Saturday, March 12, 2011

बस कुछ दिन ?



जापान में ज़लज़ला क्या आया...सारी दुनिया की ज़बान पर एक ही सवाल है। बस कुछ दिन और ? धरती की तबाही की शुरूआत हो चुकी है। विनाश की उल्टी गिलती शुरू हो चुकी है। सालों लंबी ज़िंदगी अब लम्हों में कट रही है। जापान के साथ सारी दुनिया ने जो मंज़र देखा उसकी तस्वीर ज़िंदगी भर ज़िंदा रहेगी। कुदरत का क़हर धरती पर ऐसा बरपा मानो विनाश का दिन आज ही है। माया सभ्यता के कैलेंडर ने विनाश की दिन मुकर्रर कर दी है। जापान की विनाशकारी घटना आने वाले खतरे का संकेत मात्र है। प्रलय किसे कहते हैं अब ये समझना मुश्किल नहीं है। पाप और पुण्य के तराजू में पाप का पलड़ा शायद भारी हो चुका है। डर हर किसी के जेहन में घर कर चुका है। सारी दुनिया धरती मां से प्रार्थना कर रही है कि हे धरती मां हमें हमारी ग़लतियो के लिए माफ कर दो। ये विनाशलीला रोक दो।
आखिर हमें हमारी ग़लतियों का एहसास अब क्यों हो रहा है ? सालों तक हमने प्रकृति की उपेक्षा की। और अब जब प्रकृति हमारी उपेक्षा कर रही है तो हम चीख-पुकार मचा रहे हैं। इस दिन की कल्पना पर्यावरणविदों ने बहुत पहले ही कर दी थी। लेकिन मानवी लोलुपता और पिपाशा के वशीभूत होकर मानवों ने प्रकृति के हर उस नियम की अवहेलना की जिसका दुष्परिणाम आज हमारे सामने है। अपने निजी हितों के लिए हमने प्रकृति में परिवर्तन करना शुरू किया। निजी स्वार्थ के चलते धरती की हरियाली पतनोन्मुख हो गई। क्या धरती..क्या आसमान सब दूषित होते गए। जल, थल और वायु पर नियंत्रण करने की हमारी मंशा ने हमें अंत के द्वार पर खड़ा कर दिया है। दुनिया के विकसित देश बढ़ते प्रदूषण या यूं कहें की ग्रीन हाउस इफेक्ट के लिए प्रगतिशील देशों को ज़िम्मेदार ठहराते हैं। प्रगतिशील देशों में ताकतवर और कद्दावर बनने की होड़ मची है, चाहे इसके लिए कोई भी कीमत क्यों ना चुकानी पड़ी। जापान में जो ज़लज़ला आया वो इतिहास की सबसे बड़ी विनाशकारी घटना है। लाखों लोग अभी भी लापता हैं। मरनेवालों का आंकड़ा लगातार बढ़ता जा रहा है। द्वितीय विश्वयुद्ध के समय जापान ने मित्र राष्ट्रों में सबसे कद्दावर देश अमेरिका को पर्ल हार्बर जैसा ज़ख्म दिया। अमेरिका ने जापान को नागासाकी और हिरोशिमा पर परमाणु बम बरसाकर करारा जवाब दिया। जापान एक त्रासदी भूला भी नहीं था कि अब एक और जख्म से पीड़ित हो चुका है। और सिर्फ जापान ही क्यों...26 जुलाई, मुंबई, पिछले साल चीन की बाढ़, लेह और लद्दाख की त्रासदी के साथ दुनिया के अलग-अलग कोने लगातार मिल रही तबाही की खबरें हमें इस बात का इशारा कर रही हैं कि अब वो वक्त आ गया है। जापान के पास बचने के लिेए 12 मिनट मात्र शेष थे। लेकिन हमारे पास तो शायद अभी सालों का वक्त है। हम अभी भी अपनी गलतियां सुधार कर मानव सभ्यता को विलुप्त होने से बचा सकते हैं। हम अभी भी तबाही को रोक सकते हैं। बशर्ते हम प्रकृति का आदर करें।

No comments:

Post a Comment