Saturday, November 21, 2009

ये नेता हैं या गुंडे ?




देश के हर राज्य में आपने कुछ लोगों को अपना प्रतिनिधि बनाकर उसे शहर, राज्य और राष्ट्र की सबसे ऊंची अदालतों में भेजा है। ये सोचा था कि हमारे प्रतिनिधि हमारे सुखों का ध्यान रखेंगे। हमारी समस्याओं को सरकार के सामने रखकर उसका समाधान करेंगे। लेकिन पांच साल इंतज़ार करने के बाद हमें मिली तो निराशा। सोचा पांच साल बाद इस प्रतिनिधि को सबक सिखाएंगे। आपने उसे सबक सिखाने के लिए किसी दूसरे दल के नेता को आगे कर दिया। कम से ये तो हमरा तारणहार होगा सोचकर उसे गद्दी दी, लेकिन वो भी हमें भूल गया। साल भर के अंदर ही पचा चला कि चंदा मांगकर चुनाव लड़ने वाले हमारे नेताजी के पास करोड़ों रुपए आ गए हों। मन को ये समझाया कि चलो नेताजी पर धन कुबेर की कृपा हो गई है। लेकिन एक विरोधाभास ने मेरी सोच पर सवाल खड़ा कर दिया कि देश के सभी राज्यों में कभी किसान, तो कभी मजदूर रहे नेताजी आज सोने की लंका बनाने के लिए तैयार हैं। धनकुबेर ने इनका साथ नहीं दिया। लेकिन इन्होने अपने सियासी चाल से अलादीन का वो चिराग हासिल कर लिया जिसके बलबूते वो सबके सामने हमारी खून-पसीने की गाढ़ी कमाई लूट लेते हैं। लेकिन हम कुछ नहीं कह सकते। फिर चाहे लाख 'कोड़ा' ही क्यों ना मार लो, होगा कुछ नहीं। लेकिन आपके सामने मेरा मुद्दा ये नहीं कि नेताजी चोर हो गए। कहना ये है कि अब चोरी के साथ नेताजी ने गुंडागर्दी शुरू कर दी। आपको की लूटेंगे और अगर आपने आवाज़ उठाई तो आपकी जान के लाले पड़ जाएंगे। अब महाराष्ट्र की सियासत का रुख करते हैं। महाराष्ट्र की क्षेत्रीय पार्टी है 'शिवसेना'। लेकिन अब इस पार्टी से सारा देश परिचित है। इसलिए नहीं कि आजादी से पहले कांग्रेस की तरह इन्होने भी अपने देश या फिर अपने राज्य के लिए कोई बलिदान दिया हो या कोई समाजसेवी काम किया हो। 60 के दशक में शिवसेना अस्तित्व में आई अपने तीखे तेवर के चलते। और आज उसका अस्तित्व है तो सिर्फ इसलिए क्योंकि उनका नया धंधा है लोगों को मारना-पीटना। 80 के दशक में उन्होने महाराष्ट्र में लोगों को एक दूसरे का दुश्मन बना दिया। जिस महाराष्ट्र में पहले एक उत्तर और दूसरा दक्षिण का आया एक साथ क कंपनी में काम करते थे, खाना खाते थे। इस शिवसेना ने उनमें दरार डाल दी। यानि अंग्रेजों की नीति को अपनाकर इन्हे सत्ता मिली। महाराष्ट्र के स्थानीय लोगों के कान में ये भरा गया कि परप्रांतीय उनका हक छीन रहे हैं। उनकी नौकरियां, उनकी रोजी-रोटी पर कब्ज़ा कर रहे हैं। राज्या में शिक्षा का स्तर आज के मुकाबले बेहद कम था। लोग आज के मुकाबले कम जागृक थे। शिवसेना के बहलावे-फुसलावे में आकर उन्होने अपने भाइयों को अपना दुश्मन मान लिया। बाबा साहब अंबेडकर के कानून ने हर शख्स को ये अधिकार दिया है कि वो देश के किसी भी कोने में अपनी जीविका चला सकता है। लेकिन शिवसेना ने इस कानून को दरकिनार कर अपना नया कानून बनाया। इस कानून के मुताबिक सिर्फ मराठियों को मुंबई में रहने का अधिकार था। शिवसेना को सबसे ज्यादा चिढ़ उत्तरभारतीयों से रही। या यूं कहें कि परप्रांतीय शब्द उन्होने केवल उत्तरभारतीयों के लिए ही बनाया था। क्योंकि आज भी महाराष्ट्र में किसी और राज्य के लोगों के खिलाफ शिवसेना ने अपना मोर्चा नहीं खोला है। बरगलाए मराठियों ने उत्तरभारतीयों को मारना-पीटना जो शुरू किया तो आज तक सिलसिला नहीं थमा। कई सरकारें बदल गईं लेकिन सिलसिला चलता रहा। वक्त के साथ लोग नींद से जागे। हक़ीकत को पहचानने लगे। जनता को जगाने का सबसे बड़ा काम किया मीडिया ने। एक के बाद कई नेताओं के कारनामों का पर्दाफाश होने के बाद खादी के अंदर छिपे गीदड़ों को डर लगने लगा। मीडिया ने महाराष्ट्र में मार-पीट के सिलसिले को खत्म करने की ठानी। मराठियों को ये समझाया कि घर बैठे नौकरी नहीं मिलती। अगर उत्तरभारतीय महाराष्ट्र में नौकरी करना छोड़ दें तो क्या उनके अंदर मेहनत कर करियक बनाने की क्षमता रह पाएगी। राज्य में कई असामाजित तत्व भी इन नेताओं की शरण में आए। क्यों क्योंकि खादी की शरण में आकर उनके गुनाह छिप जाते हैं। लोग जब जागे तो सत्ता का लंबे अरसे तक स्वाद भोग चुकी शिवसेना राज्य में हाल ही में हुए चुनाव में बुरी तरह हारी। महाराष्ट्र की जनता ने शिवसेना को ये अहसास करा दिया कि अब वो हिंदू-मुस्लिम के नाम पर लड़ने की बजाय अपने परिवार को अच्छी परवरिश देने की कोशिश करेंगे। वक्त के साथ कदम मिलाकर चलने की राह में नई पीढ़ी भी राजनीति में कूद पड़ी, नतीजा धोती वाले बूढ़े नेताजी को चिंता हो गई कि अब वो अपनी जेब कैसे भरेंगे। बहरहाल इस नए युग को बनाने में सबसे बड़ा हाथ रहा मीडिया का। सियासत को पलट देने वाली ताकत रखने वाली मीडिया से खार खाकर शिवसेना ने अपना अपना गुस्सा मीडिया पर भी उतारना शुरू कर दिया है। दिया भले कितने ही गहन अंधेरे में हो, उसकी लौ उजाला तो करेगी ही। लेकिन शिवसेना से आसामाजिक पार्टिया नहीं चाहतीं कि जनता जागे जिससे उनका सिक्का चलता रहे। लेकिन वक्त बदल चुका है। शिवसेना की ही गोद से निकली एक और पार्टी ने मैं मराठी- मैं मराठी का झंडा लेकर महाराष्ट्र में नया बवाल शुरू कर दिया है। भाषा और राज्य के नाम पर भेदभाव करने और विकृत मानसिकता वाली इस दूसरी असामाजिक पार्टी का नाम है महाराष्ट्र नव निर्माण सेना। राज्य के बेरोजगार युवाओं को करियर बनाने के लिए जमकर मेहनत करने की सलाह देने के बजाय इस सेना पार्टी के मुखिया राज ठाकरे कहते हैं कि उत्तरभारतीयों को भगाओं, तभी तुम्हारा घर चलेगा। शिक्षा से मुंह चुराने वाले, आपराधिक छवि वाले जैसे कुछ युवा राज ठाकरे की इस मुहिम में शामिल हो चुके हैं। लेकिन आज वो ये नहीं जानते कि सियासत में गंदा खेल खेलने वालों को अब ज्यादा दिन आराम नहीं मिलता। इससे पहले वक्त निकल जाए, कुछ ऐसा करें ताकि उनका देश, उनका राज्य उनके साथ विकसित हो। बहरहाल मीडिया पर हल्ला करके शिवसेना ने अपने हार की भड़ास निकाली। शिवसेना के हार के पीछ सबसे अहम किरदार मीडिया ने निभाया। पार्टी अपने अंत पे है और बुझने से पहले फड़फड़ा रही है। लेकिन इस काले धुंए वाले दिए की जगह एक और दिए ने ले ली है।

Friday, November 20, 2009

चलो मेला देखें




बचपन में मेला देखने गया था। पिताजी की उंगली पकड़र गांव के किनारे पर दशहरा का बड़ा मेला लगा था। उस उम्र में शायद वही मेला बड़ा लगता था। मेला चूंकि दशहरा का था इसलिए रावण का पुतला जलाने की तैयारी थी। मैं डरने लगा लेकिन मेरे पिता को भला ये कैसे मंज़ूर हो कि उनका लाल, उनके घर का चश्मोचिराग डर जाए, और वो भी एक पुतले से। पितजी ने मुझे समझाया कि ये पुतला है इससे डरते नहीं। मेरे मंद बुद्धिपटल पर उन्होने रावण और रामायण से जुड़ा सारा ज्ञान उड़ेल दिया। लेकिन मेरा ध्यान तो आम के पेड़ के नीचे लगी दुकान में छन रहे ताज़ा-ताज़ जलेबियों पर था। मेले में गुब्बारे में भी मुझे रिझा रहे थे। बांसुरी वाला मुझे देखकर और भी तेज सुर छेड़ता जैसे मां सरस्वसी से ज़बरन चिल्लाने को कह रहा हो। मेरे हठ पर पिताजी ने मुझे गरमा-गरम जलेबियां चखाईं। अब हठ से अगर जलेबी मिल सकती है को बांसुरी क्यों नहीं। बस मेरे हठ ने मेरी संगीत पिपासा पूरी कर दी। शाम हुई मेला खत्म हो गया। रात में दादी के पास रजाई में लिपटते ही सवाल उठाया कि अगला मेता कब आएगा। सवाल सुनकर दादी कुछ पल सोचने लगी, जैसे किसी पार्टी के नेता गन्ने की कीमत को लेकर संसद में हो हल्ला कैसे किया जाए इस पर विचार करते हैं। दादी ने कहा कि जल्दी ही आएगा। मेले कई आए लेकिन गांव छोड़ने के बाद मुझे मेले की वो जलेबियां दोबारा नसीब नहीं हुईं। हालांकि शहर में आने के बाद मुझे जलेबिया ज़रूर दिखाई दीं, लकेनि मेरे हठ के बावजूद पिताजी ने मुझे ये कहकर जलेबियां खाने से इनकार कर दिया कि 'इसमें मिलावट है। इसको खाने से बीमार हो जाओगे' क्या गांव की वही मीठी जलेबी शहर में ज़हर हो जाती है। खैर उसके बाद मैने न कभी जलेबी खाने की हठ की और ना ही कभी बांसुरी लाने की। जानता था कि अब मैं उस पार्टी की तरह हो गया हूं चो चुनाव में अपनी ज़मानत तक नहीं बाचा पाया है। हारकर सत्ताधीश पिताजी की शरण में रहने लगा। साल पर साल बीत गए। एक दिन मेरे कानों में फिर वही शब्द सुनाई पड़ा 'मेला'... इस मेले से नई पीढ़ी बखूबी परिचित हैं। अगर आप दिल्ली में रहते हैं तो ज़रूर आपने ये मेला देखा होगा। दिल्ली में लगे अंतरराष्ट्रीय मेले का नाम सुनते ही मैं फिर रोमांचित हो गया। अब मैं अपने पैरों पर खड़ा हो गया हूं। अब पिताजी से सबकुछ पूछने कहने की ज़रूरत नहीं पड़ती। जैसे चुनाव में बहमत मिल गया हो। आखिरकार सालों बाद मन में बचपन के मेले की धुंधली यादें लिए हुए मैं मेले में जा पहुंचा। मेले की विशालता देखकर एक पल तो लगा कि जैसे संगमनगर में लगनेवाले महाकुंभ में आ गए हों। मेरे बचपन के मेले और इस मेले में तुलना की ही नहीं जा सकती, क्योंकि तुलना के लिए शब्द नहीं होंगे। मेला का रूप बदल चुका था। यूं कहें कि मेला 'सोफेस्टिकेटेड' हे गया था। कोट टाई वाले लाट साहब हैंगर में लटके कपड़े की तरह दिखने वाले मेमसाहब की बाहों में बाहें डाले मेले की लुत्फ उठाने आए थे। अब अंदर का हाल सुनिए। अंदर एक अलग ही दुनिया थी। मानो अपनी आकाशगंगा छोड़कर किसी और आकाशगंगा में आ गए हों। लेकिन चारों ओर मुझ जैसे दिखने वाले मानव ही थे इसलिए ये मान लिया कि मैं अपने ही ग्रह पर हूं। दुकान पर सामान लेने गया हूं। महीने की शुरूआत में शॉपिंग मॉल का भी लुत्फ भी उठा लेता हूं। लेकिन यहां तो दुकानों का रंग कुछ और ही था। ज़रूरत की लगभग सारी चीज़ें इस मेले से नदारद थीं। कुछएक दिखीं भी तो वो रोटी, कपड़ा और मकान जैसी बुनियादी चीज़ों की फेहरित्स से कोसों दूर थीं। लेकिन इस मेले हर ग़ैरज़रूरी चीज ज़रूरत का आभास करा रही थी। उस आभास पर मेरी जेब साथ देने के लिए तैयार नहीं थी। ब इन चीज़ों के दाम तो पूछ ही सकता था। दाम पूछा तो उन तमाम खबरिया चैनलों के पत्रकारों को कोसने का मन हुआ जो महंगाई का मुद्दा लेकर सरकार की टांग खींचते हैं। ज़रा इस मेले में आकर तो देखिए, कैसे लाखों रुपए खर्च किए जाते हैं। मैंने कई उन लोगों को भी देखा जो घर से तो आए थे मेला देखने लेकिन हाथ में ले जा रहे थे, गुलदस्ते। कीमत हज़ारों रुपए और दलील ये कि इसे फलां देश की स्टॉल से खरीदा गया था। वहीं ये कहने वालों की भी सुनी कि ये सामान इसी देश की गलियों में मजदूरों का खून चूसकर बनाया जाता है। और दाम आधे से भी कम। अब इस विरोधाभास पर क्यों अपना दिमाग लगाऊं। आखिर मेला खत्म हुआ। और पूरी हो गई मेरी मेला देखने की रही-सही हसरत....