Saturday, November 5, 2016

सवालों का नोटिस लीजिए, दीजिए नहीं साहब!


लोकतंत्र में बिना आवाज के स्टार्ट अप शुरू करना है!
   सवालों का नोटिस लेने वाले सरोकार सवालों पर नोटिस दे रहे हैं, २०१६ में दुनिया के सबसे महान और सबसे बडे लोकतंत्र का ये भी एक कडवा और भयावह चेहरा है। 
    हालात को इमरजेंसी करार दे दूं तो ट्रोल देशद्रोही करार दे देंगे। चलन नया शुरू किया है सरकार के सिपहसालारों ने। सवाल करना देशद्रोह है और जितना जल्दी यह समझ में आ जाए उतना ही बेहतर है। 
  "सर बागों में बहार है!" इस सवाल और इसका जवाब आपके लिए अच्छा है लेकिन जहां आपने पूछा "सर क्या बागों में बहार है?" समझिए आप अफजल गुरू के रिश्तेदार, हाफिज सईद के हमदर्द और पाकिस्तान प्रेमी जैसे ना जाने क्या क्या शब्दों से संवार दिया जाएंगे। 
      आजकल ट्रोल्स का जमाना है। हर पार्टी और सरकार के पास अपनी ही ट्रोल आर्मी है। ये आपको ईमानदारी से लेकर राष्ट्रभक्त तक हर बात का सर्टिफिकेट दे सकते हैं। इनके आकाओं पर आपने अगर सवाल उठाया तो आपको चरित्र के इतने टुकडे बिखेरेंगे कि आप सामाजिक जीवन में शर्मिंदा महसूस करने लगेंगे।
    रवीश सही कहते हैं, "दिल्ली" में कार्बन की मात्रा बढ गई है। सारे एक्सपर्ट कह रहे हैं PM10  से ज्यादा  PM 2.5 जानलेवा है। अब ये मत समझिएगा कि मैं PM10 को सरकार या पार्टी और PM2.5 को ट्रोल कहने की कोशिश कर रहा हूं। बाकी अगर आप आज के राजनीति को प्रदूषण कहना चाहते हैं तो आपकी मर्जी। 
     ताजा ताजा और नया नया सरकार ने इंट्रोड्यूस किया है और वो है "बैन"!
     मने सोचिए जरा! टीवी पर बैन लगा के वो सोचते हैं सच दब जाएगा? इंडिया है साहब! नया वाला इंडिया! हमारा इंडिया। 
     ७५ में तो पैदा तो नहीं हुए थे लेकिन इतिहास कहता है कि वो लोकतंत्र का काला दिन था। नेताओं को जेल में डाल दिया गया, अखबार बंद हुए, अदालत ठप्प हुए और सत्ता का दमनचक्र शुरू हुआ। अब 75 को इतिहास के पन्नों में खोजने की जरूरत नहीं है। बहुत कुछ सामने है।
   राज्य को मुख्यमंत्री और उपमुख्यमंत्री को हिरासत में लेना, विरोधी दल के नेता को गिरफ्तार करना वो भी इसीलिए क्योंकि वो किसी मृतक के परिवार से मिलने जा रहे थे?
    अगले दिन खबर आती है कि एक बडे विश्वसनीय चैनल को 24 घंटे के लिए बंद करने के आदेश दिए गए हैं। 
पठानकोट की कवरेज से ज्यादा क्या पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी को बुलाना गलत नहीं था।लेकिन वो तो रणनीति थी! है ना? वाह रे मापदंड!
  पत्रकारिता में मरे पडे लोगों की भीड में कुछ लोगों ने सवाल उठाया तो सरकार और उनकी फौज ने नेशनल सिक्योरिटी जैसे बडे बडे शब्दों को तीर चला दिए। लगा शायद सरकार सबक लेगी और नोटिस का दौर रुकेगा लेकिन तबतक २ और चैनल बंद करने का नोटिस प्राप्त कर चुके थे। यकीन कीजिए कि ये 2016 ही है। 
      अब ७५ और १६ के बीच मैं फर्क करने की कोशिश करता हूं तो मुझे ना जाने क्यों दिखता है कि सरकार अपनी हे देशवासियों के खिलाफ सर्जिकल स्ट्राइक पर आमादा है।
ये इमरजेंसी नहीं है लेकिन उससे कम दिखती है क्या? 
    जो अथॉरिटी हैं क्या उनकी जिम्मेदारी नहीं है जवाब देना? और अगर है तो सवाल पूछना देशद्रोह कैसे है? 
    एनकाउंटर में 8 सिमी सदस्य मारे गए, गंभीर आरोप थे उनपर लेकिन कोई सजायाफ्ता नहीं। एनकाउंटर सीधे-सीधे फर्जी नजर आता है, लेकिन जैसे सवाल उठाओ तो राष्ट्रद्रोही करार दे दिए जाएंगे। हवाला दिया जाता है कि फोर्सेस पर सवाल उठाने से उनका मनोबल गिरता है। 
   अरे क्या फर्जी और राजनीतिक एनकाउंटर नहीं होते? क्या पुराने सारे एनकाउंटर असली हैं? पुलिस कबसे सवालों से परे हो गई? 
   पुलिस मतलब ही सरकार होता है और सरकार से ही सवाल पूछे जाते हैं। सवाल से ही तो जिंदा और मुर्दा होने का फर्क पता चलता है। 
      सवाल उठाना सिर्फ धर्म नहीं हमारा अधिकार है, और संविधान द्वारा दिए गए अधिकारों पर हमला ही राष्ट्रद्रोह है। वो सारी सरकारें राष्ट्रद्रोही हैं जो सवाल पूछने पर हमला करती हैं। 
     नोटिस, गिरफ्तारी, विरोध और प्रदर्शन पर भी जब आवाज अनसुनी कर दी जाए तो समझिए आप अहंकार के दायरे में घुस चुके हैं। लेकिन यहां तो अहंकार अपनी सारी मर्यादाएं तोड रहा है।
    याद रखिए हिंदुस्तान का इतिहास गवाह है, इस देश ने बहुत गुनाह माफ किए लेकिन अहंकार कभी माफ नहीं किया। रामायण और महाभारत भी अहंकारी के साथ हुए परिणाम को बयान करते हैं। वक्त है संभल जाइए। 

Saturday, October 22, 2016

चुनावों के बाजार में आपका स्वागत है !

भारत उपभोक्ता बाजार है। शायद दुनिया का सबसे बडा बाजार जिसकी वजह से दुनिया का हर देश अपनी अर्थव्यवस्था सुधारने के लिए भारत में निवेश का रास्ता अपनाता है। सुलभ संसाधन, सस्ती मजदूरी, सरकार में भ्रष्टाचार, पूंजीपति प्रेमी सरकार और उपलब्ध बडा बाजार, वो सब कुछ भारत देते है जो किसी निवेश के मुनाफे को बडा सके। 
     सिर्फ विदेशी ही क्यों क्या भारतीय निवेश के ने देश को संसाधनों कै कम दोहन किया है! कोयला घोटाले से लेकर केजी बेसिन और २जी घोटाले से लेकर कॉमनवेल्थ खेलों तक, अखबारों की सुर्खियां बताती हैं कि देश को सफेदपोश सत्ताधारियों ने और काले कॉर्पोरेट ने किस तरह अपने निजी मुनाफे के लिए लूटा है। 
    देश में उपभोक्ता हैं तो हर सामान बेचा जा सकता है। हर वस्तु के उपभोक्ता इस देश में हैं
  बाजार ऐसा को गंजे को कंघी तक बेची जा सकती है। इस बाजार रोटी कपडा मकान तो बिकता है आजकल भावनाएं बिक रही हैं।
     शायद आजकल कहना गलत होगा क्योंकि भावनाओं का बाजार तो कभी लग गया था जब सत्ता पर बैठे लोगों पर जनता का विश्वास उठने लगा था। 
   दशक और साल लिखते ही मेरे लिखने का अर्थ राजनीतिक हो जाएगा। सदी बीतते बीतते भावनाओं का बाजार गरम और बडा होने लगा। व्यापारी भी ज्यादा आ गए और खरीददार भी बढ गए। मंदिर के बाहर प्रसाद जरूर बिकता है क्योंकि वो किसी की रोटी से जुडा है लेकिन देश ने देखा कैसे मंदिर ही नहीं भगवान के नाम पर भी भावनाएं बेची जाने लगी। सवाल यहां राजनीतिक रोटी का था। मजे की बात यह थी कि उपभोक्ताओं के नरमुंड भी बाजार में बस खरीददारी किए जा रहे थे। भावनाओं का सेंसेक्स और निफ्टी रेकॉर्ड तोड रहा था।
      इसके दशक भर पहले भावनाओं को आपातकाल के खिलाफ बेचा गया था लेकिन वो अधिकारों की जंग थी। उस बाजार से कई और दुकानदार निकले जिनमें से कई सत्ता के गोदाम तक पहुंच गए।
    नई सदी के शुरूआत में देश को ही प्रोडक्ट बनाया गया। "शाइनिंग" से उपभोक्ता शायद खुश नहीं हुआ तो उसने बाजार ही बदल दिया।
     ऩए बाजार ने भूख की भावनाओं को बेचा और उसकी नई स्कीम सुपरहिट लगी तो उपभोक्ताओं ने उस बाजार को और आगे बढाया। लेकिन १० साल बाद इस बाजार से उपभोक्ता बोर हो गया और नया प्रोडक्ट बेचने वाले के झांसे में आ गया। प्रोडक्ट तो वही थे सारे बस इस सेल्समैन की खूबी थी कि उसी माल को उसने पहले के माल से कैसे बेहतर है ये उपभोक्ताओं को समझा दिया। ना जाने और कितने कितने ऑफर इस माल के साथ देखकर बडी उम्नीद से उपभोक्ताओं ने इस बाजार का सभी माल खरीद लिया जाहिर है सेल्समैन की बल्ले बल्ले। 
   वक्त बीत रहा है और उसी सेल्समैन को उसके ऑफर याद दिलाए जा रहे हैं लेकिन अब दुकान के बाहर कुछ लोग झंडा लिए खडे हैं और कहते हैं दुकान पर सवाल उठाने पर आपको सजा होगी, अगर स्कीम को उत्पाद मांगे तो आप राष्ट्रद्रोही कहलाएंगे। ग्राहक के सामने असमंजस की स्थिति है। दुकान वाले कहते हैं पिछले दुकानदार से तो इतनी शिकायत ना थी तुम ग्राहकों को, सारी शिकायत हमसे ही है!
   किसी ग्राहक ने कहा कि पिछले दुकानदार ने सामान बेचने में बेइमानी की तभी तो उसकी दुकान ग्राहकों ने उठा दी लेकिन दुकान वाले सुनने के मूड में नहीं हैं। 
   अब मेलों का अवसर आया है। पांच जगहों पर एक साथ मेले लगेंगे। बहुत सारे दुकानदार बाजार में आएंगे और अपना माल बेेचेंगे।
    सबसे हिट है मंदिर वाला माल । ये हर ५ साल बाद वाले मेले से ठीक पहले बाजार में आता है और मेला उठते ही माल वापस चला जाता है। ग्राहकों को कुछ नहीं मिलता। इस माल का हवाला थाने पहुंच चुका है।
अब मंदिर वाले प्रोडक्ट पर अपना दावा ठोकने वाला दुकानदार बाजार में फिर आया है। थानेदार के डर से अब वो सीधे मंदिर का नाम नहीं ले रहा लेकिन बोला है कि म्यूजियम जैसा कुछ लाएगा। मंदिर में रहने वाला म्यूजियम में मिल जाए तो चमत्कार ही कहलाएगा। अब इस मेले में भी ग्राहक बाजार में उतरा है। बाजार लगा है कौन कि कितना माल बेचेगा, देखते हैं।

Thursday, October 13, 2016

केजरीवाल के लिए क्यों जरूरी है पंजाब ?"

जुम्मा-जुम्मा ४ सालों के अपने राजनीतिक इतिहास में देश की राजधानी दिल्ली में दो बार सरकार बना चुकी अरविंद केजरीवाल की आम आदमी पार्टी पहली बार दिल्ली के बाहर किसी राज्य में विधानसभा चुनाव में किस्मत आजमाने जा रही है।
    हालांकि इससे पहले 2014 में लोकसभा चुनाव में भी आम आदमी पार्टी ने हाथ आजमाया था लेकिन मोदी लहर में आप को ऐसी करारी शिकस्त मिली जिससे उबरने में उसे ना सिर्फ महीनों लग गए बल्कि आप के भीतर हार को लेकर हाहाकार मच गया था। 
  लेकिन 2015 में फिर से दिल्ली विधानसभा चुनाव में अरविंद केजरीवाल का जादू चला और ऐतिहासिक बहुमत के साथ अरविंद केजरीवाल की आम आदमी पार्टी 70 में से 67 विधायकों के साथ दिल्ली की सत्ता पर काबिज हुए।
     अरविंद केजरीवाल अब जनवरी 2017 में होने वाले पंजाब और गोवा विधानसभा में दांव आजमां रहे हैं। आप ने अब तक लगभग आधे उम्नीदवारों के नाम का ऐलान भी कर दिया है।
  
आखिर पंजाब चुनाव अरविंद केजरीवाल के लिए इतना महत्वपूर्ण क्यों है ?
    जवाब की शुरूआत दिल्ली से की जा सकती है। दिल्ली में ऐतिहासिक बहुमत के बाद केजरीवाल सरकार लगातार केंद्र सरकार के साथ किसी ना किसी मुद्दों पर जूझती दिखाई दी। लेफ्टिनेंट गवर्नर नजीब जंग पर के साथ जंग करती दिखी। केजरीवाल लगातार आरोप लगाते रहे मोदी सरकार नजीब जंग के जरिए उन्हे काम नहीं करने दो रही। दिल्ली का मौजूदा दर्जा  यूनि़यन टेरिटरी का है। बावजूद इसके अरविंद केजरीवाल दिल्ली के मौजूदा व्यवस्था को नकार कर एक पूर्ण राज्य की तरह चलाते दिखे। हालांकि दिल्ली की सभी पार्टियों ने चुनावों के दौरान दिल्ली के लिए पूर्ण राज्य के दर्जे की मांग करते रहे। 
     जाहिर है दिल्ली की व्यवस्था में पुलिस केजरीवाल सरकार के अधीन नहीं है। चुनी हुई सरकार की सुनना तो दूर दिल्ली पुलिस चुनी हुई सरकार और उसके विधायकों के खिलाफ सर्जिकल स्ट्राइक करती दिखने लगी। केजरीवाल के मंत्री से लेकर विधायक एक के बाद एक गिरफ्तार होने लगे। कुछ मामलों में कोर्ट ने पुलिस को गिरफ्तारियों पर लताड भी लगाई। केजरीवाल के भ्रष्टाचार विरोधी मुहिम को तगडा लगा जब ACB को एक नोटिफिकेशन जारी करके केंद्र सरकार ने उसे अपने अधीन कर लिया। हाल ही में आए दिल्ली हाईकोर्ट के फैसला के बाद उपराज्यपाल ने केजरीवाल सरकार के पिछले सभी फैसलों की फाइलें मंगाई और उस पर जांच शुरू कर दी। इन तमाम विवादों को बीच दिल्ली में विकास की रफ्तार थम गई। अरविंद केजरीवाल मुख्यमंत्री होते हुए भी अब दिल्ली के लिए बिना उपराज्यपाल की मंजूरी के बिना कोई फैसला नहीं ले सकते। 
   ऐसे में केजरीवाल अपने राजनीतिक मकसद को पूरा करने में जी जान से लगे हैं। लोकसभा चुनाव में आप ने पंजाब में आश्चर्यजनक तरीके से 4सीटें जीतीं। यहीं से शुरूआत हुई पंजाब विधानसभा चुनाव लडने की। पंजाब एक पूर्ण राज्य है और पुलिस समेत तमाम एजोंसियां चुनी हुई सरकार के निर्देशों पर ही काम करती हैं। यानि अगर आम आदमी पार्टी पंजाब चुनाव जीतती है तो ये पहला राज्य होगा जहां उसके पास अथाह शक्ति होगा लेकिन साथ ही किसी भी शासकीय नाकामी को छुपाने के लिए कोई भी बहाना नहीं होगा। ड्रग्स से जूझ रहे पंजाब को ड्रग्स मुक्त बनाने का वादा करने के बाद अरविंद केजरीवाल पर दबान होगा कार्रवाई करने का। साथ ही भ्रष्टाचार को केजरीवाल पंजाब से खत्म कर पाते हैं या नहीं सबकी नजर इस पर भी होगी। किसानो की खुदकुशी समेत ऐसे तमाम मुद्दे हैं जिसको सुलझाने का वादा अरविंद केजरीवाल और आम आदमी पार्टी पंजाब में लगातार कर रही है। केजरीवाल दिल्ली में मोहल्ला क्लीनिक बनाने और सरकारी स्कूलों को ठीक करने का दावा कर रहे हैं लेकिन जमीन ना मिलने का हवाला भी देते हैं। उनकी हर महत्वपूर्ण योजना को लिए पंजाब में उनके पास संसाधन भी होंगे और शक्ति भी। कुल मिलाकर अगर अरविंद केजरीवाल अपने दिल्ली मॉडल को पंजाब में सफलतापूर्ण लागू कर पाते हैं तो ना सिर्फ पंजाब के अलावा दिल्ली में बल्कि  देश के दूसरे हिस्सों में भी अपनी सरकार का दम दिखा पाएंगे।

  आप के लिए पंजाब की जीत का दूसरा और बडा मायना बेहद राजनीतिक है। 
अगर आम आदमी पार्टी पंजाब में किला फतह कर पाती है तो वो देश की तीसरी पार्टी होगी जिसकी एक से ज्यादा राज्यों में सरकार होगी। साथ ही एक संदेश होगा कि कांग्रेस की जगह अगर कोई ले रहा है तो वो है अरविंद केजरीवाल की आम आदमी पार्टी। दिल्ली विधानसभा चुनाव में आप ने ना सिर्फ बीजेपी बल्कि कांग्रेस का पूरा सफाया कर दिया था। कांग्रेस एक सीट जीतना तो दूर ज्यादातर सीटों पर जमानत खो बैठी। माना जाता है कि अल्पसंख्यक वोट और दलित गठजोड जो दिल्ली में कांग्रेस की ताकत बना रहा उसने बीजेपी को हराने के लिए आप का दामन थाम लिया ऐसे में पंजाब की जीत से केजरीवाल ये संदेश देने में कामयाब होंगे कि बीजेपी को सिर्फ आम आदमी पार्टी ही टक्कर दे सकती है। जाहिर है बीजेपी के खिलाफ एक बडे वोटबैंक को अरविंद केजरीवाल अपने खेमे में कर सकते हैं खासकर उन राज्यों में जहां कांग्रेस की सीधी टक्कर बीजेपी से है।

   आखिर अरविंद केजरीवाल की रणनीति क्या है ?
अरविंद केजरीवाल और उनकी राजनीति को लेकर किसी तरह की भविष्यवाणी करना संभव नहीं है। लेकिन उनकी राजनीति पर नजदीक से नजर रखने के कारण कुछ चीजें जरूर समझ सकता हूं। 
पंजाब के अलावा केजरीवाल गोवा में भी दांव आजमा रहे हैं। पंजाब में अगर केजरीवाल को जीत मिलती है और उसके साथ अगर गोवा में कुछ सीटों भी मिलती हैं तो उनके लिए ये ब्रेड पर मक्खन का काम करेगा। जाहिर दिल्ली में सिमटी ४ साल पुरानी पार्टी दूसरे राज्यों की विधानसभाओं में मौजूदगी दर्जे करेगी। 
ऐसे में मुझे जो समझ में आता है वो ये कि अरविंद केजरीवाल उन सभी राज्यों में चुनाव लडेंगे जहां मुकाबला सिर्फ बीजेपी और कांग्रेस के बीच है। पंजाब के बाद अरविंद केजरीवाल का पूरा ध्यान गुजरात में केंद्रित होगा। इस बीच आप के नेता मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ, झारखंड, कर्नाटक और हिमाचल में संगठन विस्तार का काम शुरू कर चुके हैं। 
   पंजाब की जीत इस लिए भी केजरीवाल के लिए महत्वपूर्ण है क्योंकि उनका अगला निशाना गुजरात होगा। ऐसे में आप पंजाब में बडे बडे योजनाओं को लागू कर गुजरात में उसका बखान करने से पीछे नहीं रहेगी। गुजरात ना सिर्फ बीजेपी बल्कि प्रधानमंत्री मोदी के लिए भी नाक की लडाई होगी। जाहिर है १५ साल राज्य करने के बाद नरेंद्र मोदी गुजरात में किसी नई पार्टी या यीं कहें कि अपने सबसे बडे धुर विरोधी को टिकने नहीं देंगे। हालांकि गुजरात में बीजेपी सरकार से नाराज पटेलों को लुभाने में केजरीवाल कामयाब रहे हैं जिनका वोट प्रतिशत अच्छा खासा है। लेकिन बावजूद इसके गुजरात में पैर जमाना केजरीवाल के लिए इतना आसान नहीं होगा। लेकिन पंजाब की जीत के बाद वो बीजेपी विरोधी वोट को अपने खेमे में लाने में कामयाब हो सकते हैं।
  
लेकिन अगर अरविंद केजरीवाल पंजाब में परचम फहराने से चूक जाते हैं तो ना सिर्फ आम आदमी पार्टी बल्कि अरविंद केजरीवाल के सभी सियासी अरमानों पर पानी फिर जाएगा। इतना ही नहीं केजरीवाल के ऊपर अपने राजनीतिक अस्तित्व को बचाने का संकट भी आ सकता है।

लेकिन पंजाब की लडाई इतनी आसान होगी?
हालिया सर्वे बताते हैं कि आम को पंजाब में बेहतर जन समर्थन है लेकिन कुछ सर्वे इससे इत्तेफाक नहीं ऱखते। अकाली सरकार, कांग्रेस और आप ने पंजाब में तिकोना मुकाबले का माहौल बना दिया है। आप को लिए मुश्किल साबित हो सकता है उसके अपने परिवार के भीतर का घमासान। छोटेपुर समेत कई नेताओं के पार्टी छोडने का असर भी नकारा नहीं जा सकता। साथ ही दिल्ली में सीडी और चिकनगुनिया के मामले पर घिरी सरकार को पंजाब में सफाई देनी पड सकती है। यानि पंजाब में अरविंद केजरीवाल की राह आसान नहीं है।

कुल मिलाकर ये तमाम बातें इशारा करते हैं कि आखिर अरविंद केजरीवाल के लिए पंजाब इतना महत्वपूर्ण क्यों है ।

Wednesday, October 12, 2016

आ गए ओपीनियन पोल

सरपंच : अरे का छेदी भाई कहां जोस में जा रहे हो वो भी पउआ हाथ में लै के

  छेदी : अरे सरपंच जी अब तो पूछो मत बस समझो कमल खिल गया है उत्तर प्रदेश में, हमरी जनकल्याण पार्टी यूपी जीत रही है ।

सरपंच : अरे अबहीं तो बहुत टाइम है चुनाव में, तुमको कोई सपना आया है का

छेदी: अरे नाही सरपंच जी ऊ टीवी वाले कहत हैं कि "हाथी" को चक्कर आ रहा है और "साइकिल" का चैन उतर गया है और "हाथ" तो अभी रोटी मांगने लायक भी नहीं बचा। कोट टाई वाले टीवी में बोल रहे हैं कि बस अब इस बार हो जाएगा।

सरपंच : तो उन लोगों को सपना आया था क्या ?

छेदी : अरे सरपंच जी आप बहुते नादान हो, ऊका ओपीनियन पोल कहत हैं, जनता की राय लेके ऊ लोग अपना गणित भिडा के बतावे हैं कि सत्ता कौन पाएगा। अब इस अपनी पार्टी का नंबर लग जाएगा तो सोचे आज ही जसन मना लिया जाए।

सरपंच: अरे लेकिन हमरे पास तो आए ही नहीं तो जनता की राय कहां से ले ली?

छेदी : अरे सरपंच जी एतना बडा यूपी में करोडों लोग रहत हैं तो कौनो और से बात किया होता, आप नाहक परेशान हो रहे हैं।

सरपंच : अरे तो कितना लोगों से बात करके ई भविष्य वाणी किया है रे छेदी ?

छेदी: कहत रहे कि ५० विधानसभा में ५००० लोगन से राय लेकर बता रहे हैं कि यूपी किसका होगा।

सरपंच : इतना आबादी तो अपने ही गांव का है तो एक गांव के राय से पूरा जवार जिता दिया?

छेदी: अब देखो सरपंच जी टीवी पे कह रहे हैं तो झुठो नहीं ना बोलोंगे। सहिए कह रहे होंगे। टाई लगा के कौनो झूठ बोलता है का। अ टीवी का कान ऐंठ के भी देख लिए तो हर जगहिए एको बात कहत हैं कि हमरी पार्टी जीत रही है। अब इहे सोच के तो हम सम्मान पार्टी छोड के इ पार्टी का कार्यकर्ता बने थे।नहीं तो पैसा और पउआ तो हमका उहां भी मिल रहा था।

सरपंच: तो काहे दल बदल लिए ?

छेदी : अरे बताए थे ना आपको २ महीने पहले जब टाई वाले टीवी पे बोल रहे थे कि अब यूपी में सम्मान पार्टी की लहर है तो हम सोचे की लहर में बह लिया जाए।

सरपंच : अरे तो अपनो अकल भी लगाए हो कि सब टीवी पे देख के सोच लिए।

छेदी : नहीं सरपंच जी जुगनी की अम्मा और हमरी मेहरिया भी बोली की देखो टीवी वाले कहत रहे इस बक दूसरा झंडा फहरेगा तो पुराने के पीछे दिन खराब करोगे।

सरपंच : तोहरी मेहरिया को ई सब का क्या पता?

छेदी: सरपंच जी वही बोली की टीवी पे ओपीनियन पोल आवत है। आओ देखो केका वोट देना है।

सरपंच : अरे तो टीवी वाले राय ही तो बतावे हैं,दूसरे कि राय से तुम अपना मन काहें बदलो है।

छेदी : अरे सरपंच जी राय तो दिखाया ही नहीं ना। टाई वाले बोले कि ऊ लोग बात कर चुको हैं और सम्मान पार्टी ही जीत रही है। अब टीवी वाले झूठ थोडे बोलोंगे उनको झूठ हल्ला करने का पैसा थोडे मिलता होगा। 
अब ऊ हमको और हमरी मेहरिया को समझा दिए कि ई बेरी सम्मान पार्टी को वोट देना चाहिए।

सरपंच : तो तुम फैसला कर लिये हो?

छेदी : टीवी वाले बोले हैं कि कौनो "सर्जिकल स्ट्राइक" हुआ है उसके बाद यूपी ने फैसला कर लियै है तो हम काहे ना करें, टीवी वाले झूठ थोडे बोले हैं।

सरपंच : ई सर्जिकल स्ट्राइक का है?

छेदी : अरे सरपंच जी हमारी फौज दूसरे देस में घुसके के आतंकवादी मार आई है, उसी का सर्जिकल स्ट्राइक कहत हैं ।

सरपंच : ई तो बहुत बढिया बात है , जवानों को बधाई हो लेकिन तोहरी सम्मान पार्टी का क्या लेना देना ?

छेदी : ऊ टीवी वाले कह रहे हैं कि हमरी पार्टी ने भी किया है सर्जिकल स्ट्राइक। अब टीवी वाले झूठ थोडे बोलेंगे। जैसे बता रहे थे लगा हमरी पार्टी को सबसे बडे नेता लोगन ने ही किया है।

सरपंच : अरे तो चुनाव में उसका क्या लेना देना?

छेदी: अरे सरपंच जी हमरे ऊपर. नाराज ना हो, ऊ टीवी वाले कहत हैं कि सर्जिकल स्ट्राइक के बाद यूपी में सब बदल गया है और जनता की राय बदल गई है और अब सम्मान पार्टी जीतोगी।
आप हमरी जीत से जलते हैं।