


मैं क्रांतिकारी नहीं हूं, और ना ही मैां हिंसा में विश्वाश करता हूं। देश का हर ज़िम्मेदार नागरिक मेरी ही तरह सोचता है। लेकिन 4 जून की रात को रामलीला मैदान में जो कुछ भी उसे देखकर अगर कोई उग्र हो जाए तो दोष आप किसे देंगे। भद्रजनों के मन में पहले ही व्यवस्था के खिलाफ रोष था। लेकिन अब ये क्रोध अपनी सारी सीमाएं लांघ चुका है। आम आदमी का गुस्सा अब सत्ता और व्यवस्था दोनों में परवर्तन चाहता है। और हो भी क्यों ना, जिन सत्ता आरूढ़ हमारे अगुवाइयों की ज़िम्मेदारी है समाज की व्यवस्था को हमारे अनुकूल बनाना और समाज का सही ताना-बाना बुनना। लेकिन जिस दिन सत्ता अपनी व्यवस्था की जिम्मेदारी से दूर हो जाएगा...परिवर्तन की मांग ज़रूर उठेगी। दिल्ली के रामलीला मैदान में हजारों की भीड़ सत्ता बदलने के लिए नहीं आई थी। लोगों का सैलाब मात्र व्यवस्था को अपने अनुकूल बनाने की मांग कर रहा था। जिसकी मांग करने का अधिकार देश का संविधान हमें देता है। लेकिन सत्ता का एक रूप ऐसा भी सामने आता है जो हमारे अधिकारों का दमन कर देता है। देश के 120 करोड़ लोगों की गाढ़ी मेहनत की कमाई देश के बाहर जमा हो रही है। ये पैसा कितना है अब ये बताने की ज़रूरत नहीं है। सारा देश जानता है कि जिस दिन ये पैसा देश में आ गया भारत की किस्मत बदल जाएगी। रामदेव के साथ खड़ा जनसैलाब उसी पैसे का भारत लाने की मांग कर था। 13 अप्रैल 1919 को भारत की ब्रिटिश सरकार ने रॉलेट एक्ट का शांतिपूर्वक विरोध करने पर जननेता पहले ही गिरफ्तार कर लिए थे। इस गिरफ्तारी की निंदा करने और पहले हुए गोली कांड की भर्त्सना करने के लिए जलियांवाला बाग़ में शांतिपूर्वक एक सभा आयोजित की गयी थी। दिन के तीसरे पहर दस हज़ार से भी ज़्यादा निहत्थे स्त्री, पुरुष और बच्चे जनसभा करने पर प्रतिबंध होने के बावजूद अमृतसर के जलियांवाला बाग़ में विरोध सभा के लिए एकत्र हुए। उसके बाद क्या हुआ इतिहास उसका गवाह है। 4 जून की रात दिल्ली के रामलीला मैदान में जो कुछ भी हुआ उसने जलियांवाला बाग हत्याकांड की तस्वीरें एक बार फिर सामने ला दीं। नई पीढ़ी ने उस हत्याकांड के बारे में पढ़ा होगा लेकिन 4 जून 2011 को जो कुछ भी हुआ अब हम उसके गवाह हैं। यहां नरसंहार नहीं हुआ लेकिन गहरी नींद में सो रही जनता को लाठी-डंडों से पीटा गया। गोलियां नहीं चलीं लेकिन आंसू गैस के गोले दागे गए। निहत्थों को मौत के घाट नहीं उतारा गया लेकिन जबरन घसीटा गया। क्या पुरुष, क्या महिला और क्या बच्चे....सत्ता का आतंक का शिकार हर कोई हुआ। ये देखकर रूह थरथरा गई कि पिटने वाले भी अपने थे और पीटने वाले भी। लेकिन आदेश किस जनरल डायर का था इसका जवाब शायद हमें कभी नहीं मिलेगा। कानून तोड़ना अपराध है। बाबा रामदेव ने अनशन के लिए इजाजत नहीं ली थी। और इस अपराध के लिए उनके और उनके समर्थकों पर बल प्रयोग किया गया। लेकिन देश के साथ गद्दारी करने वाले और सारे नियम-कानून तोड़कर अपनी इच्छा से कानून को धराशायी करने वालों पर बल प्रयोग करने की मंशा तक दिखाई नहीं पड़ती। ए.राजा और सुरेश कलमाड़ी जेल में भी हंसते दिखाई देते हैं। मानों हमपर हास्य कर रहे हों कि हमारा कोई कुछ भी नहीं बिगाड़ सकता है। हमारे पास उस हास्य को स्वीकार करने के अलावा और कोई चारा नहीं बचता। हम उस दिन को को कोसते हैं जिस दिन उन्हे अपना कीमती मत देकर अपने सिर पर बिठाया। ये सरकार दम चाहे जितना भी भरे लेकिन आज तक कोई भी ठोस कदम कभी नहीं उठाया गया। हमारे आगे हाथ जोड़ने वाले हमें ही अपने पैरों से रौंद रहे हैं। क्या संविधान ने इन्हे ये अधिकार दिया है। देश के साथ धोखा, देशवासियों के साथ धोखा ना जाने कितना धोखा ये सरकार करेगी। हम धन्यवाद करते हैं सुप्रीम कोर्ट का जिसने देश के नागरिकों ये भरोसा दिलाया है कि कानून से बढकर कोई नहीं। तो क्या अब फिर से सुप्रीम कोर्ट को ही पहल करनी होगी इस सत्ता और व्यवस्था को बदलने के लिए।