एक आंदोलन से उपजी और दिल्ली की सत्ता पर सहज़ एक साल में 2 बार जा बैठने वाली
आम आदमी पार्टी, राजनीति पढने और समझने वाले लोगों के लिए एक नया अध्याय है। इस
पार्टी ने दिखाया कि कैसे मज़बूत इरादों और सही नीयत के साथ जनता का मुद्दों को
लेकर जनता के बीच साल जाएं तो जनता उन्हे ताज़ पहना देती है। हां, परिस्थितियां भी
इसमें एक अहम भूमिका अदा कर करती हैं। दिल्ली के चुनावों की जीत के विश्लेषण में
उन तमाम भूमिकाओॆ को रेखांकित किया जा चुका है। लेकिन अब इस तीन साल पुरानी पार्टी
में जो कुछ भी हो रहा है वो हालांकि मुझे चौंकाता नही है लेकिन समय से पहले ही
महात्वकांछाओं के ज्वालामुखी ऐैसे फूटेंगे, इसका अंदाज़ा नहीं था।
इस बात से कोई इनकार नहीं कर
सकता है कि जुम्मा जुम्मा 3 साल पुरानी पार्टी में इतनी शाब्दिक जूतमपैजार अति महत्वाकांछा
का ही परिणाम है। लेकिन सच यै भी है कि राजनीति और महत्वकांछा एक दूसरे के अभिन्न
पूरक हैं।
ताज़ा घटनाक्रम के केंद्रबिंदु
हैं मशहूर अधिवक्ता प्रशांत भूषण और सामाजिक चेहरा योगेंद्र यादव। समाज में ये
दोनों ही चेहरे अपना एक वजन रखते हैं। इनकी भूमिका से कोई भी अनजान नहीं होगा। औऱ
शायद यही वजह है कि जब इनपर पार्टी के खिलाफ साजिश का आरोप लगा तो एक बड़ी संख्या
में पार्टी समर्थकों ने इन आरोपों को नकार दिया। इस पार्टी को इसके जन्म से देखता
आया हूं। आम आदमी पार्टी ने पारंपरिक चुनावों के बगैर सत्ता हासिल करके एक नया
इतिहास रचा है और अब जो राजनीति पार्टी के भीतर हो रही है वो भी इतिहास रचने की
तरफ अग्रसर है।
पार्टी के अंदरखाने की कलह का आलम
ये है कि अगर आज में ये कहूं अरविंद केजरीवाल की बनाई पार्टी से उन्हे ही बेदखल
करने की क़वायद की जा रही है तो आप चौंकेंगे ज़रूर लेकिन अपने इस भविष्यवाणी के
पीछे मेरे पास कई तर्क हैं।
आप के भीतर पार्टी के अपने ही लोगों
द्वारा एक बड़ी गहरी साजिश चल रही है। 28 मार्च को आम आदमी पार्टी की रा्ष्ट्रीय परिषद की बैठक होन वाली है। इस कार्यकारिणी की रूपरेखा समझिए।
आप की इस राष्ट्रीय परिषद में
400 से ज्यादा सदस्य हैं। जिसमें दिल्ली से 70 सदस्य हैं जिसमें स्वयं योगेंद्र
यादव, प्रशांत भूषण और आनंद कुमार और अजीत झा शामिल हैं। इस बड़ी टीम के बाकी
ज्यादातर सदस्य यूपी, बिहार, मध्यप्रदेश, उड़ीसा, राजस्थान और पंजाब से आते हैं। यही परिषद आप की सबसे बड़ी व्यवस्था है। और इस टीम को हर बड़े फैसलों पर वोटिंग
का अधिकार है। प्रशांत भूषण और योगेंद्र यादव को बाहर का रास्ता दिखाने के
प्रस्ताव पर इन्ही सदस्यों को वोट करना होगा और उसके व्यवस्था के मुताबिक वोट के
आधार पर ही फैसला हो पाएगा।
यहीं से शायद सारा खेल शुरू होता
है। पार्टी की कार्यकारिणी और राष्ट्रीय परिषद कुछ सदस्यों ने पार्टी के सामने खुलासा किया है कि
पिछले कई दिनों से उन्हे विदेशों से आम आदमी पार्टी समर्थकों के फोन आ रहे हैं। ये भी क्या महज़ एक इत्तेफाक है कि एनआरआई सेल की कोर्डिनेटर शालिनी गुप्ता हैं जो प्रशांतभूषण की बहन हैं। 20
से 25 मिनट की बातचीत एनआरआई आप समर्थकों द्वारा परिषद के सदस्यों को ये समझाने की कोशिश की जा रही है कि 28 मार्च की परिषद में वो भूषण और यादव के पक्ष में वोट करें। इसके पीछे कौन है इसकी
जानकारी नहीं है लेकिन खबरें यहां तक हैं कि दिल्ली में कई आप सदस्य परिषद के
कई नेताओं के घर पर निजी तौर पर मुलाकात भी कर चुके हैं।
इतना ही राजस्थान के आप के एक नेता जिनपर आवाम संगठन को समर्थन देने
इतना ही राजस्थान के आप के एक नेता जिनपर आवाम संगठन को समर्थन देने
का आरोप है और जिन्हे 26 फरवरी को हुई आप की राष्ट्रीय कार्यकारिणी में बैठने से मना कर दिया गया था उन्होने सोशल मीडिया के जरिए भी परिषद के लोगों से भूषण और यादव के पक्ष में वोट करने की अपील की है। अब अगर 28 मार्च की परिषद की बैठक में यादव और भूषण के खिलाफ कारर्वाई का
प्रस्ताव गिरता है तो पार्टी में अरविंद केजरीवाल के नेतृत्व और पार्टी में उनके
जनाधार पर सवाल खड़ा हो जाएगा और अगर इसी बैठक में एक प्रस्ताव केजरीवाल को पार्टी
के राष्ट्रीय संयोजक पद से हटाने के लिए लाया जाता है जिसकी संभावनाओं से
परिस्थितियों को देखते हुए अब इनकार नहीं किया जा सकता ऐसे सें केजरीवाल अपनी ही
पार्टी से हारने और बाहर का रास्ता दिखाए जाने वाले पहले नेता होंगे। यानि अगर परिषद की बैठक में वोटिंग का बहुमत केजरीवाल के खिलाफ जाता है तो वही समूह क्या उन्हे
आगे पार्टी में भी रहने देगा ये भी सोचने वाली बात है।
महत्वकांक्षा की इस लड़ाई में अपनों
के खिलाफ अपनेें ही हथियार जमा कर रहे हैं और राष्ट्रीय परिषद के सदस्यों के साथ इस तरह
की लॉविंग इसका प्रमाण है।
लॉबिंग इसलिए भी खतरनाक है कयोंकि परिषद में दिल्ली के जयादातर सदस्य केजरीवाल के पक्ष में वोटिंग कर सकते हैं लेकिन चिंता होगी परिषद में वोटिंग का अधिकार रखने वालो 350 से ज्यादा सदस्यों की जो देश के बाकी हिस्सों मसलन यूपी, बिहार, एमपी, राजस्थान। इन राज्यों के सभी सदस्य,नेता और कार्यकर्ता कहीं ना कहीं चुनाव लड़ने की मंशा रखते हैं। हर किसी की राजनीतिक महत्वकाक्षा भी है। और जैसा मैंने पहले ही कहा कि आप में मची इस महाभारत के पीछे राजनीतिक महत्वाकांक्षा ही है। विदेशों से आने वाले आप समर्थकों और देश के अंदर से ही आने वाले फोन के ज़रिए राष्ट्रीय परिषद के सदस्यों को ये समझाने की कोशिश की जा रही है कि अगर पार्टी पर केजरीवाल का दबदबा रहा तो रामलीला मैदान में दिए गए उनके भाषण के मुताबिक वो पार्टी को किसी और राज्य में चुनाव नहीं लड़ने देंगे। ऐसे में पार्टी से जुड़े दूसरे राज्यों के तमाम कार्यकर्ताओं के राजनीतिक भविष्य पर खतरे की आशंका और राजनीतिक महत्वकांक्षा उन्हे राष्ट्रीय परिषद में केजरीवाल के खिलाफ वोट करने के लिेए मजबूर कर सकती है। और यही आधार है या यूं कहें की इसी महत्वाकांक्षा के हथियार को केजरीवाल के खिलाफ 28 मार्च को उनके खिलाफ राष्ट्रीय परिषद में इस्तेमाल किया जा सकता है। औऱ उनके प्रस्ताव पर वोटिंग में उन्हे बहुमत नहीं मिलता तो प्रस्ताव गिर जाएगा और केजरीवाल अपनी ही पार्टी में जनाधारहीन हो जाएंगे। और फिर उन्हे पार्टी के संयोजक पद से हाथ धोना पड़ सकता है।
लेकिन इस परिस्थति का ज़िम्मेदार कौन है ? इन सबकी शुरूआत हुई लोकसभा चुनावों में पार्टी की शर्मनाक हार के बाद पंजाब में हुई कार्यकारिणी की बैठक में जब योगेंद्र यादव ने प्रस्ताव रखा कि पार्टी को आगामी 4 विधानसभाओं के चुनाव लड़ने चाहिए। लोकसभी चुनाव में मुंह की खा चुके केजरीवाल बिना संगठन बनाए इसके लिए कत्तई तैयार नहीं थे। और आखिरकार हरियाणा में चुनाव लड़ने का यादव का सपना चकनाचूर पो गया। पार्टी की कार्यकारिणी ने ध्वनिमत से इस प्रस्ताव को खारिज कर दिया।
लॉबिंग इसलिए भी खतरनाक है कयोंकि परिषद में दिल्ली के जयादातर सदस्य केजरीवाल के पक्ष में वोटिंग कर सकते हैं लेकिन चिंता होगी परिषद में वोटिंग का अधिकार रखने वालो 350 से ज्यादा सदस्यों की जो देश के बाकी हिस्सों मसलन यूपी, बिहार, एमपी, राजस्थान। इन राज्यों के सभी सदस्य,नेता और कार्यकर्ता कहीं ना कहीं चुनाव लड़ने की मंशा रखते हैं। हर किसी की राजनीतिक महत्वकाक्षा भी है। और जैसा मैंने पहले ही कहा कि आप में मची इस महाभारत के पीछे राजनीतिक महत्वाकांक्षा ही है। विदेशों से आने वाले आप समर्थकों और देश के अंदर से ही आने वाले फोन के ज़रिए राष्ट्रीय परिषद के सदस्यों को ये समझाने की कोशिश की जा रही है कि अगर पार्टी पर केजरीवाल का दबदबा रहा तो रामलीला मैदान में दिए गए उनके भाषण के मुताबिक वो पार्टी को किसी और राज्य में चुनाव नहीं लड़ने देंगे। ऐसे में पार्टी से जुड़े दूसरे राज्यों के तमाम कार्यकर्ताओं के राजनीतिक भविष्य पर खतरे की आशंका और राजनीतिक महत्वकांक्षा उन्हे राष्ट्रीय परिषद में केजरीवाल के खिलाफ वोट करने के लिेए मजबूर कर सकती है। और यही आधार है या यूं कहें की इसी महत्वाकांक्षा के हथियार को केजरीवाल के खिलाफ 28 मार्च को उनके खिलाफ राष्ट्रीय परिषद में इस्तेमाल किया जा सकता है। औऱ उनके प्रस्ताव पर वोटिंग में उन्हे बहुमत नहीं मिलता तो प्रस्ताव गिर जाएगा और केजरीवाल अपनी ही पार्टी में जनाधारहीन हो जाएंगे। और फिर उन्हे पार्टी के संयोजक पद से हाथ धोना पड़ सकता है।
लेकिन इस परिस्थति का ज़िम्मेदार कौन है ? इन सबकी शुरूआत हुई लोकसभा चुनावों में पार्टी की शर्मनाक हार के बाद पंजाब में हुई कार्यकारिणी की बैठक में जब योगेंद्र यादव ने प्रस्ताव रखा कि पार्टी को आगामी 4 विधानसभाओं के चुनाव लड़ने चाहिए। लोकसभी चुनाव में मुंह की खा चुके केजरीवाल बिना संगठन बनाए इसके लिए कत्तई तैयार नहीं थे। और आखिरकार हरियाणा में चुनाव लड़ने का यादव का सपना चकनाचूर पो गया। पार्टी की कार्यकारिणी ने ध्वनिमत से इस प्रस्ताव को खारिज कर दिया।
क्या यहीं से महत्वाकांक्षाओं के बीच घमासान
शुरू हुआ। केजरीवाल ने दिल्ली को लक्ष्य बनाया और सारे विवादों और घमासानों से खुद
को दूऱ रखके अपनी टीम दिल्ली बनाई जिसका नतीजा दिल्ली में 67 सीटों पर दिखाई दिया।
इधर केजरीवाल और उनकी टीम दिल्ली चुनावों की तैयारी कर रही थी और उधर मनीष
सिसोदिया और योगेंद्र यादव की चिठ्ठी सामने आ रही थी। पार्टी के बीच खुले घमासान
की पहली तस्वीर यहीं से सामने आई।
लेकिन कई और भी कारण हैं
अपनी ही पार्टी में कमजोर पड़ रहे केजरीवाल खेमे की।
यादव और भूषण ने पीएसी से
निष्कासित होने के पहले और बाद में मीडिया और सोशल मीडिया में अपनी परिपक्व और
सामाजिक छवि को सामने रखा। पीएसी से निकाले जाने पर पार्टी के फैसले खिलाफ जाकर
लेकिन बहुत संयमित तरीके से जनता और समर्थकों के बीच अपनी बात रखी। इसके विपरीत आम
आदमी पार्टी से जो चेहरे इन दोनों के खिलाफ बयानवाजी या अपना पक्ष रखने आए वो कहीं
इन दोनों के आगे कहीं भी नहीं टिकते थे। दिलीप पांडे से लेकर संजय सिंह और आशीष
खेतान या फिर आशुतोष, किसीकी की भी सामाजिक छवि यादव और भूषण के आगे बौनी थी। पार्टी
के किसी भी नेता पर समर्थकों और कार्यकर्ताओं को विश्वास नहीं था। पार्टी अपनों के
खिलाफ दिखाई दे रही थी। जो योगेंद्र यादव और प्रशांत भूषण पार्टी के सबसे बुरे
दिनों में तारनहार की भूमिका में नज़र आए आज उन्ही पर उनकी पार्टी के नेता आरोप
लगा रहे थे लेकिन उनकी सुनने वाला कोई नहीं था। विपरीत इसके यादव और भूषण लगातार
मीडिया और सोशल मीडिया में अपनी बात ना सिर्फ कहते रहे बल्कि उनकी सामाजिक छवि
उन्हे लगातार महान बनाती रही।
सोशल मीडिया पर भी दिल्ली में सिमट चुकी आम
आदमी पार्टी समर्थकों तक अपनी बात नहीं पहुंचा पाई। और यहां ज़रूरत पड़ी केजरीवाल की।
पार्टी की ज़रूररत थी कि कजरीवाल सामने आएं और समर्थकों के सामने अपनी बात रखते।
लेकिन ऐन वक्त पर केजरीवाल अपना इलाज कराने चले गए और पार्टी की डूबती नाव बीच
भंवर में छोड़ गए जिसका खामियाजा उन्हे 28 मार्च की कार्यकारिणी में भुगतना पड़ सकता
है। सच क्या है...ग़लती किसकी है...और ऐसे किसी भी सवाल से अव क्या फर्क पड़ता
है...क्या एक साल से चले आ रहे षडयंत्र के सफल होने का वक्त आ गया....क्या देश को
राजनीति को बदलने का दावा करने वाले केजरीवाल अपनी ही पार्टी के भीतर की राजनीति
से परास्त होंगे....जी ...अब देखना है कि क्या अपनी ही पार्टी से बेदखल होंगे केजरीवाल ?
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