Thursday, February 18, 2010

एक और QUIT !


Work hard Until Scceed ! दीवार पर लिखे ये वो शब्द हैं जो इशारा करते हैं कि बीटेक की छात्रा प्रगति सिंह के दिमाग में क्या चल रहा था। प्रगति मेहनत को करना चाहती थी लेकिन उम्मीदों का बढ़ता बोझ उसके रास्ते में रुकावट बन रहा था। गाज़ियाबाद के इस प्राइवेट हॉस्टल में अपनी रूम पार्टनर के साथ रहने वाली प्रगति ने इसी वजह से मौत को गले लगा लिया। प्रगति ग्रेटर नोएडा के विश्वेश्वर्य संस्थान से बीटेक कर रही थी। प्रगति गाज़ियाबाद के राजनगर इलाके के इसी हॉस्टल में रहती थी। पिछले कई दिनों से प्रगति बेहद परेशान थी। पुलिस को प्रगति के कमरे से एक सुसाइड नोट मिला है। मरने से पहले प्रगति ने अपने मन की बात कागज़ पर उतार दिए। प्रगति ने लिखा है..'हम पढ़ाई की वजह से डिप्रेशन में हूं। हम बीकॉम करना चाहते थे लेकिन हमारा परिवार चाहता था कि हम बीटेक करें। पढ़ाई को लेकर हम बहुत चिंतित हैं। जब कोई अपना काम पूरा मन लगा के करता है तो लोग उसे हमेशा गलत और बुरा क्यों कहते हैं। जब घर में भी हम अपना मन लगाके पढ़ना चाहते थे तो आप कहते थे कि हम अपने आप में ही रहते थे और घमंडी हैं। हम हमेशा दूसरों के लिए और अपने परिवार के लिए ही सोचते थे। अब हम हॉस्टल में आ गए हैं तो सोचते हैं कि अगर हम अच्छा नहीं करेंगे तो आप क्या सोचेंगे। हम हॉस्टल में अपना सारा ध्यान खो बैठे हैं। लेकिन हम उन लोगों की बात ना सुनकर केवल अपने मन की बात सुनते हैं।' सुसाइड नोट के बाद प्रगति की मौत की वजह का खुलासा हो गया। लेकिन परिवार की उम्मीदें पूरी करने के लिए प्रगति ने अपने सपनों को भुलाने की बहुत कोशिश की।  दिल और दिमाग की लड़ाई में प्रगति हार गई और खुद को मौत के हवाले कर दिया। आमिर खान की हालिय़ा फिल्म 3 ईडियट में भी पढाई के तनाव की वजह से होने वाली मौत को दिखाया गया है। देश भर में भी ऐसे कई मामले सामने आए हैं।  पढ़ाई का तनाव बढ़ते सुसाइड के मामलो की एक वजह बन गया है। ऐसे में ज़रूरत है कि मां-बाप अपने बच्चों की भावनाएं समझें। क्योंकि माता-पिता का सपोर्ट बच्चों के भावी भविष्य के लिए नींव का पत्थर साबित होता है। मैंने फिल्म देखी। विधू विनोद चोपड़ा ने एक अच्छी लेकिन ऐसी कहानी को चुना जो हमारे-आपके बेहद करीब है। एक लड़का जिसकी उम्मीदें टूट जाती हैं और वो ज़िंदगी से हार जाता है। ज़िंदगी असल ज़िंदगी में भी हारी है। मुंबई में पिछले दिनों कई वारदातें एक साथ हुईं। देश के सभी ब़ड़ों शहरों में ये हादसे आम हो गए हैं। शायद वजह हम जानते हैं। पैदा होते ही बच्चे को डॉक्टर और ईंजीनियर बनने के लिए मजबूर कर दिया जाता है। इससे पहले वो खुद को समझे उसके दिमाग ये भूत घर चुका है कि नंबर उसके 100 ही आने चाहिए वरना उसकी ज़िंदगी बेकार है। कागज़ों पर नंबर 100 बनाने के लिए वो ज़िंदगी के अहम दिन तनाव में बिता देता है। इसे देखकर क्या ये नहीं लगता कि बच्चों की मौत के लिए ज़िम्मेदार उनके मां-बाप ही हैं। मैं ये भी नहीं कहता कि बच्चों पर पढ़ने का दबाव ना हो। लेकिन पढ़ाई को बोझ बनाने के बजाए माता-पिता बच्चों को पढ़ने के लिए प्रेरित कर सकते हैं ना कि उनपर दबाव बनाकर उनकी जान के दुश्मन बन जाएं।
ज़िंदगी एक रेस है लेकिन इसे जीतने के लिए सिर्फ आंख बंद करके दौड़ने की ज़रूरत नहीं है। क्योंकि ये रेस थोड़ी अलग है। इसलिए दौड़ने के लिए रास्ता सही चुनें।

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