Thursday, February 25, 2010

देखो होली आई रे...




चारों ओर रंग ही रंग हैं। जहां जाओ रंग भरे गुब्बारे आपका इंतजार कर रहे हैं। आप आगे बढ़े नहीं कि एक गुब्बारा हवाओं के साथ मुकाबला करता हुआ आप पर हमला कर देगा। आपके कपड़ों पर गुब्बारा अपना सारा गुबार निकाल देगा। गुब्बारे की रफ्तार लंका जाते समय हनुमान की रफ्तार से कम नहीं होगी। आपके कपड़ों का रंग खून से लथपथ सिपाही की तरह होगा और हालत भीगी हुई बिल्ली की तरह। अब होली रंगो से होती है, लेकिन होली के भी कई रंग हैं। मसलन आप गोरखपुर के किसी गांव में जाइए। दोपहर के 1 बजे के पहले पहुंचे तो स्वागत कीचड़ से होगा और देर से गए तो गंदे रंगों से साथ आपका शाही स्वागत हो सकता है। शहर की ओर आते हैं। दिल्ली या मुंबई में, होली के दो हफ्ते पहले से ही माहौल बना लिया जाता है। फटे-पिचके गुब्बारे दुकानों के कोनों से बाहर की सज्जा बन जाते हैं। फिर कुछ ही देर में गली के बदमाश लेकिन मां की नज़रों में लाल के हाथों में चले आते हैं। मां के काले-काले और गोरे-गोरे लाल उन गुब्बारों का सही इस्तेमाल राहगीरों पर करते हैं। उनका कलर कॉंबिनेशन भी गजब का होता। सफेद रंग की शर्ट पहने लोगों पर लाल रंग से भरे गुब्बारे से हमला किया जाता है। किसी ने हरे रंग के कपड़े पहने हैं तो उस पर नीले रंग का गुब्बारा फोड़ दिया जाता है। गलती से जवानी की दहलीज पर कदम रखती कोई कन्या रास्ते से गुजरी तो उस पर गुब्बारों का ऐसा हमला होता है जैसे किसानों के खेत में टिड्डियों ने हमला बोल दिया हो। लड़की की हालत हमले के बाद किसान जैसी हो जाती है। पलट कर इन शरारती लेकिन मां के प्यारे-प्य़ारे बच्चों को देखने की कोशिश करेंगे तो ये ऐसे अदृश्य होंगे जैसे हवा में ऑक्सीजन। रास्ता लेकर बनारस की ओर भी चलते हैं। य़हां होली का रंग कुछ खास होता है। पंचायत वाली पेड़ के नीचे 4-5 मोटे-मोटे लोग बाल्टी में हरे रंग का खुशबू भरा शरबत बनाते नज़र आएंगे। इस शरबत में दूध की भी एक खास भूमिका होती है। भोले बाबा की नगरी में ये अनोखा शरबत पीजिए और चले जाइए एक अनोखी दुनिया में जहां संसारिक और भौतिक चीजों से मोह भंग हो जाता है। प्रसाद की ताकत आपको सूर्यकिरणों की प्रबलता के साथ नज़र आने लगेगा। बनारस से मन ऊब चुका हो तो वृंदावन आ जाइए। कान्हा की नगरी में गोपियों की होली सबसे मजेदार होती है। बरसाने की लठ्ठमार होली आपने सुनी है। अब इसके रंग का जायका लीजिए। कुछ सुंदर तो कुछ प्राकृतिक रूप से असुंदर महिलाएं ताकत लगाकर या फिर प्यार से बरसाने के पुरुषों पर लाठी से प्रहार करती हैं। कोशिश रहती है कि ना लगे लेकिन अगर किसी पुरुष का चेहरा पहचान लिया जाए मसलन इसी ने किसी समय राह चलते छेड़खानी की थी तो लाठी का निशाना चूक सकता है। फिर होली और खून का रंग एक में मिल जाता है। होली नजदीक आते ही बरसाना में फूलों की होली भी खेली जाती है। अब भला फूलों से मार कौन नहीं खाना चाहता है। लेकिन धूल भरी होली से बचना हर कोई चाहता है। बरसानो में इसे फाग कहा जाता है। इस होली में आसमान धूल से भर जाता है। चारों ओर प्राकृतिक सुंदरता का रंग धूलमय हो जाता है। होली हमारे अगुवा भी खेलते हैं। अगुवा से मेरा मतलब है हमारे वो भाई जो कुछ दिनों पहले हमारे आगे हाथ जोड़कर आए थे। लेकिन हमारे हाथ जोड़ने पर भी हमारे पास नहीं आते। आम भाषा में इन्हे नेता शब्द से संबोधित किया जाता है। हां आपस में ये होली जरूर खेलते हैं। होली के रंगों में इनकी नीतियों का भी मिलन होता है। साथ ही एक दूसरे पर गुलाल लगाकर पांच साल बाद की मित्रता को घनिष्ठ करने की कवायद की जाती है। फिर चाहे दिल मिलें या मिलें, विचार मिलें या ना मिलें, गले जरूर मिलेंगे। इसे दिखावा कहकर इनके नाटक का अपमान हम नहीं करेंगे। लेकिन एक होली इससे भी खास है। ये होली आप देख तो नहीं सकते लेकिन इसके बारे में जान जरूर सकते हैं। कश्मीर घाटी में भी होली खेली जाती है। खाकी रंग पहने, कंधे पर BSF का तमगा लगाए हमारे जवान घाटियों और हिमालय़ की चोटियों पर होली खेलते हैं। यहां लाल रंग ज्यादा प्रचलित है। गुब्बारों की जगह गोलियां चलाई जाती हैं। होली में दिवाली का रंग भी दिखता है। चाहे इस पार से या उस पार से, तोप से निकले गोले धमाका करते हैं। इस होली में जब भी बर्फ पर लाल चादर बिछती है, कहीं ना कहीं मातम ज़रूर होता है फिर चाहे इस पार हो या उस पार हो। लेकिन यहां हम ये नहीं कहतेस, बुरा ना मानो होली है....

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