Thursday, February 18, 2010

जनानियों ! घाट पर साबुन मत लगाना




कोलायत की दीवारों पर कुछ इबारतें बिखरी पड़ी थीं,अजीब-ओ-गरीब विज्ञापनों की शक्ल में। एक दास्तान है, जो राजस्थान के बीकानेर से करीब 40 किलोमीटर इस जगह पर पसरी हुई है। इस दास्तान का नाम है श्रीकोलायत। यह एक छोटा सा कस्बा है, जहां कपिल मुनी का आश्रम हुआ करता था। अब यहां एक तीर्थ स्थल है। अजीब बात है कि हरियाणा के कैथल जिले में भी एक जगह है जहां कपिल मुनी का आश्रम हुआ करता था। अब वहां एक तीर्थ है। और इस जगह का नाम है - कलायत। कैसे ये दोनों जगहें एक जैसी बनीं, यह तो अभी मैं नहीं जान पाया, लेकिन श्रीकोलायत के उस तीर्थ पर बड़े क्रिएटिव विज्ञापन नजर आए। विवेक आसरी ने इन जगहों का मुआयना किया। संसार में रचनात्मकता का सबसे बड़ा उदाहरण यहा मिलेगा आपको। सृजन के बाद मनुष्य कितना दूरगामी हुआ,इसका पता हम अपने चारों ओर देखकर लगा सकते हैं। आवश्यकता आविष्कार की जननी बन गई और सब कुछ यहां तक पहुंच गया। महिलाओं ने भी घर के आंगन से कदम बाहर बढ़ाए और आसमान पर अपना नाम लिख दिया। मन नहीं भरा तो चांद पर भी कदम जमा दिए। ईश्वर की इस दुनिया में एक विचित्र स्वभाव है। इसे जलन या फिर द्वेष नाम भी दे सकते हैं। ईश्वर ने नर और नारी को बनाया। नरों ने आगे निकलने की दौड़ में सदा आगे रहने के लिए नारियों को बंधनों में बांध दिया। उदाहरण आपने भी कई देखे होंगे। धीरे-धीरे रिश्ता भेदभाव तक पहुंच गया। कलायत घाट इसका सबसे बेहतर उदाहरण है। इस घाट पर महिलाओं को नहाने की इजाजत नहीं है लेकिन पुरुष यहां भांग भी पिएं तो कोई बात नहीं। कभी आप जाएं तो इस घाट की शोभा देख सकते हैं। बस देखिए किसी से ये सवाल ना पूछ बैठिएगा कि आखिर आपको जन्म देने वाली महिलाओं को इस घाट पर आने से क्यों रोका गया है। नतीजा कुछ भी हो सकता है। क्योंकि भारत में आस्था कभी-कभी अंधविश्वास बन जाती है। और अंधा कुछ भी कर सकता है...

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