Saturday, July 12, 2014

सूखे की चपेट में देश !

मोदी सरकार भले ही देश में अच्छे दिन आने दावा कर रही हो लेकिन एक इन दावों प्रकृति झुठलाने की तैयारी में है। मॉनसून आ चुका है, लोगों नज़रें आसमान पर गाड़े बैठे हैं लेकिन इंद्र देवता भक्तों से कुछ नाराज़ नज़र आ रहे हैं। बादल रह-रह कर आंख मिचौली कर रहे हैं। जुलाई के मौसम में भी बदन पर बारिश की बूंदें ठंडक देने के बावजूद सूरज की तपिश उसे जला रही है। हरे-भरे मैदान सूख रहे हैं और पंक्षी आशियाना बदल रहे हैं। बादलों की छाया जैसे ही मन को बहलाती है अगले ही पल सूरज की तेज किरणें सारे अरमानों पर पानी फेर देती हैं। गांवों में कहीं कुंएं सूख रहे हैं तो कहीं नले से निकलता पानी भी अब सूख चुका है। देश सूखे की ज़बरदस्त मार से ग्रस्त होने की राह पर है। मौसम विभाग की मानें तो जून महीने में औसत बारिश से 50 फीसदी से ज्यादा की कमी रही। गुजरात और राजस्थान में तो सामान्य से 80 फीसदी कम बारिश हुई है। जुलाई के आंकड़े भी राहत की खबर नहीं लेकर आए। जुलाई में अमूमन झमाझम बारिश होती है लेकिन ज़मीन दो बूंदों के लिए अभी भी तरस रही है। मॉनसून अपनी ताकत खो बैठा है नतीजन जुलाई में भी धरती की कोख सूखी ही रह जाएगी। मौसम विभाग की मानें तो जुलाई में भी उतनी बरसात नहीं होगी जितनी अमूमन जुलाई महीने में होती है। कम बरसात के चलते आधे उत्तर भारत को बिजली और पानी देने वाला भाखड़ा नांगल बांध भी सूख रहा है। बांध में पानी का स्तर कम होने के चलते आस-पास के राज्यों को पानी की सप्लाई रोके जाने का खतरा है। हिमाचल के कई बांधों में भी पानी का स्तर कम हो चुका है जिसका सीधा असर सिंचाई पर पड़ेगा। उत्तरप्रदेश, मध्यप्रदेश, पंजाब, राजस्थान, गुजरात, हिमाचल, हरियाणा और महाराष्ट्र के कुछ हिस्से सबसे ज्यादा सूखे की चपेट में हैं। आंकड़ों के मुताबिक अबतक मात्र 256 लाख हेक्टेयर क्षेत्रफल में ही खरीफ की फसल की बुवाई हो पाई है जो पिछले वर्ष जुलाई में 520 लाख हेक्टेयर से भी ज्यादा थी। देश के कई हिस्सों में दाल की फसल भी नुकसान हो रही है इसलिए किसान दालों की जगह धान की खेती कर रहे हैं। ज़ाहिर है आने वाले समय में दालों के दाम और बढ़ेंगे। सूखे के चलते देश का सालाना पैदावार में 3 करोड़ टन अनाज की कमी आ सकती है। बिगड़े मॉनसून के चलते ये तमाम समस्याएं देश के समानेव आ सकती हैं। इसलिए सवाल ये कि ऐतिहासिक जनमत से सत्ता में आई मोदी सरकार क्या कर रही है।   
  ऐसा भी नहीं है कि केंद्र सरकार हाथ पर हाथ धरे बैठी है। सरकार के सूत्रों की मानें तो केंद्र ने सूखे से निपटने के लिए एक मास्टरप्लान तैयार कर लिया है जिसके तहत राज्यों के साथ बेहतर तालमेल किया जाएगा ताकि हर स्थिति पर गंभीरता से नज़र रखी जा सके। सरकार ने ग्रामीण विकास मंत्रालय के अधीन एक निगरानी सेल भी गठित की है जो संभावित सूखे की चपेट में आने वाले राज्यों की केंद्रीय कार्यक्रमों के तहत की जा रही तैयारियों पर नज़र रखेगी। मामला सिर्फ कागज़ी कार्रवाई तक ना रह जाए इसलिए केंद्र ने सभी राज्यों से मनरेगा के तहत अगले 3 महीनों तक हर पखवाड़े रिपोर्ट भी तलब की है ताकि सूखे की मार से जनता को राहत दी जा सके। केंद्र ने मनरेगा के तहत सभी राज्यों के अधिकार क्षेत्र भी बढ़ा दिए हैं ताकि छोटी नहरों से लेकर सिंचाई के और भी साधनों का बंदोबस्त किया जा सके। कमज़ोर मॉनसून के चलते देश भर में पहले ही आलू, प्याज टमाटर और सभी सब्ज़ियों के दाम आसमान छू रहे हैं। हां लेकिन वित्तमंत्री अरुण जेटली को मंहगाई की मार झेलती जनता का दर्द नहीं दिखाई देता बल्कि उन्हे तो मंहगाई ही इतनी ज्यादा गंभीर नहीं लगती और शायद इसीलिए उनकी ओर से ये बयान आता है कि महंगाई को लेकर पैनिक (डर) करने की ज़रूरत नहीं है। अब कौन बतलाए जेटली जी को देश में निम्न मध्य वर्ग की तादात मध्य वर्ग और उच्च वर्ग कई गुना ज़्यादा है और जिसकी जेब में आने वाले पैसों से बमुश्किल ही उनके घर का खर्च चल पाता है, बचत के बारे में तो बेचारे सोचकर ही जी लेते हैं। वित्त मंत्री जी ने जो बजट पेश किए वो मध्यवर्ग को बेहद आकर्षक लगा, बड़ी-बड़ी कंपनियों ने इसे सर माथे पर लिया और अरबों का व्यापार करने वालों की तो पौ-बारह हो गई। बेचारा गरीब तबके के अच्छे दिनों के सपने महज़ सपने बन कर रह गए। ख़ैर इन पर कभी और चर्चा करेंगे, फिलहाल बात देश पर मंडराते हुए भयानक सूखे की खतरे की ही करते हैं। सरकार ने 50 लाख टन चावल सार्वजनिक वितरण प्रणाली के लिए आबंटित कर दिए हैं। मई महीने में खाद्य मंहगाई दर 9.50 थी जो अप्रैल के मुकाबले के थोड़ी कम रही लेकिन जून का डाटा सरकार के लिए अच्छी खबर लेकर नहीं आया। डेढ़ महीने पहले ही निर्वाचित हुई मोदी सरकार के समाने एक के बाद एक मुसीबतें खड़ी हो रही हैं ओर इन्ही चुनौतियों से सकुशलता से लड़ना ही नरेंद्र मोदी अपनी पहचान बताते रहे हैं। अब बात गुजरात के 6 करोड़ लोगों तक सीमित नहीं है और ना ही बात एक राज्य में दबकर रह जाएगी। मोदी के हर कदम को ना सिर्फ सारा देश बल्कि सारी दुनिया देखेगी। और अगर इस पहलू को छोड़ भी दें मोदी उन लाखों करोड़ों लोगों की उम्मीद भी हैं जिन्होने मोदी में अपने लिए हीरो तलाशा था। देश में आने वाला सूखा और उससे लड़ने की सरकार की मंशा और तरीका दोनों ही प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और उनकी राजनीति का भविष्य लिखने में एक अहम भूमिका अदा करेंगे। इसलिए प्रधानमंत्री जी फिलहाल राज्यों के गवर्नर के तबादले, निजी सचिवों के मसले, विपक्ष की चिंता और राज्यों के चुनावों की चिंता छोड़कर अब देश की ओर देखिए क्योंकि देश आप की तरफ देख रहा है। 

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