Sunday, April 10, 2011

हम जीत गए, मैं जीत गया....




अण्णा हजारे के साथ हजारों। जंतर-मंतर पर ये नारा थमने का नाम नहीं ले रहा था। सिस्टम के खिलाफ आम आदमी का गुस्सा था। कुछ दिन पहले देश ने वर्ल्डकप जीता था। अब देश एक बार फिर कप जीता है। करप्शन की पिच पर फ्रंटफुट पर बैटिंग करने उतरे यूपीए के टॉप आर्डर को अण्णा की फिरकी ने बैकफुट पर फेंक दिया। मैंने 1947 का आंदोलन नहीं देखा और ना ही मेरी नई पीढ़ी ने इस तरह का आंदोलन देखा होगा।
लेकिन 2011 के के इस क्रांति का मैं गवाह भी हूं और हिस्सा भी। हमारी लड़ाई ना बाबू से थी, और ना खादी से। ना साहब से थी और ना खाकी से। ये लड़ाई थी सिस्टम से। अब तक कहते रहे कि इस देश का कुछ नहीं हो सकता क्योंकि इस देश का सिस्टम ही खराब है। दुनिया की सबसे बड़ी डेमोक्रेसी की विडंबना ही यही थी। लेकिन पानी सर से ऊपर हो गया।
गांधी और भगत सिंह के किस्से पढ़े भी और सुने भी, लेकिन जंतर-मंतर पर मैंने गांधी और भगत सिंह को देख लिया। इस पीढ़ी के साथ आनेवाली पीढ़ी को भी क्रांतिकारी बनते देख लिया। हाथों में तिरंगा और सत्ता कि खिलाफ गुस्सा...ये क्रांति नहीं तो और क्या है ? ये गुस्सा शायद सालों से हमारे अंदर था। करप्शन का शिकार हममें हर कोई हो चुका है। स्कूल में एडमिशन के लिए करप्शन, गाड़ी चलाने की परमिशन के लिए करप्शन....लेकिन अब बस...
मैं विधिज्ञानी नहीं हूं। इसलिए नहीं जानता कि लोकपाल बिल कितना कारगर होगा...होगा भी या नहीं। लेकिन इतना समझ गया कि पब्लिक अब चुप नहीं रहेगी। अब लालबत्ती पर 100 रुपए नहीं दूंगा। गलती की, तो सज़ा भुगत लूंगा लेकिन 100 रुपए देकर इस करप्ट सिस्टम का हिस्सा नहीं बनूंगा। किसी ने अन्याय किया तो चुपचाप सहने की बजाए लोकपाल का दरवाजा खटखटाउंगा। अब तक देश में अंधेर देखा है इसलिए देर से ही सही लेकिन हक की लड़ाई लड़ूंगा।
अरे ! वोट देकर जिसे अपना रहनुमा बनाकर दिल्ली भेजा उसने हमारे सीने में छुरा भोंक दिया। मेरा घर संभालने के लिए मैंने जिसे पावर दिया उसीने मेरे घर में डाका डाल दिया। अब मैं अपने घर की रखवाली के लिए नेता की बजाए अपना अधिकारी रखना चाहता हूं। वो मेरा लोकपाल होगा। वो मेरी बात सुनेगा। ना जाने कितने राजा और कलमाड़ी मेरे घर से मेरी ही मेहनत की कमाई लूटकर अपनी तिजोरी भर रहे हैं। मेरी शिकायत सुनने वाला कोई नहीं है। मेरा लोकपाल मेरी सुनेगा। और ऐसे राजा और कलमाड़ी से मेरा पैसा मुझे वापस लाकर देगा। इतना ही नहीं उन्हें उनके कारनामों की सजा भी देगा।
मैं भी जंतर-मंतर गया था। अण्णा हजारे को समर्थन देने नहीं बल्कि अपने आनेवाली पीढ़ी को ये बताने कि मैंने इस सिस्टम को बदलने के लिए आवाज़ उठाई थी। मेरा नाम इतिहास में भले ना लिखा जाए लेकिन मैं उस इतिहास का हिस्सा हूं। मैं सरकार को झुका दिया। उन्हे झुका दिया जो खुद को खुदा समझते थे। मैंने उन्हे बता दिया कि मालिक मैं हूं और तुम सिर्फ नौकर। अण्णा के एहसान मैं कभी नहीं भूलुंगा। अण्णा ने मुझे ताकत दी मेरे गुस्से को सही रास्ता दिखाया। मेरी आवाज के आगे सिस्टम झुक गया। ये मेरी जीत है...ये हमारी जीत है......