Tuesday, February 23, 2010

क्या बातचीत से मानेंगे ?




भारत आतंकवाद से प्रभावित है। आतंकवाद देश की सबसे बड़ी समस्या है। रक्षा बजट भी काफी बढ़ा है। देश के विकास में होने वाला खर्च रक्षा के मुकाबले खर्च होने वाली रकम से काफी कम है। विदेशी आतंकवाद से जख्मी भारत को मरहम तो मिल रहा लेकिन माओवाद का दर्द ज़रूर मिला है। पहले से ही घायल ही चिड़िया को जख्मों को कुरेदने की हालत हो गई है हमारी। बिहार, जारखंड, छत्तीसगढ़ और पश्चिम बंगाल को माओवादियों ने 'लाल' रंग से रंग दिया है। माओवादियों ने हजारों लोगों को बघर कर दिया। लेकिन गलती सिर्फ हाथ में बंदूक लेकर कानून तोड़ने वाले माओवादियों की ही नहीं है। आखिर इनके हाथ में बंदूक दी किसने। 'लाल'कुर्सी पर बैठे कछ सफेदपोश आकाओं की मेहरबानी है कि वो हाथ जो कभी खेतों में हल चलाते थे वो हाथों में बंदूक लेकर अपने ही निर्दोष भाईयों का खून बहाते हैं। मिदनापुर के खेतों का रंग हरा से लाल हो गया है। हाल ही में बंगाल के एक गांव में नक्सली हमले की खबर आई। पता चला कि हमले को अंजाम देने वाले 15 साल के कुछ बच्चे थे। जिनके हाथों में किताबें होनी चाहिए थीं वो हाथों में हथियार लेकर अपने साथियों की हत्या कर रहे थे। बच्चो बूढ़े और महिलाएं सभी हाथों में हथियार लेकर घूम रहे हैं। एक सच ये भी है कि नक्सलियों को मारने के बहाने प्रशासनिक कार्रवाई में कई निर्दोषों को सजा मिली। जुल्म इतने हुए कि हल छोड़कर हाथों ने हथियार थाम ही लिए। उन्हे मजबूर किया गया। शिक्षा का अभाव और जुल्म की टूटती सीमा पार करने के बाद शायद अंजाम यही होना था। पहले स्थित ऐसी बन गई कि रास्ता नहीं बचा और उसके बाद उनका अंत ही रास्ता बन गया। नक्सली भी खेल को समझ गए और फिर लड़ाई आर-पार की शुरू हो गई। लडाई का नतीजा हम रोज देख रहे हैं। खबर है कि नक्सलियों ने सीज़फायर का ऐलान किया है। गृहमंत्री ने कई बार नक्सलियों को हथियार रखकर बात करने का प्रस्ताव दिया है। वहीं माओवादियों की ओर से की गई संघर्ष विराम की सशर्त पेशकश पर सरकार ने कहा है कि कोई पूर्व शर्त स्वीकार नहीं करेगी और माओवादियों से कहा कि वे सामने आएं तथा बयान जारी कर हिंसा त्यागने की बात कहें। अब जब बात करने की नौबत आई है तो सरकार ने किसी भी शर्त को जंगलों में छोड़ आने की शर्त रख दी है। जिसने बंदूक उठाने पर मजबूर किया आज वो शर्त ना रखने की शर्त रख रहे हैं। अब शर्त भी सुनिए। माओवादियों ने संघर्ष विराम के लिए सरकार के सामने शर्त रखी है कि वह 72 दिन के लिए उनके खिलाफ अभियान बंद करे और बातचीत में मध्यस्थों को शामिल करे। आखिर बुरा क्या है अगर नक्सली इन 72 दिनों तक अपने हथियारों का मुंह बंद रखें। कमसेकम इन 72 दिनों तक किसी बेकसूर का खून तो नहीं बहेगा। ऑपरेशन ग्रीन हंट जबसे चलाया गया है तबसे नक्सली वारदातों में बढ़ोत्तरी हुई है। हम ये भी नहीं कहते कि नक्सलियों पर कार्रवाई ना हो। खून बहाने वाला हर शख्स अपराधी है। और उसे सज़ा मिलनी चाहिए। गृहमंत्री ने कहा है कि वो सीपीआई (माओवादी) की ओर से एक साधारण और संक्षिप्त सा बयान चाहते हैं जिसमें वो ये कहें कि हम हिंसा छोड़ देंगे और हम बातचीत के लिए तैयार हैं।' चिदंबरम ने कहा है कि वो चाहते हैं कि ये बयान गृह मंत्रालय के नंबर - 01।-23093155 पर फैक्स कर दिया जाए। चिदंबरम जी ने नक्सलियों को रास्ता तो दे दिया है। लेकिन रास्ते रोड़े उन्होने खत्म नहीं किए हैं। ज़रूरत है कि नक्सलियों को शिक्षा दी जाए। उन्हे समाज की मुख्यदारा के साथ जोड़ा जाए। क्योंकि भारत का संविधान हर नागरिक को समान जीवन जीने का अधिकार देता है। और इस अधिकार पर उनका भी हक है। अब इंतजार है नक्सलियों के अगले कदम का। साथ ही सवाल है कि क्या भारत ऑपरेशन ग्रीन हंट को कुछ दिन के लिए रोकेगा। और इंतजार करेगा नक्सलियों के सामने आने का। ताकि नक्सलपीड़ित इलाकों में ज़िंदगी को भय ना हो।

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