मोदी सरकार सत्ता में एक महीने से ज्यादा समय बिता चुकी है लेकिन उसे अभी से जनता से शिकायत होने लगी है कि सरकार को हनीमून मनाने का समय भी नहीं दिया जा रहा है। सरकार की शिकायत इस बात की भी है कि जनता एक महज़ एक महीने में ही अच्छे ही दिनों की उम्मीद क्यों कर रही है जबकि किसी भी सरकार की नीतियां दीर्घकालिक होती हैं और उसके परिणाम भी दीर्घकाल के बाद ही दिखाई देते हैं। लेकिन उन्हीं दलीलों को जनता के सामने रखते समय सरकार को भी याद परिकल्पना किसने दी थी। भ्रष्टाचार से त्राहिमाम कर रहे देशवासियों को अच्छे दिनों के सपने किसने दिखाए। एक दलील ये भी हो सकती है कि चुनावों लड़ने का एकमात्र लछ्य होता है चुनान जीतना और सत्ता का स्वाद चखना। हिंदुस्तान को इस राजनीति की आदत पीढ़ियों से है और हम शिकायत भी नहीं करते, बस मन ही मन अपनी बेबसी का रोना रोते हैं। लेकिन गुजरात से आई हुई कहें या बनाई हुई एक आंधी दिल्ली का रुख़ करने लगी। नरेंद्र मोदी ने अपने तमाम चुनावी रैलियों में तत्कालीन यूपीए सरकार पर महंगाई और भर्ष्टाचार को लेकर न सिर्फ तीखे हमले किए बल्कि देश के करोड़ों लोगों के दिलों को वे अच्छे दिनों के नाम पर वो भेदने में भी कामयाब रहे। मार्केटिंग के ज़रिए भी चुनाव जीता जा सकता है 2014 इसका सबसे बड़ा प्रमाण है। पिछली सरकार के अगुवा पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने जब ये कहा कि उनके पास कोई जादू की छड़ी नहीं है ज़िससे वो महंगाई पे अंकुश लगा सकें। फैसले ना लेने के चलते सरकार और देश के हुए नुकसान पर साथियों का रोना भी पिछली सरकार ने दिया। नरेंद्र मोदी ने उन मुद्दों को भी उठाया और 300 से ज्यादा सीटों के लिए जनता से फरियाद की। मोदी की जादुई शख्शियत और बेबाक बोल जनता को कुछ ऐसे भाए कि बीजेपी की झोली में 300 से ज्यादा सीटें गिरीं। भारत के इतिहास की सबसे मजबूत सरकार लेकर मोदी प्रधानमंत्री बन गए। लेकिन अब बारी थी उन वादों को पूरा करने कि जिसके सपनों को बेचकर ये सरकार बनी थी।
महज़ एक महीने में नई सरकार को आटे दाल का भाव पता लग गया। एक महीने के भीतर ही महंगाई ने देश को अपने गिरफ्त में ले लिया। चुनावों में ज़िक्र तक नहीं था लेकिन सरकार बनते ही प्रधानमंत्री ने कहा देशहित में कुछ कड़वे फैसले लेने होंगे। नतीजा पिछली सरकार द्वारा हर महीने डीज़ल की कीमतों में होनेवाले मालभाड़े का किराया बढ़ाकार। देश के इतिहास में रेल किराए और मालभाड़े में इतनी बढ़ोत्तरी ना देश ने कभी देखी या सुनी थी और ना ही रेलवे ने। मुंबई जैसे शहर में मासिक पास की कीमत तो आसमान से भी आगे जा गिरी। 14 प्रतिशत किराए का बोझ देश पर गिरा तो मुंबईकरों की जेबपर 300 प्रतिशत से ज्यादा को बोझ पड़ा। इसी साल महाराष्ट्र में चुनाव हैं और पॉलिसी पर पॉलिटिक्स किस तरह भारी पड़ी वो भी इस सरकार ने देखा। शिवसेना के दबाव और जनता के गुस्से के चलते मुंबईकरों पर पड़ा अतिरिक्त बोझ हट गया।
सरकार ने एक महीना पूरा करते-करते रसोई गैस, डीज़ल और पेट्रोल के दाम भी बढा दिए। सरकार ने खजाने पर भारी सब्सिडी का हवाला दिया और देश को ये कहकर शांत रहने को कहा कि ये एक और कड़वी दवाई का डोज़ है। कड़वी दवाईयों का आलम ये है कि देश की जनता अब बीमार सी हो रही है। सरकार उलट जनता से सवाल करती है कि इतनी जल्दी अच्छे दिनों की उम्मीद हम क्यों करते हैं, हमारे पास कोई जादू की छड़ी नहीं है।
ये सारा देश जनता है कि जादू की छड़ी ना तो पिछली सरकार के पास थी ना तो आपके पास है लेकिन चुनावों में आपने देश को कुछ ऐसे ही सपने दिखाए कि जैसे आपके आने से सब कुछ बस यूं ही ठीक हो जाएगा। जनता बस आपको अपने वादे याद दिला रही है ताकि आस उसे भूल ना जाएं। 3जी और 4जी के ज़माना और युवाओं की समाज में बढ़ती भागीदारी के चलते राजनीति अब उतनी आसान नहीं रह गई जितनी कभी रहा करती थी। चुनावी वादों को लोग अब यूं ही नहीं भूलते। देश अब नींद से उठ खड़ा है और देश चलाने वालों की उतनी ही जवाहदेही होगी जनता के प्रति जितनी संसद के लिए है। और ये जवाबदेही का बोझ है जिसे मोदी सरकार को उठाना ही पड़ेगा। सरकार के साथ उन तमाम राजनीतिक पार्टियों को अब ये याद रखना होगा कि सपने बेचकर सत्ता हासिल करने का मंसूबा छोड़ दें क्योंकि लोगों की चेतना जाग चुकी है। सवाल पूछे जाएंगे, बार-बार पूछे जाएंगे जैसे इस सरकार से जनता पूछ रही है कि अच्छे दिन कब आएंगे।

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