
चंदन काका के साइकिल रिक्शे पर स्कूल जाते थे। मास्टर जी कक्षा लेने से पहले प्रार्थना करवाते थे। मास्टर जी के अस्पष्ट शब्दों को हम अपने सुर में दोहराने की कोशिश करते थे। पंक्तियां कुछ ऐसी थीं...ईश्वर अल्लाह तेरो नाम, सबको सम्मति दे भगवान बचपन के मन ने मास्टर से जी इन पंक्तियों का मतलब पूछा तो उनका जवाब समझने के लिए मष्तिष्क के साथ जूझना पड़ा। लेकिन घर जाकर दादी मां से इसका अर्थ समझ में आया। दादी कभी स्कूल नहीं गई लेकिन इतना जरूर पढ़ा सकती थी कि हिंदू और मुसलमान दोनों की भगवान की बनाई हुई देन है। लेकिन जैसे ही दूसरे गांव का किसान अनाज के पैसे देने आया तो उसे चाय मिट्टी के बर्तन में दी गई। जबकि वही चाय हम कप में पी रहे थे। माजरा समझने के लिए मुझे सवाल पूछना ही था। जिस दादी ने कुछ देर पहले मुझे हिंदू-मुस्लिम एकता का ज्ञान दिया था थोड़ी ही देर में मैंने उसे ईश्वर की देन का अपमान करते हुए देखा। पता चला वो किसान मुसलमान है इसलिए उसे मिट्टी के बर्तन में चाय दी गई। उसकी गरीबी भी उसकी हालत की एक वजह थी। पिता जी मास्टर हैं। दूसरे बच्चों को पढ़ाते हैं। मेरी किताब में एक अध्याय फिर आया। मैंने पढ़ा भेदभाव नहीं करना चाहिए। मन में शंकाओं का कुतूहल उठा। पिताजी ने समझाया कि हम सब एक हैं इसलिए जात-पात के नाम पर भेदभाव नहीं करना चाहिए। मैंने इस पंक्ति को अपने मन में घर कर लिया। इस एकता की मिसाल बनाने के लिए मैं रामअधारे के बेटे के साथ खेलने गया। लेकिन घर आते ही पिताजी के हाथ में बेहये का डंडा मेरे इंतजार में था। मार तो पड़ी ही साथ में कड़कती ठंड में मुझे नहलाय़ा भी गया। जाहिर है आगे से मुझे रामअधारे के टोले के किसी भी बच्चे के साथ खेलने या बातचीत करने से मना कर दिया गया। तब मैंने इंसानी प्रवृत्ति का एक और उदाहरण देखा। मन ही मन सोच लिया कि जब मैं बड़ा होउंगा तब इन कुरीतियों के खिलाफ लड़ुंगा। क्योंकि अभी घर में बगावत करने पर सज़ा का हकदार हो जाउंगा इतनी समझ मुझमें थी। आज मैं बड़ा हो गया हूं। अच्छे-बुरे की समझ है। इंसान को चांद पर पहुंचे ज़माना हो चुका है। मंगल पर इंसानों की बस्ती बसने वाली है। इंसानों का क्लोन भी पुरानी बात हो गई है। लेकिन बचपन की कुछ बातें आज भी नहीं बदली हैं। धर्म और मजहब के नाम पर लड़ाई हो जातिवाद, इंसानों की बस्ती में ये आज भी उतने ही मजबूत हैं जितने कल थे। उदाहरण लीजिए मलेशिया का। लेखक मधुसूदन आनंद लिखते हैं अल्लाह या ईश्वर का शुक्र मनाइए कि आपका जन्म न तो मलयेशिया में हुआ और न ही आप वहाँ रहते हैं। अगर आप मुसलमान नहीं होते और गलती से भी अपने ईश्वर को अल्लाह के नाम से पुकारते तो आपकी खैर नहीं थी। कोई भी हिन्दू, सिख, ईसाई, जैन या अन्य गैरमुस्लिम आदमी किसी भी गैर इस्लामी संदर्भ और विमर्श में ईश्वर के लिए यदि अल्लाह शब्द लिखता या बोलता है तो उसे एक साल तक की सजा हो सकती है। मलयेशिया में 7 प्रतिशत आबादी भारतीय मूल के लोगों की है और वहाँ हिन्दू और सिख धर्मावलंबियों की अच्छी-खासी संख्या है। मलयेशिया में जो भाषाएँ बोली जाती हैं, उनमें चीनी, थाई और अँगरेजी भाषा के साथ-साथ पंजाबी का भी नाम आता है। बहुधर्मी और बहुभाषी समाज में भाषाएँ एक-दूसरे को प्रभावित करती हैं। जैसे हमारे यहाँ ईश्वर को रब, अल्लाह, ईश्वर, खुदा, राम, रहीम, गॉड आदि किसी भी नाम से पुकारा जा सकता है, वैसे ही पश्चिमी देशों में ही नहीं अरब देशों तक में चलन है। जो समाज अनीश्वरवादी रहे हैं, वहाँ भी इस तरह की कोई बंदिश नहीं है। लेकिन मलयेशिया में ईश्वर को या गॉड को या रब को अल्लाह कहने की मनाही है। मलयेशिया से ज्यादा मुसलमान पड़ोसी देश इंडोनेशिया में रहते हैं, लेकिन वहाँ किसी भी धर्म का आदमी अपने ईश्वर को अल्लाह के नाम से पुकार सकता है। और तो और मलयेशिया के बोर्नियो में रहने वाले ईसाई लोग अपने गॉड को अल्लाह के नाम से पुकार सकते हैं लेकिन मलयेशिया की मुख्यभूमि पर इसकी मनाही है। यही नहीं 'फतवा', 'इमाम', 'हाजी', 'शेख', 'मुफ्ती' और 'अल्लाह-ओ-अकबर' जैसे शब्द भी कोई गैर मुस्लिम लिख या बोल नहीं सकता। सब जानते हैं कि ईसाई और सिख धर्म में अल्लाह शब्द का ईश्वर के अर्थ में इस्तेमाल होता है। संत, कवियों और सूफियों ने यही सिखाया है कि ईश्वर एक है और उसे किसी भी नाम से पुकारा जा सकता है। गाँधीजी का तो भजन है : 'ईश्वर अल्लाह तेरे नाम, सबको सम्मति दे भगवान' इसलिए हम भारतीयों को जब यह पता चलता है कि मलयेशिया में हम ईश्वर को अल्लाह नहीं कह सकते तो हमें गहरा झटका लगता है। लेकिन मलयेशिया सरकार के अपने तर्क और कारण हैं। उसने इस तरह की बंदिशें इस डर से लगाई थीं ताकि दूसरे धर्मों के लोग और विशेषकर क्रिश्चियन लोग मुसलमानों का धर्म परिवर्तन न करा लें। अल्लाह और अन्य शब्दों को लेकर विवाद वर्षों पुराना है। 1980 के दशक में करीब दो दर्जन ऐसे शब्दों की सूची बनाकर सरकार ने हुक्मनामा जारी कर दिया था। है ईश्वर आखिरये कब तक चलता रहेगा।
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