Saturday, March 5, 2011

इन आंखों की मस्ती के दीवाने हज़ारों हैं !



हम बीसवीं सदी में जी रहे हैं। सारी दुनिया के रंग और कलेवर अब बदल चुके हैं। बात करें फिल्मों की तो अब 36 मिमी का रंग 70 मिमी के परदे पर उतर चुका है। सिंगल स्क्रीन थिएटर तो अब आंखों से दुर्लभ हो गए हैं। मल्टीप्लेक्स का ज़माना है। कभी लकड़ी की कुर्सियों पर बैठकर फिल्मों का लुत्फ उठाते लोग अब गोल्टन टिकट लेकर लेटकर बॉलीवुड का मज़ा लेते हैं। लेकिन मैं बात यहां ना तो फिल्मों की करुंगा और ना ही थिएटरों की...आज मुझे याद आ रही है उन्नीसवीं सदी की उस महान अदाकारा की जिसकी खूसबसूरती का आज भी कोई जवाब नहीं। जिसके अभिनय की नकल तो दूर उसके पास पहुंचने की हिमाकत भी आज की किसी अभिनेत्री ने नहीं की। आज मुझे याद आ रही है रेखा की। जिस रेखा के बिना आज भी बॉलीवुड अधूरा है उसने ज़िंदगी में संघर्ष और सफलता के बीच का फैसला कैसे तय किया, वो आज भी एक मिसाल है। चार साल की उम्र में बेबी भानुरेखा ने रूपहले पर्दे पर पहला कदम रखा। हिंदी फिल्मों की जान बनने से पहले रेखा अभिनय की शुरूआत दक्षिण भारतीय फिल्मों से की।
1970 में रेखा ने हिंदी फिल्मों का रुख किया। बतौर अभिनेत्री रेखा की पहली हिंदी फिल्म थी ‘सावन भादों’। इस फिल्म से रेखा को कुछ खास सफलता नहीं मिली जिसकी वजह से उन्हे बेहद निराशा हुई। लेकिन उन्हे नहीं पता था कि इस फिल्म के बाद हिंदी फिल्मों के तमाम निर्देशकों की नज़र अब उन पर पड़ चुकी थी। रेखा के हाथों की रेखा
ने अपना जलवा तब दिखाया जब उन्हे पहली बार आज की सदी के महानायक अमिताभ बच्चन के साथ फिल्म अलाप में काम करने का मौका मिला। इस जोड़ी की सफलता देखकर प्रकाश मेहरा ने इन दोनों को फिल्म ‘मुकद्दर का सिकंदर’ फिल्म बनाई। फिल्म इसी जोड़ी को मौका दिया गया। और देखते ही देखते रेखा और अमिताभ ने शोहरत के आसमान को छूना शुरू कर दिया। फिल्म की कामयाबी के साथ रेखा के सितारे भी सातवें आसमान को पार कर चुके थे। अमिताभ के साथ ही फिल्म ‘मि.नटवरलाल’
में रेखा एक बार फिर नज़र आईं। फिल्म का गीत ‘परदेसिया’ इतना ज़बरदस्त हिट हुआ कि उसके बोल सुनते ही आज की पीढ़ी भी थरकने को नजबूर हो जाती है। एक गांव की भोली-भाली लड़की का किरदार रेखा ने बखूबी निभाया। वहीं फिल्म ‘सुहाग’ में रेखा की अदायगी ने उन्हे प्रशंसकों के दिलोदिमाग पर हावी कर दिया। अपनी कई फिल्मों में तवायफ का किरदार रेखा ने कुछ ऐसा निभाया कि उनपर मर मिटने वालों का रेला सा लग गया। रेखा की आंखें बिना बोले ही बहुत कुछ कह जाती थीं। उनकी आँखों की कशिश ने ना जाने कितनों को घायल किया। रेखा के चाहने वालों की तादात बढ़ती जा रही थी। वहीं रेखा के दिल में भी किसी शख्स ने अपनी जगह बनानी शुरू कर दी। वो शख्स कोई और नहीं बल्कि अमिताभ बच्चन थे। दोनों के अफेयर के चर्चे खूब चले।
बॉलीवुड की सबसे हिट जोड़ी को हर चाहने वाला जीवन भार साथ देखने की चाहत पालने लगा। लेकिन अमिताभ के दिल में पहले ही जया बहादुरी बस चुकी थीं। रेखा, अमिताभ और जया के बीच लवट्राएंगल को यश चोपड़ा ने देखा। यश चोपड़ा ने जया, अमिताभ और रेखा को लेकर फिल्म बनाई जिसका नाम था ‘सिलसिला’। फिल्म बेहद मशहूर हुई। फिल्म की सफलता के पीछे आज भी वजह इन तीनों कलाकारों के रिश्ते का माना जाता है। रील लाइफ की कहानी को लोगों ने रीयल लाइफ से जोड़कर देखा।
प्रेम की मारी रेखा ने अपना प्रेम खो दिया। लेकिन ज़िंदगी से हार नहीं मानी। फिल्म
‘उमराव जान’ में रेखा ने जो अदायगी दिखाई वो एक मिसाल बन गई। उसी ‘उमराव जान’ को जब दोबारा पर्दे पर उतारा गया जो उसमें रेखा की जगह ऐश्वर्या राय नज़र आईं। ऐश्वर्या ने ‘उमराव जान’ के किरदार को निभाने की पूरी कोशिश की लेकिन दर्शकों ने इस ‘उमराव जान’ को उस ‘उमराव जान’ के ज़रा भी करीब नहीं पाया। मैं खुद भी रेखा के चाहने वालों में से एक हूं। और इसलिए मैं जानता हूं कि जिस दिन रेखा और अमिताभ दोबारा सिल्वर स्क्रीन पर आए तो बॉलीवुड में एक नया इतिहास बनेगा। रेखा अपने आप में एक अनसुलझी कहानी हैं। प्रेम ऐसा किया कि दोबारा किसी को दिल में जगह नहीं दी। किसने क्या कहा और क्यों कहा इसकी परवाह ज़रा भी नहीं की। रेखा की इस प्रेम को मैं सलाम करता हूं।

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