


कुछ ही महीनों में देश कॉमनवेल्थ खेलों की मेज़बानी करेगा। अगर इस दरम्यान आप दिल्ली आते हैं तो आपके लिए राजधानी बिलकुल नई होगी। जिन सड़कों पर धूल और गंदगी कभी आपने देखी होगी वो सड़कें आपको किसी और देश में होने का अहसास कराएंगी। सड़कों पर कदम-कदम पर बने फ्लाईओवर के चलते आप रास्ता भी भूल सकते हैं। कॉमनवेल्थ गेम्स की मेजबानी के लिए पिछले तीन सालों से दिल्ली में कई बदलाव किए जा रहे हैं। पूरे शहर को मेट्रो जैसे क्रांतिकारी परिवर्तन में ढालने के बाद नई-नई लो-फ्लोर बसें और सड़कों से किलर या फिर कहें जानलेवा ब्लू-लान बसों को हटाना एक अच्छी पहल माना जा सकता है। लेकिन खेलों के नाम पर अरबों रुपए भी स्वाहा किए गए हैं। आलम ये है कि दिल्ल सरकार का खजाना अब खाली हो चुका है। महज तीन साल पहले दिल्ली सरकार के पास 11,000 करोड़ रुपये का फंड था, लेकिन लुटी-पिटी दिल्ली के पास आज फंड के नाम पर बचे हैं केवल 200 करोड़ रुपये। खबरों की मानें तो इस बार सरकार को 3 हजार करोड़ से भी ज्यादा का घाटा हुआ है। इतना ही नहीं दिल्ली को खूबसूरत बनाने के नाम पर राजधानी को 27 हजार करोड़ रुपए का कर्ज भी झेलना पड़ रहा है। क्या कोई शीला दीक्षित और सरकारी महकमें के अधिकारियों से ये पूछेगा कि आखिर जनता के खून-पसीने की कमाई किसने डकार ली? आखिर कहां गया सरकारी खजाना? लेख लिखे जाने के दो दिन पहले ही दिल्ली में दूध के दाम 2 रुपए तक बढ़ गए। 1 लीटर दूध के लिए अब 30 रुपए तक देने पड़ रहे हैं। सब्जी, अनाज, फल हर चीज़ के दाम जेब पर भारी पड़ रहे हैं। लेकिन जो सरकारी बंगले में रहते हैं और सब्सिडी के अलावा ऊपर से भी खाते हैं उनके लिए इसकी चिंता करना ज़रूरी नहीं है। जनता पर पड़ते बोझ से कहीं सरकार की कुर्सी ना हिलने लगे इसलिए सरकार परेशान ज़रूर है। मीडिया के सवालों का जवाब देने से अधिकारी और नेता दोनों ही बच रहे हैं। दिल्ली पर हाथ का कब्जा है, इसलिए पैसा पानी की तरह यमुना में बहा दिया गया। काम कितना हुआ इसकी सुध लेने के नाम पर भी पैसा बहाया गया। परवाह किसी को नहीं थी। दिल्ली सरकार के बजट में खर्चों की भारी लिस्ट है। वजीराबाद एक इलाका है दिल्ली में। सरकार यहां एक सिग्नेचर ब्रिज बनाना चाहती है। खर्चा आएगा लगभग 1200 करोड़ रुपए। हालांकि इस ब्रिज के लिए केंद्र सरकार भी मदद आर्थिक मदद करेगा। बावजूद इसके दिल्ली सरकार को 700 करोड़ रुपए खर्च करने होंगे। इस पुल को दिल्ली की शान के नाम पर बनाया जा रहा है। सरकार की जेब खाली है लेकिन महज दिखावे के नाम पर करोड़ों रुपए स्वाहा करने की तैयारी की जा चुकी है। इस पुल से दिल्ली के लोगों का भला तो होने से रहा लेकिन नेताओं और अफसरों के वारे-न्यारे ज़रूर होंगे। और जब अपनी जेब भरती हो तो अधिकारियों और नेताओं के पास जनता की सुध लेने की सुध कहां? दिल्ली में ही गीता कॉलोनी के पास भी हाल ही में एक पुल बनाया गया है। इस पुल की कुल लागत लगभग 100 करोड़ रुपए रही। महज 100 करोड़ रुपए दिल्ली को एक ज़बरदस्त पुल का तोहफा मिला। पुल की लंबाई भी ज्यादा और 4 लेन हाइवे से भी ज्यादा जगह है इस पुल पर और खूबसूरती के क्या कहने। लेकिन इस पुल के खर्चे और आसानी से दिल्ली सरकार खुश नहीं है। आपको बतादें कि इस पुल की वजह से इलाके में ट्रैफिक नाममात्र रह गया है। गीताकॉलोनी से दरियागंज सेकेंडों में पहुंचा जा सकता है। दिनभर अगर 10 हजार गाड़ियां इस रास्ते से गुजरें तो लाखों रुपए का पेट्रोल बच जाता है। लेकिन सरकार इसे महत्व नहीं देती। उन्हे तो सिग्नेचर ब्रिज ही चाहिए। भले ही दिल्ली पर कर्ज बढ़ता रहे। आखिर इन पांच सालों में उन्हे अपनी पीढ़ियों के लिए धन भी तो जमा करना है। मैंने अखबार में पढ़ा कि सरकार ने लालकिले के पीछे रिंग रोड बाइपास के लिए 655 करोड़ रुपये और बारापूला नाले पर बनने वाले रोड पर 550 करोड़ रुपये खर्च करने का मन बनाया है। हालांकि यहां इतने बड़े प्रोजक्ट की ज़रूरत नहीं है। और अगर है भी तो इसे खेलों के बाद भी बनाया जा सकता है। दिल्ली बदल रही है। रेडियो पर सरकार चीख-चीख कर कह रही है। ऐसा लगता है जैसे लोगों की आंखें नहीं है और वो बदलाव को देख नहीं सकते। खैर राजधानी में सड़कों के आसपास खूबसूरती के नाम पर 500 करोड़ रुपये खर्च किए जा रहे हैं। पूरी दिल्ली में करीब 280 करोड़ रुपये की लागत से स्ट्रीट लाइट के खंभे बदले गए हैं। ये खंबे थोड़े खूबसूरत लगते हैं, नए जो हैं। सरकार ने दलील दी है कि कॉमनवेल्थ गेम्स के दौरान पूरी दिल्ली में एक जैसे खंभे हों, लेकिन मजे की बात है कि जितने भी खंभे शहर में लगाए गए हैं, उनके डिजाइन एक जैसे नहीं हैं। ब्लू-लाइन से शबर को निजात दिलाना एक अच्छी पहल थी। लेकिन इसके लिए सरकार ने लो-फ्लोर के नाम पर लूट मचा दी। जो बसें सरकार 20 लाख रुपए में खरीद सकती थी उसे खरीदने के लिए 52 करोड़ रुपए खर्च किए गए। आखिर ये पैसा इन सफेदपोश चोरों के खून-पसीने का नहीं था। सरकार ने लो-फ्लोर बसों के लिए 2000 करोड़ रुपए बर्बाद कर दिए। करोड़ों रुपए की बचत से सरकार कई महीनों की किश्त दे सकती थी। लेकिन अगर ऐसा किया जाता तो करोड़ों रुपए अपनी जेब आने का रास्ता नहीं बनता। दिल्ली जलबोर्ड घाटे में हैं। लेकिन उसे रोकने के लिए सरकार के पास वक्त नहीं है। डीटीसी का घाटा कम करने के लिए दिल्ली की जनता पर बढ़े हुए किराए का बोझ डालव दिया गया। बावजूद इसके 500 करोड़ रुपए डीटीसी को देने पड़ रहे हैं। हर मर्ज की दवा होती है। लेकिन सरकार बीमारी को ठीक करने के बजाए हरकदम एक नया मर्ज इजाद करने में जुटी है। खेलों में कुछ महीने बचे हैं। शहर भर में निर्माण कार्य धड़ल्ले से हो रहे हैं। करोड़ों का खर्चा अरबों तक पहुंच गया है। खेलों में स्टेडियम में लगाई जाने वाली घास लाने के लिए अफसरान जनता का पैसा किस तरह खर्च किया इसका अंदाजा इस बात से ही लगाया जा सकता है कि अफसर हर एक दौरे के लिए बिजनेस क्लास में बैठकर दिल्ली से कोलकाता का सफर करते रहे। एक बार घास लाने के बाद उसे तबतक इस्तेमाल में नहीं लाया गया जबतक कि वो सड़ नहीं गया। घायस जब सड़ गई तो अधिकारी फिर से दिल्ली-कोलकाता करते रहे। करोड़ों रुपए की घास बर्बाद करने के बाद फिर उसी क्रिया को दोहराया गया। लेकिन जिस घास को कोलकाता से करोड़ों रुपए देकर मंगाया जा रहा था वो दिल्ली में ही यमुना किनारे भारी मात्रा में मौजूद है ये देखने की जेहमत किसी ने नहीं उठाई। इनका मकसद था सरकारी खजाने को खाली करना। अब जब सरकारी कंगाल हो रही है तो नए-नए रास्ते निकाले जा रहे हैं कि कर्ज लेकर भी अपनी जेब भरी जाए। दिल्ली वालों, आप तैयार रहें क्य़ोंकि सरकारी खजाना आपके ही पैसों से भरा जाएगा।
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