Wednesday, November 1, 2017

राष्ट्रवादी खिचडी खाइए...देश का हाज़मा खराब है

देश मर्ज इतना गहरा है कि डॉक्टर लगातार कडवी दवा देकर इलाज कर रहे हैं। महंगाई का एलोपैथी से नब़्ज पकड नहीं आई तो नोटबंदी की होम्योपैथी भी आज़माई गई। सेहद बिगडी तो हकीम ने जीएसटी की नैचुरोपैथी भी आज़माई ली है। देश का मर्ज़ है कि ठीक होने का नाम नहीं ले रहा। नादान लोग कह रहे हैं कि दवाइयों का साइड इफेक्ट हो गया है। लेकिन
हकीम से जलने वाले तो ये भी कह रहे हैं कि मर्ज़ कुछ और था दवा कोई और दे दी। अब उनकी क्यों सुनें जो हकीम से खार खाते हैं। वैद्यशाला के खाते में धन तो आ रहा है ना! मरीज का जितना ज्यादा और लंबा इलाज, अस्पताल की उतनी ही कमाई। अब गणित तो सीधे-सीधे यही कहता है जी। अब कुछ लोग यहां तक कह रहे हैं कि अस्पताल में जो पैसा आया है उससे डॉक्टर साहब अपने परिवार के बीमार लोगों की हालत ठीक करेंगे। अब परिवार का ख्याल रखना गुनाह है क्या जी? परिवार ने इतना निवेश किया है तो उनकी मर्ज़ तो पहले ठीक करना पडेगा ना? पहले वाले डॉक्टर ने भी तो यही किया था। उधर जो मर्ज़ नहीं है वो गालों पर ग्लो लेकर चलेगा लेकिन अस्पताल को मर-मर कर और भर-भरकर देने वाले का इलाज ही नहीं हो रहा। हकीम लगातार एक्सपेरीमेंट करने के मूड में है। विदेशी रिपोर्ट कह दी है कि इस अस्पताल में इलाज करने के लिए माहौल बढिया है। डॉक्टर गदगद हो गए और टेबल पर रखी उस विदेशी रिपोर्ट को धीरे से कचरे के डब्बे में डाल गए जिसपर लिखा था कि अस्पताल की दवा का असर किसी मरीज पर नहीं हो रहा है बल्कि झारखंड में कुछ तो बिना इलाज के ही मर गए।
       डॉक्टर सिर्फ दवा ही नहीं सलाह और हौसलों के जुमले भी बांटता है जिससे मरीज़ को इलाज पर उम्मीद हो जाए और उसे लगे कि दवा का असर हो रहा है और वो ठीक हो रहा है। देश के मर्ज़ को साथ भी यही हो रहा है। जुमलों का सीरप डिब्बा भर के पिलाया जा रहा है। जिनके गले से नीचे नहीं उतर रहा उन्हे वही सीरप राष्ट्रवादी डिब्बों में भरकर पिलाया जा रहा है़। जो पीने से मना करे उसे पाकिस्तानी अस्पताल भेजने की व्यवस्था की जा रही है। धैर्य रखिए राष्दवा का नुस्खा नया है। इसका फायदा डॉक्टर को अस्पताल में नहीं बाहर ज्यादा हुआ है।
   लेकिन मर्ज़ इतना बेगैरत हैं जो इन तमाम दवाओं से भी ठीक होने का नाम नहीं ले रहा है। बडा ही देशद्रोही किस्म का मर्ज़ है जो बीमार रहकर हकीम को बदनाम करने की कोशिश कर रहा है। लेकिन हकीम ने हिम्मत नहीं हारी है। हकीम अब मर्ज़ को जड से खत्म करने के लिए मरीज़ को खिचडी खाने को कह रहा है। इस में खिचडी राष्ट्रवाद का नमक, मिर्च और मसाला होगा। हकीम से खिचडी आपको नहीं देगा बल्कि खिचडी का इंतजाम आपको खुद करना होगाा। क्या हुआ जो सब्जी और चूल्हा तनिक महंगा हो गया है। मर्ज़ भी तो गहरा है। बीरबल की खिचडी भले ना पकी हो। ये खिचडी ज़रूर पकेगी और मर्ज़ इसीसे खत्म होगा। है कि हकीम की हिम्मत की दाद दीजिए। खिचडी से ठीक ना हुआ तो अगले इलाज की तैयारी चल ही रही होगी। बस तबतक कहीं दर्द से मरीज़ की मौत ना हो जाए।

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