Saturday, October 22, 2016

चुनावों के बाजार में आपका स्वागत है !

भारत उपभोक्ता बाजार है। शायद दुनिया का सबसे बडा बाजार जिसकी वजह से दुनिया का हर देश अपनी अर्थव्यवस्था सुधारने के लिए भारत में निवेश का रास्ता अपनाता है। सुलभ संसाधन, सस्ती मजदूरी, सरकार में भ्रष्टाचार, पूंजीपति प्रेमी सरकार और उपलब्ध बडा बाजार, वो सब कुछ भारत देते है जो किसी निवेश के मुनाफे को बडा सके। 
     सिर्फ विदेशी ही क्यों क्या भारतीय निवेश के ने देश को संसाधनों कै कम दोहन किया है! कोयला घोटाले से लेकर केजी बेसिन और २जी घोटाले से लेकर कॉमनवेल्थ खेलों तक, अखबारों की सुर्खियां बताती हैं कि देश को सफेदपोश सत्ताधारियों ने और काले कॉर्पोरेट ने किस तरह अपने निजी मुनाफे के लिए लूटा है। 
    देश में उपभोक्ता हैं तो हर सामान बेचा जा सकता है। हर वस्तु के उपभोक्ता इस देश में हैं
  बाजार ऐसा को गंजे को कंघी तक बेची जा सकती है। इस बाजार रोटी कपडा मकान तो बिकता है आजकल भावनाएं बिक रही हैं।
     शायद आजकल कहना गलत होगा क्योंकि भावनाओं का बाजार तो कभी लग गया था जब सत्ता पर बैठे लोगों पर जनता का विश्वास उठने लगा था। 
   दशक और साल लिखते ही मेरे लिखने का अर्थ राजनीतिक हो जाएगा। सदी बीतते बीतते भावनाओं का बाजार गरम और बडा होने लगा। व्यापारी भी ज्यादा आ गए और खरीददार भी बढ गए। मंदिर के बाहर प्रसाद जरूर बिकता है क्योंकि वो किसी की रोटी से जुडा है लेकिन देश ने देखा कैसे मंदिर ही नहीं भगवान के नाम पर भी भावनाएं बेची जाने लगी। सवाल यहां राजनीतिक रोटी का था। मजे की बात यह थी कि उपभोक्ताओं के नरमुंड भी बाजार में बस खरीददारी किए जा रहे थे। भावनाओं का सेंसेक्स और निफ्टी रेकॉर्ड तोड रहा था।
      इसके दशक भर पहले भावनाओं को आपातकाल के खिलाफ बेचा गया था लेकिन वो अधिकारों की जंग थी। उस बाजार से कई और दुकानदार निकले जिनमें से कई सत्ता के गोदाम तक पहुंच गए।
    नई सदी के शुरूआत में देश को ही प्रोडक्ट बनाया गया। "शाइनिंग" से उपभोक्ता शायद खुश नहीं हुआ तो उसने बाजार ही बदल दिया।
     ऩए बाजार ने भूख की भावनाओं को बेचा और उसकी नई स्कीम सुपरहिट लगी तो उपभोक्ताओं ने उस बाजार को और आगे बढाया। लेकिन १० साल बाद इस बाजार से उपभोक्ता बोर हो गया और नया प्रोडक्ट बेचने वाले के झांसे में आ गया। प्रोडक्ट तो वही थे सारे बस इस सेल्समैन की खूबी थी कि उसी माल को उसने पहले के माल से कैसे बेहतर है ये उपभोक्ताओं को समझा दिया। ना जाने और कितने कितने ऑफर इस माल के साथ देखकर बडी उम्नीद से उपभोक्ताओं ने इस बाजार का सभी माल खरीद लिया जाहिर है सेल्समैन की बल्ले बल्ले। 
   वक्त बीत रहा है और उसी सेल्समैन को उसके ऑफर याद दिलाए जा रहे हैं लेकिन अब दुकान के बाहर कुछ लोग झंडा लिए खडे हैं और कहते हैं दुकान पर सवाल उठाने पर आपको सजा होगी, अगर स्कीम को उत्पाद मांगे तो आप राष्ट्रद्रोही कहलाएंगे। ग्राहक के सामने असमंजस की स्थिति है। दुकान वाले कहते हैं पिछले दुकानदार से तो इतनी शिकायत ना थी तुम ग्राहकों को, सारी शिकायत हमसे ही है!
   किसी ग्राहक ने कहा कि पिछले दुकानदार ने सामान बेचने में बेइमानी की तभी तो उसकी दुकान ग्राहकों ने उठा दी लेकिन दुकान वाले सुनने के मूड में नहीं हैं। 
   अब मेलों का अवसर आया है। पांच जगहों पर एक साथ मेले लगेंगे। बहुत सारे दुकानदार बाजार में आएंगे और अपना माल बेेचेंगे।
    सबसे हिट है मंदिर वाला माल । ये हर ५ साल बाद वाले मेले से ठीक पहले बाजार में आता है और मेला उठते ही माल वापस चला जाता है। ग्राहकों को कुछ नहीं मिलता। इस माल का हवाला थाने पहुंच चुका है।
अब मंदिर वाले प्रोडक्ट पर अपना दावा ठोकने वाला दुकानदार बाजार में फिर आया है। थानेदार के डर से अब वो सीधे मंदिर का नाम नहीं ले रहा लेकिन बोला है कि म्यूजियम जैसा कुछ लाएगा। मंदिर में रहने वाला म्यूजियम में मिल जाए तो चमत्कार ही कहलाएगा। अब इस मेले में भी ग्राहक बाजार में उतरा है। बाजार लगा है कौन कि कितना माल बेचेगा, देखते हैं।

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