Saturday, July 12, 2014

सूखे की चपेट में देश !

मोदी सरकार भले ही देश में अच्छे दिन आने दावा कर रही हो लेकिन एक इन दावों प्रकृति झुठलाने की तैयारी में है। मॉनसून आ चुका है, लोगों नज़रें आसमान पर गाड़े बैठे हैं लेकिन इंद्र देवता भक्तों से कुछ नाराज़ नज़र आ रहे हैं। बादल रह-रह कर आंख मिचौली कर रहे हैं। जुलाई के मौसम में भी बदन पर बारिश की बूंदें ठंडक देने के बावजूद सूरज की तपिश उसे जला रही है। हरे-भरे मैदान सूख रहे हैं और पंक्षी आशियाना बदल रहे हैं। बादलों की छाया जैसे ही मन को बहलाती है अगले ही पल सूरज की तेज किरणें सारे अरमानों पर पानी फेर देती हैं। गांवों में कहीं कुंएं सूख रहे हैं तो कहीं नले से निकलता पानी भी अब सूख चुका है। देश सूखे की ज़बरदस्त मार से ग्रस्त होने की राह पर है। मौसम विभाग की मानें तो जून महीने में औसत बारिश से 50 फीसदी से ज्यादा की कमी रही। गुजरात और राजस्थान में तो सामान्य से 80 फीसदी कम बारिश हुई है। जुलाई के आंकड़े भी राहत की खबर नहीं लेकर आए। जुलाई में अमूमन झमाझम बारिश होती है लेकिन ज़मीन दो बूंदों के लिए अभी भी तरस रही है। मॉनसून अपनी ताकत खो बैठा है नतीजन जुलाई में भी धरती की कोख सूखी ही रह जाएगी। मौसम विभाग की मानें तो जुलाई में भी उतनी बरसात नहीं होगी जितनी अमूमन जुलाई महीने में होती है। कम बरसात के चलते आधे उत्तर भारत को बिजली और पानी देने वाला भाखड़ा नांगल बांध भी सूख रहा है। बांध में पानी का स्तर कम होने के चलते आस-पास के राज्यों को पानी की सप्लाई रोके जाने का खतरा है। हिमाचल के कई बांधों में भी पानी का स्तर कम हो चुका है जिसका सीधा असर सिंचाई पर पड़ेगा। उत्तरप्रदेश, मध्यप्रदेश, पंजाब, राजस्थान, गुजरात, हिमाचल, हरियाणा और महाराष्ट्र के कुछ हिस्से सबसे ज्यादा सूखे की चपेट में हैं। आंकड़ों के मुताबिक अबतक मात्र 256 लाख हेक्टेयर क्षेत्रफल में ही खरीफ की फसल की बुवाई हो पाई है जो पिछले वर्ष जुलाई में 520 लाख हेक्टेयर से भी ज्यादा थी। देश के कई हिस्सों में दाल की फसल भी नुकसान हो रही है इसलिए किसान दालों की जगह धान की खेती कर रहे हैं। ज़ाहिर है आने वाले समय में दालों के दाम और बढ़ेंगे। सूखे के चलते देश का सालाना पैदावार में 3 करोड़ टन अनाज की कमी आ सकती है। बिगड़े मॉनसून के चलते ये तमाम समस्याएं देश के समानेव आ सकती हैं। इसलिए सवाल ये कि ऐतिहासिक जनमत से सत्ता में आई मोदी सरकार क्या कर रही है।   
  ऐसा भी नहीं है कि केंद्र सरकार हाथ पर हाथ धरे बैठी है। सरकार के सूत्रों की मानें तो केंद्र ने सूखे से निपटने के लिए एक मास्टरप्लान तैयार कर लिया है जिसके तहत राज्यों के साथ बेहतर तालमेल किया जाएगा ताकि हर स्थिति पर गंभीरता से नज़र रखी जा सके। सरकार ने ग्रामीण विकास मंत्रालय के अधीन एक निगरानी सेल भी गठित की है जो संभावित सूखे की चपेट में आने वाले राज्यों की केंद्रीय कार्यक्रमों के तहत की जा रही तैयारियों पर नज़र रखेगी। मामला सिर्फ कागज़ी कार्रवाई तक ना रह जाए इसलिए केंद्र ने सभी राज्यों से मनरेगा के तहत अगले 3 महीनों तक हर पखवाड़े रिपोर्ट भी तलब की है ताकि सूखे की मार से जनता को राहत दी जा सके। केंद्र ने मनरेगा के तहत सभी राज्यों के अधिकार क्षेत्र भी बढ़ा दिए हैं ताकि छोटी नहरों से लेकर सिंचाई के और भी साधनों का बंदोबस्त किया जा सके। कमज़ोर मॉनसून के चलते देश भर में पहले ही आलू, प्याज टमाटर और सभी सब्ज़ियों के दाम आसमान छू रहे हैं। हां लेकिन वित्तमंत्री अरुण जेटली को मंहगाई की मार झेलती जनता का दर्द नहीं दिखाई देता बल्कि उन्हे तो मंहगाई ही इतनी ज्यादा गंभीर नहीं लगती और शायद इसीलिए उनकी ओर से ये बयान आता है कि महंगाई को लेकर पैनिक (डर) करने की ज़रूरत नहीं है। अब कौन बतलाए जेटली जी को देश में निम्न मध्य वर्ग की तादात मध्य वर्ग और उच्च वर्ग कई गुना ज़्यादा है और जिसकी जेब में आने वाले पैसों से बमुश्किल ही उनके घर का खर्च चल पाता है, बचत के बारे में तो बेचारे सोचकर ही जी लेते हैं। वित्त मंत्री जी ने जो बजट पेश किए वो मध्यवर्ग को बेहद आकर्षक लगा, बड़ी-बड़ी कंपनियों ने इसे सर माथे पर लिया और अरबों का व्यापार करने वालों की तो पौ-बारह हो गई। बेचारा गरीब तबके के अच्छे दिनों के सपने महज़ सपने बन कर रह गए। ख़ैर इन पर कभी और चर्चा करेंगे, फिलहाल बात देश पर मंडराते हुए भयानक सूखे की खतरे की ही करते हैं। सरकार ने 50 लाख टन चावल सार्वजनिक वितरण प्रणाली के लिए आबंटित कर दिए हैं। मई महीने में खाद्य मंहगाई दर 9.50 थी जो अप्रैल के मुकाबले के थोड़ी कम रही लेकिन जून का डाटा सरकार के लिए अच्छी खबर लेकर नहीं आया। डेढ़ महीने पहले ही निर्वाचित हुई मोदी सरकार के समाने एक के बाद एक मुसीबतें खड़ी हो रही हैं ओर इन्ही चुनौतियों से सकुशलता से लड़ना ही नरेंद्र मोदी अपनी पहचान बताते रहे हैं। अब बात गुजरात के 6 करोड़ लोगों तक सीमित नहीं है और ना ही बात एक राज्य में दबकर रह जाएगी। मोदी के हर कदम को ना सिर्फ सारा देश बल्कि सारी दुनिया देखेगी। और अगर इस पहलू को छोड़ भी दें मोदी उन लाखों करोड़ों लोगों की उम्मीद भी हैं जिन्होने मोदी में अपने लिए हीरो तलाशा था। देश में आने वाला सूखा और उससे लड़ने की सरकार की मंशा और तरीका दोनों ही प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और उनकी राजनीति का भविष्य लिखने में एक अहम भूमिका अदा करेंगे। इसलिए प्रधानमंत्री जी फिलहाल राज्यों के गवर्नर के तबादले, निजी सचिवों के मसले, विपक्ष की चिंता और राज्यों के चुनावों की चिंता छोड़कर अब देश की ओर देखिए क्योंकि देश आप की तरफ देख रहा है। 

Thursday, July 10, 2014

De-रेल बजट !

मोदी सरकार ने अपना पहला रेल बजट पेश कर दिया। लाखों लोगों की उम्मीदों के विपरीत सरकार ने 20 जून को ऐतिहासिक तरीके से बढ़ाए गए 14 प्रतिशत रेल किराए को वासप नहीं लिया। शेयर मार्केट ने भी रेल बजट में रुचि नहीं दिखाई और बाज़ार धडाम हो गया। रेलवे रिफॉर्म के  बल्कि नाम पर बजट में जो कुछ भी रेल मंत्री ने संसद में रखा वो ज्यादातर की समझ से परे था। मेरा इसरा विपक्ष द्वारा सदन में किए गए विरोध से नहीं बल्कि बजट के अंदर ढेरों विसंगतियों से है। चलिए तकनीकि तौर पर इस बजट को देखते हैं। सरकार द्वारा प्रतावित इस रेल बजट की अमुमानित लागत 65,455 करोड़ है। हास्यादपद ये कि रेलवे की सालाना कमाई ही 6
0 हज़ार करोड़ है। यानि सरकार पहले ही रेलवे को घाटे में में ले जाने का मन बना चुकी है। बजट की दूसरी सबसे अहम बात रही रेलवे में देशी और विदेशी प्रत्यक्ष निवेश। विपक्ष में रही भाजपा लगातार विदेशी निवेश का विरोध करती रही लेकिन सत्ता में आते ही सरकार के सुर अगर बदल गए तो इसमें हैरत नहीं होनी चाहिए क्योंकि सत्ता की कई मजबूरियां होती हैं। बहरहाल, अर्थशास्त्र की मानें तो निवेशक हमेशा वहीं निवेश करता है जहां धंधा मुनाफे का हो। नई सरकार ने पहले ही रेलवे को 5 हज़ार करोड़ से ज्यादे के घाटे में डाल दिया है। लेकिन इसके वाबजूद अगर कोई विदेशी कंपनी रेलवे में निवेश के लिए आगे आती है उसके रेड कारपेट ज़रूर बिछाए जाने चाहिए।
         इस उम्मीद के साथ देशी निजी निवेश एक डर भी अपने साथ ला रहा है जो है रेलवे के निजीकरण का। वामदल ही नहीं देश का एक बड़ा तबका इसके खिलाफ है और इसीलिए सरकार को ऐसा कोई कदम उठाने के पहले सभी पक्ष के लोगों से एक व्यापक चर्चा करनी चाहिए।
        ऐसा भी नहीं कि रेल बजट में सिर्फ खामियां ही हैं, कई ऐसे पहलू भी हैं जिनकी तारीफ की जानी चाहिए। मसलन रेलवे विश्वविद्यालय खोलने का ऐलान एक नई उम्मीद जगाता है जहां नई पीढ़ी हाई-स्पीड के गुर सीखेगी। चुनिंदा रेलवे स्टेशनों को हवाई अड्डों की तर्ज पर विकसित करना। पीने का पानी, साफ-सफाई और गुणवत्ता पूर्ण खाने की बात में रेल मंत्री सदानंद गौड़ा ने कही। सरकार ने इस बजट में बहुत कम नई ट्रेनों का ऐलान किया लेकिन एक सबसे बड़ा ऐलान किया हाई स्पीड ट्रेनों और बुलेट ट्रेन का।

                प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपनी चुनावी रैलियों में देश भर को बुलेटट्रेन में घुमाने का वादा किया था और वो वादा इस बजट में भी दिखाई दे ही गया। रेलमंत्री में मुंबई से अहमदाबाद के बीच पहली बुलेट ट्रेन चलाने का ऐलान किया है। गुजरात को मोदी सरकार ने पहला तोहफा दे ही दिया। अब बुलेट ट्रेन की अपनी ही एक कहानी है जिसके बारे में बाद में लिखूंगा लेकिन ये ये मान के चलिए कि मुंबई को गुजरात से बुलेट ट्रेन से जोड़ना खर्चीला बहुत है। अनुमानित लागत इस प्रोजेक्ट पर 60 हज़ार करोड़ रुपए बताई जा रही है जो कि रेलवे की सालान कमाई के बराबर है। इस बुलेट ट्रेन का इस्तेमाल कितना किफायती और फायदेमंद होगी इस पर एक व्यापक चर्चा की जा सकती है। भारतीय रेलवे की यात्रा करने वाली यात्री अमूमन 2 रु प्रतिकिलोमीटर देकर यात्रा करता है। वहीं बुलेट ट्रेन में प्रतिकिलोमीटर की यात्रा 8-9 रुपए तक आती है ऐसे में भारत में बुलेट ट्रेन कितनी व्यावहारिक होगी ये भी सवालों के घेरे में है। मौजूदा हालात में देश का हर यात्री चाहता है कि उसे बुनियादी सहूलियतें मिलें। मसलन बुलेट ट्रेन ना सही लेकिन मौजूदा ट्रेनों में सुविधाएं बेहतर हो। रेलमंत्री में अने बजट भाषण के दौरान कहा कि वो रेलवे को फायदे वाली कंपनी बनाना चाहते हैं जो सेवा निहितार्थ हो। लेकिन किसी भी धंधे में उपभोक्ता से उधार नहीं नहीं लिया जाता हां सुविधाओं के अनुसार उसकी कीमत ज़रूर ली जाती है। मोदी सरकार ने किरए में बढोत्तरी कर दी और कहा कि कड़वी दवाई है, पी जाइए और देश की तबियत सही कर देंगे। हां ये सही कि कोई भी विकास कार्य एक दिन में नहीं हो सकता लेकिन इस सरकार को ये भी मानना होगी कि जनता जो उम्मीदें इस सरकार से लगा रही है वो इनके दिखाए उन बड़े-बड़े सपनों की वजह से है। रेलवे आज भी साफ-सफाईष गुणवत्तापूर्ण खाना, सुरक्षा और तमाम खामियों से जूझ रहा है। यात्रियों की संख्या ज्यादा है और ट्रेनें कम। अच्छी ट्रेनों के नाम पर हमारे पास राजधानी और शताब्दी है जिसकी औसत रफ्तार 100 किमी है। रही बात सुरक्षा की तो हाल ही राजधानी एक्सप्रेस में हुआ हादसा इसकी असली कहानी कहता है। कुल मिलाकर बात इतनी है कि मौजूदा रेलवे की ओर नज़र डालें रेल मंत्री जी, जो है उसे बेहतर बनाएं, बुलेट की सवारी बाद में भी कर लेंगे फिलहाल जो रेंग रही हैं उनकी रफ्तार बढ़ाएं। 

Sunday, July 6, 2014

किसकी होगी दिल्ली...


6 महीने बीतने को आ गए और दिल्ली अभी भी भगवान भरोसे है। अरविंद केजरीवाल के नेत्रित्व वाली और कांग्रेस के समर्थन से चल रही आम आदमी पार्टी की सरकार द्वारा दिल्ली से महज़ 49 दिनों में इस्तीफा देने के बाद दिल्ली में प्रत्यक्ष रूप से कोई सरकार नहीं है। लेकिन संविधान के अनुसार देश की राजधानी पर अप्रत्यक्ष रूप में राज वर्तमान समय में केंद्र में ऐतिहासिक बहुमत से सरकार बनाने वाली भाजपा का है। आप के सत्ता छोड़ने के बाद दिल्ली में राषट्रपति शासन लागू है। आप का कहना है कि सरकार से इस्तीफा देना और एलजी को दिल्ली विधानसभा भंग करने की सिफारिश एक बहुमत की सरकार का फैसला था। पूरे विवाद पर सुनवाई देश की सबसे बड़ी अदालत में चल रही है। आप का दावा है कि वो अब दोबारा जनता की अदालत में जाने के लिए तैयार है। दिल्ली में सालों तक अपना झंडा गाड़ने वाली कांग्रेस दिल्ली विधानसभा में महज़ 8 सीटों पर सिमटकर रह गई। लोकसभा में कांग्रेस दिल्ली में खाता भी नहीं खोल पाई और वही हाल आम आदमी पार्टी का भी हुआ। मोदी की लहर में आप का किला भी ढह गया। पार्टी के अंदरखाने से ही पार्टी आलाकमान के खिलाफ़ आवाजें उठने लगी। एक तरफ पार्टी में टूट की खबरें दूसरी तरफ कांग्रेस द्वारा आप को दोबारा समर्थन ना देने के फैसले से पार्टी के पास चुनाव में जाने के अलावा दूसरा विकल्प नहीं दिखाई पड़ता। कांग्रेस दिल्ली में हाशिए पर जा चुकी है। बिजली-पानी की किल्लत को लेकर हालिया दिनों में कांग्रेस फिर से जीवित होने का अहसास कराने की कोशिश कर रही है लेकिन वास्तविकता यही है कि दिल्ली के दंगल से फिलहाल वो बाहर हो चुकी है।
सबसे चौंकाने वाला और समझ से परे रवैया बीजेपी का दिखाई देता है। दिल्ली की सातों लोकसभा सीटों के साथ भाजपा ने पूरे देश में ऐतिहासिक बहुमत हासिल किया। तमाम सर्वे को झुठलाते हुए बीजेपी ने अपने दमपर ना सिर्फ 272 का आंकड़ा पार किया बल्कि अपनी अगुवाई में एनडीए को 300 का आंकड़ा भी पार कर दिया। जहां तक सवाल दिल्ली का है, बीजेपी यहां निकायों पर भी काबिज़ है और लोकसभा की सभी सीटों पर उसकी के सांसद हैं बावजूद इसके बीजेपी दिल्ली में चुनाव कराने से परहेज़ कर रही है। पार्टी में एक बड़ी धड़ा मानता है कि अगर दिल्ली में चुनाव हुए तो नई-नवेली सरकार ने कड़वी दवाओं के नाम पर बोझ़ डाला है उसका साइड इफेक्ट उसे दिल्ली में झेलना पड़ सकता है। हालिया लोकसभा चुनावों में आम आदमी पार्टी को भले ही दिल्ली में सीटें ना मिली हों लेकिन तमाम दुष्प्रचारों के बावजूद उसका वोटबैंक और प्रतिशत बढ़ा है। और यही बढ़ता हुआ वोट प्रतिशत बीजपी के लिए चिंता का विषय है। इतना ही नहीं मुस्लिम बहुल इलाकों में भी आप को एकतरफा वोट मिलना भी बीजेपी के लिए चिंता का एक कारण है। वर्तमान विधानसभा में बीजेपी और अकाली दल की कुल मिलाकर 29 सीटें हैं वहीं दूसरी तरफ बिन्नी की बगावत के बाद आप के पास केवल 27 विधायक हैं। दिल्ली के एकमात्र निर्दलीय विधायक जिसने पहले आप की सरकार को समर्थन दिया अब उसने पाला दलकर भाजपा को समर्थन देने का ऐलान कर दिया है। भाजपा में दिल्ली में सरकार बनाने के मुद्दे पर दो फाड़ हो चुका है। एक हिस्सा जोड़-तोड़ की सियासत के लिए तैयार है तो दूसरा छवि की दुहाई देकर नैतिकता का मुखौटा ओढ़े रखना चाहता है। बीजेपी आलाकमान भी तमाम पहलुओं का फुरसत से अध्ययन करना चाहती है। इतनी फुरसत की दिल्ली वालों की तकलीफ सुनने का समय भी नहीं है। पिछले दिनों हुई बिजली की लगातार कटौती से दिल्ली के अच्छे दिन जो थे वो भी चले गए। बिजली के साथ-साथ पानी की समस्या से भी दिल्ली को जूझना पड़ा। जनता अपनी ज़रूरतों को लेकर सिसकियां बहाती रही और राजनीतिक पार्टियां अपनी सियासत में मशगूल रहीं। कांग्रेस ने गली-गली भाजपा और आप के खिलाफ मुहिम छेड़ दी। वहीं आप ने इस बार अपनी पारंपरिक धरना राजनीति से दूरी बनाई लेकिन और एमएलए फंड लेकर स्वराज का नया फार्मूला लेकर जनता के बीच जा रही है। भाजपा इस कशमकश में है कि दिल्लीवालों की तकलीफों को लेकर पिछली सरकार को कोसे या केंद्र में बैठी अपनी ही सरकार की आलोचना करे। बिजली कटौती को लेकर उर्जा मंत्रालय को जो रवैया रहा है बीजेपी के कई स्थानीय नेता उससे बड़े नाराज़ हैं। दबी ज़बान में वो ये भी मान रहे हैं कि उर्जा मंत्रालय वक्त रहते इन मुद्दों को गंभीरता से लेता तो सरकार और भाजपा की इतनी फजीहत नहीं
होती। फिलहाल दिल्ली बीजेपी इकाई तमाम दुष्वारियों को लेकर आप की पिछली सरकार को कोसकर खुश है। राजनीति की मजबूरी है कि जनता के बीच या तो अपनी कामयाबी लेकर जाएं या दूसरी की नाकामयाबी। अब दिल्ली में गुजरात भी तो नहीं बेचा जा सकता है। एक महीने की मोदी सरकार पहले ही अच्छे दिनों के लंबे इंतज़ार पर आलोचना झेल रही है वहीं मंहगाई पर लगाम लगाने में मिली असफलता औऱ कीमतों में इजाफा किए जाने से दिल्ली बीजेपी नतीज़ों को लेकर आशवस्त नहीं है।
              आम आदमी पार्टी को भी इतने बुरे नतीज़ों की उम्मीद नहीं थी। दिल्ली में सभी सीटों पर पार्टी के गले नहीं उतर रही है। समीक्षा जारी है कि हार क्यों हुई। देर से ही सही पार्टी के कार्यकर्ता और आला नेताओं ने अब ये स्वीकार कर लिया है कि दिल्ली की सत्ता छोड़कर उन्होंने बहुत बड़ी गलती की। पार्टी के राष्ट्रीय संयोजक अरविंद केजरीवाल ने लोकसभा के नतीजों के बाद दिल्ली की जनता से बिना राय लिए कुर्सी छोड़ने के लिए माफी भी मांगी। इतना ही नहीं पार्टी के सभी विधायक और खुद पूर्व मुख्यमंत्री अपनी तमाम मोहल्ला सभाओं में जनता से माफी मांग कर दोबारा अवसर दिए जाने की प्रार्थना कर रहे हैं। लोकसभा चुनावों में मोदी लहर के चलते भले ही आप को दिल्ली में एक भी सीट ना हासिल हुई हो लेकिन पार्टी इस बात से खुश है कि वो सभी सीटों पर दूसरे नंबर पर रही और चहुतरफा आलोचनाओं के बावजूद भी उसका वोट प्रतिशत बढ़ा है। साथ ही कांग्रेस जिन 8 सीटों पर आज मौजूद है उसमें से 5 सीटें मुस्लिम बहुतायत इलाकों की हैं जहां लोकसभा चुनावों में आप के पक्ष में वोट पड़े। दिल्ली विधानसभा चुनावों में 28 सीटों के अलावा कई सीटों पर आप के उम्मीदवार बहुत कम वोटों से हारे। आप एक नई रणनीति के साथ अभी से जनता के बीच में है। कांग्रेस अब पारंपरिक धरने की राजनीति से दिल्ली के मुद्दों पर केंद्र सरकार को घेर रही है। वहीं इस पशोपेश में है कि वो अपने आलाकमान की इजाजत लेकर दिल्ली में जोड़-तोड़ करके सरकार बनाए या जनता के बीच जाए और अगर जनता के बीच जाए तो क्या मुद्दा लेकर जाए क्योंकि अच्छे दिनों के वादे का हश्र पार्टी और जनता ने महज़ एक महीने में देख लिया। कुल मिलाकर दिल्ली के अच्छे दिन कब आएंगे इस पर सस्पेंस अभी भी बरकरार है। 

कहां गई मोदी सरकार......

मोदी सरकार सत्ता में एक महीने से ज्यादा समय बिता चुकी है लेकिन उसे अभी से जनता से शिकायत होने लगी है कि सरकार को हनीमून मनाने का समय भी नहीं दिया जा रहा है। सरकार की शिकायत इस बात की भी है कि जनता एक महज़ एक महीने में ही अच्छे ही दिनों की उम्मीद क्यों कर रही है जबकि किसी भी सरकार की नीतियां दीर्घकालिक होती हैं और उसके परिणाम भी दीर्घकाल के बाद ही दिखाई देते हैं। लेकिन उन्हीं दलीलों को जनता के सामने रखते समय सरकार को भी याद परिकल्पना किसने दी थी। भ्रष्टाचार से त्राहिमाम कर रहे देशवासियों को अच्छे दिनों के सपने किसने दिखाए। एक दलील ये भी हो सकती है कि चुनावों लड़ने का एकमात्र लछ्य होता है चुनान जीतना और सत्ता का स्वाद चखना। हिंदुस्तान को इस राजनीति की आदत पीढ़ियों से है और हम शिकायत भी नहीं करते, बस मन ही मन अपनी बेबसी का रोना रोते हैं। लेकिन गुजरात से आई हुई कहें या बनाई हुई एक आंधी दिल्ली का रुख़ करने लगी। नरेंद्र मोदी ने अपने तमाम चुनावी रैलियों में तत्कालीन यूपीए सरकार पर महंगाई और भर्ष्टाचार को लेकर न सिर्फ तीखे हमले किए बल्कि देश के करोड़ों लोगों के दिलों को वे अच्छे दिनों के नाम पर वो भेदने में भी कामयाब रहे। मार्केटिंग के ज़रिए भी चुनाव जीता जा सकता है 2014 इसका सबसे बड़ा प्रमाण है। पिछली सरकार के अगुवा पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने जब ये कहा कि उनके पास कोई जादू की छड़ी नहीं है ज़िससे वो महंगाई पे अंकुश लगा सकें। फैसले ना लेने के चलते सरकार और देश के हुए नुकसान पर साथियों का रोना भी पिछली सरकार ने दिया। नरेंद्र मोदी ने उन मुद्दों को भी उठाया और 300 से ज्यादा सीटों के लिए जनता से फरियाद की। मोदी की जादुई शख्शियत और बेबाक बोल जनता को कुछ ऐसे भाए कि बीजेपी की झोली में 300 से ज्यादा सीटें गिरीं। भारत के इतिहास की सबसे मजबूत सरकार लेकर मोदी प्रधानमंत्री बन गए। लेकिन अब बारी थी उन वादों को पूरा करने कि जिसके सपनों को बेचकर ये सरकार बनी थी। महज़ एक महीने में नई सरकार को आटे दाल का भाव पता लग गया। एक महीने के भीतर ही महंगाई ने देश को अपने गिरफ्त में ले लिया। चुनावों में ज़िक्र तक नहीं था लेकिन सरकार बनते ही प्रधानमंत्री ने कहा देशहित में कुछ कड़वे फैसले लेने होंगे। नतीजा पिछली सरकार द्वारा हर महीने डीज़ल की कीमतों में होनेवाले मालभाड़े का किराया बढ़ाकार। देश के इतिहास में रेल किराए और मालभाड़े में इतनी बढ़ोत्तरी ना देश ने कभी देखी या सुनी थी और ना ही रेलवे ने। मुंबई जैसे शहर में मासिक पास की कीमत तो आसमान से भी आगे जा गिरी। 14 प्रतिशत किराए का बोझ देश पर गिरा तो मुंबईकरों की जेबपर 300 प्रतिशत से ज्यादा को बोझ पड़ा। इसी साल महाराष्ट्र में चुनाव हैं और पॉलिसी पर पॉलिटिक्स किस तरह भारी पड़ी वो भी इस सरकार ने देखा। शिवसेना के दबाव और जनता के गुस्से के चलते मुंबईकरों पर पड़ा अतिरिक्त बोझ हट गया। सरकार ने एक महीना पूरा करते-करते रसोई गैस, डीज़ल और पेट्रोल के दाम भी बढा दिए। सरकार ने खजाने पर भारी सब्सिडी का हवाला दिया और देश को ये कहकर शांत रहने को कहा कि ये एक और कड़वी दवाई का डोज़ है। कड़वी दवाईयों का आलम ये है कि देश की जनता अब बीमार सी हो रही है। सरकार उलट जनता से सवाल करती है कि इतनी जल्दी अच्छे दिनों की उम्मीद हम क्यों करते हैं, हमारे पास कोई जादू की छड़ी नहीं है। ये सारा देश जनता है कि जादू की छड़ी ना तो पिछली सरकार के पास थी ना तो आपके पास है लेकिन चुनावों में आपने देश को कुछ ऐसे ही सपने दिखाए कि जैसे आपके आने से सब कुछ बस यूं ही ठीक हो जाएगा। जनता बस आपको अपने वादे याद दिला रही है ताकि आस उसे भूल ना जाएं। 3जी और 4जी के ज़माना और युवाओं की समाज में बढ़ती भागीदारी के चलते राजनीति अब उतनी आसान नहीं रह गई जितनी कभी रहा करती थी। चुनावी वादों को लोग अब यूं ही नहीं भूलते। देश अब नींद से उठ खड़ा है और देश चलाने वालों की उतनी ही जवाहदेही होगी जनता के प्रति जितनी संसद के लिए है। और ये जवाबदेही का बोझ है जिसे मोदी सरकार को उठाना ही पड़ेगा। सरकार के साथ उन तमाम राजनीतिक पार्टियों को अब ये याद रखना होगा कि सपने बेचकर सत्ता हासिल करने का मंसूबा छोड़ दें क्योंकि लोगों की चेतना जाग चुकी है। सवाल पूछे जाएंगे, बार-बार पूछे जाएंगे जैसे इस सरकार से जनता पूछ रही है कि अच्छे दिन कब आएंगे।