मोदी सरकार ने अपना पहला रेल बजट पेश कर दिया। लाखों लोगों
की उम्मीदों के विपरीत सरकार ने 20 जून को ऐतिहासिक तरीके से बढ़ाए गए 14 प्रतिशत
रेल किराए को वासप नहीं लिया। शेयर मार्केट ने भी रेल बजट में रुचि नहीं दिखाई और
बाज़ार धडाम हो गया। रेलवे रिफॉर्म के बल्कि नाम पर बजट में जो कुछ भी रेल मंत्री ने
संसद में रखा वो ज्यादातर की समझ से परे था। मेरा इसरा विपक्ष द्वारा सदन में किए
गए विरोध से नहीं बल्कि बजट के अंदर ढेरों
विसंगतियों से है। चलिए तकनीकि तौर पर इस बजट को देखते हैं। सरकार द्वारा प्रतावित
इस रेल बजट की अमुमानित लागत 65,455 करोड़ है। हास्यादपद ये कि रेलवे की सालाना
कमाई ही 6
0 हज़ार करोड़ है। यानि सरकार पहले ही रेलवे को घाटे में में ले जाने का
मन बना चुकी है। बजट की दूसरी सबसे अहम बात रही रेलवे में देशी और विदेशी
प्रत्यक्ष निवेश। विपक्ष में रही भाजपा लगातार विदेशी निवेश का विरोध करती रही
लेकिन सत्ता में आते ही सरकार के सुर अगर बदल गए तो इसमें हैरत नहीं होनी चाहिए
क्योंकि सत्ता की कई मजबूरियां होती हैं। बहरहाल, अर्थशास्त्र की मानें तो निवेशक
हमेशा वहीं निवेश करता है जहां धंधा मुनाफे का हो। नई सरकार ने पहले ही रेलवे को 5
हज़ार करोड़ से ज्यादे के घाटे में डाल दिया है। लेकिन इसके वाबजूद अगर कोई विदेशी
कंपनी रेलवे में निवेश के लिए आगे आती है उसके रेड कारपेट ज़रूर बिछाए जाने चाहिए।
इस उम्मीद के साथ देशी निजी निवेश एक डर
भी अपने साथ ला रहा है जो है रेलवे के निजीकरण का। वामदल ही नहीं देश का एक बड़ा
तबका इसके खिलाफ है और इसीलिए सरकार को ऐसा कोई कदम उठाने के पहले सभी पक्ष के
लोगों से एक व्यापक चर्चा करनी चाहिए।
ऐसा भी नहीं कि रेल बजट में सिर्फ
खामियां ही हैं, कई ऐसे पहलू भी हैं जिनकी तारीफ की जानी चाहिए। मसलन रेलवे
विश्वविद्यालय खोलने का ऐलान एक नई उम्मीद जगाता है जहां नई पीढ़ी हाई-स्पीड के
गुर सीखेगी। चुनिंदा रेलवे स्टेशनों को हवाई अड्डों की तर्ज पर विकसित करना। पीने
का पानी, साफ-सफाई और गुणवत्ता पूर्ण खाने की बात में रेल मंत्री सदानंद गौड़ा ने
कही। सरकार ने इस बजट में बहुत कम नई ट्रेनों का ऐलान किया लेकिन एक सबसे बड़ा
ऐलान किया हाई स्पीड ट्रेनों और बुलेट ट्रेन का।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने
अपनी चुनावी रैलियों में देश भर को बुलेटट्रेन में घुमाने का वादा किया था और वो
वादा इस बजट में भी दिखाई दे ही गया। रेलमंत्री में मुंबई से अहमदाबाद के बीच पहली
बुलेट ट्रेन चलाने का ऐलान किया है। गुजरात को मोदी सरकार ने पहला तोहफा दे ही
दिया। अब बुलेट ट्रेन की अपनी ही एक कहानी है जिसके बारे में बाद में लिखूंगा
लेकिन ये ये मान के चलिए कि मुंबई को गुजरात से बुलेट ट्रेन से जोड़ना खर्चीला
बहुत है। अनुमानित लागत इस प्रोजेक्ट पर 60 हज़ार करोड़ रुपए बताई जा रही है जो कि
रेलवे की सालान कमाई के बराबर है। इस बुलेट ट्रेन का इस्तेमाल कितना किफायती और
फायदेमंद होगी इस पर एक व्यापक चर्चा की जा सकती है। भारतीय रेलवे की यात्रा करने
वाली यात्री अमूमन 2 रु प्रतिकिलोमीटर देकर यात्रा करता है। वहीं बुलेट ट्रेन में
प्रतिकिलोमीटर की यात्रा 8-9 रुपए तक आती है ऐसे में भारत में बुलेट ट्रेन कितनी
व्यावहारिक होगी ये भी सवालों के घेरे में है। मौजूदा हालात में देश का हर यात्री
चाहता है कि उसे बुनियादी सहूलियतें मिलें। मसलन बुलेट ट्रेन ना सही लेकिन मौजूदा
ट्रेनों में सुविधाएं बेहतर हो। रेलमंत्री में अने बजट भाषण के दौरान कहा कि वो
रेलवे को फायदे वाली कंपनी बनाना चाहते हैं जो सेवा निहितार्थ हो। लेकिन किसी भी
धंधे में उपभोक्ता से उधार नहीं नहीं लिया जाता हां सुविधाओं के अनुसार उसकी कीमत
ज़रूर ली जाती है। मोदी सरकार ने किरए में बढोत्तरी कर दी और कहा कि कड़वी दवाई
है, पी जाइए और देश की तबियत सही कर देंगे। हां ये सही कि कोई भी विकास
कार्य एक दिन में नहीं हो सकता लेकिन इस सरकार को ये भी मानना होगी कि जनता जो उम्मीदें इस सरकार से लगा रही
है वो इनके दिखाए उन बड़े-बड़े सपनों की वजह से है। रेलवे आज भी साफ-सफाईष
गुणवत्तापूर्ण खाना, सुरक्षा और तमाम खामियों से जूझ रहा है। यात्रियों की संख्या
ज्यादा है और ट्रेनें कम। अच्छी ट्रेनों के नाम पर हमारे पास राजधानी और शताब्दी
है जिसकी औसत रफ्तार 100 किमी है। रही बात सुरक्षा की तो हाल ही राजधानी एक्सप्रेस
में हुआ हादसा इसकी असली कहानी कहता है। कुल मिलाकर बात इतनी है कि मौजूदा रेलवे
की ओर नज़र डालें रेल मंत्री जी, जो है उसे बेहतर बनाएं, बुलेट की सवारी बाद में
भी कर लेंगे फिलहाल जो रेंग रही हैं उनकी रफ्तार बढ़ाएं।

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