Wednesday, August 19, 2009

ये कैसा फरमान ?


हाल में हमने अपनी आज़ादी की साल गिरह मनाई है। लेकिन जश्न के इस माहौल में कहीं मातम भी है। कर्नाटक के एक कालेज में एक मुस्लिम लड़की के बुर्का पहनने को लेकर बखेड़ा खड़ा हो गया है। कालेज ने लड़की को बुर्का पहन कर कक्षा में आने से मना कर दिया। पाखंड़ियों के ढोंग का शिकार बनी लड़की अब कॉलेज नहीं जा रही है। इस लड़की की मानें तो कॉलेज प्रबंधन के एक अधिकारी ने उससे कहा है अगर वो बुरका पहनकर आएगी तो वो खुद भी भगवा स्कार्फ बांध कर कालेज आने लगेगा। इस लड़की का कॉलेज जाना बंद हो गया। महज इसलिए कि वो बुर्का पहनती है। अपने मजहब का पालन करना देश के संविधान में ग़ैरकानूनी तो नहीं है। फिर किस कानून के तहत उसे कॉलेज जाने से रोका गया ? तालिबान सिर्फ पाकिस्तान और अफगानिस्तान में ही हैं इस बात को अब हम कैसे मानें। क्या इस लड़की के गुनाहगार देश के तालिबानी नहीं हैं। ऐसे फरमानों को तालिबानी ना भी कहें तो कॉलेज प्रशासन के उस अधिकारी की बात पर मुझे आपत्ति है। बुर्का एक लिबास है। और अगर एक लड़की अपना लिबास पहनकर कॉलेज आ रही है तो उस पर रोक क्यों ? उस अधिकारी की बात का क्या जवाब है जिसमें उसने कहा कि अगर तुम बुर्का पहनकर आओगी तो मैं भगवा बांधकर आउंगा। तो क्या अब कपड़ों को लेकर भी धर्मांध लोग आपसी जंग चाहते हैं। भगवा शांति का प्रतीक है। लेकिन यहां उसके बात कहने का तरीका किस ओर इशारा करता है ये आप भी समझ सकते हैं। ये घटना देश के उस भाग में हुई है जहां साक्षरता की दर सबसे ज्यादा है। दक्षिण भारत में हुई ये घटना नई नहीं है। मसलन यूपी के कुछ कॉलेजों में महीनों पहले लड़कियों के जींस और टीशर्ट पहनने पर रोक लगा दी गई थी। स्कूल की महिला शिक्षकों को भी स्लीवलेस पहनने के लिए मना कर दिया गया था। कॉलेज का तर्क था कि इससे छेड़-छाड़ की घटनाओं पर रोक लगाने में मदद मिलेगी। यानि लड़कियां जींस ना पहनें तो उनके साथ बलात्कार जैसी घटनाएं नहीं होंगी। इस तर्क पर कोई गणित सही नहीं बैठता। समाज में महिलाओं की रक्षा की ज़िम्मेदारी उठाने के बजाय उनके कपड़ों पर बैन लगाना कहीं भी जायज नहीं है। देश आज़ाद है और हर शख्स एक सीमित दायरे में अपनी आज़ादी का इस्तेमाल कर सकता है। समाज का पाखंड महिलाओं पर सदियों से भारी रहा है। वक्त हैइन पाखंडियों को सही तर्क से रूबरू कराने का। वक्त है उन्हे ये दिखाने का, कि दुनिया में महिलाओं का बोलबाला है। और हम हैं कि 21वीं सदी में अभी भी उन तर्कों में उलझे हैं जिसकी प्रासंगिकता कभी थी ही नहीं और ना ही कभी होगी।

Monday, August 17, 2009

कोसी के कहर का एक साल...




कोसी...बिहार की जीवनदायिनी नदी। कोसी ने बिहार के पूतों को अपनी गोद में पाला पोसा। कोसी के अमृतमयी जल से बिहार के खेत लहलहाए। सालों बिहार का लालन-पालन करने वाली कोसी अचनाक अपने बच्चों से क्यों नाराज़ हो गई ?
साल 2008 बिहार के लोग कभी भी भूल नहीं सकते। इसी साल कोसी मैया अपने बच्चों से इतनी खफ़ा हुईं कि चारों ओर वो तांचव मचाया, जिसका खौफ बिहार के लोगों के जेहन में आज भी है। कोसी मैया के प्रकोप ने कई लोगों को काल के मुंह में भेज दिया। कोसी के कहर को एक साल हो चुके हैं। उस भयानक तबाही के एक साल बाद भी हादसे के शिकार लोगों की हालत बद से बत्तर है। जब बाढ़ आई तो सरकारी मदद पहुंची। लेकिन मदद सिर्फ कागज़ों में ही दिखी। करोड़ों रुपए लोगों की मदद के लिए खर्च किए गए। ये बातें भी सरकारी फाइलों में लिखी हैं। लेकिन अगर हकीकत देखनी है तो कोसी के आस-पास बसने वाले लोगों से मिलिए। सारे दावों पर पड़ी धूल खुद-बखुद हट जाएगी। मैंने सुना है, उन लोगों की ज़बानी जो बाढ़ पीड़ितों की मदद के लिए गए थे। मैंने सुना कैसे, राहत शिविरों में सवर्णों और दलितों के साथ भेदभाव किया जाता था। मैंने सुना, किस तरह दलितों को खाने में खिचड़ी और चावल का मांड़ दिया जाता था, जबकि ब्राह्मणों को चावल,दाल,रोटी सब्ज़ी दी जाती थी। बाढ़ ने गरीबों को और गरीब बना दिया जबकि जो रसूखदार थे वो आज गरीबों का हक मारकर ऐश कर रहे हैं। एक कमेटी ने सरकार को रिपोर्ट सौंपी जिसमें लिखा था कि सवर्णों ने दलितों और गरीबों की ज़मीन पर अपना कब्ज़ा कर लिया है। तबाही के बाद राहत मिली सिर्फ उन्हे जो छीनना जानते थे। जिन्हे मदद की वास्तव में ज़रूरत थी वो बेचारे आज भी मदद की राह देख रहे हैं। केंद्र सरकार ने बाढ़ पीड़ितों की मदद के लिए राहत फंड भेजा, लेकिन वो लोगों तक पहुंचने के पहले ही कई लोगों की जेबें भरने में खत्म हो गया। कोसी के किनारे रहने वाले आज भी कोसी की धारा को देखकर सहम जाते हैं। ज़रा सी बरसात भी इन लोगों में डर पैदा कर देती है। कोसी की धारा में पले-भड़े कोसी के लाल आज अपनी उस मां को देखकर डर जाते हैं। नेपाल में पैदा हुई कोसी इठला-इठला कर भारत में आती है। बिहार के लोगों को जीवन देती है। लेकिन अब कोसी मैया की गोद में उठी छोटी सी लहर भी डरावनी लगती है। नेपाल में कोसी पर डैम बनाए जाने की योजना है। लगभग 8000 करोड़ रुपए लगाकर कोसी के कहर को रोकने की कोशिश की जानी है। लेकिन ये तमाम योजनाएं अभी कागज़ों में हैं। खद्दवालों को इंतज़ार है पैसों के सरकारी खजाने से निकलने का। वहीं कोसी के लाल इंतज़ार कर रहे हैं तिनके के सहारे का। सहारा अब तक नहीं मिला इसलिए आसमान में आंख उठाए भगवान से प्रार्थना कर रहे हैं कि हे परमेश्वर अब मत बरसना। इंद्र देवता ने कोसी के लालों की फरियाद सुन ली। इस साल पानी नहीं बरसा। कोसी के लाल एक और कहर से तो बच गए लेकिन धरती के कई सपूत सूखे खेतों में बैठे बरसने की गुहर कर रहे हैं। अब भगवान भी कशमकश मे हैं। आखिर करें ते क्या करें...

Sunday, August 16, 2009

ये 'जिन्ना' का 'जिन्न' है...




क्या आपने कभी किताब लिखी है। अगर नहीं तो ज़रूर लिखिए। किताब का विषय कुछ भी रख लीजिए, वो मायने नहीं रखता। लेकिन हां किताब बिकने के जो सबसे ज्यादा ज़रूरी है उसके बारे में आपको बता देता हूं। किताब को बिक्री बढ़ाने के लिए आपको उसमें किसी बड़ी हस्ती का नाम लेना होगा। उसके साथ जुड़े विवादों को भले ही ना लिखें लेकिन कुछ ना कुछ विवादास्पद ज़रूर लिखें। विवाद बड़ा रहा तो आपका नाम होगा। लेकिन देश की बड़ी पार्टियों के बड़े नेताओं को किस नाम की चाह है। खबरों से ताल्लुक रखने वाले तमाम लोगों को पता है कि बीजेपी के वरिष्ठ नेता जसवंत सिंह ने एक किताब लिखी है। इस किताब में उन्होने मुस्लिम लीग के नेता मुहम्मद अली जिन्ना की जमकर तारीफ की है। पाकिस्तान के साथ भारत के करीबी रिश्ते बीजेपी को कभी रास नहीं आएंगे। लेकिन एक पाकिस्तानी नेता की नेक छवि का गुणगान करके जसवंत सिंह ने एक नए विवाद को जन्म ज़रूर दिया है। जसवंत की किताब 'जिन्ना - इंडिया, पार्टिशन, इंडिपेंडंस' जनता के सामने है। किताब जैसे-जैसे फैलेगी, विवाद भी बढ़ता जाएगा। कांग्रेस को चारा मिलेगा बीजेपी का नंगा करने का। वहीं बीजेपी भी सेक्युलर छवि दिखाने की बात कहकर मामले से पल्ला झाड़ सकती है। लेकिन तबतक मचे हंगामे से मिली प्रसिद्धि जसवंत सिंह की पिपासा ज़रूर शांत कर देगी। जिन्ना का जिन्न पहली बार नहीं निकला है। एनडीए के शासनकाल में उपप्रधानमंत्री लालकृष्ण आडवाणी पाकिस्तान गए थे। आडवाणी ने जिन्ना को एक सेक्युलर नेता बताया था। जबकि सारा हिंदुस्तान जानता है कि देश के दो टुकड़े करने के लिए जिन्ना ने ही सियासत शुरू की थी। आडवाणी के बयान पर देश भर में होहल्ला हुआ। आडवाणी ने सफाई भी दी लेकिन उनकी सफाई किसी काम में नहीं आई। बीजेपी के असंतुष्ट नेता चाहते क्या हैं, ये शायद उन्हे भी नहीं मालूम। हिंदुत्व का नारा लेकर चुनावी मैदान में उतरी बीजेपी को वो झटका लगा जो शायद आनेवाले कई सालों तक पार्टी के लिए नासूर बनकर रह जाएगा। वक्त है जागने का। वक्त है आगे बढ़ने का। वक्त है विकास का। नई पीढ़ी किसी धर्म, किसी मज़हब से बैर नहीं रखती। हर मज़हब के साथ वो कंधे से कंधा मिलाकर आगे बढ़ना चाहते हैं। ऐसे में बीजेपी की संकुचित सोच क्या उन्हे कभी सत्ता में वापस ला पाएगी ? जवाब शायद ना में मिले। जसवंत सिंह ने अपनी बहुचर्चित किताब में लिखा है कि बंटवारे का ज़ख्म देश को जिन्ना ने नहीं, बल्कि नेहरू ने दिया था। जसवंत ने लिखा है कि देश का बंटवारा नेहरू की केंद्रीयकृत राजनीति की वजह से हुआ था। जसवंत ने अपने एक इंटरव्यू में कहा कि जिन्ना एक महान व्यक्ति थे। एक सवाल पर जसवंत सिंह ने कहा,'हां मैं बिल्कुल मानता हूं क्योंकि उन्होंने कुछ ना में से एक चीज बनाई थी और वो खुद को नापसंद करने वाली कांग्रेस पार्टी व अंग्रेजी शासन के खिलाफ अपने दम पर खड़े हुए। गांधी जी ने खुद भी जिन्ना को महान भारतीय कहा था, तो हम उन्हें यह दर्जा क्यों नहीं देते? हम यह क्यों नहीं समझते कि महात्मा गांधी ने ऐसा क्यों कहा था।' पूर्व विदेशमंत्री रह चुके जसवंत सिंह ने पाकिस्तान के खिलाफ अपनी विदेश नीति में कहीं भी कोई कड़ा रुख नहीं इख्तेयार किया। जिन्ना पर जसवंत का लेख पार्टी के लिए खतरनाक हो सकता है। खासकर ऐसे में जब पार्टी पहले ही अंत:कलह से जूझ रही है। बीजेपी के पास शायद सच्चर कमेटी का बहाना है। मुसलमानों को रिजर्वेशन के मामले को लेकर बीजेपी कांग्रेस से लड़ तो सकती है। लेकिन इस किताब का क्या, जिसने इस देश के गुनहगार को देवता है आज़ादी के महानायक को राक्षस बना दिया।

हम आज़ाद हैं !




जी हां हम आज़ाद हैं। कितने आज़ाद हैं, ये मत पूछिए। शायद दिल के कोने में छिपा कोई ज़ख्म हरा हो जाए। सुनने में अच्छा लगता है कि हम आजाद हैं। हमारी आजादी की कोई सीमा नहीं है। हम इतने आजाद हैं कि दूसरों की ज़िंदगियों में भी दखल दे सकते हैं। इस आज़ादी ने हमें अधिकार दे दिया है कि हम किसी के भी साथ कुछ भी कर सकते हैं। देश ने आज़ादी की 62वीं सालगिरह मनाई। हमारी पीढ़ी ने गुलामी की सच्ची तस्वीरें नहीं देखीं। लेकिन अपनी पुरानी पीढ़ी से उन भयानक सालों की डरावनी दास्तानें ज़रूर सुनीं हैं हमनें। किताबों में पढ़ा है कि किस तरह फिरंगियों ने हमपर सितम किए। उस सितम से तंग आकर देश नींद से जागा। नींद टूटी और फिरंगियों को अपने वतन भागने की राह तक ना मिली। हमें आज़ादी मिल गई। लालकिले की बुर्ज पर प्रधानमंत्री ने तिरंगा फहराया और भाषण दिया। कुछ घंटे तक प्रोग्राम चला। आज़ादी का जश्न खत्म होते ही लालकिले के पास कई जगह देश की शान, हमारा तिरंगा सड़क पर मिला। जो तिरंगा कुछ देर पहले बच्चों के हाथ में देश के सुनहरे भविष्य जैसा नज़र आ रहा था, वो कुछ ही देर में अपना वजूद खोज रहा था। ये हमारी आज़ादी है। हम इतने आज़ाद हैं कि अपने तिरंगे की कद्र करना भूल गए। बाबूजी को रिटायर हुए 3 साल हो गए। रिटायरमेंट के बाद पेंशन से ही घर चलता है। लेकिन इस पेंशन के लिए उन्हे क्या नहीं करना पड़ा। सरकारी बाबू के आगे हमारे बाबूजी ने कई बार हाथ जोड़े। लेकिन दफ्तर के बाबू ने उनसे कहा पहले रुपयों का बंदोबस्त करो। गुस्से में एक बार बूढ़े बाबूजी ने कह दिया। देश आज़ाद है। मैं आज़ाद दूं। ये मेरा हक है, मेरी मेहनत की कमाई है। बड़े बाबू इतना सुनते ही बिदक गए। हारकर हमारे आज़ाद बाबूजी ने दफ्तर के बाबू की जेब भरी। अब वो अपनी आज़ादी की ज़िंदगी जी रहे हैं। ऐसी ही आज़ादी की ज़िंदगी जी रहे हैं देश के वो किसान जिनकी ज़मीनें साहूकारों के पास गिरवी पड़ी हैं। कर्ज का सूद चुकाते-चुकाते घर का सारा सामान चला गया। मूल अभी भी जस का तस बाकी है। बेचारे किसान ने अपने तीन बच्चों और पत्नी को ज़हर देकर मार दिया। ज़िल्लत ने उसके मन को झकझोरा। बेचारे किसान ने भी दुनिया से अपनी आज़ादी छीन ली। दूसरे दिन किसान की लाश घर में पाई गई। वो गरीब किसान दुनिया से आज़ाद हो गया था। उसकी आज़ादी पर साहूकार ने ज़रूर जश्न मनाया होगा। मुझे भी गर्व है कि मैं आज़ाद हूं। मैं ठूंस-ठूंस कर भरी हुई बसों में जाता हूं। ट्रेनों में सहमकर जाता हूं कि कहीं कुछ अनहोनी ना हो जाए। लेकिन मैं आज़ाद हूं। कोई अपने घर में क्या कर रहा है,वो सबकुछ टीवी पर दिखाया जाता है। बेचारा करे भी तो क्या करे। मशहूर हस्ती जो ठहरा। घर से लेकर बाहर तक उसकी ज़िंदगी के हर लम्हे अखबारों और टीवी की सुर्खियां बनी रहीं। ये प्रेस की आज़ादी है। किसी की भी ज़िंदगी में दखल दे सकते हैं। तो भई आप भी सीना चौड़ा करके कहिए कि हम आज़ाद हैं। किसी ने मुझसे कहा था कि आपकी आज़ादी की सीमा वहीं खत्म हो जाती है जहां से दूसरे की आज़ादी की सीमा शुरू होती है। माथापच्ची करने के बजाए मैंने किसी बहस में यही संवादा सुना दिया। हर किसी ने मेरा उपहास किया। शायद ये उनकी आज़ादी है। आज़ादी का मतलब क्या है,ये जानता हर कोई है, समझता हर कोई है लेकिन उस मतलब को समझकर जीवन में अपनाने के लिए तैयार कोई नहीं है। काश हम सब आज़ाद होते! यही मेरी हसरत है।

Thursday, August 6, 2009

'हड़ताल है हड़ताल'




चारों ओर हड़ताल हो रही है। कहीं बस ड्राइवर हड़ताल पर हैं। तो कहीं डॉक्टर हड़ताल पर हैं। कहीं टीचर हड़ताल पर हैं तो कहीं बैंक कर्मचारी हड़ताल पर हैं। हर ओर है हड़ताल, हर जगह है हड़ताल। ताजा उदाहरण है हड़ताल पर गए देश भर के बैंकों के 10 लाख कर्मचारी। बैंकों की हड़ताल है। काम-धंधा ठप्प पड़ा है। व्यापारी परेशान हैं तो आम लोग दिक्कतें झेल रही हैं। किसी की सैलरी आनी है तो किसी को इंस्टालमेंट भरनी है। किसी को बेटी के लिए पैसा भेजना है तो किसी को मां की दवाई के लिए पैसा भेजना है। लेकिन है तो हड़ताल। बैंक बंद हैं, काम कैसे होगा ? क्या हड़ताल ही समस्या का समाधान है ? ये सवाल हर वो आम आदमी पूछता है जो हड़ताल का खामियाजा भरता है। बसों की हड़ताल हुई तो सड़कों की रफ्तार रुक जाती है। मंज़िल पर जाने के लिए खड़ा आम आदमी अपना मन मसोस कर रहा जाता है। हड़ताल से हासिल भले ही कुछ ना हो, लेकिन हड़ताल होती ज़रू है। टीचरों को तनख्वाह बढ़वानी है तो हड़ताल होती है। भले ही नुकसान बच्चों के भविष्य का हो। लेकिन हड़ताल तो होनी है। डॉक्टरों को पैसा बढ़वाना है तो हड़ताल होगी। लाखों मरीज अस्पतालों के बाहर इलाज के इंतजार में पड़े रहते हैं। कई मरीज इलाज के बिना दम तोड़ देते हैं। उनकी लाशें सवाल पूछती हैं। आखिर मेरा क्या कसूर था ? डॉक्टरों के पास जवाब है ना! भई हमें भी तो पैसा चाहिए। फिर चाहे आपकी जान ही क्यों ना जाए। भगवान का दर्ज भले ही हमें मिला है तो क्या, पैसे से बड़ा भगवान कोई नहीं है। मरी हुई मां की लाश गांव में इंतज़ार कर रही है। बेटा आएगा तो शरीर को आग मिल पाएगी। गरीब बेटा दूर शहर में आंसू बहा रहा है क्योंकि ट्रेनों की हड़ताल है। मां की लाश तो इंतजार कर सकती है। लेकिन रेलवे कर्मचारियों का भत्ता नहीं बढ़ाया गया तो धरती फट जाएगी। इस हकीकत से हम सब वाकिफ हैं। मैं तारीफ करता हूं सरकार की जिसने कुछ महीनों पहले तेल कंपनियों और पेट्रोल पंप मालिकों की हड़ताल पर सख्त रवैया अपनाते हुए उन्हे कदम पीछे लेने पर मजबूर कर दिया। सरकार ने हड़तालियों को गिरफ्तार करने तक के आदेश दे दिए। मरते क्या ना करते। हड़ताल खत्म हुई और ज़िंदगी पटरी पर लौट गई। ट्रांसपोर्टरों ने हड़ताल की। महंगाई आसमान पर पहुंच गईं। रोजमर्रा की चीजें जेब पर भारी पड़ने लगीं। दिल्ली में सरकार ने कड़ा रुख इख्तियार किया। हड़तालियों पर लगाया एस्मा। ट्रकों का रजिस्ट्रेशन रद्द कर दिया। देखिए ना, हड़ताल तुरंत खत्म हो गई। यानि ये समझ में आ गया कि हड़ताल से लड़ना है तो हड़तालियों की ना सुनी जाए। एक बार सुनी तो अगली हड़ताल के लिए तैयार रहिए। तैयार रहिए तकलीफों का बोझ सहने के लिए। अब वक्त है हड़ताल जैसे देशद्रोह से लड़ने का। देश की अर्थव्यवस्था को खोखला करते हड़तालियों के खिलाफ सख्त कदम ही इसका इलाज है। ये हड़ताल अब ना हो, यही मेरी हसरत है।

Wednesday, August 5, 2009

मज़हब नहीं सिखाता, आपस में बैर रखना...




ये पंक्तियां आपने कई बार सुनी होंगी। शायद तब सुना होगा जब आपने पहली बार देश के राष्ट्रीय गीत का महत्व समझा होगा। कक्षा में मास्टरजी ने भी कई बार बताया होगा कि हमसब एक हैं। हिंदू हो या मुसलमान, हमसब एक हैं। ऊपरवाले ने सिर्फ इंसान बनाया। उसे धर्म और मजहब के नाम पर बांटने वाले हम हैं। देश में शायद ही कोई ऐसा होगा जिसने ये ना पढ़ा हो या ना सुना हो। क्योंकि ये बातें तो उसे भी पता हैं जिसने पाठशाला का मुंह भी नहीं देखा है। लेकिन वक्त बीतने के साथ वो तमाम सीख पानी में बुलबुले की तरह विलुप्त हो गई हैं। समाज के हर तबके ने ये सीख ली है, लेकिन उस सीख की प्रासंगिकता आज के वक्त में नहीं दिख रही है। धर्म और मजहब के नाम पर देश के बांटने वाले आज भी हैं। वो नहीं चाहते कि हम एक होकर रहें। क्योंकि अगर ऐसा हुआ तो उनकी दुकान पर ताला लग जाएगा। परदे पर तमाशा दिखाने वाले कलाकार भी इस मजहबी हमले से नहीं बच सके। इमरान हाशमी के साथ मुंबई में क्या हुआ पूरे देश ने देखा। उनका कहना है कि मुसलमान होने के नाते उन्हे उस सोसाइटी में घर नहीं दिया गया जहां वो रहना चाहते थे। तो सोसाइटी वालों ने दलील दी कि इमरान झूठ बोल रहे हैं। कौन सच्चा है और कौन झूठा इसका फैसला तो अभी तक नहीं हो पाया। लेकिन इस वाकये ने एक बार फिर धर्म और मजहब के नाम पर होने वाले भेदभाव की दीवार खड़ी कर दी है। कई लोग हैं जो ये मानते हैं कि इमरान के साथ गलत हुआ तो कई लोग ये भी मानते हैं कि इमरान मज़हब के नाम पर भड़का रहे हैं। सारे खबरिया चैनलों ने इस मामले को जमकर भुनाया। बॉलीवुड के सितारों से खूब सवाल पूछे गए। चैनलों के तमाम ऐंकरों ने चिल्ला-चिल्ला कर इमरान को दोषी ठहराने की कोशिश की। इमरान ने की होगी गलती, पर क्या हम ये नहीं जानते कि समाज में कई लोग हैं जो हमें आपस में लड़ाने की कोशिश करते हैं। फिल्म न्यूयॉर्क जिसने भी देखी होगी, वो समझ सकता है कि सिर्फ हिंदुस्तान में ही नहीं बल्कि दुनिया के कोने-कोने में इंसानों के साथ महज़ इसलिए बुरा बर्ताव होता है क्योंकि वो किसी और धर्म के हैं या किसी और मजहब के। इससे छुटकारा कैसे मिलेगा ? हम सब इस पर बात तो करते हैं लेकिन जब इन बातों को अमल में लाने की बात आती है तो कदम कुछ पीछे खिसकते नज़र आते हैं। हम कह सकते हैं लिख सकते हैं लेकिन क्या हम धर्म और मजहब की इस लड़ाई को खत्म कर पाएंगे ? यकीन मानिए मैं इस लड़ाई को लड़ना चाहता हूं। क्योंकि ये मेरी हसरत है।

Tuesday, August 4, 2009

दरारों में ज़िंदगी...




15वीं लोकसभा बखूबी अपना कम कर रही है। यूपीए ने सांसदों को 100 days का टारगेट दे रखा है। टारगेट पूरा हुआ तो पार्टी में जगह और मजबूत होगी। इसलिए हर कोई अपनी ड्यूटी बजा रहा है। मसला ये नहीं है। मुझे बात करनी है इस 100 दिनों में शामिल सबसे बड़े टारगेट की। और वो है देश का विकास। लोकसभा में आए दिन हंगामा हो रहा है। कभी अनिल अंबानी के दादरी प्रोजेक्ट को लेकर तो कभी सरकार की विदेश नीति को लेकर। विपक्ष में बैठी भारतीय जनता पार्टी ने चुनावों में खूब दावा किया, 'सत्ता में आए तो देश के विकास के लिए ना जाने क्या-क्या करेंगे...आज वो विकास दिख रहा है बुंदेलखंड में। वो विकास दिख रहा है उन गांवों में जहां एक जून की रोटी नसीब नहीं हो रही है। देश की 60 फीसदी आबादी खेती पर निर्भर है। देश की अर्थ व्यवस्था खेती पर चल रही है। लेकिन देश के नेता हैं कि इस ओर देखने से कतरा रहे हैं। माना राज्यों की विधानसभाओं में मुद्दा उठता रहा है। लेकिन क्या लोकसभा के लिए ये मुद्दा अहम नहीं है। नरेगा के लिए केंद्र हजारों करोड़ रुपए दे रहा है। लेकिन वो पैसे कहां जा रहे हैं है कोई इसका जवाब देने वाला ? आज वक्त इतना भी नहीं है कि इन सवालों का जवाब मांगा जाए। हालात इतने बिगड़े हैं लेकिन सुध लेने वाला कोई नहीं है। लोकसभा में मंगलवार को मुद्दा गूंजा वो था हाफिज सईद को लेकर। माना आतंकवाद देश की बड़ी समस्या है। लेकिन हमारे देश की अंदरूनी समस्या से भी ज्यादा। देश की सरकार विदेश नीति पर काम कर रही है। मुलायम सिंह ने केंद्र सरकार को आड़े हाथों लिया। हाफिज सईद पर पाकिस्तान में मुकदमा चल रहा है। दुनिया जानती है कि ये महज़ एक ड्रामा है। पाक ने भारत की अबतक ना सुनी तो अब क्या सुनेगा। पाक ने तो कसम खा रखी है कि अगर भारत ने कुछ कहा तो वो नहीं सुनना है। लेकिन हां अगर अमेरिका का डंडा चला तो बात कुछ बन सकती है। अमेरिकी पैसों से उसने अपनी ताकत खड़ी की है। माना विदेश नीति बनने में सालों लगते हैं। तो क्या सालों तक लोकसभा का कीमती वक्त केवल सरकार को घेरने में लगा दिया जाए। इस सरकार से पूछने के लिए सवाल और भी हैं। मैं तारीफ करता हूं सरकार के उस कदम का जिसमें उन्होने मासूम बच्चों के लिए मुफ्त शिक्षा का विधेयक पास करवाया। देश के विकास के लिए ये एक महत्वपूर्ण प्रयास है। सारा देश महंगाई की मार से घायल है। महंगाई दर के सरकारी और कागजी आंकड़ों पर नज़र डालें तो दिल करता है कि खाने पर बस टूट पड़ों क्योंकि इससे सस्ता कभी नहीं मिलेगा। लेकिन हकीकत में एक जून की थाली की कीमत कमर तोड़ रही है। इस महंगाई के अलावा आज देश सूखे से जूझ रहा है। अनाज की कमी है। दालों की कीमत आसमान पर है। इस सूखे के लिए केंद्र सरकार राहत पैकेज भी दे रही है। लेकिन इस पैकेज से कितनों को राहत मिलेगी क्या है कोई इसका जवाब देने वाला? उत्तरप्रदेश में अनाज का भंडार पैदा होता है। लेकिन इस बार सूखे की चपेट में हैं यूपी के 47 ज़िले। लेकिन ये सिर्फ कागज़ी आंकड़े हैं। हकीकत में ये संख्या कुछ ज़्यादा है। यूपी की मुख्यमत्री ने कहा है कि वो सूखे से निपटेंगी। लेकिन क्या आप विश्वास करते हैं माया की ज़बान पर ? मायावती की जान अटकी है लखनऊ के अंबेडकर पार्क पर। साढ़े चार सौ करोड़ से भी ज्यादा की रकम पानी की तरह इस पार्क में बहाई गई है। वो भी सिर्फ अपनी साख बचाने के लिए। पार्क में मायावती अपनी मूर्तियां लगवाने में व्यस्त हैं। उन्हे कहां सुध है सूखे की मार झेल रहे लोगों की। हां जो थोड़ा वक्त मिला उसमें उन्होने 11 करोड़ का हैलिकॉप्टर खरीदने का मन बनाया। शायद इस हेलिकॉप्टर से माया देख सकें कि सूखे खेतों में कितने लोगों का भविष्य धूल के साथ उड़ रहा है। किसानों पर पहले ही कर्ज का बोझ है। इस बोझ से टूटती कमर पर सूखे का वज़न भी गिरा है। क्या सरकार एक और विदर्भ कांड का इंतज़ार कर रही है। मैं सरकार और सरकारी नीति के खिलाफ नहीं हूं। मैं बस ये कहा रहा हूं कि देश के विकास की जड़ को मजबूत किए बिना कोई भी नीति कारगर नहीं हो सकती। बुंदेलखंड को राहत देने के लिए कांग्रेस के युवराज राहुल गांधी परेशान हैं। लेकिन क्या बुंदेलखंड में 100 लोगों को भी राहत मिला। लोगों की गाढ़ी कमाई केंद्र सरकार ने दे तो दी लेकिन वो पैसा कहां है इसका जवाब भी किसी के पास नहीं है। मैं तो बस उस बेबसी पर रो रहा हूं जब एक मां अपने बच्चे को दो के बाद तीसरी रोटी नहीं देती क्योंकि उसका दूसरा बेटा भूखा रह जाएगा। इस हालात में हम चर्चा कर रहे हैं विदेश नीति की। खेती की ज़मीनों को बड़े औद्योगिक घराने सरकार पर दबाव डालकर एसईज़ेड में तब्दील करवा रहे हैं। और वक्त आने पर उन ज़मीनों पर बड़े-बड़े मॉल नज़र आते हैं। जिनका इस्तेमाल सिर्फ वो कर सकते हैं जिनका पेट और जेब दोनों भरे हैं। उस मॉल के बाहर खड़ा वो किसान मजबूरी में अपनी ज़मीन की औनी-पौनी कीमत लेकर तकदीर को कोसता है। मैंने वो तस्वीरें देखी हैं जिसमें खेतों में पड़ी दरारों पर एक नंगा बच्चा चल रहा है। इन दरारों में वो अपनी किस्मत खोज रहा है। घर में बैठी बूढ़ी मां आसमान में टकटकी लगाए इंद्रदेव से गुहार कर रही है। वो कहती है कि अब ना बरसे तो मेरे बच्चे भूखे मर जाएंगे। तुमने पेट दिया तो अब रोटी भी दो। क्योंकि वो मां भले ही पढ़ी-लिखी नहीं है लेकिन वो जानती है कि उसकी सुध लेने कोई नहीं आएगा। लेकिन भगवान भी उसपर मेहरबान होने से कतरा रहे हैं। भगवान तो इंसानों से पहले ही नाराज़ हैं। अच्छी-भली फसल जहां भी हुई इंद्र देवता वहीं ज़रूररत से ज्यादा मेहरबान हो जाते हैं। शायद इसकी वजह हम इंसान ही हैं। लेकिन मुद्दा ये भी नहीं है। मुद्दा है उन लोगों की मदद करने का जिन्हे मदद की ज्यादा दरकार है। जितने पैसों में मायावती का एक पार्क बना है,उतनी रकम में तो उत्तरप्रदेश की किस्मत ही बदल जाती। सैंकड़ों अस्पताल, स्कूल बनकर तैयार हो जाते। नरेगा का जितना पैसा भ्रष्टाचार रूपी राक्षस के पेट में गया वो पैसा बेरोगारी के हालात बदलने के लिए पर्याप्त था। फिलहाल सवाल और जवाब के लिए वक्त नहीं है। वक्त है जल्दी से जल्दी जागने का और कई ज़िंदगियों को बचाने का। जो इस उम्मीद में हैं कि कभी तो उनकी हसरत पूरी होगी।

Monday, August 3, 2009

मेरे ये गीत याद रखना...


वो जब याद आए, बहुत याद आए...

किशोर कुमार, देश का वो नाम जिसपर जितना भी नाज़ किया जाए कम है। संगीत की दुनिया का वो सितारा जिसकी आवाज़ आज भी ज़ेहन में गूंजती है। जिसकी संगीत के बिन आज भी दिन अधूरा लगता है। 4 अगस्त को हिंदुस्तान उस किशोर कुमार को याद कर रहा है। जिसके गीत सुनकर लाखों-करोड़ों दिल जवां हुए। 4 अगस्त मध्य प्रदेश के खंडवा में जन्मे किशोर उर्फ आभास गांगुली ने अपने जीवन के हर क्षण में खंडवा को याद किया। खंडवा भी आज किशोर को याद करता है। ज़मीन से जुड़े किशोर ने हमेशा अपने शहर को याद किया। जिस जमाने में 10 पैसे की उधारी भी मायने रखती थी उस जमाने में भी किशोरदा अपने दोस्तों से पैसे लेकर कैंटीन में खाना खाया करते थे। किशोर कुमार पर इस तरह पाँच रुपया बारह आना उधार हो गए। पैसे चुकानी की बात जब भी होती तो किशोर दा कैंटीन में बैठकर ही टेबल पर गिलास, और चम्मच बजाकर पांच रुपया बारह आना गा-गाकर कई धुन निकालते थे। शायद भविष्य के खूबसूरत संगीत का आगाज़ यहीं से होना था। फिल्म जिद्दी में किशोर दा की आवाज का पहली बार जलवा दिखा। किशोर ने देवआनंद के लिए गाना गाया। के. एल. सहगल के फैन होने की वजह से ये गीत उन्होने सहगल साहब की आवाज़ में ही गाया। फिल्म चल पड़ी लेकिन किशोर दा को कोई खास तवज्जो नहीं मिली। इसी तरह 1951 में आई फणी मजूमदार की फिल्म आंदोलन में बतौर हीरो काम करने के बावजूद भी उन्हे किसी ने नहीं देखा। फिल्म भी फल्प रही। मजेदार बात है कि किशोर कुमार की शुरुआत की कई फिल्मों में मोहम्मद रफी ने किशोर कुमार के लिए अपनी आवाज दी थी। मोहम्मद रफी ने फिल्म ‘रागिनी’ तथा ‘शरारत’ में किशोर कुमार को अपनी आवाज उधार दी तो मेहनताना लिया सिर्फ एक रुपया। काम के लिए किशोर कुमार सबसे पहले एस डी बर्मन के पास गए। इसके बाद एसडी बर्मन ने किशोर कुमार को अपने संगीत निर्देशन में कई गीत गाने का मौका दिया। आर डी बर्मन के संगीत निर्देशन में किशोर कुमार ने 'मुनीम जी', 'टैक्सी ड्राइवर', 'फंटूश', 'नौ दो ग्यारह', 'पेइंग गेस्ट', 'गाईड', 'ज्वेल थीफ़', 'प्रेमपुजारी', 'तेरे मेरे सपने' जैसी फिल्मों में अपनी जादुई आवाज से फिल्मी संगीत के दीवानों को अपना दीवाना बना लिया। किशोर कुमार ने साल 1940 से 1980 के बीच के अपने करियर के दौरान करीब 574 से अधिक गाने गाए। किशोर कुमार ने हिन्दी के साथ ही तमिल, मराठी, असमी, गुजराती, कन्नड़, भोजपुरी, मलयालम और उड़िया फिल्मों के लिए भी गीत गाए। किशोर कुमार को आठ फिल्म फेयर अवार्ड मिले। किशोर कुमार की खासियत यह थी कि उन्होंने देव आनंद से लेकर राजेश खन्ना, अमिताभ बच्चन के लिए अपनी आवाज दी और इन सभी अभिनेताओं पर उनकी आवाज ऐसी रची बसी मानो किशोर खुद उनके अंदर मौजूद हों। किशोर कुमार ने 81 फ़िल्मों में अभिनय किया और 18 फिल्मों का निर्देशन भी किया। फ़िल्म 'पड़ोसन' में उन्होंने जिस मस्त मौला आदमी के किरदार को निभाया वही किरदार वे जिंदगी भर अपनी असली जिंदगी में निभाते रहे। 1975 में देश में आपातकाल के समय एक सरकारी समारोह में भाग लेने से साफ मना कर देने पर तत्कालीन सूचना एवं प्रसारण मंत्री विद्याचरण शुक्ला ने किशोर कुमार के गीतों के आकाशवाणी से प्रसारित किए जाने पर पर रोक लगा दी थी और किशोर कुमार के घर पर आयकर के छापे भी डाले गए। मगर किशोर कुमार ने आपात काल का समर्थन नहीं किया। यह दुर्भाग्य और शर्म की बात है कि किशोर कुमार द्वारा बनाई गई कई फिल्में आयकर विभाग ने जप्त कर रखी है और लावारिस स्थिति में वहाँ अपनी दुर्दशा पर आँसू बहा रही है। किशोर कुमार की पहली शादी रुमा देवी के से हुई थी, लेकिन जल्दी ही शादी टूट गई और इस के बाद उन्होंने मधुबाला के साथ विवाह किया। उस दौर में दिलीप कुमार जैसे सफल और शोहरत की बुलंदियों पर पहुँचे अभिनेता जहाँ मधुबाला जैसी रूप सुंदरी का दिल नहीं जीत पाए वही मधुबाला किशोर कुमार की दूसरी पत्नी बनी। 1976 में उन्होंने योगिता बाली से शादी की लेकिन ये साथ कुछ महीनों का ही रहा। इसके बाद योगिता बाली ने मिथुन चक्रवर्ती से शादी कर ली। 1980 में किशोर कुमार ने चौथी शादी लीना चंद्रावरकर से की जो उम्र में उनके बेटे अमित से दो साल बड़ी थीं। सदी के इस महान गायक के साथ कई विवाद जुड़े रहे लेकिन विवाद कभी भी उनपर हावी नहीं हुए। किशोर की आवाज़ उनकी पहचान है, और ये पहचान इतनी बड़ी थी कि विवाद उन्हे दागदार नहीं कर पाए। किशोर हमारे बीच नहीं हैं लेकिन उनका संगीत हमारे चारों ओर है। किशोरदा आप हमेशा याद आएंगे।

Saturday, August 1, 2009

सब कुछ ज़हरीला है !







मैं अगर कहूं कि आप ज़हर खा रहे हैं तो आप मुझे पागल कहेंगे। लेकिन चारों ओर यही शोर है। ये मत खाओ इसमें ज़हर है। वो मत पीओ उसमें ज़हर है। पिछले कई दिनों से सुनता आ रहा हूं कि ज़हर हमारे घरों तक पहुंच गया है और हम ज़हर खा रहे हैं। अब आप पूछेंगे कैसे। पिछले दिनों टीवी पर देखा, सूट-बूट में एक शख्स चिल्ला-चिल्ला कर कह रहा था। आप ज़हर खा रहे हैं। मैं मिठाई की दुकान पर गया। जो मुझे पसंद है वो लेकर घर आया। टीवी चालू कर बैठ गया अपने पसंदीदा मिठाई का लुत्फ उठाने। लो जी वही शख्स फिर दिखा। बोला ये मिठाई मत खाना, 'इसमें ज़हर है' मुझे लगा वो मेरी ही मिठाई पर नज़र गड़ाकर कह रहा है। मैंने मिठाई का डब्बा दूर फेंक दिया। भूख तो लगी थी। पेट भरने के लिए कुछ खाना तो ज़रूरी था। मैं फिर गया बाज़ार सोचा फलों से काम चला लूं। देखने में सुंदर और ताजे फलों को लेकर बड़े चाव से मैं घर आया। बुद्धूबक्से के आगे बैठकर फलों का स्वाद लेने बैठ गया। देश और दुनिया का हाल जानने की जिज्ञासा में फिर मैंने खबरिया चैनलों का रुख किया। खबरों के अलावा सब कुछ देखा। तभी वो शख्स फिर आता है और कहता है कि सावधान! ये फल मत खाना, 'इस फल में ज़हर है' मैं तो डर गया। उसने फलों में ना जाने कौन-कौन से ज़हर पाए जाने की बात कही। उसके स्टूडियो में भी कई सारे फल रखे थे। उसने कहा कि इन फलों को खाने से कैंसर हो जाएगा। फिर मुझे उस डॉक्टर को कोसने का मन हुआ जिसने मुझे कहा था कि सेहत बनाने के लिए फल खाना चाहिए। मैंने मान लिया कि डॉक्टर को भी नहीं पता होगा कि फलों में सेहतमंद बनाने जैसा कुछ नहीं होता उल्टे फल खाया तो मौत ज़रूर हो जाएगी। डॉक्टर पर हंसते हुए मैंने फलों को भी कूड़े की टोकरी के हवाले कर दिया। भूख तो लगी ही थी। किचन में हरी-हरी सब्ज़ियां मेरा इंतज़ार कर रही थीं। पत्नी को कहा कि कुछ स्वादिष्ट भोजन बना दो। थोड़ी ही देर में भरी हुई खुशबूदार थाली मेरे आगे थी। एक तो भूख ऊपर से खाने की खुशबू , मैं बस खाने पर टूट पड़ा। इस बार मैंने टीवी चालू नहीं किया। लेकिन थकी हारी मेरी पत्नी को टीवी देखने का मन किया। बोली खबरें तो आएंगी नहीं कुछ मनोरंजन का प्रोग्राम न्यूज चैनल पर ज़रूर आ रहा होगा। मैं कुछ बोल नहीं पाया। मेरा पूऱा ध्यान तो खाने पर था। पत्नी ने जैसी किचन और खाने का नाम सुना, चैनल पर टिककर बैठ गईं। मुझे फिर वही शख्स दिखाई दिया। अब मुझे उससे डर लगने लगा था। लेकिन इस बार उसके साथ कोई और भी खड़ा था। उसके आस-पास सब्ज़ियां और अनाज रखा हुआ था। मैंने रोटी का कौर मुंह में जाने से पहले ही रोक लिया। उस शख्स ने अब चिल्लाना शुरू किया, आपकी रसोई में ज़हर है। आपके खाने में ज़हर है। आपकी सब्ज़ियों में ज़हर है। डर के मारे मैंने थाली खिसका दी। उसके साथ जो खड़ा था, ये शख्स उसे डॉक्टर कहकर बुला रहा था। इसलिए मैंने ध्यान से सुनने की कोशिश की। उसने कहा कि आपकी थाली में पड़ी हर चीच में कोई ना कोई ज़हर है, जिसके खाने से मेरा दिल काम करना बंद कर देगा। मुझे गंभीर बीमारी हो सकती है। जो खाना अबतक मेरा पेट भरता था, जिसे खाकर मैं अबतक ज़िंदा हूं। वो खाना अब मेरी जान ले लेगा। अब मैं क्या करता ? सरकार को कोसने के अलावा मेरे पास कुछ ना बचा। इस न्यूज चैनल ने मेरी आंखें खोल दीं। अब भूख अपनी हद पार कर रही थी। सोचा दूध पीकर ही काम चला लूं। गिलास में दूध भरा ही था कि मेरी पत्नी ने आकर मेरा गिलास छीन लिया। मैं सकपका गया। पूछा क्या कर रही हो ? तो जवाब मिला कि ये दूध मत पीना। टीवी पर कह रहे हैं कि दूध पीने से दिमाग काम करना बंद कर देगा। इस दूध में भी ज़हर है और ये जान भी ले सकती है। मैंने सोचा जो दूध अबतक पवित्र माना जाता था। जिसको पीने से शरीर अब तक पुष्ट होता था। डॉक्टर हो या हकीम हर कोई दूध पीने की सलाह देता था। ये बुद्धूबक्सा उस दूध को ज़हरीला बता रहा है। हर बार की तरह बुद्धूबक्से की बात मानकर मैंने दूध फेंक दिया। सोचा मरने से अच्छा है कि भूखा रहूं। लेकिन यकीन मानिए रहा नहीं गया। तो सोचा पानी पीकर ही काम चला लूं। लेकिन यहां तो हद हो गई। मेरा पानी का गिलास भी ज़हरीला होगा ये मैं कभी सोच भी नहीं सकता था। लेकिन उस बुद्धूबक्से की बात मानकर मैंने पानी का गिलास भी रख दिया। मन में एक अजीब से डर को बसाकर मैंने अपने पूरे किचन को एक नज़र देखा। मुझे सबकुछ ज़हरीला दिख रहा था। मन मारकर टीवी के आगे बैठ गया। वो शख्स अभी भी मेरी आंखों के आगे ही था। मेरी भूख बढ़ती ही जा रही थी। उसके बाद से लेकर आज तक मेरे घर में टीवी की आवाज सुनाई नहीं दी। इसलिए अब मैं मैं सबकुछ खा सकता हूं।



हां वो टीवी टूटकर एक कोने में अपनी किस्मत को कोस रहा है।