Sunday, March 27, 2011

बदलता बिहार...





सालों से अगर हमारे मस्तिष्क पटल पर अगर कोई भ्रांति ने डेरा जमा रखा हो तो ज़रूरी नहीं है को वो अटल सत्य है। वस्तुत: उस विषय विशेष से जुड़ी धारणा किसी परिपेक्ष में यथार्थ हो सकती है। मैंने बिहार नहीं देखा है। लेकिन बिहार पर कटाक्ष करने में मैं भी पीछे नहीं रहा। मैं भी से मेरा तात्पर्य कदाचित आपको भी समझ में आ गया होगा। जब मतभ्रांति टूटी तो मुझे नालंदा विश्वविद्यालय याद आया। मुझे वो वक्त भी याद आया जब सिर्फ आर्यावार्त ही नहीं अपितु समस्त संसार के विद्याप्रेमी बिहार की धूलि पाकर स्वयं को धन्य समझते थे। सार और संसार का ज्ञान केवल बिहार के पास था। राजनीति और कूटनीति यहीं की देन है। इसी राज्य ने चाण्क्य दिया तो इसी राज्य ने चंद्रगुप्त मौर्य भी दिया। इतिहास के पन्नों से शुरू इस यात्रा को मैं वर्तमान परिवेश में ले जाना चाहुंगा। 90 के दशक तक बिहार पर लालू यादव सत्ता शीर्ष रहे। राजनीति और साम्राज्यवाद का अनुपम मेल बिहार में देखने के मिल रहा था। लालू अवसरवादी थे लेकिन जनता के सामने अपनी छवि वो समाजसेवी की बनाए रखते थे। बिहार को विकास की बारहखड़ी भी नहीं पता थी। समयचक्र बदला...लोगों की जिज्ञासा बढ़ी और बदलाव की बयार ने सबकुछ बदल दिया। बिहार में शिक्षा की दर सबसे कम रही। बावजूद इसके देश की व्यवस्था बनाए रखने वाले साहब इसी प्रदेश से आते रहे। बिहार और बिहार के लोग आज भी उनपर गर्व करते हैं। लोकतंत्र का चौथा स्तंभ भी इसी प्रदेश ने मजबूत किया।
15 सालों के लालूराज ने बिहार की छवि कुछ यूं बदहाल की जिसका नतीजा बिहार के लोगों को पूरे देश में भुगतना पड़ा। प्रदेश को विकास और शिक्षा से दूर क्या रखा, पलायन दर बढ़ती रही। महाराष्ट्र में बिहार वासियों के साथ जो कुछ भी हुआ उसका एक कारण आप पलायन को मान सकते हैं। कूटनीति और राजनीति का जगतगुरू बना ये प्रदेश अब सांस लेने लगा है। विकास दर बढ़ चुकी है। शिक्षा दर बढ़ रही है। पूंजीवादी अब बिहार में मौका तलाशन लगे हैं। ज़ाहिर है आनेवाला वक्त बिहार के लिए एक नया सूरज लेकर आने वाला है। इस लेख को लिखने के लिए मुझे एक लेख ने प्रेरित किया है। कहीं पढ़ा था कि देश के अन्य राज्यों की तुलना में विभिन्न क्षेत्रों में पिछड़ा बिहार शराब की खपत के मामले में भी सबसे पीछे है और यहां प्रति सौ व्यक्ति इसकी खपत मात्र 45 लीटर है। देश की राजधानी दिल्ली, हरियाणा, पंजाब, महाराष्ट्र और उत्तर प्रदेश में शराब की खपत क्रमश: 999 लीटर, 612 लीटर, 594 लीटर, 414 लीटर और 144 लीटर है। अगर विदेशों की बात करें तो दक्षिण अफ्रीका में 2122 लोगों पर शराब की एक दुकान है। इसी प्रकार ब्रिटेन में 303, अमेरिका में 265, आस्ट्रेलिया में 483, रुस में 432 तथा चीन में 195 लोगों पर एक दुकान मौजूद है। इस खबर को मैं बिहार के लिए एक नया सवेरा मानता हूं। बिल गेट्स का हालिया दौरा इस सेवरे में जान फूंकता है। मैं किसी पार्टी या व्यक्ति विशेष का नाम नहीं लूंगा न ही मैं किसी राजनीतिक पार्टी से संबंध रखता हूं। लेकिन बिहार का वर्तमान चेहरा मुझे सोचने पर मजबूर करता है कि मैं अपनी राय बदलूं। हर अंधकार के बार सूरज उगता है और बिहार का सूर्योदय हो चुका है। बिहार के लोग बदलाव के पक्ष में हैं और अब बिहार में एक नया युग आएगा।

Saturday, March 12, 2011

बस कुछ दिन ?



जापान में ज़लज़ला क्या आया...सारी दुनिया की ज़बान पर एक ही सवाल है। बस कुछ दिन और ? धरती की तबाही की शुरूआत हो चुकी है। विनाश की उल्टी गिलती शुरू हो चुकी है। सालों लंबी ज़िंदगी अब लम्हों में कट रही है। जापान के साथ सारी दुनिया ने जो मंज़र देखा उसकी तस्वीर ज़िंदगी भर ज़िंदा रहेगी। कुदरत का क़हर धरती पर ऐसा बरपा मानो विनाश का दिन आज ही है। माया सभ्यता के कैलेंडर ने विनाश की दिन मुकर्रर कर दी है। जापान की विनाशकारी घटना आने वाले खतरे का संकेत मात्र है। प्रलय किसे कहते हैं अब ये समझना मुश्किल नहीं है। पाप और पुण्य के तराजू में पाप का पलड़ा शायद भारी हो चुका है। डर हर किसी के जेहन में घर कर चुका है। सारी दुनिया धरती मां से प्रार्थना कर रही है कि हे धरती मां हमें हमारी ग़लतियो के लिए माफ कर दो। ये विनाशलीला रोक दो।
आखिर हमें हमारी ग़लतियों का एहसास अब क्यों हो रहा है ? सालों तक हमने प्रकृति की उपेक्षा की। और अब जब प्रकृति हमारी उपेक्षा कर रही है तो हम चीख-पुकार मचा रहे हैं। इस दिन की कल्पना पर्यावरणविदों ने बहुत पहले ही कर दी थी। लेकिन मानवी लोलुपता और पिपाशा के वशीभूत होकर मानवों ने प्रकृति के हर उस नियम की अवहेलना की जिसका दुष्परिणाम आज हमारे सामने है। अपने निजी हितों के लिए हमने प्रकृति में परिवर्तन करना शुरू किया। निजी स्वार्थ के चलते धरती की हरियाली पतनोन्मुख हो गई। क्या धरती..क्या आसमान सब दूषित होते गए। जल, थल और वायु पर नियंत्रण करने की हमारी मंशा ने हमें अंत के द्वार पर खड़ा कर दिया है। दुनिया के विकसित देश बढ़ते प्रदूषण या यूं कहें की ग्रीन हाउस इफेक्ट के लिए प्रगतिशील देशों को ज़िम्मेदार ठहराते हैं। प्रगतिशील देशों में ताकतवर और कद्दावर बनने की होड़ मची है, चाहे इसके लिए कोई भी कीमत क्यों ना चुकानी पड़ी। जापान में जो ज़लज़ला आया वो इतिहास की सबसे बड़ी विनाशकारी घटना है। लाखों लोग अभी भी लापता हैं। मरनेवालों का आंकड़ा लगातार बढ़ता जा रहा है। द्वितीय विश्वयुद्ध के समय जापान ने मित्र राष्ट्रों में सबसे कद्दावर देश अमेरिका को पर्ल हार्बर जैसा ज़ख्म दिया। अमेरिका ने जापान को नागासाकी और हिरोशिमा पर परमाणु बम बरसाकर करारा जवाब दिया। जापान एक त्रासदी भूला भी नहीं था कि अब एक और जख्म से पीड़ित हो चुका है। और सिर्फ जापान ही क्यों...26 जुलाई, मुंबई, पिछले साल चीन की बाढ़, लेह और लद्दाख की त्रासदी के साथ दुनिया के अलग-अलग कोने लगातार मिल रही तबाही की खबरें हमें इस बात का इशारा कर रही हैं कि अब वो वक्त आ गया है। जापान के पास बचने के लिेए 12 मिनट मात्र शेष थे। लेकिन हमारे पास तो शायद अभी सालों का वक्त है। हम अभी भी अपनी गलतियां सुधार कर मानव सभ्यता को विलुप्त होने से बचा सकते हैं। हम अभी भी तबाही को रोक सकते हैं। बशर्ते हम प्रकृति का आदर करें।

Saturday, March 5, 2011

इन आंखों की मस्ती के दीवाने हज़ारों हैं !



हम बीसवीं सदी में जी रहे हैं। सारी दुनिया के रंग और कलेवर अब बदल चुके हैं। बात करें फिल्मों की तो अब 36 मिमी का रंग 70 मिमी के परदे पर उतर चुका है। सिंगल स्क्रीन थिएटर तो अब आंखों से दुर्लभ हो गए हैं। मल्टीप्लेक्स का ज़माना है। कभी लकड़ी की कुर्सियों पर बैठकर फिल्मों का लुत्फ उठाते लोग अब गोल्टन टिकट लेकर लेटकर बॉलीवुड का मज़ा लेते हैं। लेकिन मैं बात यहां ना तो फिल्मों की करुंगा और ना ही थिएटरों की...आज मुझे याद आ रही है उन्नीसवीं सदी की उस महान अदाकारा की जिसकी खूसबसूरती का आज भी कोई जवाब नहीं। जिसके अभिनय की नकल तो दूर उसके पास पहुंचने की हिमाकत भी आज की किसी अभिनेत्री ने नहीं की। आज मुझे याद आ रही है रेखा की। जिस रेखा के बिना आज भी बॉलीवुड अधूरा है उसने ज़िंदगी में संघर्ष और सफलता के बीच का फैसला कैसे तय किया, वो आज भी एक मिसाल है। चार साल की उम्र में बेबी भानुरेखा ने रूपहले पर्दे पर पहला कदम रखा। हिंदी फिल्मों की जान बनने से पहले रेखा अभिनय की शुरूआत दक्षिण भारतीय फिल्मों से की।
1970 में रेखा ने हिंदी फिल्मों का रुख किया। बतौर अभिनेत्री रेखा की पहली हिंदी फिल्म थी ‘सावन भादों’। इस फिल्म से रेखा को कुछ खास सफलता नहीं मिली जिसकी वजह से उन्हे बेहद निराशा हुई। लेकिन उन्हे नहीं पता था कि इस फिल्म के बाद हिंदी फिल्मों के तमाम निर्देशकों की नज़र अब उन पर पड़ चुकी थी। रेखा के हाथों की रेखा
ने अपना जलवा तब दिखाया जब उन्हे पहली बार आज की सदी के महानायक अमिताभ बच्चन के साथ फिल्म अलाप में काम करने का मौका मिला। इस जोड़ी की सफलता देखकर प्रकाश मेहरा ने इन दोनों को फिल्म ‘मुकद्दर का सिकंदर’ फिल्म बनाई। फिल्म इसी जोड़ी को मौका दिया गया। और देखते ही देखते रेखा और अमिताभ ने शोहरत के आसमान को छूना शुरू कर दिया। फिल्म की कामयाबी के साथ रेखा के सितारे भी सातवें आसमान को पार कर चुके थे। अमिताभ के साथ ही फिल्म ‘मि.नटवरलाल’
में रेखा एक बार फिर नज़र आईं। फिल्म का गीत ‘परदेसिया’ इतना ज़बरदस्त हिट हुआ कि उसके बोल सुनते ही आज की पीढ़ी भी थरकने को नजबूर हो जाती है। एक गांव की भोली-भाली लड़की का किरदार रेखा ने बखूबी निभाया। वहीं फिल्म ‘सुहाग’ में रेखा की अदायगी ने उन्हे प्रशंसकों के दिलोदिमाग पर हावी कर दिया। अपनी कई फिल्मों में तवायफ का किरदार रेखा ने कुछ ऐसा निभाया कि उनपर मर मिटने वालों का रेला सा लग गया। रेखा की आंखें बिना बोले ही बहुत कुछ कह जाती थीं। उनकी आँखों की कशिश ने ना जाने कितनों को घायल किया। रेखा के चाहने वालों की तादात बढ़ती जा रही थी। वहीं रेखा के दिल में भी किसी शख्स ने अपनी जगह बनानी शुरू कर दी। वो शख्स कोई और नहीं बल्कि अमिताभ बच्चन थे। दोनों के अफेयर के चर्चे खूब चले।
बॉलीवुड की सबसे हिट जोड़ी को हर चाहने वाला जीवन भार साथ देखने की चाहत पालने लगा। लेकिन अमिताभ के दिल में पहले ही जया बहादुरी बस चुकी थीं। रेखा, अमिताभ और जया के बीच लवट्राएंगल को यश चोपड़ा ने देखा। यश चोपड़ा ने जया, अमिताभ और रेखा को लेकर फिल्म बनाई जिसका नाम था ‘सिलसिला’। फिल्म बेहद मशहूर हुई। फिल्म की सफलता के पीछे आज भी वजह इन तीनों कलाकारों के रिश्ते का माना जाता है। रील लाइफ की कहानी को लोगों ने रीयल लाइफ से जोड़कर देखा।
प्रेम की मारी रेखा ने अपना प्रेम खो दिया। लेकिन ज़िंदगी से हार नहीं मानी। फिल्म
‘उमराव जान’ में रेखा ने जो अदायगी दिखाई वो एक मिसाल बन गई। उसी ‘उमराव जान’ को जब दोबारा पर्दे पर उतारा गया जो उसमें रेखा की जगह ऐश्वर्या राय नज़र आईं। ऐश्वर्या ने ‘उमराव जान’ के किरदार को निभाने की पूरी कोशिश की लेकिन दर्शकों ने इस ‘उमराव जान’ को उस ‘उमराव जान’ के ज़रा भी करीब नहीं पाया। मैं खुद भी रेखा के चाहने वालों में से एक हूं। और इसलिए मैं जानता हूं कि जिस दिन रेखा और अमिताभ दोबारा सिल्वर स्क्रीन पर आए तो बॉलीवुड में एक नया इतिहास बनेगा। रेखा अपने आप में एक अनसुलझी कहानी हैं। प्रेम ऐसा किया कि दोबारा किसी को दिल में जगह नहीं दी। किसने क्या कहा और क्यों कहा इसकी परवाह ज़रा भी नहीं की। रेखा की इस प्रेम को मैं सलाम करता हूं।