Monday, July 26, 2010

इज्जत का सवाल है...




कॉमनवेल्थ गेम्स नज़दीक हैं। चारों ओर हल्ला है कि देश की इज्जत खतरे में है। देश की नाक कट जाएगी। सरकार ने पानी की तरह पैसा बर्बाद कर दिया। लेकिन कबतक इस शोर से हम सरकार को जगाने की कोशिश करेंगे। एक बार हमें भी तोसोचना होगा....मैं नोएडा से कनॉट प्लेस आ रहा था। यात्रा के दौरान मुझे एक साल पीछे की तस्वीरें दिखाई देने लगीं। उन तस्वीरों और आज की तस्वीरों में जो फर्क दिखा वो सकून देने वाला था। एक पल मैं ये सोचने को मजबूर हो गया कि मैं दिल्ली में ही हूं या कहीं और। जिन सड़कों पर गाड़ियों का काफिला लग जाता था आज वहीं गाड़ियों को इंतजार नहीं करना पड़ता। सिंगल लेन सड़क डबल लेन के बराबर हो गई है। फ्लाई ओवर ने रास्ता और आसान कर दिया। एक दूसरा फ्लाईओवर जो डबल लेन का है उसके खुलने के बाद ये रास्ता बेहद आसान हो जाएगा। चारों ओर हरियाली है। जितने पेड़ काटे गए उससे कहीं ज्यादा लगाए गए हैं। खेलगांव और अक्षरधाम मंदिर के पास से होती हुई सड़क पर अब ट्रैफिक नहीं लगता। इसी इलाके में खिलाड़ियों के लिए बनाए गए फ्लैटों की खूबसूरती देखते ही बनती है। यहां भी एक फ्लाईओवर बनाया गया है। यानि ट्रैफिक की समस्या यहां भी बस कुछ दिनों की बात है। अब आइए इंद्रप्रस्थ पार्क के पास...तस्वीरें यहां भी आपको खुश कर देंगी। चौड़ी होती सड़कें और खूबसूरत पार्क देखने लायक है। इसी तरह दिल्ली की तमाम सड़कों को देखिए कहीं सड़के चौड़ी हो रही हैं तो कहीं फ्लाईओवर बन रहे हैं। आखिर ये किसके लिए हैं ? मैं ये नहीं कहता कि सरकार जनताका भला सोच रही है...जाहिर है जितना पैसा खर्च हमारे भले के लिए किया गया है उसके आंकड़ों में हेरा-फेरी की गई है। कई बाबुओं की तिजोरी भर चुकी है खेलों के नाम पर। खेल सर पर हैं और हम दिल्ली की एक अलग ही तस्वीर दुनिया को दिखा रहे हैं। सब कहते हैं कि देश की नाक कटने वाली है....मैं बचपन से एक कहावत सुनता हूं...फर्स्ट इंप्रेशन इज़ लास्टइंप्रेशन....। मतलब भी सुनिए। खिलाड़ी और हमारे विदेशी मेहमान जब सरज़मीन-ए-हिंदुस्तान पर कदम रखेंगे तो उनकी आंखों के सामने होगा दिल्ली का टी-3 टर्मिनल। इस एयरपोर्ट के बारे में मीडिया के जरिए सारा देश जानता है। अंतरराष्ट्रीय स्तर के इस एयरपोर्ट पर उतरते ही उन्हे भारत की शान का अंदाज़ा होगा। एयरपोर्टसे निकलते ही उन्हे मिलेगी एयरपोर्ट लाइन मेट्रो। हवा की रफ्तार से हमारे मेहमान दिल्ली के दिल पर दस्तक देंगे। कनॉट प्लेस की खूबसूरती उन्हे दिल्ली का दीवाना बना देगी। जाहिर है पहली तस्वीर उनके जेहन में उतर जाएगी। तो शिकायत का मौका नहीं मिलेगा। खेलों के दौरान कमर्शियल गाड़ियों,ब्लूलाइन बसों को हटा दिया जाएगा। यानि सड़कों पर से 30 फीसदी ट्रैफिक कम हो जाएगा। सरकार दिल्ली की जनता से आग्रह करेगा कि खेलों के दौरान निजी वाहनों का इस्तेमाल कम से कम करें। दिल्ली की जनता भी देश की इज्जत की खातिर थोडी कुर्बानी देकर मेट्रो से सफर करेगी। स्कूल, कॉलेज और सरकारी दफ्तर बंद रहेंगे। यानि ट्रैफिक की समस्या हमारे मेहमानों के सामने नहीं आएगी। एक न्यूज़ चैनल पर पूर्व खेल मंत्री मणिशंकर अय्यर ने कहा था कि वो नहीं चाहते कि कॉमनवेल्थ थेल सफल हों। अय्यरसाहब से कोई पूछे कि कल को आप उनके देश क्या नहीं जाएंगेजो आपके दरवाजे पर आने वाले हैं। आप ना भी जाएं लेकिन आपको कोई हक नहीं कि आप देश की इज्जत का फैसला करें। हमें भी उनके देश जाना है। मीडिया पर लगातार दिखाया जा रहा है कि तैयारियां पूरी नहीं हुई हैं। मैं भी जानता हूं कि तैयारियां पूरी नहीं हुई हैं। लेकिन मैं वो तस्वीर भी देखना चाहता हूं जिसमें दिल्ली का वो चेहरा भी दिखाई दे जिसमें विकास की तस्वीर दिखती है।वो सड़कें देखना चाहता हूं चोडबल लेन के बराबर हो चुकी हैं और जिन सड़कों के बीच पौधे लगाकर हरा-भरा करने की कोशिश की गई। रामकृष्ण आश्रम मेट्रो से होकर पहाड़गंज की ओर जाइए...यकीन मानिए तस्वीर बिलकुल अलग है। हरियाली के साथ सड़कों के किनारे लटकने वाले जानलेवा बिजली के तार अब आपको नज़र नहीं आएंगे। सीवर सिस्टम बेहतर हो चुका है। लाने पक्के और सीमेंटेड हैं। सड़कों पर मलबा पड़ा है, मैंने भी देखा है। लेकिन सड़कों पर लगे बिजली के नए खंबे भी मैंने देखे हैं। बिजली की कमी के बावजूद भी दिल्ली में बिजली की कटौती ज्यादा नहीं हुई। अमूमन चारों ओर यही हाल है। खेल मंत्री गिल ने एक बार कहा था कि तैयारियों के बारे में मीडिया सवाल ना उठाए क्योंकि हमारे देश में बारात आने तक लड़की के घर में तैयारी होती है।ये बयान एक मंत्री के लिए शर्मनाक है लेकिन हम सब जानते हैं कि येसच भी है। मैं सरकार की भाषा नहीं बोल रहा हूं। लेकिन अपने देश की इज्जत की चिंता मुझे भी है। कई खिलाड़ी और मेहमान देश में आ चुके हैं। मीडिया में तैयारियों पर सवाल लगातार उठ रहे हैं। इन सवालों पर नज़र उनकी भी पड़ रही है। जाहिर है दिल्ली का एक ऐसा चेहरा वो देख रहे हैं जो उन्हे नहीं देखना चाहिए। आखिर अपने घर की बात है, किसी और को क्यों बताएं। खेलों के बाद हर घोटाले का हिसाब लिया जा सकता है। किसने कहां कितना पैसा खाया इसबात की पड़ताल की जा सकती है। लेकिन फिलहाल वक्त है हमारे मेहमानों को 'फीलगुड' कराने का। क्योंकि दिल्ली बदल रही है। सरकार को हम बदल सकते हैं लेकिन सरकारी बाबुओं को नहीं। इसलिए उन्हे सबक जरूर सिखाया जाए..लेकिन देश की इज्जत बचाने के बाद।

Saturday, July 24, 2010

सलेम पर हमला !




मुंबई....अंडरवर्ल्ड का सेंट्रल प्वाइंट है। ये शहर कई गैंगस्टरों को पैदा करता है। यहां किसी एक की सत्ता नहीं चलती। लेकिन शहर पर हक हर कोई जताता है। जिसके पास जितने आदमी उता ही शहर उसका। जिसके पास जितनी पुलिस उतनी ही पकड़ मजबूत....यही है मुंबई अंडरवर्ल्ड का सच। खबर आपने सुनी होगी। मुंबई की आर्थर रोड जेल में फिर गैंगवार हुई। जेल में बंद 93 में हुए धमाकों के आरोपी अंडरवर्ल्ड डॉन अबू सलेम पर जानलेवा हमला हुआ। कहा जा रहा है कि सलेम पर ये हमला दाऊद इब्राहिम के गुर्गे मुस्तफा मंजू उर्फ मुस्तफा दौसा ने करवाया है। दौसा भी इसी जेल में बंद है। दौसा और उसके आदमियों ने सलेम पर धारदार हथियार से हमला किया। जांच में पता चला कि हमला कैदियों द्वारा इस्तेमाल की जाने वाली चम्मच से हुआ। आर्थररोड जेल प्रशासन के लिए इस तरह की खबर नहीं है। इससे पहले भी जेल में राजन के खास गर्गे डीके राव पर हमला हो चुका है। हमले के बाद राव को अंडासेल में भेज दिया गया। अंडासेल में रहकर भी राव ने अपने विरोधियों से बदला लिया। राव के लोगों ने दाउद के कई गुर्गों पर हमला करवाया। इन हमलों में एक खास तरह के हथियार का इस्तेमाल किया गया। जेल के कैदी एल्यमिनियम की जिस प्लेट में खाना खाते हैं उसी प्लेट के किनारे वाले हिस्से को जेल के अंदर पत्थरों पर घिसकर उसे नुकीला बनाते हैं। और इसी हथियार से जेल के अंदर होता है गैगवार। जेल के अधिकारियों को इस खास हथियार के बारे में पता है। 1995 के बाद से इस जेल में लगभग हर साल गैंगवार होते रहे। हर बार हमले का तरीका एक ही रहा। लेकिन अब तक प्रशासन ने कोई खास कदम नहीं उठाए।
मुंबई अच्छी तरह जानती है कि अंडरवर्ल्ड के तार मुंबई पुलिस से जुड़े हैं। जेल में दाउद के गुर्गों को हर वो चीज़ मुहैया है जो उन्हे बाहर मिल सकती है। अच्छा खाना, अच्छा बिस्तर, केबल टीवी और वो सबकछ जिसकी जरूरत उन्हे है। बदल में उन पुलिसवालों को दुबई से तनख्वाह मिलती है। सलेम किसी ज़माने में दाउद के साथ डी कंपनी चलाता था। मनमुटाव हुआ और दाउद का दामन सलेम ने छोड़ दिया। तब तक छोटा राजन उर्फ दीपक निकालजे
दाउद के साथ था। सलेम को दाउद के तमाम धंधों की जानकारी थी। सलेम का साथ छोड़ना दाउद को रास नहीं आया। कहा तो ये भी जाता है कि सलेम को गिरफ्तार करवाने के लिए दाउद ने भी काफी हाथपैर मारे थे। पुर्तगाल में दाउद का ड्रग्स का कारोबार है। जाहिर है पुर्तगाल सरकार और पुलिस में उसकी अच्छी पैठ है। इंटरपोल का नोटिस पहले ही सलेम के खिलाफ था। भारतीय इंटेलीजेंस ने जब सलेम के प्रत्यर्पण की बात पुर्तगाल सरकार से की तो दाउद ने भी सलेम की गिरफ्तारी के लिए प्रयास किए। सलेम मुंबई पुलिस के पास आ गया। लेकिन दाउद को अब ये डर है कि कहीं सलेम के सीने में दफन वो राज जो दाउद के कारोबार पर असर डाल सकता है, कहीं मुंबई पुलिस को पता चल जाए। पुलिस में दाउद के कई लोग हैं। इनकी मदद से दाउद सलेम को लगातार परेशान करवाता रहा। सलेम की जान को शरू से ही खतरा था। और इस बार तो उसपर बाकायदा हमला हो भी गया। यानि जेल के अंदर हो या बाहर अंडरवर्ल्ड हर जगह हावी है। भाई के लोग आपको देख रहे हैं....

Monday, March 29, 2010

सानिया, सोहराब और शोएब...




मेरे प्यारे भाईलोग और सिर्फ भाईलोग...आज मैंने टीवी पर एक हटके खबरे देखेला है। बोले तो देखा है। खबर देखतेइच अपुन का दिमाग खराब हो गया। मैंने क्या देखा कि सीरे टीवी चैनल चीख-चीख कर कह रहे थे कि सानिया मिर्जा शादी कर रहेली है। भाईलोग मेरेको अभी भी याद है कुछ महीने पहले इच सानिया ने अपने मंगेतर सोहराब मिर्जा से रिश्ता तोड़ा था। अभी सोहराब का जख्म भी नहीं भरा होगा कि सानिया नए जोड़े के साथ शादी के कोर्ट में कूद गएली है। बोले तो शादी कप में शानिया का डबल्स अवार्ड। अपुन के कान में सुनने को आया है कि सानिया मिर्जा के साथ जिंदगी का गेम खेलने वाला नया प्लेयर है पाक क्रिकेटर शोएब मलिका। भिड़ू लोग शोएब क्रिकेट कमाल का खेलता है। अभी सानिया के साथ ये उसका कौन सा गेम है मेरेको भी समझ में नहीं आ रहेला है। ये न्यूज के बाद सिर्फ मेराइच नहीं बल्कि इंडिय़ा और पाकिस्तान में भी काफी लोगों का दिल टूट गएला है। बेचारा दिल सानिया की मिनी स्कर्ट और उसकी नोज़रिंग पर मरता था। अभी सोहराब की जगह शोएब कैसे आ गया मै वहीच जबाव खोज रहेला हूं। तो एक अखबार में मेरे को जवाब मिला। अभी भिड़ू लोग तुम लोग सोचेगा कि मैं अखबार पढ़ता भी हूं क्या। तो भाईलोग मैं बतादूं मेरे को पढ़ना अच्छा लगता है। अभी क्या है हर किसी को पढ़ना लिखना मांगता है। तो मेरे को भी पड़ना मांगता है सोचके मैं भी अखबार पढ़ना शुरू किया। तो मैंने क्या पढ़ा कि
जनवरी में सोहराब से सानिया की सगाई टूटी और फिर सानिया फरवरी में दुबई में एक टूर्नामेंट में खेलने के वास्ते गई।
इधर शोएब मलिक की पाक क्रिकेट ने वाट लगा दी थी। आपको मालूम इच होगा कि पाकिस्तान क्रिकेट बोर्ड ने ऑस्ट्रेलिया दौरे में पिटने के बाद शोएब पर एक साल का बैन लगा दिया है। तो वाट लगने के बाद शोएब भी दुबई चला गया। शोएब का कुबई में भी एक घर है। तो भिड़ू उधरीच रहने को चला गया। इधर जब सानिया टेनिस खेल रही थीं तभी शोएब की मुलाकात सानिया से हुई। अभी दोनों के बीच कुछ-कुछ हुआ। बोले तो दोनों की दो-दो आंखें मिलकर चार होने लगीं। अभी आप लोग भी किसी ना किसी से लव तो कियाइच होंगा। अपुन ये नहीं पूछ रहेला है कि वो सच्चा था या फिर टाइमपास। बोले तो लव क्या है ये अभी केजी के बच्चे को भी पता है। तो वहीं हुआ इन दोनों खिलाड़ियों के बीतच में। बोलेतो लव एट फर्स्ट साइट....
इधर सानिया अपने सोहराब को छोड़कर आई थी तो उधर गेम में वाट लगने से सोएब भी काफी टेंशन में था। अभी ऐसे माहौल में दोनों की मुलाकात दवाई बनने लगी। जास्ती मजा लेने का नहीं...उधर शोएब का भी दिल कुछृ-कुछ टूटेला टाइप का ही था। शोएब मलिका का टक्कर मिस इंडिया और ऐक्ट्रेस सयाली भगत से भी था। उसके बाद उसका टांका भिड़ा हैदराबाद की आयशा सिद्दकी के साथ। पन कुछ हुआ नहीं उलटे सोएब टेंशन में आ गया। अभी हैदराबाद से शोएब का क्या लफड़ा है अपने को भी समझ में नहीं आता। हैदराबाद की सनसनी सानिया पर शोएब का दिल आ गया। इधर दुबई में दोनों के दिल बीच में लफड़ा चलने लगा। इतना ही नहीं इस कपल ने अक्खे दुबई का टूर किया। और जभी दोनों को लगा कि अभी सिंगल खेलने की बजाए कपल्स खेलना चाहिए तो घर वालों के सामने इन दोनों ने प्रपोजल रख दिया। अभी मियां-बीवी राजी तो क्या करेगा काजी वाली कहावात ओ आपने सुनीच होगी। बेटे की खातिर शोएब की मां हैदराबाद आई और सानिया की मां से बातचीत की। अभी बात बनगएली होगी इसीलिए दोनों अप्रैल में शादी कर रहेले हैं। अभी मेरेको तो नहीं बुलाया पन भिड़ू अगर कोई भी शादी में गया तो प्लीज़ मेरेको भी बताने का कि उधर क्या हुआ। अभी क्या है मैं भी सानिया का फैन रहेला हूं लेकिन सानिया अपने इस फैन को तो बुलाएगी नहीं। सुना है 7 अप्रैल को शोएब अपना फुलटू फैमिली के साथ इंडिया आ रहेला है। हैदराबाद में दोनों की शागी होगी और पाकिस्तान में दावत।
अभी सानिया शादी के बाद टेनिस खेलेगी क्या नहीं ये मेरे को नहीं मालूम। क्या है कि सोहराब ने भी सानिया को बोला था शादी के बाद खेलना है कि नहीं तुम खुदीच डिसाइड करो। ठीक यही बाद शोएब ने भी सानिया को बोलेला है। पन आगे क्या होएंगा ये दोनों को भी मालूम नहीं है। इधर सानिया चाहती है कि लंदन ओलंपिक में खेले। दो भाई लोग सानिया-शोएब को मेरी ओर से all the best.

Friday, March 26, 2010

महानायक पर महाभारत !




हमने इस शख्सियत को सदी का महानायक घोषित किया है। सदी का सबसे बड़ा सितारा है ये। बॉलीवुड इसे शहंशाह मानता है। लेकिन कुछ मतलब परस्त इस शख्स से किनारा करने लगे हैं। माजरा समझने के लिए इतना ही मजमून काफी है। अमिताभ बच्चन के साथ जो कुछ भी हुआ और जो कुछ भी किया गया इसका जिम्मेदार कौन है ? मुंबई में अमिताभ बच्चन सी-लिंक के उद्घाटन में क्या गए हंगामा हो गया। हंगामा ऐसे जैसे आतंकियों ने पुल को उड़ा दिया हो। मुंबई से शुरू हुई हलचल ने दिल्ली को हिला दिया। यकीन ना आए तो कोई पर्यावरण मंत्री जयराम रमेश से पूछे। अमिताभ को स-लिंक के उद्घाटन समारोह में शामिल होने के लिए न्यौता दिया गया या नहीं सवाल अब ये नहीं रहा। सवाल ये है कि आखिर अभिनय की दुनिया की सबसे बड़ी शख्सियत के साथ नामजोड़कर ओछी राजनीति क्यों ? अमिताभ के समारोह में शामिल होने से महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री को ऐतराज हुआ। अमिताभ को मंच पर जगह घेरे देखकर महाराष्ट्र प्रदेश के कुछ कांग्रेस नेताओं को तीर चुभने लगा। एक वजह ये भी हो सकती है कि समारोह में कांग्रेस का मुख्यमंत्री सदी के सबसे बड़े नायक के साथ खड़ा होने का सम्मान पा रहा था लेकिन छुटऊभैये नेताओं को ये गंवारा नहीं हो रहा था। इसलिए भी अमिताभ के आने का मुद्दा बड़ा बना दिया गया। मुद्दा इसलिए बना क्योंकि अमिताभ गुजरात के ब्रांड एंबेसडर हैं। अमिताभ पर आरोप है कि उनकी विचारधारा नरेंद्र मोदी से मेल खाती है। इसलिए क्योंकि उन्होने गुजरात का ब्रांड एंबेसडर बनान स्वीकार किया। इस बेतुके तर्क पर आप चाहें तो हंस भी सकते हैं। गुजरात की विकास दर अन्य राज्यों की तुलना में बेहतर है। मोदी ने राज्ज में निवेश को बढ़ावा दिया। नौकरी और व्यवसाय की उपलब्धता के चलते गुजरात में पलायन अन्य राज्यों की अपेक्षा बेहद कम है। और शायद यही वजह है कि गुजरात में कांग्रेस को कभी भी सफलता नहीं मिली और आगे भविष्य में भी आसार नज़र नहीं आते। कांग्रेस इस तथ्य को भलीभांति महसूस करती है। राज्य में निवेश और बढ़े और उसकी अच्छी ब्रांडिंग हो इसलिए मोदी ने बिगबी को राज्य का ब्रांड एंबेसडर बनाया। तो आखिरकार इस मुद्दे को लेकर अमिताभ बच्चन ये सवाल क्यों पूछें कि मैंने क्या किया ? आप गुजरात जाकर वहां के हालात देख सकते हैं। आम आदमी की कार लखटकिया नैनो का सपना पूरा गुजरात से हुआ। मोदी राजनीति जरूर करते हैं लेकिन अपने राज्य को विकास का तोहफा देने के बाद। शायद यही कांग्रेस की आंख में खटकता है। सवाल ये उठता है कि अगर कोई शख्स किसी राज्य विशेष को प्रमोट करता है तो क्या जरूरी है कि वो उस राज्य के नेतृत्व की विचाराधारा से भी समानता रखता हो ? जवाब ना भी हो सकता है लेकिन राजनीति में सिर्फ अपना फायदा देखा जाता है। और मुंबई में कांग्रेस ने यही किया। अमिताभ पर आरोप लगा दिया कि उनके विचार मोदी से मिलते हैं इसलिए उन्हे कांग्रेस के समारोह में नहीं आना चाहिए था। सवाल एक और, क्या कांग्रेस संविधान से ऊपर है जो ये निर्णय ले कि कौन सा शख्स किस जगह पर जाए ? जवाब आप दीजिए और सवाल कांग्रेस से पूछिए। मैं मोदी विचाराधारा से बिलकुल सहमत नहीं हूं। किसी धर्म विशेष के खिलाफ या पक्ष में नहीं हूं। लेकिन जो सच मुझे नज़र आता है उसे जाहिर करने से पीछे मैं नहीं हटूंगा। बिना गलती के अमिताभ बच्चन को सज़ा दी जा रही है। कांग्रेसी नेता अपनी गंदी राजनीति का कीचड़ अमिताभ के दामन पर डालकर मीडिया में ध्यान का केंद्र बनने की कोशिश कर रहे हैं। कांग्रेस वो दिन भूल गई जब नेहरू ने बिग के बड़े भाई अजिताभ बच्चन के लिए निजीतौर पर सेवाईं दी थीं। समारोहों में उनका खास ख्याल रखा जाता था। वहीं कांग्रेस आज बच्चन के नाम को दागदार कर रही है। महाराष्ट्र में एनसीपी के साथ कांग्रेस ने साझा सरकार बनाई है और उसी साथी पक्ष के नेता ने ही बच्चन को आमंत्रित किया था। स्टेज पर बच्चन के साथ बैठते समय मुख्यमंत्री अशोक चव्हाण को दिक्कत नहीं हुई क्योंकि वो विरोधी पार्टी के चहेते के साथ बैठे थे। शायद ये बात उनके जेहन में भी नहीं थी लेकिन जैसे ही पार्टी के छुटभैयों ने आलाकमान से शिकायत की चव्हाण बिगबी के जन्मजात विरोधी की तरह बर्ताव करने लगे। इसके पहले भी टैक्सी ड्राइवरों के लाइसेंस के मामले में अशोक चव्हाण पर पलटने का आरोप लग चुका है। मुंबई में मची हलचल दिल्ली तक पहुंच गई। दिल्ली में पर्यावरण के मुद्दे पर आयोजित एक कार्यक्रम में पर्यावरण मंत्री जयराम रमेश को आना था। इसी समारोह में अमिताभ बच्चन को भी बतौर मुख्य अतिथि बुलाया गया था। लेकिन बिगबी के साथ बैठने पर मचे कोहराम का नतीजा रमेश देख चुके थे इसलिए ऐन वक्त पर आने से कन्नी काट गए। लोगों को कहा कि तबीयत खराब है लेकिन उसी वक्त कहीं और रमेश साहब मीडिया से मुखातिब हो रहे थे। खैर जो कुछ भी हुआ उसमें गलती किसकी है कांग्रेस अभी भी इसी में लगी हुई है। जल्द ही महाराष्ट्र में एक और समारोह है जिसमें चव्हाण साहब के साथ अमिताभ बच्चन को भी बुलावा भेजा गया है। देखते हैं क्या करेंगे सीएम साहब ?

Monday, March 22, 2010

दिल्ली को लूट लिया !




कुछ ही महीनों में देश कॉमनवेल्थ खेलों की मेज़बानी करेगा। अगर इस दरम्यान आप दिल्ली आते हैं तो आपके लिए राजधानी बिलकुल नई होगी। जिन सड़कों पर धूल और गंदगी कभी आपने देखी होगी वो सड़कें आपको किसी और देश में होने का अहसास कराएंगी। सड़कों पर कदम-कदम पर बने फ्लाईओवर के चलते आप रास्ता भी भूल सकते हैं। कॉमनवेल्थ गेम्स की मेजबानी के लिए पिछले तीन सालों से दिल्ली में कई बदलाव किए जा रहे हैं। पूरे शहर को मेट्रो जैसे क्रांतिकारी परिवर्तन में ढालने के बाद नई-नई लो-फ्लोर बसें और सड़कों से किलर या फिर कहें जानलेवा ब्लू-लान बसों को हटाना एक अच्छी पहल माना जा सकता है। लेकिन खेलों के नाम पर अरबों रुपए भी स्वाहा किए गए हैं। आलम ये है कि दिल्ल सरकार का खजाना अब खाली हो चुका है। महज तीन साल पहले दिल्ली सरकार के पास 11,000 करोड़ रुपये का फंड था, लेकिन लुटी-पिटी दिल्ली के पास आज फंड के नाम पर बचे हैं केवल 200 करोड़ रुपये। खबरों की मानें तो इस बार सरकार को 3 हजार करोड़ से भी ज्यादा का घाटा हुआ है। इतना ही नहीं दिल्ली को खूबसूरत बनाने के नाम पर राजधानी को 27 हजार करोड़ रुपए का कर्ज भी झेलना पड़ रहा है। क्या कोई शीला दीक्षित और सरकारी महकमें के अधिकारियों से ये पूछेगा कि आखिर जनता के खून-पसीने की कमाई किसने डकार ली? आखिर कहां गया सरकारी खजाना? लेख लिखे जाने के दो दिन पहले ही दिल्ली में दूध के दाम 2 रुपए तक बढ़ गए। 1 लीटर दूध के लिए अब 30 रुपए तक देने पड़ रहे हैं। सब्जी, अनाज, फल हर चीज़ के दाम जेब पर भारी पड़ रहे हैं। लेकिन जो सरकारी बंगले में रहते हैं और सब्सिडी के अलावा ऊपर से भी खाते हैं उनके लिए इसकी चिंता करना ज़रूरी नहीं है। जनता पर पड़ते बोझ से कहीं सरकार की कुर्सी ना हिलने लगे इसलिए सरकार परेशान ज़रूर है। मीडिया के सवालों का जवाब देने से अधिकारी और नेता दोनों ही बच रहे हैं। दिल्ली पर हाथ का कब्जा है, इसलिए पैसा पानी की तरह यमुना में बहा दिया गया। काम कितना हुआ इसकी सुध लेने के नाम पर भी पैसा बहाया गया। परवाह किसी को नहीं थी। दिल्ली सरकार के बजट में खर्चों की भारी लिस्ट है। वजीराबाद एक इलाका है दिल्ली में। सरकार यहां एक सिग्नेचर ब्रिज बनाना चाहती है। खर्चा आएगा लगभग 1200 करोड़ रुपए। हालांकि इस ब्रिज के लिए केंद्र सरकार भी मदद आर्थिक मदद करेगा। बावजूद इसके दिल्ली सरकार को 700 करोड़ रुपए खर्च करने होंगे। इस पुल को दिल्ली की शान के नाम पर बनाया जा रहा है। सरकार की जेब खाली है लेकिन महज दिखावे के नाम पर करोड़ों रुपए स्वाहा करने की तैयारी की जा चुकी है। इस पुल से दिल्ली के लोगों का भला तो होने से रहा लेकिन नेताओं और अफसरों के वारे-न्यारे ज़रूर होंगे। और जब अपनी जेब भरती हो तो अधिकारियों और नेताओं के पास जनता की सुध लेने की सुध कहां? दिल्ली में ही गीता कॉलोनी के पास भी हाल ही में एक पुल बनाया गया है। इस पुल की कुल लागत लगभग 100 करोड़ रुपए रही। महज 100 करोड़ रुपए दिल्ली को एक ज़बरदस्त पुल का तोहफा मिला। पुल की लंबाई भी ज्यादा और 4 लेन हाइवे से भी ज्यादा जगह है इस पुल पर और खूबसूरती के क्या कहने। लेकिन इस पुल के खर्चे और आसानी से दिल्ली सरकार खुश नहीं है। आपको बतादें कि इस पुल की वजह से इलाके में ट्रैफिक नाममात्र रह गया है। गीताकॉलोनी से दरियागंज सेकेंडों में पहुंचा जा सकता है। दिनभर अगर 10 हजार गाड़ियां इस रास्ते से गुजरें तो लाखों रुपए का पेट्रोल बच जाता है। लेकिन सरकार इसे महत्व नहीं देती। उन्हे तो सिग्नेचर ब्रिज ही चाहिए। भले ही दिल्ली पर कर्ज बढ़ता रहे। आखिर इन पांच सालों में उन्हे अपनी पीढ़ियों के लिए धन भी तो जमा करना है। मैंने अखबार में पढ़ा कि सरकार ने लालकिले के पीछे रिंग रोड बाइपास के लिए 655 करोड़ रुपये और बारापूला नाले पर बनने वाले रोड पर 550 करोड़ रुपये खर्च करने का मन बनाया है। हालांकि यहां इतने बड़े प्रोजक्ट की ज़रूरत नहीं है। और अगर है भी तो इसे खेलों के बाद भी बनाया जा सकता है। दिल्ली बदल रही है। रेडियो पर सरकार चीख-चीख कर कह रही है। ऐसा लगता है जैसे लोगों की आंखें नहीं है और वो बदलाव को देख नहीं सकते। खैर राजधानी में सड़कों के आसपास खूबसूरती के नाम पर 500 करोड़ रुपये खर्च किए जा रहे हैं। पूरी दिल्ली में करीब 280 करोड़ रुपये की लागत से स्ट्रीट लाइट के खंभे बदले गए हैं। ये खंबे थोड़े खूबसूरत लगते हैं, नए जो हैं। सरकार ने दलील दी है कि कॉमनवेल्थ गेम्स के दौरान पूरी दिल्ली में एक जैसे खंभे हों, लेकिन मजे की बात है कि जितने भी खंभे शहर में लगाए गए हैं, उनके डिजाइन एक जैसे नहीं हैं। ब्लू-लाइन से शबर को निजात दिलाना एक अच्छी पहल थी। लेकिन इसके लिए सरकार ने लो-फ्लोर के नाम पर लूट मचा दी। जो बसें सरकार 20 लाख रुपए में खरीद सकती थी उसे खरीदने के लिए 52 करोड़ रुपए खर्च किए गए। आखिर ये पैसा इन सफेदपोश चोरों के खून-पसीने का नहीं था। सरकार ने लो-फ्लोर बसों के लिए 2000 करोड़ रुपए बर्बाद कर दिए। करोड़ों रुपए की बचत से सरकार कई महीनों की किश्त दे सकती थी। लेकिन अगर ऐसा किया जाता तो करोड़ों रुपए अपनी जेब आने का रास्ता नहीं बनता। दिल्ली जलबोर्ड घाटे में हैं। लेकिन उसे रोकने के लिए सरकार के पास वक्त नहीं है। डीटीसी का घाटा कम करने के लिए दिल्ली की जनता पर बढ़े हुए किराए का बोझ डालव दिया गया। बावजूद इसके 500 करोड़ रुपए डीटीसी को देने पड़ रहे हैं। हर मर्ज की दवा होती है। लेकिन सरकार बीमारी को ठीक करने के बजाए हरकदम एक नया मर्ज इजाद करने में जुटी है। खेलों में कुछ महीने बचे हैं। शहर भर में निर्माण कार्य धड़ल्ले से हो रहे हैं। करोड़ों का खर्चा अरबों तक पहुंच गया है। खेलों में स्टेडियम में लगाई जाने वाली घास लाने के लिए अफसरान जनता का पैसा किस तरह खर्च किया इसका अंदाजा इस बात से ही लगाया जा सकता है कि अफसर हर एक दौरे के लिए बिजनेस क्लास में बैठकर दिल्ली से कोलकाता का सफर करते रहे। एक बार घास लाने के बाद उसे तबतक इस्तेमाल में नहीं लाया गया जबतक कि वो सड़ नहीं गया। घायस जब सड़ गई तो अधिकारी फिर से दिल्ली-कोलकाता करते रहे। करोड़ों रुपए की घास बर्बाद करने के बाद फिर उसी क्रिया को दोहराया गया। लेकिन जिस घास को कोलकाता से करोड़ों रुपए देकर मंगाया जा रहा था वो दिल्ली में ही यमुना किनारे भारी मात्रा में मौजूद है ये देखने की जेहमत किसी ने नहीं उठाई। इनका मकसद था सरकारी खजाने को खाली करना। अब जब सरकारी कंगाल हो रही है तो नए-नए रास्ते निकाले जा रहे हैं कि कर्ज लेकर भी अपनी जेब भरी जाए। दिल्ली वालों, आप तैयार रहें क्य़ोंकि सरकारी खजाना आपके ही पैसों से भरा जाएगा।

Sunday, March 21, 2010

चलो इलाहाबाद चलें !




इलाहाबाद का नाम सुनते ही संगम नगरी का चेहरा सामने आ जाता है। जो लोग इस तीर्थ को देख चुके हैं उनकी यादें एक बार फिर ताजा हो जाएंगी। लेकिन जिन्होंने इस इस देवनगरी के दर्शन नहीं किए हैं उन्हे मैं इलाहाबाद का दर्शन कराउंगा। 26 साल तक मैंने केवल इस नगरी का नाम सुना था। कुछ ऐसा संयोग बना कि अब मैं अक्सर इलाहाबाद जाता रहता हूं। दिल्ली से प्रयागराज एक्पप्रेस में रात 9 बजकर 25 मिनट पर मैं चला। इसे वीआईपी ट्रेन कहते हैं और अगर कोई प्राकृतिक आपदा ना आए तो ट्रेन अक्सर वक्त पर य़ानि अगले दिन सुबह साढे 6 बजे आपको संगम नगरी पहुंचा देती है। तो साहेबान अगले दिन मैं भी वक्त पर इलाहाबाद पहुंच गया। स्टेशन से बाहर निकलते ही आपको अंदाज़ा हो जाएगा कि आप उत्तरप्रदेश में आ गए हैं। जनाब इलाहाबाद में मैं आपका स्वागत करता हूं। रेलवे स्टेशन से बाहर आइए। यहां आनेवाले ज्यादातर मुसाफिर संगम की ओर बढ़ते हैं। तो चलिए आपको भी संगम ले चलता हूं। हिंदुस्तान की ज्यादातर आबादी ये जानती है कि इलाहाबाद में संगम कहां है और इसका नाम संगम क्यों पड़ा। संक्षिप्त में आपको मैं भी बतादूं, इलाहाबाद में जिस जगह पतित पावनी गंगा, जीवन दायिनी यमुना और पवित्र सरस्वती आपस में मिलती हैं उसे संगम कहते हैं। रेलवे स्टेशन के बाहर तीन पहिए वाले ऑटोरिक्शा (विक्रम) वाले आपका स्वागत करेंगे। एक साथ वो आपपर झपटेंगे। अपने विवेक से काम लें और सही जगह देखकर विक्रम की सवारी का मजा लें। हां अपने सामान की जिम्मेदारी आपकी ही होगी ये बताने की जरूरत नहीं है। तो जनाब इलाहाबाद की गलियों से आप गुजरें। जर्जर होती पुरानी इमारतों के बीच से आप चल रहे हैं। सड़कें पतली हैं और गाड़ियों का काफिला दोनों ओर से गुजर रहा है। किस्मत अच्छी रही तो ज्यादा ट्रैफिक जाम नहीं मिलेगा। बाजार, गली, मोहल्ला पार करने के बाद आपको खुली सड़क भी मिलेगी। बीच-बीच में कई सारे छोटे-छोटे मंदिर भी मिलेंगे। लोगों ने अपने पसंदीदा देवताओं की श्रद्धा के हिसाब से मंदिर बना रखे हैं। चाहें तो रिक्शा में बैठे-बैठे ही सिर झुकाकर आस्था प्रकट कर लें। लोग अक्सर ऐसा करते हैं। हां अगर जोर-जोर से मंदिरों में लाउडस्पीकर पर फिल्मी धुनों पर भजन बज रहे हों तो परेशान ना हों। आस्था प्रकट करने का लोगों का अपना-अपना तरीका। मंदिरों के जमघट पार करने के बाद आप रूबरू होंगे पुराने पुल से। आप चाहें तो नए पुल से भी जा सकते हैं। लेकिन वहां से में आपको बाद में ले चलुंगा। तो साहब हम पहुंच गए पुराने पुल पर। अंग्रेजों के जमाने से चला आ रहा पुल हिलता जरूर है लेकिन अभी तक गिरा नहीं है। आए दिन सरकारी खर्चे पर इसकी मरम्मत भी होती है। मरम्मत के बहाने स्थाई ठेकेदार की दुकानदारी भी चल जाती है। पुल के ऊपर से ट्रेनें भी गुजरती हैं। अगर उसी दौरान नीचे से आप भी गुजर रहे होंगे तो शोर से आपको तकलीफ भी हो सकती है। बहरहाल अब पुल से अपने दोनों ओर देखिए। पुल के नीचे यमुना मैया आपको दर्शन देंगी। अगर वक्त सुबह का है सूरज की रोशनी के चलते आपको यमुना का पानी काला नहीं दिखाई देगा। हाथ जोड़कर उनसे माफी मांगिए कि हे यमुना मैया हम तुम्हारा पानी काला होने से नहीं बचा सकते, हमें माफ करो। ऑटो में बैठै-बैठे आप देख सकेंगे कि कैसे स्थाई लोगों के साथ बाहर के मुसाफिर भी अपने घर का बचा-खुचा सामान यमुना नदीं में प्रवाहित करके पुण्य प्राप्त करने का लाभ महसूस करते हैं। उन्हे ये मत कहिएगा कि आपने कचरा नदी में क्यों बहाया। वो आपसे नाराज़ हो सकते हैं। उन्हे लगता है कि उनके घर की गंदगी यमुना स्वीकार करेंगी और उन्हे यश का प्रसाद देंगी। अपने बाईं ओर थोड़ी दूर देखने की क्षमता अगर आप में होगी तो आप संगम भी देख सकेंगे। ध्यान देंगे तो आपको गंगा मैया की कराह भी सुनाई देगी जो अपने बेटों से कहती है कि मेरा दर्द सुनो। मुझे बचाओ, मेरा अस्तित्व खतरे में है। लेकिन हम हिंदुस्तानी हैं, दूसरों की दर्द की परवाह किए बगैर सतत आगे बढ़ते जाना हमारी आदत में शामिल है। किसी और की पीड़ा सुनने के लिए हमारे पास वक्त नहीं है। तो दर्द और मायूसी से बाहर निकलें। पुराना पुल पार हो चुका है। आगे बढ़ें,तो गुलाब के फूलों की मंडी से गुजरेंगे। खुशबू से आपको अच्छा महसूस होगा। थोड़ा और आगे आएंगे तो एक बड़ा चौराहा पड़ेगा। यहां से सीधा रास्ता आपको नैनी, बनारस और विंध्याचल की ओर ले जाएगा। बाईं सड़क आपको नए पुल से होते हुए वापस इलाहाबाद शहर की तरफ ले जाएगी। दाईं तरफ की सड़क पर ध्यान ना दें। वहां आपको सड़क किनारे कई ट्रक दिखाई देंगे। और ड्राइवरों से बातचीत करते पुलिस वाले। उनके बीच होनेवाले लेन-देन को बिलकुल ना देंखें। नहीं तो आप उन्हे घूसखोर कहेंगे। और अगर आपने ऐसा किया तो आपका सफर प्रभावित हो सकता है। इसलिए बिलकुल भारतीय बनकर आगे बढ़े। चलिए अब इसी चौराहे से संगम की ओर चला जाए। नए पुल पर आपका स्वागत है। देश में विदेशी तरीके से बना ये पुल आपको बेहद खूबसूरत लगेगा। इस पुल से आप नीचे यमुना का गंदा पानी भी देख सकेंगे। इक्का-दुक्का मछुआरे भी अपनी छोट-छोटी नाव में दिखाई देंगे। पुल पर बने बड़े-बड़े खंबे और खंबों से लगे लंबे-लंबे तार आपको किसी दूसरे देश में होने का अहसास कराएंगे। इस पुल पर अगर कुछ देर रुकने की इच्छा है तो उसे रिक्शावाले को व्यक्त ना करें। क्योंकि वो रुकेगा नहीं। हां अगर आप चाहें तो रिक्शा रोक लें और कुछ देर रुककर दूसरा रिक्शा लें। यहां कुछ तस्वीरें आप ले सकते हैं। आपनी यात्रा की यादगार के लिए। आब आगे चलिए...पुल पार करने के बाद सड़क के दाईं ओर बनी पतली सड़क पकड़ लें। ये रास्ता आपको संगम की ओर ले जाएगा। लगभग 2 किलोमीटर चलने के बाद आप पहुंचेंगे तीर्थराज प्रयाग नगरी के संगम पर। कथा में वर्णित तीन की बजाए आपको दिखेंगी केवल 2 नदियां और उनका संगम। नदी के किनारे आते समय अपने आस-पास की दुकानों को देखिए। यहां पूजा-पाठ से जुड़ा हर सामान आपको मिलेगा। थोड़ा और नीचे गए तो मचान के नीचे तख्ता लगाकर आपको साधू बाबा भी दिखेंगे। ये प्राणी यहां भारी मात्रा में पाए जाते हैं। आपकी इच्छा हो या ना हो ये आपको अपना चेला बना ही लेंगे। चलिए टीका लगवाइए और इन्हे दस-पांच रुपए देकर आगे बढ़िए। अब अपने जूते उतारकर पवित्र यमुना के ठंडे पानी में पैर डालिए। उस अहसास का वर्णन करना मेरे लिए भी कठिन है। अपने सामने थोड़ी दर पर देखिए जहां गंगा और यमुना का मिलन होता है। यहां नाव वाले भी मिलेंगे। किसी नाव में बैठिए, 10 रुपए दीजिए और संगम पर पहुंच जाइए। नाव पर बैठे-बैठे ही संगम की धारा को अपने हाथों से स्पर्श कीजिए। गंगा और यमुना की महानता आपको खुद-बखुद समझ में आ जाएगी। उस पवित्र धारा में 3 डुबकी लगाइए और प्राचीन कथाओं के अनुसार अपने पापों को धो लीजिए। शीतल जल में स्नान के बाद आप एक बार ये महसूस करेंगे कि इस धारा का जल सदैव निर्मल रहे इसके लिए आपभी कुछ प्रयास करेंगे। लेकिन नदी से बाहर आने के बाद आपकी याद्दाश्त कुछ कमजोर हो जाएगी। चिंता ना करें, इसका भी बंदोबस्त बाहर है। यहां कई बड़-बड़े सरकारी घड़े रखे हैं। और किनारे लगे बड़े-बड़े बैनरों पर लिखा है कि नदी में कचरा ना डालें। लेकिन इसकी परवाह किए बिना लोग गंगा-यमुना में कचरा डालकर पवित्र होने का मौका खोना नहीं चाहते। अब चाहे तो क्रोध कीजिए या फिर अफसोस कीजिए लेकिन लोगों को कुछ मत कहिए। बेवजह नाराज हो जाएंगे। नदी से बाहर ऊपर की तरफ आईए। सामने एक राजा का किला है। कभी लोग परिवार के साथ घूमने आते थे, आजकल शहर के रोमियो-जूलियट के लिए पनाहगार है किला। जिस ओर नहीं जाना उसका जिक्र क्या करना लेकिन फिर भी मन में कुछ और चल रहा है तो जाइए घूम आइए। वापस आकर संगम किनारे बने मंदिरों के दर्शन भी कर लें। यहां एक बजरंगबली का भी मंदिर है। सुना है कि ये मंदिर बरसात के समय एक बार पानी से जरूर भरता है। गंगा मैया हनुमानजी को अपना दर्शन देती हैं। यहां अपनी इच्छानुसार पूजा-प्रार्थना कीजिए। पंडित जी बाहर मिलेंगे ही..आप चाहें तो हवन वगैरह भी करवा सकते हैं। अब संगम से बाहर निकलें तो इलाहाबाद बाजार की ओर चलें। सबसे पहले चलते हैं चौक बाजार में। यहां आपको इलाहाबाद का हर रंग मिलेगा। चौक बाजार खाने-पीने की चीजों के लिए प्रसिद्ध है। बाजार के एक ओर चा वालों का कब्जा है दूसरी ओर मिठाई वालों का। यहां की चाट अगर आपने एक बार चख ली तो दिल्ली और बंबई वालों की चाट का जाएगा आपको दोबारा नहीं भाएगा। तरह-तरह के चाट मिलते है यहां। गोलगप्पों के साथ-दही वड़ा भी काफी मशहूर है। जी ललचाए और अगर रहा ना जाए तो किसी भी चाट की दुकानपर जाइए और टूट पड़िए। लेकिन चाट की दुकानपर जाकर टमाटर वाली चाट एक बार जरूर खाएं वो भी बिना मीठी चटनी के। चाट की कीमतें इतनी सस्ती हैं कि अगर 20 रुपए में आप हर तरह की चाट का जाएका ले सकते हैं। गोलगप्पे, आलूचाट, टिक्की और टमाटर चाट खाने के बाद भी 20 रुपए खर्च नहीं होंगे। कम कीमत में उम्दा जाएका लेने के बाद मोहन जाचा की लस्सी जरूर पीजिए। इनकी दुकान काफी प्रसिद्ध है। 2 तरह की मलाई के साथ खड़ी चम्मच वाली लस्सी मिलेगी यहां। खड़ी चम्मच से अर्थ है कि लस्सी इतनी गाढ़ी कि चम्मच डालने पर वह गिरेगा नहीं। लस्सी में केसर और गुलाबजल पड़के बाद इसका जाएका और भी बढ़ जाएगा। मोहन चाचा की लस्सी के बाद सामने की दुकानों पर आप लाल पेड़े का स्वाद लेना ना भूलें। इसका स्वाद आपको जिंदगी भर याद रहेगा। यहां एक और मिठाई भी प्रसिद्ध है। परवर वाली मिठाई। ये मिठाई आपने शायद ही खाई होगी। इसका जाएगा आपके लिए यादगार रहेगा। चाहें तो इसे पैक भी करा सकते हैं लेकिन ये ज्यादा दिन नहीं टिकता। परवर मिठाई पैक कराइए और अब जाएगा लीजिए दही जलेबी का, मजा आ जाएगा। अब इस बाजार से बाहर निकलकर आगे बढ़े। आगे मिलेगी बताशेवाली गली। सफेद-सफेद बताशे आपको गांवों के मेलों की याद दिलाएंगै। सिक्के के बराबर बताशे के साथ आपको पूड़ी के बराबर के बताशे भी आपको बताशामंडी में मिल जाएगा। साइकिलरिक्शों के जमघट और भीड़-भाड़ से बाहर निकलें। अब आगे चलते हैं सिविल लाइंस की ओर। इलाहाबाद के लोग यहां से कपड़ों की खरीददारी करते हैं। यहां बिगबाजार भी है। शहर आधुनिकीकरण की ओर बढ़ रहा है। यहां भी हनुमान जी का मंदिर है। दर्शन कीजिए और यहां मिलनेवाली मिठाईयों का भी जाएका लीजए। चाहें तो पास ही में एल्फ्रेड पार्क भी जा सकते हैं। शहीद चंद्रशेखर आजाद ने यहीं कुर्बानी दी थी। इन खास जगहों के दर्शन के बाद वापस रेलवे स्टेशन लौटें और वापस अपने घर की गाड़ी पकड़ें।

Tuesday, March 9, 2010

डॉन का पासवर्ड शूटरों के पास




कोई भी डॉन अपने सारे राज अभी तक कभी भी अपने शूटरों को नहीं बताता था, लेकिन ऐडवोकेट शाहिद आजमी की हत्या को अंजाम देने के लिए अंडरवर्ल्ड डॉन भरत नेपाली ने अपने शूटरों को अपना पासवर्ड तक बता रखा था। आजमी की 11 फरवरी को हत्या कर दी गई थी। इस हत्याकांड में पुलिस ने देवेंद्र जगताप, विनोद विचारे और पिंटू दगड़े नामक तीन आरोपियों को गिरफ्तार किया था, जबकि हंसराज सोलंकी नामक चौथी आरोपी अभी तक फरार है। क्राइम ब्रांच के एक अधिकारी के अनुसार जब थाईलैंड में बैठे भरत नेपाली ने शाहिद आजमी की हत्या का फैसला कर लिया, तो गुगल सर्च से शाहिद आजमी की फोटो निकालकर अपने ई-मेल पर पेस्ट कर दी। बाद में उसने वीओआईपी कनेक्शन के जरिए अपने मुख्य शूटर देवेंद्र जगताप और विनोद विचारे को फोन किया और दोनों को ही अपना पासवर्ड बता कर कहा कि वे उसके (भरत नेपाली) ई-मेल को ओपन कर शाहिद आजमी की फोटो गौर से देखें। इसी दौरान भरत नेपाली ने जगताप और विचारे को शाहिद आजमी के कुर्ला के घर का पूरा पता भी लिखा दिया और सलाह दी कि उसके घर और दफ्तर की फौरन रेकी करो। यही नहीं, दोनों को भरत नेपाली ने यह भी बताया कि वे शाहिद आजमी को किसी बहाने कोर्ट में जाकर भी गौर से देख लें, ताकि मर्डर के वक्त कोई भी गड़बड़ न हो। इसके बाद जगताप और विचारे अपने दो साथियों पिंटू दगड़े और हंसराज सोलंकी के साथ कई दिन तक शाहिद आजमी के घर और दफ्तर की रेकी करते रहे। जिस 11 फरवरी को दोनों ने शाहिद आजमी का मर्डर किया, उसके ठीक एक दिन पहले जगताप ने यह कहकर पवई के पीसीओ से आजमी को फोन लगाया कि मेरा भाई ठाणे जेल में बंद है, उसी सिलसिले में मुझे आपसे अरजेंट मिलना है। इस पर आजमी ने जगताप को अगले दिन शाम को दफ्तर आने को कहा। जगताप इसके बाद पिंटू और सोलंकी को लेकर अगले दिन शाम को आजमी के दफ्तर पहुंच गया और फिर तीनों ने कई राउंड गोलियां चलाकर आजमी का कत्ल कर दिया। अब तक आतंकवादी किसी साजिश के लिए एक ही पासवर्ड का इस्तेमाल करते थे, पर किसी अंडरवर्ल्ड सरगना द्वारा अपने शूटरों को अपना पासवर्ड बताने का शायद यह पहला मामला है। क्राइम बांच के एक अधिकारी के अनुसार कई साल पहले अरुण गवली को बॉलीवुड के शेट्टी नाम के एक डुप्लीकेट (डमी रोल करने वाला) का मर्डर करना था। उस डुप्लीकेट का फोटो गवली के पास था नहीं, इसलिए गवली अपने शूटर को बॉलीवुड की फिल्म दिखाने ले गया, जिसमें उस शेट्टी ने डुप्लीकेट का रोल किया था। पर फिल्म देखकर भी शूटर उस डुप्लीकेट को सही से पहचान नहीं पाया और गलती से उस डुप्लीकेट के हमशक्ल का कुछ दिन बाद मर्डर कर दिया। दरअसल अब अंडरवर्ल्ड पूरी तरह आतंकवादियों की तर्ज पर अपना काम कर रहा है, इसलिए सिर्फ पासवर्ड नहीं, 26/11 के बाद वीओआईपी कनेक्शन का इस्तेमाल भी अब अंडरर्वल्ड में आम हो गया है।

Monday, March 8, 2010

बहुत चालाक है कांग्रेस !




साल 2010 का बजट कितनी खुशियां लाया, ये किसी मध्यवर्गीय परिवार से पूछिए। उस परिवार से जो 20हजार में अपनी सारी जरूरत पूरी कर लेता है। सरकार के टैक्स के साथ बच्चों की पढ़ाई, बहन-बेटी की शादी, पत्नी और माता-पिता की दवाई के साथ घर की जरूरतें, ये तमाम जरूरत वो परिवार महज 20 हजार रुपए मासिक आमदनी में पूरी कर लेता है। इस बजट से उसने जो उम्मीदें की वो टूट गई होंगी। घर में अगर गाडी है तो इस बजट के वार ने उसे घायल जरूर किया होगा। बजट में पेट्रोल-डीजल महंगा हो गया। नतीजा तमाम जरूरत की चीजों के दाम आसमान पर पहुंच गए। यूपीए सरकार ने आम जनता खून चूस-चूस कर अपनी जेबें भर लीं। सरकार के तमाम मंत्री देश-विदेश का जायजा लेते रहे। लेकिन महंगाई के बोझ तले जनता की सुध लेने की किसी ने नहीं सोची। सरकार को जगाने के लिए देश की दूसरी राजनीतिक पार्टियां एकजुट होने लगीं। हालांकि इनका मकसद देश के साथ हमदर्दी नहीं बल्कि जनता की तकलीफों की लौ में अपनी रोटियां सेंकना था। तो जनाब देश की दूसरी पार्टियां सरकार के खिलाफ लामबंद होने लगीं। सरकार को डर सताने लगा। मामला इसके पहले गंभीर हो जाए, कांग्रेस ने फूट डाले राज करो की नीति अपनाई। नतीजा महिला आरक्षण बिल का सामने आना। सन 96 में जिस विधेयक को लेकर सरकार घिरी थी, उसी विधेयक के जिन्न को यूपीए ने अपने फायदे के लिए फिर जगाया। महिला आरक्षण बिल को संसद के इसी सत्र में पास कराने की कवायद शुरू हो गई। महंगाई पर सरकार को घरने के लिए पूरी ताकत लगाने वाला विपक्ष महिला आरक्षण बिल के वार से चकनाचूर हो गया। पार्टियों की एकता गर्त मे चली गई। पने ही परा होने लगे। महिलाओं के खिलाफ बोलकर कोई भी पार्टी अपना वोटबैंक खत्म करने का रिस्क नहीं लेना चाहती थी। इसलिए बीजेपी और लेफ्ट ने बिल का समर्थन कर दिया। लेकिन कई क्षेत्रीय पार्टियों में बगावत के सुर उठने लगे। जेडीयू में भी दरार पड़ी। तो समाजवादी पार्टी भी बिल के खिलाफ हो गई। इन पार्टियों की मजबूरी ये है कि अगर महिला आरक्षण बिल पास हो जाता है तो इनके पास महिला चेहरे ऐसे नहीं हैं जिसे सामने रहकर ये वोट हथिया सकें। जाहिर है इनके अस्तित्व पर खतरा हो सकता है। इसके उलट लेफ्ट और बीजेपी के पास ऐसे चेहरे हैं जिसे वो कैश करा सकते हैं। लेकिन कामयाबी पर सवाल अभी भी है। लेकिन आरक्षण बिल का निवाल ना ही ये पार्टियां निगल सकती हैं और ना ही उगल सकती हैं। इसलिए नाराजगी झेलने से अच्छा है कि बिल के समर्थन में आ जाएं। इस बिल का प्रस्ताव रखते ही विपक्ष समेत सारे देश का ध्यान महंगाई से हट चुका है। देश के विकास का दम भरने वाली कांग्रेस देश को खोखला होने से बचाने के बजाए अब अपनी राजनीतिक जमीन को मजबूत कर रही है। हम किसी के उद्देश्य के खिलाफ नहीं हैं। लोकतंत्र में कोई भी अगुवाई कर सकता है। लेकिन पहले अपना फर्ज तो पूरा करे। महंगाई दर गिरती रही लेकिन कीमतों ने आसमान से नीचे उतरने का नाम ही नहीं लिया। कृषि मंत्री शरद पवार कहते हैं कि रबी की फसल आने के बाद महंगाई कम होगी। चीनी के दाम भगवान पर छोड़कर शरद पवार भी निश्चिंत हैं। आखिर उन्हे तो 9 घंटे की नौकरी के बाद महीने की तनख्वाह पर गुजारा तो नहीं करना है। आम आदमी पिसता है तो पिसे। उन्हे क्या ? भगवान ने चाहा तो रबी की फसल जल्द ही बाजार में आ जाएगी। लेकिन इस बात का यकीन कौन दिलाएगा कि बिचौलिए और दलाल इस फसल में सेंध नहीं लगाएंगे। आखिर सरकार ने महंगाई के लिए इन्हीं दीमकों को जिम्मेदार ठहराया था। जब महंगाई पर सारा देश अपना सुर एक कर रहा था तो कांग्रेस ने नया शिगूफा छेड़कर सबका ध्यान दूसरी ओर कर दिया। आम जनता के दुख को समझने का दम भरने वाले नेताओं के सुर भी बदल गए। अब महंगाई की लड़ाई कौन लड़ेगा। आम जनता की आवाज सरकार तक नहीं पहुंचेगी, इतना तो देश जानता ही है। इसलिए अब ये आवाज राख के नीचे दब गई है। लेकिन सरकार ये ना भूले कि चिंगारी पर सिर्फ राख पड़ी है। आग तो अंदर बाकी है...

कलयुग में राम राज !




कलयुग में राम राज! सुनकर थोड़ा अजीब लगता है,पर ये सच है। राजा हरदौल की पवित्र नगरी बुंदेलखंड के ओरछा में अब भी 'राम राज' कायम है। यहां लोग मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम की पूजा राजा के रूप में करते हैं। यही नहीं मध्य प्रदेश की पुलिस चारों पहर की आरती में भगवान श्रीराम को 'गार्ड ऑफ ऑनर' देती है। बुंदेलखंड के टीकमगढ़ जिले में राजा हरदौल की पवित्र नगरी ओरछा है। कहा जाता है कि यहां कभी बुंदेला राजा जुझार सिंह ने अपने सेनापति पहार सिंह के बहकावे में आकर अपने ब्रह्माचारी भाई राजा हरदौल को भोजन में जहर खिलाकर मरवा दिया था। किवदंती के मुताबिक राजा हरदौल अमर हो गए थे। इस नगरी में मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम को राजा की पदवी दिए जाने के पीछे एक लोककथा प्रचलित है। झांसी की उर्मिला पटेल बताती हैं कि मान्यता के अनुसार संवत् 1600 में बुंदेला महाराजा माकुर शाह की पत्नी महारानी कुंअरि, गणेश और राम की प्रतिमा अयोध्या से ओरछा लाई थीं। उस वक्त राम ने शर्त रखी थी कि ओरछा में राजतंत्र नहीं बल्कि उन्हीं की सत्ता होगी। शर्त मानकर महाराजा माकुर ने ओरछा राज्य में 'राम के राज' की घोषणा कर दी। महाराजा के शासनकाल में चारों पहर की आरती में भगवान श्रीराम को 'गार्ड ऑफ ऑनर' दिया जाने लगा। राजाओं की पुरानी परंपरा को मध्य प्रदेश पुलिस बखूब निभा रही है। ओरछा तीर्थ नगरी के रूप में प्रसिद्ध है और देश के कई हिस्से से लोग यहां पूजा अर्चना के लिए आते हैं। यहां मंदिर की सुरक्षा के लिए मध्य प्रदेश सरकार की ओर से जवान तैनात किए गए हैं जो कि रोजाना आरती के समय गार्ड ऑफ ऑनर देते हैं।
सौ.नवभारत टाइम्स

क्या बिक गए तुम ?




देश की आधी आबादी की आवाज़ है...
आधा देश बुला रहा है...
अब बराबरी का हक दो...
मंगलवार को ये तमाम लाइनें तमाम न्यूज चैनलों के स्लग के रूप में दिखाई दे रही थीं। मामला था महिलाओं आरक्षण विधेयक से जुड़ा हुआ। दिन भर हंगामा चलता रहा। विपक्ष के कुछ नेताओं ने संसद में हंगामा किया। टीवी चैनलों की फुल स्क्रीन पर लिखा गया, संसद शर्मसार हुआ। नेताओं ने संसद की मर्यादा का नुकसान किया। ऐसा लगा कि नेताओं ने किसीकी हत्या कर दी हो। शाम को घर पहुंचते ही फिर से टीवी चालू किया। देश के नामी न्यूज चैनलों ने बड़े-बड़े नेताओं को बैठाकर अपनी टीआरपी बढ़ाने का माहौल बना लिया था। एक दूसरे का झगड़ा इनके लिए पैसा लाता है। हालांकि अब ये बात टीवी देखने वाले तमाम लोग जानते हैं। मैंने एक अंग्रेजी चैनल लगाया। देश में काफी नाम है इस चैनल का। अच्छी खासी व्यूअरशिप भी है। खबरों में हमेशा आगे रहने वाले इस चैनल की हरकतें मैं बेहद बारीकी से देख रहा था। महिला आरक्षण बिल लाने वाली कांग्रेस की नीयत पर सवाल उठाने के बजाए उस एक चैनल के अलावा देश के सभी बड़े चैनल विपक्ष को कोस रहे थे। मानो बिल का बहिष्कार करके उन्होने देश के साथ गद्दारी कर दी हो। अपनी राजनीति की दुकान चलाने की मजबूरी ने ही उन्हे बिल का विरोध करने पर मजबूर किया। जिन पार्टियों में महिला चेहरे नहीं हैं उनकी दुकानदारी इस बिल से प्रभावित हो सकती है। शायद यही वजह है कि विरोध के स्वर सुने गए। लेकिन चैनल के पत्रकार कबसे कांग्रेसी प्रवक्ता बन गए। बिल पर सार्थक बहस देखने के लिए मैंने तमाम चैनलों पर गौर किया। लेकिन कहीं भी सार्थकत नज़र नहीं आई। लालू यादव ने अगर अपना मत रखा तो चैनलों ने उसे गलत बता दिया। आखिर सही-गलत का फैसला करने के हक उन्हे किसने दिया। चैनलों का रवैया ऐसा था मानों कांग्रेस हाईकमान ने तमाम चैनलों में शेयर ले रखा हो। ऐसा लगा मानो विपक्ष के नेताओं को सिर्फ जलील करने के लिए बुलाया हो। मैं कांग्रेस या दूसरे दलों का विरोधी नहीं हूं। लेकिन अगर आपने किसी को चर्चा के लिए बुलाया होलतो उसे बोलने का मौका तो मिलना चाहिए। चैनलों में वक्त की कीमत भी समझ सकता हूं। लेकिन मेहमान से ज्यादा मेजबान का बोलना इसे खारिज कर देता है। मानो चैनलवाले कांग्रेस के खिलाफ कुछ सुनना ही नहीं चाहते। महिला बिल पास हो, सारा देश ये चाहता है लेकिन बिल पास होने से पहले मीडिया ने इतना बवाल क्यों किया। कौन देगा इसका जवाब। इसलिए क्योंकि आपके पास सैटेलाइट की ताकत है..या इसलिए क्योंकि आपके पास जनता का विश्वास है...आप खुद खुदा बन बैठे। लोकतंत्र में बोलने का हक हर किसी को है। तरीका गलत हो तो समर्थन हम भी नहीं करते। गंदी राजनीति की निंदा और विरोध हम भी करते हैं। लेकिन चौथे स्तंभ को किसी पार्टी का सरेआम साथ देना दुखद लगता है। मानो मीडिया बिक गई हो। संसद में हंगामा करने वाले नेता टीवी पर गुंड़ों के रूप में दिखाई दिए। लेकिन यही काम अगर कांग्रेस ने किया होता तो शायद वो वीर क्रांतिकारी कहलाते। कांग्रेसियों का विरोध भी सही हो जाता। कहीं कांग्रेस कार्यकर्ताओं पर लाठीचार्ज होता है तो खबरें ऐसी चलाई जाती हैं मानों भगत सिंह के साथियों पर अंग्रेजों ने लाठी चार्ज कर दिया है। कृपाशंकर सिंह और संजय निरूपम की बात सही लगती है लेकिन रविशंकर प्रसाद की दलील सुनी भी नहीं जाती। कौन सही है कौन गलत इसका फैसला जनता पर छोड़ना चाहिए। तराजू बराबर रखकर खबर बेची जाए, टीआरपी तब भी आती है। तरीके और भी हो सकते हैं। बिल सही है या गलत इसके लिए चर्चा तो होनी ही चाहिए। लेकिन पहले हर किसी की बात तो सुनी जाए।

Thursday, March 4, 2010

भाई बोल रहा हूं...




मुंबई...सपनों का शहर... वो दुनिया जहां जाना हर किसी का सपना होता है। चाहत इतनी कि इसे मायानगरी कहते हैं। हर दिन यहां लाखों मुसाफिर आते हैं। कुछ को मंजिल मिलती है तो कुछ बेमंजिल हो जाते हैं। किसी की किस्मत चमकती है तो कोई ठोकरें खाता है। किसी के अरमान पूरे होते हैं तो कई हताश हो जाता है। जिसके सपने पूरे हुए वो बादशाह जिसका टूट गया वो फकीर। हार बर्दाश्त नहीं होती तो फकीर बादशाह बनने की कोशिश करता है। कोशिश के लिए कदम कहीं भी चल पड़ते हैं। उस रास्ते पर भी जिसकी मंजिल सलाखों के पीछे खत्म होती है, या फिर वहां जहां है सिर्फ अंधेरा। फिर पैदा होता है एक नया बादशाह। सपना..मुंबई पर राज करना। अपने सपनों के लिए कई लोगों को घर बर्बाद करना भी कबूल है। मुंबई अंडरवर्ल्ड में कुछ ऐसा ही होता है। वरना दाउद इब्राहिम आज खुद को बेताज बादशाह नहीं कहता। छोटा राजन और छोटा शकील का नाम भी नहीं होता। लेकिन इनका नाम है मतलब पर्दे के पीछे एक कहानी ऐसी जरूर है जो इन किरदारों को पैदा करने का काम करती है। बहरहाल अंडरवर्ल्ड का खात्मा करने के लिए मुंबई पुलिस जीतोड़ मेहनत कर रही है। लेकिन एक कहावत है...घर के भेदी लंका ढाए... मतलब समझाने की जरूरत नहीं है। खाकी के पीछे कई चेहरे इन बेताज बादशाहों के मोहरे का काम करते हैं। इन्हे वर्दीवाला गुंड़ा भी कहा जाता है। मुंबई पुलिस के कई अधिकारियों पर आरोप लग चुके हैं। मसलन सब इंस्पेक्टर दया नायक, अकेले 83 लोगों को मार गिराया...इन पर है अंडरवर्ल्ड से साठगांठ का आरोप। विजय सालस्कर जैसे कई एनकाउंटर स्पेशलिस्टों पर ऐसे आरोप हैं। अकेले विजय सालस्कर ने ही अंर नाइक, जग्गू शेट्टी, साधु शेट्टी, कुंदन सिंह रावत और जहूर माखंडा जेसे अपरादिय़ों को मौत की नींद सुला दी। खाकी पहनकर सरकारी तरीके से शूटआउट करने वाले अंडरवर्ल्ड के इन मोहरों के खिलाफ सबूत मिलते भी नहीं मिलते। और इन्ही की शय पर अंडरवर्ल्ड फल-फूल रहा है। माया डोलस के एनकाउंटर के बाद अंडरवर्ल्ड के हौसले पस्त भी हुए थे। लेकिन वक्त बीतने के साथ ही काली दुनिया के शैतान फिर जाग उठे हैं। पिछले साल से अंडरवर्ल्ड एक बार फिर मुंबई पर हावी होने लगा है। नई कहानी आपको बताते हैं।
मुंबई के कांदिवली में रहने वाले एक बिल्डर को हाल ही में अंडरवर्ल्ड का फोन आया है। फोन करने वाले अपना नाम एजाज लकड़ावाला बताया। अब इन दोनों के बीच क्या बातचीत हुई वो आपको बताते हैं..
एजाज- खैरियत भाईजान
फैजल शेख (नाम बदला हुआ)- बस अल्लाह का करम है
एजाज- एजाज भाई बोल रहा हूं
फैजल शेख (नाम बदला हुआ)- : एजाज भाई लकड़ावाले ? हां बोलो
एजाज- : रफीकभाई से मैसेज ले लेना और बात कर लेना। अपने वाले हो तो फोन करके बताया, नहीं तो दूसरी बात रहता है, बात अलग हो जाती है। जवाब दे देना।
फैजल शेख (नाम बदला हुआ)- : बराबर
एजाज- : आपकी इज्जत कर रहा हूं, किसीको बीच में डाला तो मैं किसीकी इज्जत नहीं करुंगा। फैसला मुझको करना है। आपकी तरफ से एक करोड़ गुडलक करवाओ। वो जो जगह करवाया है उसमें इनवॉल्व नहीं हो रहा हूं। वो अहमदाबाद वाले बुकी का।
ये है बातचीत एजाज लकड़ावाला और मुंबई के उस बिल्डर के बीच। एजाज ने बतौर प्रोटेक्शन मनी 1 करोड़ रुपए मांगे हैं। जिसे उसने नया नाम दिया है..गुडलक। पैसा नहीं मिला को इस बिल्डर का भगवान ही मालिक है। अंजाम शायद हमसब जानते हैं।
मुंबई अंडरवर्ल्ड में इस समय कई लोग सक्रिय हैं। गैंगवार की खबरें भले कम हो गई हों लेकिन इनका आतंक कभी भी कम नहीं हुआ।
एजाज लकड़वाला वो नाम है जो कभी छोटा राजन के साथ काम करता था। फिलहाल कनाडा में हैं और वहीं से अपना गैंग ऑपरेट करता है। एजाज पर 2003 में बैंकॉक में अपने ही बॉस छोटा राजन पर हमला करवाने का आरोप है।
रवी पुजारी--छोटा राजन का पुराना साथी। बैंगलोर से अपना गिरोह चलाता है। दक्षिण कर्नाटक और मुंबई में भी रवी पुजारी गिरोह सक्रिय है।

हेमंत पुजारी- कभी राजन के साथ काम करता था। अब मुंबई के पश्चिमी उपनगरों के होटल व्यवसायी और बिल्डरों से एक्स्टॉर्शन वसूलने का काम करता है।

भारत नेपाली और संतोष शेट्टी- छोटा राजन के दो खारस गुर्गे। क्रिमिनल लायर शहीद आज़मी और नेपाल के बिदजनेसमैन जमील शाह की हत्या के बाद ये राजन के करीबी बन गए।

यूसूफ बचकाना और राजन रामानुजम एलियास कालिया राजन--फिलहाल राजन के यो दोनों गुर्गे जेल मे हैं लेकिन राजन के बेहद करीबी हैं। जेल में भी इनके लिए खास सुविधाएं देने का काम राजन का है। जेल के अंदर से ही राजन के बाकी गुर्गों की मदद का काम करते हैं।

डीके राव: छोटा राजन का खास गुर्गा। आर्थर रोड के अंडा सेल में सड़ता रहा। जेल से फिलहाल बाहर है। जेल क अंदर से ही वो राजन के लिए नेटवर्किंग का काम करता रहा।

फरीद तानाशाह: राजन का भरोसेमंद साथी। कभी इंटेलिजेंस के साथ था आजकल राजन के साथ मिलकर अंडरवर्ल्ड में सक्रिय है।
मुंबई अंडरवर्ल्ड के ये कुछ खास चेहरे हैं। दाउद के बाद इन सबका नंबर आता है। फिलहाल ये तमाम गैंगस्टर मुंबई में सेंध लगा रहे हैं। आंकड़ों पर नजर डालें तो साल 2008 में एक्सटॉर्शन के 240 मामले दर्ज किए गए। 2009 में ये आकंड़ा 296 तक पहुंच गया। 2008 में 162 अपराधियों को इसी मामले में गिरफ्तार किया गया जबकि 2009 में ये आंकड़ा 196 तक पहुंच गया।
दाउद इब्राहिम, छोटा शकील, चोटा राजन, अरुण गवली मुंबई में फिलहाल ज्यादा सक्रिय हैं। इनके अलावा गुनाह की इस दुनिया में कई और छोटे-मोटे नाम भी लगातार जुड़ रहे हैं। लेकिन मुंबई पुलिस है कि हाथ पर हाथ धरे बैठी है।

Wednesday, March 3, 2010

दांव पर ज़िंदगी...




मुंबई हमलों के दौरान मुंबई पुलिस के जांबांज अधिकारी हेमंत करकरे की मौत इसलिए हुई क्योंकि उनकी बुलेटप्रूफ जैकेट ने उन्हे धोखा दे दिया था। जिस कवच को पहनकर करकरे आतंकियों का सामना करने गए थे वो कवच लगभग नकली निकला। उसने करकरे का साथ नहीं दिया। और करकरे साहब को शहादत मिल गई। देश ने उन्हे सलाम किया। लेकिन उनके कवच की नाकामयाबी पर सवाल किसी ने नहीं उठाया। महाराष्ट्र विधानसभा में बुलेटप्रूफ जैकेट का मुद्दा जिस तरह से उठा उसी तरह कब्र में चला गया। करकरे की शहादत भी मुंबई भूल चुका है। वरना उनकी शहादत के ज़िम्मेदार अपनी किस्मत को कोस रहे होते। अधिकारी से लेकर सरकार तक हर किसी को जवाब देना पड़ता। लेकिन हम उस देश के नागरिक हैं जिसने महात्मा गांधी की शहादत को भी भुला दिया। तो फिर करकरे साहब क्या चीज हैं। लेकिन मेरा दिल रोता है। आवाज उठाना चाहता है उस शोर के खिलाफ जिसकी वजह से सच्चाई के सुर दब जाते हैं। करकरे की मौत के बाद देशभर में बुलेटप्रूफ जैकेटों को लेकर कोई हलचल शुरू हुई तो वो थी सियासी हलकों में। एक दूसरे पर उंगली उठी। लेकि हुआ कुछ भी नहीं। क्योंकि चोर-चोर मौसेरे भाई। तो फिर आरोप लगाएं किस पर ? क्या हुआ अगर एक अधिकारी बुलेटप्रूफ जैकेट होने के बाद भी मारा जाता है...क्या हुआ जो एक पत्नी का सुहाग मिट गया..तो क्या हुआ अगर इस देश ने अपना एक बहादुर लाल खो दिया...तो क्या हुआ अगर एक बेटे ने अपना पिता खो दिया.....जैकेटों की दलाली में जो पैसे आए उससे हमारा घर तो चल ही रहा है। ये लाइनें मैंने जिसके संदर्भ में लिखीं उसे आप भी समझ सकते हैं। लखनऊ में एक आलाअधिकारी ने बुलेटप्रूफ जैकेट का परीक्षण किया। साधारण राइफल से मारी गई गोली का मुकाबला भी वो जैकेट नहीं कर सकी जिसे उत्तरप्रदेश सरकार ने मान्यता दी थी।
दबा-सहमा पुलिस अधिकारी ना तो कुछ कह पाया और ना ही कुछ कर पाया। लेकिन इतना समझ गया कि फिर कहीं किसी ददुआ से मुकाबला हुआ तो जान बचाने वाली बुलेटप्रूफ जैकेट से उम्मीद ना ही किया जाए। शून्य से 30 डिग्री से भी ज्यादा नीचे के तापमान पर 24 घंटे होकर हमारे लिए अपना घरबार छोड़कर गए देश के जवानों पर भ्रष्ट अधिकारी और नेताओं को रहम नहीं आता। पाप की कमाई से घर भरने वाले इस सिस्टम से जुड़े तार अपनों का खून चूसने के लिए तैयार हैं। इन जवानों के लिए हर साल ठंड से बचने के लिए नए कपड़े बनाए जाते हैं। नए जूते भी आते हैं। लेकिन कड़कती ठंड के सामने इन तमाम जीवनरक्षक चीजों का महत्व कम हो जाता है। सवाल इनकी गुणवत्ता पर फिर उठता है। मामला सेना के किसी अधिकारी या फिर मामले से जुड़े मंत्रालय तक आता है। और फिर ढाक के तीन पात... हथियारों के मामले में भी सवाल उठता रहा है। बोफोर्स कांड इस बात का सबसे बड़ा उदाहरण है। रूस और चीन से हथियार खरीदने के हर मामले में पर्दे के पीछे कोई ना कोई कहानी जरूर रही है। बहरहाल अर्द्धसैनिक बलों के लिए खरीदे गए बुलेटप्रूफ जैकेटों को परखने में
पुराने तरीके अपनाए जाने से पूरी प्रक्रिया पर सवालिया निशान लगने के बाद गृह मंत्री पी. चिदंबरम ने बुलेटप्रूफ जैकेट की खरीददारी रद्द करने का आदेश दिया था। हाल ही में सीआरपीएफ के लिए 59 हजार बुलेटप्रूफ जैकेट खरीद के दौरान इसके चयन की जिम्मेदारी चंडीगढ़ स्थित डीआरडीओ की लैब स्पार्क रेंज को सौंपी गई थी। सूत्रों के मुताबिक, बुलेटप्रूफ जैकिट सप्लाई करने की होड़ में नौ कंपनियां शामिल हैं। 26/11 के मुंबई हमलों के दौरान एटीएस प्रमुख करकरे की बुलेटप्रूफ जैकेट पहनने के बावजूद आतंकवादी की गोली लगने से मौत के बाद चिदंबरम ने जैकेटों को दोबारा टेस्ट करने के आदेश दिए थे। लेकिन रक्षा सूत्रों का कहना है कि परीक्षण में वे ही तकनीकी अधिकारी शामिल हैं जिन्हें पहले दौर के परीक्षण में जिम्मेदारी दी गई थी। आरोप है कि कुछ खास कंपनियों के बुलेटप्रूफ जैकेट को बेहतर सिद्ध करने के लिए दूसरी कंपनियों के बुलेटप्रूफ जैकेट को पहले अत्यधिक तापमान दिखाने के बाद उस पर बुलेट चला कर टेस्ट किया जा रहा है। इस वजह से कुछ जैकेट कसौटी पर खरे नहीं उतर पा रहे हैं। बुलेटप्रूफ जैकेट पहनने वाले जवानों का जीवन इसकी मजबूती पर टिका होता है। इसलिए इसके चुनाव में अधिकारियों को पूरी पारदर्शिता बरतनी चाहिए। सूत्रों का कहना है कि परीक्षण के दौरान सभी कंपनियों के प्रतिनिधियों और रक्षा विशेषज्ञों की मौजूदगी में ये परीक्षण होने चाहिए ताकि जवानों को श्रेष्ठ उपलब्ध बुलेटप्रूफ जैकेट मुहैया हो सके। देश के विभिन्न हिस्सों में आतंकवाद से लड़ रहे थलसेना के जवानों के लिए भी भारी संख्या में मौजूदा जैकेटों से मजबूत और हल्के बुलेटप्रूफ जैकेट खरीदने की प्रक्रिया शुरू होगी। यदि डीआरडीओ ने किसी घटिया बुलेटप्रूफ जैकेट को मंजूरी दे दी तो इसे भविष्य में भी ऑर्डर मिलते रहेंगे जिससे जवानों को जिंदगी खतरे में पड़ सकती है। यानि फिर किसी करकरे की ज़िंदगी दांव पर लग सकती है...

अब तारीख पर तारीख नहीं !




मोहन सिंह आज बड़ा खुश लगा रहा है। जिला कचहरी में चल रहा उसका बरसों पुराना केस आज वो जीत गया। अदालत में वकील साहब को उसने मिठाई खिलाई। वकील साहब के घर भी गया था। बड़े साहब उमाकांत को भी उसने मिठाई खिलाई। आखिरकार जमीन के कागजात लेकर वो अपने घर पर गया। लालजी की फोटो के आगे उसने कागज रखा और उन्ह प्रणाम किया। मोहन सिंह की मां और पत्नी आज बड़े खुश थे। मोहन सिंह की मां की आंखों से आंसू निकले। वो भी लालाजी की फोटो के आगे जाकर रोने लगी। उसके मुंह से निकला, अगर आप आज ज़िंदा होते तो इस जीत का मजा ही कुछ और होता। अब जाकर मेरी समझ में आया कि लालाली मोहन सिंह के पिता हैं। और जो केस मोहन 20 बरस की उम्र में जीता है उसकी शुरूआत तब हुई थी जब उसके पिताता यानि लालाजी 20 बरस के थे। 55 की उम्र में उनका निधन हो गया। तब मोहन की उम्र केवल 15 साल थी। लालजी की मौत के साथ ही उनके वकील उमाकांत भी रिटायर की उम्र तक पहुंच गए थे। इसलिए केस की ज़िम्मेदारी नई पीढ़ी की हाथ चली गई थी। अदालत में चक्कर पे चक्कर और तारीख पर तारीख लेने के बाद 30 साल का इंतजार ही था जिसकी बदौलत उन्हे 1 बीघा जमीन के केस में जीत मिली। उस एक बीघा जमीन के लिए लालाजी और मोहन सिंह ने 2 लाख रुपए से ज्यादा खर्च कर दिए। आज पचा चला कि उस जमीन की कीमत 50 हजार से भी ज्यादा नहीं है। ये भूमिका इसलिए दी ताकि अदालत से आपको रूबरू कर सकूं। इतना मैं भी जानता हूं कि अदालती प्रक्रिया के बारे में आपने भी बचपन से ही सुना होगा कि कोर्ट कचहरी के चक्कर में ना ही पड़ो तो अच्छा है। मैं भी ज्यादा नहीं कहुंगा क्योंकि जेल की दीवारें मुझे अच्छी नहीं लगतीं। बहरहाल अदालतों की कार्रवाई में पीढ़ियां ना बदलें इसलिए सरकार ने हाल ही में आनन-फानन में जजों की नियुक्ति की। लेकिन ढाक के तीन पात रहा सबकुछ। लेकिन एक बार ऊंट ने फिर करवट ली है। हायर जुडिशल सर्विसेज़ में जवाबदेही और मानक स्थापित करने के लिए प्रस्तावित नए कानून के तहत जजों को किसी मामले में बहस पूरी होने के बाद तीन महीने के अंदर अपना फैसला सुनाना होगा। कानून मंत्रालय के प्रस्तावित जुडिशल स्टैंडर्ड ऐंड अकाउंटेबिलिटी बिल 2010 का उद्देश्य न्यायिक सेवाओं में मानक स्थापित करना और ऐसी प्रणाली बनाना है जिससे सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट के जजों के खिलाफ दुर्व्यवहार और अयोज्ञता की शिकायतों को दूर किया जा सके। इस विधेयक में जजों की संपत्ति और दायित्वों की घोषणा का भी प्रावधान किया गया है। केंद्रीय मंत्रिमंडल की स्वीकृति के बाद इस विधेयक को वर्तमान बजट सत्र के दौरान इसे संसद के समक्ष पेश किए जाने की संभावना है। प्रस्तावित कानून में कहा गया है कि बहस पूरी होने के तीन महीने की समय सीमा के अंदर जज को अपना फैसला देना होगा। विधेयक के मसौदे में कहा गया है कि उच्च न्यायिक सेवाओं के सदस्यों को अपने न्यायिक कार्य के दौरान निष्पक्ष रहना चाहिए या उनके द्वारा दिए गए निर्णय धर्म, नस्ल, जाति, लिंग या जन्म स्थान से प्रभावित नहीं होने चाहिए। विधेयक के अन्य दिशा निर्देशों में कहा गया है कि जज चुनाव नहीं लड़ सकते, वे किसी क्लब या संगठन के सदस्य नहीं हो सकते, बार कांउसिल के किसी सदस्य के साथ घनिष्ठता नहीं बढ़ा सकते, अपने संबंधियों के अलावा और किसी से उपहार या मेहमाननवाजी नहीं स्वीकार कर सकते और उन कंपनियों के मामलों की सुनवाई नहीं कर सकते जिनके शेयर उनके पास हैं। प्रस्तावित कानून में कहा गया है कि जज को अपने किसी निर्णय के संबंध में मीडिया को इंटरव्यू नहीं देना चाहिए। इसके अलावा जजों को राजनीतिक मसलों पर किसी सार्वजनिक बहस में भाग नहीं लेना चाहिए। जजों द्वारा न्यायिक मानकों को गिराने वाले किसी भी कदम के लिए उनके खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई की जाएगी। जजों के विरूद्ध दुर्व्यवहार या भ्रष्टाचार की शिकायत को तीन जजों की जांच समिति के समक्ष पेश किया जाएगा। जांच समिति यदि जज के खिलाफ किसी शिकायत को वाजिब पाती है तो उसे न्यायिक निगरानी समिति के पास भेजा जाएगा। यह समिति मामले की जांच कर जांच रिपोर्ट को राष्ट्रपति के पास उक्त जज के खिलाफ कार्रवाई के लिए भेजेगी। राज्यसभा के सभापति के रूप में उप राष्ट्रपति न्यायिक निगरानी समिति की संभवत: अध्यक्षता करेंगे। इस समिति के अन्य सदस्यों में भारत के चीफ जस्टिस, सीजेआई द्वारा नामांकित हाई कोर्ट के एक चीफ जस्टिस और राष्ट्रपति द्वारा नियुक्त किए गए दो नामचीन कानून के जानकार शामिल होंगे। भारत के सभी 21 हाई कोर्ट्स में एक-एक जांच समिति का गठन किया जाएगा। विधेयक के मुताबिक जज के दुर्व्यवहार के अनुसार उसे चेतावनी, फटकार या प्रतिबंध की सजा दी जा सकती है। लेकिन यदि न्यायिक मानकों के उल्लंघन की प्रकृति गंभीर है तो उसके खिलाफ महाभियोग लगाया जा सकेगा। इस विधेयक के बाद अदालत में तारीखों के दान पर रोक लगेगा या नहीं इसके लिए हमें विधेयक के लागू होने तक का इंतजार करना पड़ेगा।

Saturday, February 27, 2010

ना ईश्वर कहो ना अल्लाह...



चंदन काका के साइकिल रिक्शे पर स्कूल जाते थे। मास्टर जी कक्षा लेने से पहले प्रार्थना करवाते थे। मास्टर जी के अस्पष्ट शब्दों को हम अपने सुर में दोहराने की कोशिश करते थे। पंक्तियां कुछ ऐसी थीं...ईश्वर अल्लाह तेरो नाम, सबको सम्मति दे भगवान बचपन के मन ने मास्टर से जी इन पंक्तियों का मतलब पूछा तो उनका जवाब समझने के लिए मष्तिष्क के साथ जूझना पड़ा। लेकिन घर जाकर दादी मां से इसका अर्थ समझ में आया। दादी कभी स्कूल नहीं गई लेकिन इतना जरूर पढ़ा सकती थी कि हिंदू और मुसलमान दोनों की भगवान की बनाई हुई देन है। लेकिन जैसे ही दूसरे गांव का किसान अनाज के पैसे देने आया तो उसे चाय मिट्टी के बर्तन में दी गई। जबकि वही चाय हम कप में पी रहे थे। माजरा समझने के लिए मुझे सवाल पूछना ही था। जिस दादी ने कुछ देर पहले मुझे हिंदू-मुस्लिम एकता का ज्ञान दिया था थोड़ी ही देर में मैंने उसे ईश्वर की देन का अपमान करते हुए देखा। पता चला वो किसान मुसलमान है इसलिए उसे मिट्टी के बर्तन में चाय दी गई। उसकी गरीबी भी उसकी हालत की एक वजह थी। पिता जी मास्टर हैं। दूसरे बच्चों को पढ़ाते हैं। मेरी किताब में एक अध्याय फिर आया। मैंने पढ़ा भेदभाव नहीं करना चाहिए। मन में शंकाओं का कुतूहल उठा। पिताजी ने समझाया कि हम सब एक हैं इसलिए जात-पात के नाम पर भेदभाव नहीं करना चाहिए। मैंने इस पंक्ति को अपने मन में घर कर लिया। इस एकता की मिसाल बनाने के लिए मैं रामअधारे के बेटे के साथ खेलने गया। लेकिन घर आते ही पिताजी के हाथ में बेहये का डंडा मेरे इंतजार में था। मार तो पड़ी ही साथ में कड़कती ठंड में मुझे नहलाय़ा भी गया। जाहिर है आगे से मुझे रामअधारे के टोले के किसी भी बच्चे के साथ खेलने या बातचीत करने से मना कर दिया गया। तब मैंने इंसानी प्रवृत्ति का एक और उदाहरण देखा। मन ही मन सोच लिया कि जब मैं बड़ा होउंगा तब इन कुरीतियों के खिलाफ लड़ुंगा। क्योंकि अभी घर में बगावत करने पर सज़ा का हकदार हो जाउंगा इतनी समझ मुझमें थी। आज मैं बड़ा हो गया हूं। अच्छे-बुरे की समझ है। इंसान को चांद पर पहुंचे ज़माना हो चुका है। मंगल पर इंसानों की बस्ती बसने वाली है। इंसानों का क्लोन भी पुरानी बात हो गई है। लेकिन बचपन की कुछ बातें आज भी नहीं बदली हैं। धर्म और मजहब के नाम पर लड़ाई हो जातिवाद, इंसानों की बस्ती में ये आज भी उतने ही मजबूत हैं जितने कल थे। उदाहरण लीजिए मलेशिया का। लेखक मधुसूदन आनंद लिखते हैं अल्लाह या ईश्वर का शुक्र मनाइए कि आपका जन्म न तो मलयेशिया में हुआ और न ही आप वहाँ रहते हैं। अगर आप मुसलमान नहीं होते और गलती से भी अपने ईश्वर को अल्लाह के नाम से पुकारते तो आपकी खैर नहीं थी। कोई भी हिन्दू, सिख, ईसाई, जैन या अन्य गैरमुस्लिम आदमी किसी भी गैर इस्लामी संदर्भ और विमर्श में ईश्वर के लिए यदि अल्लाह शब्द लिखता या बोलता है तो उसे एक साल तक की सजा हो सकती है। मलयेशिया में 7 प्रतिशत आबादी भारतीय मूल के लोगों की है और वहाँ हिन्दू और सिख धर्मावलंबियों की अच्छी-खासी संख्या है। मलयेशिया में जो भाषाएँ बोली जाती हैं, उनमें चीनी, थाई और अँगरेजी भाषा के साथ-साथ पंजाबी का भी नाम आता है। बहुधर्मी और बहुभाषी समाज में भाषाएँ एक-दूसरे को प्रभावित करती हैं। जैसे हमारे यहाँ ईश्वर को रब, अल्लाह, ईश्वर, खुदा, राम, रहीम, गॉड आदि किसी भी नाम से पुकारा जा सकता है, वैसे ही पश्चिमी देशों में ही नहीं अरब देशों तक में चलन है। जो समाज अनीश्वरवादी रहे हैं, वहाँ भी इस तरह की कोई बंदिश नहीं है। लेकिन मलयेशिया में ईश्वर को या गॉड को या रब को अल्लाह कहने की मनाही है। मलयेशिया से ज्यादा मुसलमान पड़ोसी देश इंडोनेशिया में रहते हैं, लेकिन वहाँ किसी भी धर्म का आदमी अपने ईश्वर को अल्लाह के नाम से पुकार सकता है। और तो और मलयेशिया के बोर्नियो में रहने वाले ईसाई लोग अपने गॉड को अल्लाह के नाम से पुकार सकते हैं लेकिन मलयेशिया की मुख्यभूमि पर इसकी मनाही है। यही नहीं 'फतवा', 'इमाम', 'हाजी', 'शेख', 'मुफ्ती' और 'अल्लाह-ओ-अकबर' जैसे शब्द भी कोई गैर मुस्लिम लिख या बोल नहीं सकता। सब जानते हैं कि ईसाई और सिख धर्म में अल्लाह शब्द का ईश्वर के अर्थ में इस्तेमाल होता है। संत, कवियों और सूफियों ने यही सिखाया है कि ईश्वर एक है और उसे किसी भी नाम से पुकारा जा सकता है। गाँधीजी का तो भजन है : 'ईश्वर अल्लाह तेरे नाम, सबको सम्मति दे भगवान' इसलिए हम भारतीयों को जब यह पता चलता है कि मलयेशिया में हम ईश्वर को अल्लाह नहीं कह सकते तो हमें गहरा झटका लगता है। लेकिन मलयेशिया सरकार के अपने तर्क और कारण हैं। उसने इस तरह की बंदिशें इस डर से लगाई थीं ताकि दूसरे धर्मों के लोग और विशेषकर क्रिश्चियन लोग मुसलमानों का धर्म परिवर्तन न करा लें। अल्लाह और अन्य शब्दों को लेकर विवाद वर्षों पुराना है। 1980 के दशक में करीब दो दर्जन ऐसे शब्दों की सूची बनाकर सरकार ने हुक्मनामा जारी कर दिया था। है ईश्वर आखिरये कब तक चलता रहेगा।

Thursday, February 25, 2010

देखो होली आई रे...




चारों ओर रंग ही रंग हैं। जहां जाओ रंग भरे गुब्बारे आपका इंतजार कर रहे हैं। आप आगे बढ़े नहीं कि एक गुब्बारा हवाओं के साथ मुकाबला करता हुआ आप पर हमला कर देगा। आपके कपड़ों पर गुब्बारा अपना सारा गुबार निकाल देगा। गुब्बारे की रफ्तार लंका जाते समय हनुमान की रफ्तार से कम नहीं होगी। आपके कपड़ों का रंग खून से लथपथ सिपाही की तरह होगा और हालत भीगी हुई बिल्ली की तरह। अब होली रंगो से होती है, लेकिन होली के भी कई रंग हैं। मसलन आप गोरखपुर के किसी गांव में जाइए। दोपहर के 1 बजे के पहले पहुंचे तो स्वागत कीचड़ से होगा और देर से गए तो गंदे रंगों से साथ आपका शाही स्वागत हो सकता है। शहर की ओर आते हैं। दिल्ली या मुंबई में, होली के दो हफ्ते पहले से ही माहौल बना लिया जाता है। फटे-पिचके गुब्बारे दुकानों के कोनों से बाहर की सज्जा बन जाते हैं। फिर कुछ ही देर में गली के बदमाश लेकिन मां की नज़रों में लाल के हाथों में चले आते हैं। मां के काले-काले और गोरे-गोरे लाल उन गुब्बारों का सही इस्तेमाल राहगीरों पर करते हैं। उनका कलर कॉंबिनेशन भी गजब का होता। सफेद रंग की शर्ट पहने लोगों पर लाल रंग से भरे गुब्बारे से हमला किया जाता है। किसी ने हरे रंग के कपड़े पहने हैं तो उस पर नीले रंग का गुब्बारा फोड़ दिया जाता है। गलती से जवानी की दहलीज पर कदम रखती कोई कन्या रास्ते से गुजरी तो उस पर गुब्बारों का ऐसा हमला होता है जैसे किसानों के खेत में टिड्डियों ने हमला बोल दिया हो। लड़की की हालत हमले के बाद किसान जैसी हो जाती है। पलट कर इन शरारती लेकिन मां के प्यारे-प्य़ारे बच्चों को देखने की कोशिश करेंगे तो ये ऐसे अदृश्य होंगे जैसे हवा में ऑक्सीजन। रास्ता लेकर बनारस की ओर भी चलते हैं। य़हां होली का रंग कुछ खास होता है। पंचायत वाली पेड़ के नीचे 4-5 मोटे-मोटे लोग बाल्टी में हरे रंग का खुशबू भरा शरबत बनाते नज़र आएंगे। इस शरबत में दूध की भी एक खास भूमिका होती है। भोले बाबा की नगरी में ये अनोखा शरबत पीजिए और चले जाइए एक अनोखी दुनिया में जहां संसारिक और भौतिक चीजों से मोह भंग हो जाता है। प्रसाद की ताकत आपको सूर्यकिरणों की प्रबलता के साथ नज़र आने लगेगा। बनारस से मन ऊब चुका हो तो वृंदावन आ जाइए। कान्हा की नगरी में गोपियों की होली सबसे मजेदार होती है। बरसाने की लठ्ठमार होली आपने सुनी है। अब इसके रंग का जायका लीजिए। कुछ सुंदर तो कुछ प्राकृतिक रूप से असुंदर महिलाएं ताकत लगाकर या फिर प्यार से बरसाने के पुरुषों पर लाठी से प्रहार करती हैं। कोशिश रहती है कि ना लगे लेकिन अगर किसी पुरुष का चेहरा पहचान लिया जाए मसलन इसी ने किसी समय राह चलते छेड़खानी की थी तो लाठी का निशाना चूक सकता है। फिर होली और खून का रंग एक में मिल जाता है। होली नजदीक आते ही बरसाना में फूलों की होली भी खेली जाती है। अब भला फूलों से मार कौन नहीं खाना चाहता है। लेकिन धूल भरी होली से बचना हर कोई चाहता है। बरसानो में इसे फाग कहा जाता है। इस होली में आसमान धूल से भर जाता है। चारों ओर प्राकृतिक सुंदरता का रंग धूलमय हो जाता है। होली हमारे अगुवा भी खेलते हैं। अगुवा से मेरा मतलब है हमारे वो भाई जो कुछ दिनों पहले हमारे आगे हाथ जोड़कर आए थे। लेकिन हमारे हाथ जोड़ने पर भी हमारे पास नहीं आते। आम भाषा में इन्हे नेता शब्द से संबोधित किया जाता है। हां आपस में ये होली जरूर खेलते हैं। होली के रंगों में इनकी नीतियों का भी मिलन होता है। साथ ही एक दूसरे पर गुलाल लगाकर पांच साल बाद की मित्रता को घनिष्ठ करने की कवायद की जाती है। फिर चाहे दिल मिलें या मिलें, विचार मिलें या ना मिलें, गले जरूर मिलेंगे। इसे दिखावा कहकर इनके नाटक का अपमान हम नहीं करेंगे। लेकिन एक होली इससे भी खास है। ये होली आप देख तो नहीं सकते लेकिन इसके बारे में जान जरूर सकते हैं। कश्मीर घाटी में भी होली खेली जाती है। खाकी रंग पहने, कंधे पर BSF का तमगा लगाए हमारे जवान घाटियों और हिमालय़ की चोटियों पर होली खेलते हैं। यहां लाल रंग ज्यादा प्रचलित है। गुब्बारों की जगह गोलियां चलाई जाती हैं। होली में दिवाली का रंग भी दिखता है। चाहे इस पार से या उस पार से, तोप से निकले गोले धमाका करते हैं। इस होली में जब भी बर्फ पर लाल चादर बिछती है, कहीं ना कहीं मातम ज़रूर होता है फिर चाहे इस पार हो या उस पार हो। लेकिन यहां हम ये नहीं कहतेस, बुरा ना मानो होली है....

'लेक्चर मत दो'




पाकिस्तान क्या चाहता है ? भारत के साथ सारी दुनिया इस सवाल पर सर पटककर मर जाए लेकिन जवाब नहीं मिल सकता। आखिर ये जवाब इतना मुश्किल क्यों है ? जवाब भी हम जानते हैं। पाकिस्तान के हर बार बदले रंग को देखरक उसके मानसिक मिजाज का पता नहीं चल पा रहा है। कश्मीर को लेकर उसकी मांग को हम जानते हैं। आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई को लेकर दिया गया उसका बयान भी हम सुन चुके हैं। विदेश सचिव निरुपमा राव से बात करने आए पाकिस्तान के विदेश सचिव सलमान बशीर ने कहा कि आतंकवाद क्या होता है, हमें पता है इसलिए इस पर हमें लेक्चर न दिया जाए। उन्होंने कहा कि वार्ता को 26/11 अटैक से जोड़ना मुनासिब नहीं होगा। भारत को विवाद के मुख्य मुद्दे जम्मू-कश्मीर पर बात करनी चाहिए ताकि दक्षिण एशिया में शांति बहाल हो सके। पाकिस्तान को आतंकवाद की धुरी बताकर भारत बदनाम करता रहा है जबकि सचाई यह है कि पूरे इलाके में आतंकवादी समूह हैं और इनके स्लीपर सेल हैं। बशीर ने भारतीय वार्ताकारों को यह मेसेज भी देने की कोशिश की कि प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह दक्षिण एशिया में अमन का माहौल चाहते हैं, उनके अजेंडा को विदेश मंत्रालय के अधिकारी आगे बढ़ाएं। बशीर ने कहा कि हम आतंकवाद पर भारत के साथ सहयोग को तैयार हैं। हम चाहेंगे कि दोनों देश खुफिया जानकारियों का आदान प्रदान करें। उन्होंने दावा किया कि मैं खुद इस्लामाबाद में भारतीय उच्चायुक्त को आतंकवादी घटनाओं की गोपनीय जानकारियां देता रहा हूं। लेकिन क्या उन्होंने डेविड हेडली के बारे में भारत को जानकारी दी है, बशीर ने कहा कि गुरुवार को हुई वार्ता में पहली बार भारत की ओर से हेडली के बारे में पूछा गया है। मिस्टर हेडली अमेरिकी नागरिक हैं और मैं उनके बारे में मीडिया से ही जानता हूं। निरुपमा राव ने बशीर से कहा कि भारत ने पाकिस्तान से बातचीत के लिए गंभीर और सार्थक कदम उठाए हैं लेकिन आतंकवादी हरकतों से ये सब निरर्थक साबित हुए। वास्तव में 2004 से 2007 के दौरान जो भी विश्वास बहाल हुआ था, मुंबई हमले ने उसे खत्म कर दिया। हाल में पुणे में जो हमला हुआ, उसने एक बार फिर हमें याद दिलाया कि हमारे लोग अब भी आतंकवादी हमलों के शिकार हो रहे हैं। निरुपमा ने बशीर से कहा कि आतंकवाद से कोई बात नहीं बनती। पाकिस्तान की यह ड्यूटी बनती है कि वह अपनी धरती से आतंकवादी गुटों का सफाया करे और मुंबई हमले के दोषियों को सजा दे। पाकिस्तान में अब भी लश्कर और हिजबुल मुजाहिदीन जैसे संगठन सक्रिय हैं। वहां से भारत में हिंसा फैलाने की बातें होती हैं। पाकिस्तान इस पर रोक लगाए। बशीर को ध्यान दिलाया गया कि इन नेताओं ने हाल ही में किस तरह हिंसा भड़काने की बातें की हैं, इस पर बशीर ने कहा कि ऐसे सार्वजनिक भाषणों पर रोक लगाने का कानून हमारे यहां नहीं है। निरुपमा ने कहा कि दोनों देशों के बीच बातचीत आतंकवाद से मुक्त माहौल में ही हो सकती है। यदि पिछली वार्ताओं को आगे बढ़ाने की बात की जाती है तो जरूरी है कि आतंकवाद पर लगाम लगाने की कोशिश की जाए। इन बयानों कितना सच है और कितना झूठ ये बताने का ज़रूरत शायद नहीं है।

Tuesday, February 23, 2010

दीदी की रेल...पास या फेल ?




24 फरवरी जैसे-जैसे नजदीक आ रही है वैसे-वैसे दिल की धड़कने तेज हो रही हैं। सांसें अटकी हैं। डर लग रहा है कहीं नई दिल्ली रेलवे स्टेशन पर पटना जाने वाली उसी ट्रेन की सेकेंड क्लास टिकट खरीदने के लिए जेब से ज्यादा पैसे तो खर्च नहीं करने पड़ेंगे। मामा के घर कानपुर जाने से पहले 10 बार सोचने की नौबत तो नहीं आएगी। बड़े चाचा गोरखपुर में रहते हैं। कहीं उनके बुलावे पर बहाना तो नहीं बनाना पड़ेगा। जी हां रेल बजट आने वाला है। एक साल से घर का बजट आर्थिक मंदी ने बिगाड़ा है। घर के कुछ बर्तन संभाल के इकठ्ठा किए तो महंगाई ने उसे तितर-बितर कर दिया। शहर में रहने वालों को गांव के अनाज का सहारा था। लेकिन डर है कि कहीं रेलवे का बजट बिगड़ गया तो गांव जाने का हालत भी नहीं रहेगी। लालू यादव का रेलवे बजट लंदन के मैनेजमेंट वालों को भी भाया। लेकिन ममता बनर्जी का पिछला रेल बज़ट कुछ खास नहीं रहा भले ही
पिछले साल जुलाई में रेल मंत्री की अपनी दूसरी पारी के पहले बजट में ममता ने यात्री किराये और माल भाड़े में किसी तरह की बढ़ोतरी नहीं की थी। रेलवे के साथ दुखद यह है कि इससे पिछले साल रेल मंत्री लालू प्रसाद ने भी चुनावी साल की वजह से किरायों में बढ़ोतरी नहीं की थी। इसका नतीजा यह हुआ कि पिछले 2 साल से रेलवे के किराये बढ़ोतरी से हासिल होने वाले अडिशनल रेवेन्यू में किसी तरह का इजाफा नहीं हो पाया है। पिछले 2 साल में रेलवे से माल की आवाजाही और पैसेंजर्स ट्रैफिक में काफी बढ़ोतरी हुई है, पर 9 परसेंट की ऊंची महंगाई दर की वजह से इस अतिरिक्त मुनाफे का कुछ खास असर नहीं दिख पाया है। दिलचस्प ये है कि लालू प्रसाद या ममता बनर्जी को किसी ने आम आदमी पर 'मेहरबानी' दिखाने, धड़ल्ले से नई योजनाएं शुरू करने, अपने-अपने चुनावी क्षेत्रों में नई ट्रेनों की संख्या या फ्रीक्वेंसी बढ़ाने से जुड़े कदम उठाने से किसी ने रोका भी नहीं। ऐसे हालत में जाहिर है कि इस बार जब रेल बजट पेश किया जाएगा तो रेल मंत्री को कई तरह की चुनौतियों से दो-चार होना होगा।
पैसेंजर किराया और माल भाड़ा
रेलवे रोजाना 20 लाख टन माल और 1 करोड़ 80 लाख पैसेंजर्स ढोता है। रेलवे के रेवेन्यू का 70 परसेंट हिस्सा माल भाड़े और बाकी 30 परसेंट पैसेंजर्स किराये से आता है। 2009-10 के लिए पैसेंजर किराये से होने वाली आमदनी 25 हजार करोड़ रुपये रहने के आसार हैं, जो 2008-09 में 22 हजार 330 करोड़ रुपये थी। पर मौजूदा चलन को देखते हुए ममता बनर्जी शायद ही पैसेंजर्स किराये में कोई बढ़ोतरी करें। ऐसे में रेलवे का रेवेन्यू बढ़ाने के लिए रेल मंत्री के पास माले भाड़े में थोड़ी बढ़ोतरी करनी होगी। साल 2007-08 में रेलवे ने 794.21 मिलियन टन माल ढोया। उसके अगले साल यानी 2008-09 में इसमें करीब 7 परसेंट की बढ़ोतरी हुई और यह 850 मिलियन टन हो गया। कारोबारी साल 2009-10 में इसके 882 मिलियन टन का टारगेट रखा गया है। 2009-10 के लिए माल भाड़े से होने वाली आमदनी का लक्ष्य 59 हजार 59 करोड़ रुपये रखा गया है, जो 2008-09 में 54 हजार 293 करोड़ रुपये था। पिछले साल (2009-10) इकॉनमी के मंदी की गिरफ्त में होने की वजह से माल भाड़े में बढ़ोतरी नहीं की गई। पर इस बार हालात सुधरे हैं और माल भाड़े में बढ़ोतरी की जानी चाहिए। रेलवे के जरिये लौह अयस्क, कोयले और सीमेंट की आवाजाही बड़े पैमाने पर होती है। इनके लिए भाड़ा बढ़ाकर रेल मंत्री रेलवे का बटुआ कुछ भर सकती हैं। पर खाने के सामान, फर्टिलाइजर जैसी चीजों की बड़े पैमाने पर आवाजाही होने के बावजूद इनके भाड़े में बढ़ोतरी करना शायद ममता के लिए मुश्किल हो, क्योंकि वह अपने वोट बैंक को नाराज नहीं करना चाहेंगी।

रेलवे ट्रैक पर दबाव
ट्रैक रेलवे ट्रांसपोर्टेशन की रीढ़ हैं। लिहाजा इनकी मेंटिनेंस बेहद जरूरी है। कोई भी ट्रैक 700-800 ग्रॉस मिलियन टन (जीएमटी) ढुलाई के बाद मरम्मत मांगता है। पर ऐसा हो नहीं पा रहा है। जाहिर है इस बार रेल बजट में में नई ट्रेनों का ऐलान होगा और ट्रैक्स पर बोझ और बढ़ेगा। इसे डील करने की चुनौती ममता के सामने होगी।

प्राइवेट इनवेस्टमेंट पर निर्भरता
अब तक खांटी राजनीति करती रहीं और बिजनस सेंटिमेंट से काफी दूर रहीं ममता बनर्जी को लगता है यह समझ में आ गया है कि रेलवे के लिए फंड का इंतजाम पब्लिक-प्राइवेट पार्टनरशिप के जरिये किया जा सकता है। ऐसा माना जा रहा है कि इसी वजह से ममता ने कुछ बिजनस-फ्रेंडली चेहरों को अपने इर्दगिर्द रखना शुरू कर दिया है। इन्हीं में से एक अहम चेहरे हैं - फिक्की के सेक्रेटरी जनरल अमित मित्रा। रेलवे बोर्ड के एक अधिकारी ने बताया है कि साल 2020 तक रेलवे में करीब 14 लाख करोड़ रुपये के निवेश की दरकार होगी और रेलवे इसका करीब 64 परसेंट हिस्सा खुद जुटाएगा, जिसमें पीपीपी की बड़ी भूमिका होगी। पर बड़ी दिक्कत यह है कि लालफीताशाही की दिक्कतों को देखते हुए कॉरपोरेट सेक्टर अच्छी दिलचस्पी रेलवे में नहीं दिख रही।

लोडिंग की समस्या
रेलवे ने 11वीं योजना के अंत तक (31 मार्च 2012 तक) 1150 मिलियन टन फ्रेड वॉल्यूम का लक्ष्य रखा है। फ्रेड में 7 परसेंट की बढ़ोतरी को देखने हुए वैगन की कमी की चुनौती रेलवे के सामने होगी।
तो देखिए भैया 24 तारीख को क्या होता। मीठा खाएंगे या दांत चबाएंगे अब ये दीदी पर निर्भर है।