Tuesday, February 23, 2010

दीदी की रेल...पास या फेल ?




24 फरवरी जैसे-जैसे नजदीक आ रही है वैसे-वैसे दिल की धड़कने तेज हो रही हैं। सांसें अटकी हैं। डर लग रहा है कहीं नई दिल्ली रेलवे स्टेशन पर पटना जाने वाली उसी ट्रेन की सेकेंड क्लास टिकट खरीदने के लिए जेब से ज्यादा पैसे तो खर्च नहीं करने पड़ेंगे। मामा के घर कानपुर जाने से पहले 10 बार सोचने की नौबत तो नहीं आएगी। बड़े चाचा गोरखपुर में रहते हैं। कहीं उनके बुलावे पर बहाना तो नहीं बनाना पड़ेगा। जी हां रेल बजट आने वाला है। एक साल से घर का बजट आर्थिक मंदी ने बिगाड़ा है। घर के कुछ बर्तन संभाल के इकठ्ठा किए तो महंगाई ने उसे तितर-बितर कर दिया। शहर में रहने वालों को गांव के अनाज का सहारा था। लेकिन डर है कि कहीं रेलवे का बजट बिगड़ गया तो गांव जाने का हालत भी नहीं रहेगी। लालू यादव का रेलवे बजट लंदन के मैनेजमेंट वालों को भी भाया। लेकिन ममता बनर्जी का पिछला रेल बज़ट कुछ खास नहीं रहा भले ही
पिछले साल जुलाई में रेल मंत्री की अपनी दूसरी पारी के पहले बजट में ममता ने यात्री किराये और माल भाड़े में किसी तरह की बढ़ोतरी नहीं की थी। रेलवे के साथ दुखद यह है कि इससे पिछले साल रेल मंत्री लालू प्रसाद ने भी चुनावी साल की वजह से किरायों में बढ़ोतरी नहीं की थी। इसका नतीजा यह हुआ कि पिछले 2 साल से रेलवे के किराये बढ़ोतरी से हासिल होने वाले अडिशनल रेवेन्यू में किसी तरह का इजाफा नहीं हो पाया है। पिछले 2 साल में रेलवे से माल की आवाजाही और पैसेंजर्स ट्रैफिक में काफी बढ़ोतरी हुई है, पर 9 परसेंट की ऊंची महंगाई दर की वजह से इस अतिरिक्त मुनाफे का कुछ खास असर नहीं दिख पाया है। दिलचस्प ये है कि लालू प्रसाद या ममता बनर्जी को किसी ने आम आदमी पर 'मेहरबानी' दिखाने, धड़ल्ले से नई योजनाएं शुरू करने, अपने-अपने चुनावी क्षेत्रों में नई ट्रेनों की संख्या या फ्रीक्वेंसी बढ़ाने से जुड़े कदम उठाने से किसी ने रोका भी नहीं। ऐसे हालत में जाहिर है कि इस बार जब रेल बजट पेश किया जाएगा तो रेल मंत्री को कई तरह की चुनौतियों से दो-चार होना होगा।
पैसेंजर किराया और माल भाड़ा
रेलवे रोजाना 20 लाख टन माल और 1 करोड़ 80 लाख पैसेंजर्स ढोता है। रेलवे के रेवेन्यू का 70 परसेंट हिस्सा माल भाड़े और बाकी 30 परसेंट पैसेंजर्स किराये से आता है। 2009-10 के लिए पैसेंजर किराये से होने वाली आमदनी 25 हजार करोड़ रुपये रहने के आसार हैं, जो 2008-09 में 22 हजार 330 करोड़ रुपये थी। पर मौजूदा चलन को देखते हुए ममता बनर्जी शायद ही पैसेंजर्स किराये में कोई बढ़ोतरी करें। ऐसे में रेलवे का रेवेन्यू बढ़ाने के लिए रेल मंत्री के पास माले भाड़े में थोड़ी बढ़ोतरी करनी होगी। साल 2007-08 में रेलवे ने 794.21 मिलियन टन माल ढोया। उसके अगले साल यानी 2008-09 में इसमें करीब 7 परसेंट की बढ़ोतरी हुई और यह 850 मिलियन टन हो गया। कारोबारी साल 2009-10 में इसके 882 मिलियन टन का टारगेट रखा गया है। 2009-10 के लिए माल भाड़े से होने वाली आमदनी का लक्ष्य 59 हजार 59 करोड़ रुपये रखा गया है, जो 2008-09 में 54 हजार 293 करोड़ रुपये था। पिछले साल (2009-10) इकॉनमी के मंदी की गिरफ्त में होने की वजह से माल भाड़े में बढ़ोतरी नहीं की गई। पर इस बार हालात सुधरे हैं और माल भाड़े में बढ़ोतरी की जानी चाहिए। रेलवे के जरिये लौह अयस्क, कोयले और सीमेंट की आवाजाही बड़े पैमाने पर होती है। इनके लिए भाड़ा बढ़ाकर रेल मंत्री रेलवे का बटुआ कुछ भर सकती हैं। पर खाने के सामान, फर्टिलाइजर जैसी चीजों की बड़े पैमाने पर आवाजाही होने के बावजूद इनके भाड़े में बढ़ोतरी करना शायद ममता के लिए मुश्किल हो, क्योंकि वह अपने वोट बैंक को नाराज नहीं करना चाहेंगी।

रेलवे ट्रैक पर दबाव
ट्रैक रेलवे ट्रांसपोर्टेशन की रीढ़ हैं। लिहाजा इनकी मेंटिनेंस बेहद जरूरी है। कोई भी ट्रैक 700-800 ग्रॉस मिलियन टन (जीएमटी) ढुलाई के बाद मरम्मत मांगता है। पर ऐसा हो नहीं पा रहा है। जाहिर है इस बार रेल बजट में में नई ट्रेनों का ऐलान होगा और ट्रैक्स पर बोझ और बढ़ेगा। इसे डील करने की चुनौती ममता के सामने होगी।

प्राइवेट इनवेस्टमेंट पर निर्भरता
अब तक खांटी राजनीति करती रहीं और बिजनस सेंटिमेंट से काफी दूर रहीं ममता बनर्जी को लगता है यह समझ में आ गया है कि रेलवे के लिए फंड का इंतजाम पब्लिक-प्राइवेट पार्टनरशिप के जरिये किया जा सकता है। ऐसा माना जा रहा है कि इसी वजह से ममता ने कुछ बिजनस-फ्रेंडली चेहरों को अपने इर्दगिर्द रखना शुरू कर दिया है। इन्हीं में से एक अहम चेहरे हैं - फिक्की के सेक्रेटरी जनरल अमित मित्रा। रेलवे बोर्ड के एक अधिकारी ने बताया है कि साल 2020 तक रेलवे में करीब 14 लाख करोड़ रुपये के निवेश की दरकार होगी और रेलवे इसका करीब 64 परसेंट हिस्सा खुद जुटाएगा, जिसमें पीपीपी की बड़ी भूमिका होगी। पर बड़ी दिक्कत यह है कि लालफीताशाही की दिक्कतों को देखते हुए कॉरपोरेट सेक्टर अच्छी दिलचस्पी रेलवे में नहीं दिख रही।

लोडिंग की समस्या
रेलवे ने 11वीं योजना के अंत तक (31 मार्च 2012 तक) 1150 मिलियन टन फ्रेड वॉल्यूम का लक्ष्य रखा है। फ्रेड में 7 परसेंट की बढ़ोतरी को देखने हुए वैगन की कमी की चुनौती रेलवे के सामने होगी।
तो देखिए भैया 24 तारीख को क्या होता। मीठा खाएंगे या दांत चबाएंगे अब ये दीदी पर निर्भर है।

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