काम हो या न हो, ठोस आश्वासन जरूरी है। एक चुटकुला शायद इस समझने में आपकी मदद करे। जंगल में सभा हुई, सब जानवर बोले - शेर बहुत परेशान करता है। बंदर बोला, किसी को नेता बना लें, हमारी बात भी सुनी जाएगी। सब राजी हो गए मगर नेता बने कौन? फिर बंदर आया और बोला मैं ही लेता हूं यह कठिन जिम्मेदारी। कुछ दिनों बाद शेर बकरी के बच्चे को उठाकर भाग गया। बकरी पहुंची बंदर के पास। बंदर फौरन निकल पड़ा। पीछे-पीछे जंगल के बाकी जानवर। शेर एक मैदान में बैठा शिकार को तड़पा रहा था। बंदर यह देखकर एक डाल से दूसरी डाल पर कूदने लगा। कुछ देर बाद जानवरों ने पूछा, अरे कुछ करते क्यों नहीं। बंदर ने जवाब दिया, देखो मेरी भागदौड़ में तो कोई कमी नहीं। तो नेता का भी यही काम है, भागदौड़ करते, कोशिश करते दिखना। काम हो जाए, बहुत अच्छी बात है, नहीं भी हो तो फरियादी को लगा कि नेता जी ने तो पूरी कोशिश की। अच्छा नेता अपनी बात नहीं कहता, लोगों की बात कहता है, जैसे लोग सुनना चाहते हैं। जनता को लगे कि अरे यह तो हमारी सोच को आवाज दे रहा है। तो शीशे के सामने, गली-मोहल्ले पर, नगर-निगम की बैठक में यानी हर मुमकिन जगह बोलें और ऐसे बोलें गोया आप अमेरिकी प्रेजिडेंट बनने के बाद पहली स्पीच दे रहे हैं। ध्यान रखें कि बुझी आवाज और बुझे चेहरों को कोई याद नहीं रखता। जरूरत लच्छेदार बातों, भावुक अंदाजों और हाथ लहराने की खास अदाओं की है। अगर भाषा अच्छी नहीं तो कोई बात नहीं, किसी भी हिंदी साहित्य या राजनीति शास्त्र के स्टूडेंट को अपने संगठन के युवा मोर्चे का प्रभारी बनाएं और हर जरूरी मौके पर उससे भाषण लिखवाएं। आपकी स्पीच में अगर लोकल जबान, लोकल फैक्टर आ जाएं, तो कहने ही क्या। कानपुर में बोलें तो कहो गुरु के अंदाज में और नागपुर में बोलें तो भाषण में संतरे की खुशबू आए। दूसरी जरूरी चीज है आंकड़ों का सही इस्तेमाल। इस बारे में भाषणबाजी के जरिए समझाने के बजाय बस एक उदाहरण ही काफी रहेगा। मसलन, आपको कहना है कि आपके राज्य की मुख्यमंत्री बहुत ज्यादा हीरे-मोती के आभूषण पहनती हैं, जो आपके हिसाब से गलत है। दिखावा नहीं करना चाहिए। तो आप कहें कि भाइयों हमारे प्रदेश की सबसे बड़ी जनसेवक होने का दावा करने वाली मुख्यमंत्री जी जितने करोड़ रुपये जेवरों पर खर्च करती हैं, उनसे लाखों गरीब बहनों के मंगलसूत्र बन सकते हैं। भारत भावुक लोगों का देश है। झंडे और डंडे के लिए मरने-मिटने वाले लोग हैं यहां। यहां प्रतीकों की राजनीति बहुत हिट रहती है। फलाने जी ने झोपड़ी में रात गुजारी, ढिकाने जी ने बीच सड़क पर रुककर मूंगफली वाले से बात की, हर बात की जनता चर्चा करेगी। तो आप भी कुछ ऐसा करें, जिसका प्रतीकात्मक महत्व हो। इलाके के बच्चों को साथ लेकर 15 अगस्त की शाम या 16 अगस्त की सुबह सड़कों पर निकलें और कागज के तिरंगे जो धूल में लोट रहे हैं, उन्हें समेटना शुरू कर दें। फेंक दिए गए झंडे समेटने से पहले मीडिया को खबर करना न भूलें। सबक यह कि अच्छा काम करना है, मगर यह भी ध्यान रखना है कि आपके शोर मचाए बिना लोगों की उस नेकी पर नजर जाए। यह तो खूब सुना होगा कि दिल का रास्ता पेट से होकर जाता है। मगर पॉलिटिक्स की पाठशाला का अहम सबक है, अपने बॉस, अपने बड़े नेता से घरेलू संबंध कायम करना। इसके लिए जरूरी है कि उनकी पत्नी से भी आपके संबंध अच्छे हों। पहला रूल, नेता जी की पत्नी को भाभी जी नहीं, बहन जी कहें। नेता जी का आप पर यकीन बढ़ेगा, उनकी पत्नी आपके साथ ज्यादा सहज होंगी, बच्चे मामा जी कहकर फरमाइश कर सकेंगे। जब भी घर जाएं, बहिनजी की पसंद की चीज ले जाएं। जरूरी नहीं कि हर बार कुछ भारी-भरकम ही हो। मसलन, अरे दीदी गांव से आ रहा था, दद्दा ने जिद करके ताजा गुड़ दे दिया। मुझे लगा सर्दियों में आपको अच्छा लगेगा, तो थोड़ा सा ले आया। इतना कहकर चुपचाप झोला रख दें और बात बदल दें। अगर अंदर एंटर कर गए, तो नेता जी भी आपको सिर पर ज्यादा चढ़ाएंगे। मगर कुछ नेता घरघुस्सू लोगों को ज्यादा पसंद नहीं करते। तो उनके सामने आपको प्रकट करना है कि महिलाओं में और चूल्हे-चौके में आपको ज्यादा रुचि नहीं। जैसा मरीज-वैसा इलाज। राजनीति में आगे बढ़ने के लिए सिर्फ बड़ी लकीर खींचना ही जरूरी नहीं, पहले से मौजूद लकीरों को इरेजर की मदद से धुंधला करना भी जरूरी है। मगर महत्वाकांक्षा को हमेशा अंदर की जेब में रखें। जब आप ज्यादा आगे बढ़ते दिखेंगे, तो लोग लंगड़ी मारने की कोशिश भी करेंगे। इसलिए ऐसे नजर आएं गोया आप तो खुद कुछ चाहते ही नहीं हैं। कई बार बैलों की लड़ाई में बंदर मजे मारता है। मगर साथ ही यह भी याद रखें कि लड़ाई बैलों के बीच ही होती है। तो आगे बढ़ें, हैवीवेट बनें मगर ऐहतियात के साथ। आप इतने दिन से लोगों के बीच काम कर रहे हैं, उनकी मदद कर रहे हैं, तो अब मौका है यह देखने का कि आपका हिसाब-किताब कैसा है। किसी नेता की रैली या फिर आपका ही अपना कोई प्रोग्राम, उसमें कितने लोग मदद कर रहे हैं, कितने लोग चंदा कर रहे हैं, इसे गौर से देखें, फ्यूचर का प्लान तैयार करने में मदद मिलेगी। साथ ही जिन नेता जी के साथ आप लगे हैं, उन्हें भी अपने जनाधार का एहसास कराते रहें। एक बात और, अगर लगे कि आपके नेताजी की लुटिया ही नहीं, सारे बर्तन डूबने को हैं, तो उन्हें एकदम से छोड़ने के बजाय कुछ दिन इंतजार करें और इस बीच किसी दूसरे नेता के साथ यारी मजबूत करें। कब किसकी किस्मत का कनेक्शन कहां लग जाए, कहा नहीं जा सकता, इसलिए अपने आदर्श नेता का चुनाव करने में सावधानी बरतें और साथ रहें मगर फैवीक्विक की तरह नहीं। इसके अलावा दूसरी पार्टियों के नेताओं से भी बेहतर संबंध रखें। हमारे उनके साथ वैचारिक मतभेद हैं, आपस में कोई दुश्मनी नहीं या फिर मतभेद हैं, मनभेद नहीं जैसे जुमलों का इस्तेमाल करें। सत्ता आती-जाती है, मगर लोगों को एक दूसरे से काम हमेशा पड़ते हैं। तो यही संबंध काम आते हैं। जब भी कहीं कुछ गड़बड़ हो, आपके सक्रिय होने का समय आ गया। लोगों की खुशी में भले ही शरीक न हो पाएं, उनके गम में जरूर शरीक हों। फिर चाहे वह परिचित के लोग हों या अपरिचित। दुख के साथी ज्यादा दिनों तक याद रहते हैं। इसलिए आस-पड़ोस, मोहल्ला, विधानसभा, जहां भी आपको पता चले और जाने की गुंजाइश हो, जरूर पहुंचें। लोगों से मुलाकात होगी, आपके रिश्ते जुड़ेंगे और आगे काम आएंगे। इस मामले में गरीबों को पहली प्राथमिकता दें। एक कड़वा सच याद रखें - गरीब सबसे ज्यादा वोट डालते हैं और आपके एहसान को सबसे ज्यादा याद रखते हैं। इसी तरह कहीं ऐक्सिडेंट हो गया या कुछ और अनहोनी हो गई, फौरन सक्रिय हो जाएं। पीड़ितों को मुआवजा मिले, इसमें देरी होने पर सड़क जाम हो, प्रधानमंत्री को ज्ञापन दिया जाए और ऐसे ही तमाम जरूरी काम। इसी दौरान आप एक बार फिर से अपनी ताकत तौल सकते हैं। बीच में मौका देखकर मगर कुछ संभलकर सत्ता प्रतिष्ठान से भी भिड़ा जा सकता है, मगर हद से ज्यादा नहीं। करियर के शुरुआती दौर में खुद बहुत ज्यादा पैसा बनाने की जुगत में न रहें। सार्वजनिक जीवन में आज भी लोगों को ईमानदारी एक पूजने लायक मूल्य लगता है। आगे मौके आएंगे, जो देर से और आराम से खाएंगे, वही देर तक खाएंगे, इसलिए रुपयों-पैसों के मामले में सावधानी बरतें। चंदे का हिसाब साफ रखें। कहीं फर्जी सर्टिफिकेट या ऐफिडेविट के जरिए अपना काम करवाने से बचें। बड़ा नेता बनने पर ये छोटी-छोटी चूकें नासूर बन सकती हैं। हर नेता का अपनी स्टाइल होता है, आपका स्टाइल क्या है? खास तरह के कपड़े पहनें, खास ढंग से जुमलेबाजी करें या खास मौकों पर मसलन नवरात्र या रमजान में ज्यादा सक्रिय दिखें। साथ ही एक कैलेंडर साथ रखें। नहीं-नहीं, यह साल का कैलेंडर नहीं बल्कि खास आपका कैलेंडर है। इसमें काम के तमाम नंबरों के अलावा किस नेताजी का हैपी बर्थडे कब है, मैरिज ऐनिवर्सरी कब है, हज यात्री कब जा रहे हैं, कांवड़ कब आ रहे हैं, जैसे ब्यौरे रखें। नेता जी की मेमरी में स्थायी ठिकाना बनाने का हर मुमकिन मौका इस्तेमाल करें। इसके अलावा उनके इर्द-गिर्द हो रही राजनैतिक उठापटक पर भी नजर रखें। चुगली करने यानी काम की जानकारी लेने-देने में आसानी होगी। आपमें कुछ तो खास होगा। बोलते अच्छा हैं, सोचते अच्छा हैं या कुछ खास जानते हैं, तो उसे अपनी ताकत बनाएं। कोई समाजसेवी संस्था चलाएं, कोई एनजीओ खोलें, कहीं श्रमदान के जरिए पौधे लगवाएं, कुछ अच्छा दिखने वाला काम करें। अब अगर आपको लिखा-पढ़ी का शौक है, तो आरटीआई आपके काम आ सकती है। हर होने वाले और न होने वाले काम के लिए आरटीआई दाखिल करें। अधिकारियों को खौफ होगा, पत्रकार स्टोरी की फिराक में मिलेंगे और आप ज्यादा सक्रिय दिखेंगे। सरकारी सब्सिडी, सरकारी फंड, इन सब बोरिंग से ब्यौरों का तफसील से ध्यान रखें, तभी जनता आपका ध्यान रखेगी। इतना सब करने के बाद भी आप अगर सफल नेता न बन पाए तो? हो सकता है, मगर इतना तय है कि आप काम के और इसीलिए लोगों की निगाह में अच्छे आदमी जरूर बन जाएंगे। सदी की शुरुआत में आई एक चर्चित हिंदी फिल्म में नायक एक बुजुर्ग के यह पूछने पर कि क्या करते हो, बहुत फख्र के साथ कहता है, आई एम अ फिक्सर सर, आई फिक्स थिंग्स। बस आपको भी फिक्स करना है अपने सपने को सचाई से। जो चीजों को चलाए, चालू रखे, उसे नेता कहते हैं। चलते रहिए-चलाते रहिए, क्योंकि धूप से परेशान करोड़ों निगाहें आंखों पर हाथ टिकाए इस लोकतंत्र में एक मसीहा के आने का इंतजार कर रही हैं...कहीं वह आप तो नहीं।

ये 'अमर' कथा है !


आखिर अमरसिंह के सीने में कौन से राज दफन हैं मुलायम के? अमर सिंह मामले में एसपी सुप्रीमो मुलायम सिंह ने अपने चचेरे भाई को नीचा क्यों दिखाया? क्या मुलायम सिंह उस राज के बेपर्दा होने से डर रह है जो अमर सिंह के सीने में दफन है? आखिर अमर सिंह ने यह क्यों कहा है कि मुलायम के राज उनकी लाश के साथ ही जाएंगे?
ये और ऐसे ही कई सवाल राजनैतिक गलियारों में घूम रहे हैं। एसपी में चल रहे 'यादवी संघर्ष' का आनंद ले रहे लोग ये ज़रूर जानना चाहते है कि आखिर अमर सिंह के पास वो कौन सा दांव है जिसने मुलायम को पीछे हटने पर मजबूर कर दिया है। 'अमर विवाद' में मुलायम का रुख रोज बदल रहा है। उनकी भाषा और लहजे में हो रहे परिवर्तन को लोगों ने बारीकी से देखा है। राजनीति के चतुर खिलाड़ी मुलायम और अमर के बीच सीधा संवाद सोमवार को ही हुआ है। मुलायम के रुख में सोमवार को आए बदलाव की मुख्य वजह अमर सिंह का ब्लॉग पर लिखा गया वो लेख माना जा रहा है जिसमें अमर ने अपनी कथा आम लोगों को बताई थी। अमर ने उनके खिलाफ बोले मोहन सिंह को इसी ब्लॉग में ये याद दिलाया कि कब उन्होंने मोहन सिंह का इलाज कराया और कब उन्हें चुनाव के लिए बड़ी रकम दी। अमर ने बृजभूषण तिवारी के जरिए एसपी के सबसे सीनियर सदस्य जनेश्वर मिश्रा पर भी निशाना साधा। अमर उन्हें ये बताना नहीं भूले कि किस तरह उनके इलाज के लिए उन्होंने भोपाल में अंबानी का जहाज पहुंचाया था और डॉ. प्रताप रेड्डी से कहकर सारी व्यवस्थाएं की थीं। राजनैतिक क्षेत्रों में ये माना जा रहा है कि अमर ने मोहन सिंह और जनेश्वर मिश्रा के जरिए मुलायम तक संकेत पहुंचा दिया था। यही वजह थी कि मुलायम ने सवेरे-सवेरे अमर सिंह को फोन करके सैफई आने का न्योता दे दिया और रामगोपाल को घर के खनकते बर्तन याद आने लगे। बेनी प्रसाद वर्मा, राज बब्बर, आजम खान और कल्याण के बाद मुलायम ने उन सभी मुस्लिम नेताओं को भी यह संदेश दिया है जो अमर के एसपी से निष्कासन की मांग कर रहे थे।
अमर के पास तुर्प का वो इक्का है जिससे मुलायम की राजनैतिक पारी अर्श से फर्श पर आ सकती है। इसलिए मुलायम फिलहाल अमर के साथ हैं लेकिन अमर फिलहाल मुलायम होने का नाम नहीं ले रहे।



अंडरवर्ल्ड और मुंबई पुलिस का चोली-दामन का साथ है। ये हम नहीं कहते। ये कहता है मुंबई पुलिस का रेकॉर्ड। अपराधियों के साथ मिल चुके हैं अपराध को खत्म करने वाले। ये तस्वीर देखिए... मुंबई पुलिस में इस शख्स की अच्छी साख है। ये हैं मुंबई पुलिस के एसीपी प्रकाश वाणी। हैरत इस बात पर नहीं है कि मुंबई पुलिस का एक जिम्मेदार पुलिस ऑफिसर एक पार्टी में दिखाई दे रहा है। बल्कि हैरानी इस बात पर है कि एसीपी साहब एक डॉन की पार्टी में क्या कर रहे हैं। जी हां जिस पार्टी की तस्वीरें हम आपको दिखा रहे हैं, उस पार्टी में एक खास मेहमान था अंडरवर्ल्ड डॉन डीके राव। छोटा राजन का दायां हाथ और मुंबई में उसके गिरोह की नेटवर्किंग देखने वाले डीके राव के साथ एसीपी प्रकाश वाणी को जमकर थिरकते देखा गया। इन तस्वीरों ने पुलिस और अंडरवर्ल्ड के रिश्तों पर फिर मुहर लगाई है। खुद मुंबई पुलिस इस बात से इनकार नहीं कर सकती। मुंबई में ऊंचे पद मुंबई में ये रंगीन पार्टी छोटा राजन के बेहद करीबी साथी पॉल जोसेफ ने दी थी। इस पार्टी में एसीपी प्रकाश वाणी तो थे ही, उनके अलावा भी पुलिस के कई अफसर मौजूद थे। मुंबई के अंग्रेजी अखबार मुंबई मिरर ने ये तस्वीरें छापी हैं। इन तस्वीरों में मुंबई  एसीपी प्रकाश वाणी छोटा राजन के गुर्गों के साथ डांस करते दिखाई दे रहे हैं। मुंबई के चेंबूर इलाके में ये पार्टी हुई थी। मस्ती में चूर इस पार्टी में चीफ गेस्ट था डीके राव। 13 साल बाद जेल से छूटा डीके राव अब जश्न मना रहा है। राव पर मर्डर और एक्सटॉर्शन के 30 मामले दर्ज थे। इस पार्टी में दूसरा मेहमान था फरीद तनाशा और सुनील पोद्दार। तनाशा को मुंबई पुलिस ने 2005 में दिल्ली से गिरफ्तार किया था। जुलाई 2008 में उसे जमानत मिल गई। जबकि सुनील पोद्दार उर्फ पोट्या हाल ही जेल से छूटा है। इस पार्टी में और भी कई ऐसे चेहरे नजर आए, जिनका ताल्लुक छोटा राजन से है। अब कैसे भरोसा करें इस खाकी का........

उफ़ ये सर्दी...




घर से निकला तो दो हाथ दूर देखना भी मुहाल था। ठंड के मारे कलेजा हाथ में आ रहा था। हालांकि गले में मफलर और हाथ में दस्तानों के साथ शरीर में दो-दो स्वेटरों क कवच था। लेकिन कड़कड़ाती ठंड के तीरों को मेरे ठंडभेदी कवच भेदने से रोक नहीं पा रहे थे। मैं समंदर किनारे रहने वाला हूं। इसलिए ऐसी ठंड का सामना पहले कभी नहीं किया। जानलेवा सर्दी से मेरे हाथ-पैर कांपने लगे। सर्दी में दिल्ली वालों का रंग कुछ अलग ही होता है। सड़क के किनारे टपरी पर चाय का लुत्फ लेते दिखाई देंगे तो कहीं रेड़ी पर छोले-भटूरे का आनंद लेने का रंग भी दिखाई देगा। गले में रंग-बिरंगे मफलर हों या फिर रंगीन कपड़े, दिल्ली में सर्दी का मज़ा ही कुछ और होता है। सुना है कश्मीर और हिमाचल में खूब बर्फबारी हुई है। मौसम विभाग ने कहा कि दिल्ली में भी सर्दी का सितम बढ़ेगा। लेकिन तभी तापमान बढ़ गया और पारा नीचे गर गया। समझ गया कि ये हमारा मौसम विभाग है इसलिए आगे से ध्यान ना देने का वादा करके मैं शिमला और मनाली का ध्यान करने लगा। सफेद बर्फ की फर्श पर खेलकूद करते लोगों की तस्वीर दिखाई देने लगी। फिर अगले ही पल उत्तरभारत की वो तस्वीर दिखाई देने लगी जहां पुराने कंबल में लिपटा एक बूढ़ा ठंड की वजह से भगवान को कोस रहा है। ओस की वजह से टूटी झोपड़ी में कड़कड़ाती बूढ़ी अम्मा भगवान से दुआ करती हैं कि ये ठंड खत्म हो जाए। उत्तरभारत में अभिजात्य वर्ग तो अपने बंगले में अलाव जलाकर मूगफली के मजे लेता है। लेकिन उसी बंगले के बाहर ठंड से किसी की मौत भी एक सच है। वही अभिजात्य वर्ग उस मरे इंसान की आत्मा को कोसता है कि उसने मरने के लिए यही जगह क्यों चुनी। बेचारा मर गया लेकिन मरते-मरते एक जिम्मेदार बड़े अधिकारी को तकलीफ दे गया। कहीं ऐसा ना हो जाए कि कैमरे उनके दरवाजे पर आ खड़ें हों और सवाल पूछें कि आप पर शहर के लोगों की ज़िम्मेदारी है और घर के बाहर एक गरीब की मौत कैसे हो गई। सुना है कि गली-गली में कलेक्चर साहब कंबल बांट रहे हैं। केंद्र सरकार और राज्य सरकार ने गरीबों को सर्दी से निजात दिलाने के लिए राहत फंड दिया है लेकिन उस फंड से बाबूसाहब मनाली ट्रिप पर जाने की तैयारी कर रहे हैं। बेचारे गरीब मरें तो मरें। नकी बला से। अब उनका भी कहना ठीक है। भई ठंड है और ठंड में ठंडी जगहों पर घूमने का मज़ा ही कुछ और होता है। हां जी ,साहब आप घूमिए। गरीब तो होता ही है मरने के लिए। बहरहाल ठंड है, आप ठंड का मज़ा लीजिए। हो सके तो कुछ गरीबों को अपने पुराने कपड़े दे दीजिए। ताकि आपके साथ वो भी सर्दी का मज़ा ले सकें। फिर चाहें तो आप घर में हीटर जलाकर गरमागरम पकौड़ों का आनंद लें।