


देश के हर राज्य में आपने कुछ लोगों को अपना प्रतिनिधि बनाकर उसे शहर, राज्य और राष्ट्र की सबसे ऊंची अदालतों में भेजा है। ये सोचा था कि हमारे प्रतिनिधि हमारे सुखों का ध्यान रखेंगे। हमारी समस्याओं को सरकार के सामने रखकर उसका समाधान करेंगे। लेकिन पांच साल इंतज़ार करने के बाद हमें मिली तो निराशा। सोचा पांच साल बाद इस प्रतिनिधि को सबक सिखाएंगे। आपने उसे सबक सिखाने के लिए किसी दूसरे दल के नेता को आगे कर दिया। कम से ये तो हमरा तारणहार होगा सोचकर उसे गद्दी दी, लेकिन वो भी हमें भूल गया। साल भर के अंदर ही पचा चला कि चंदा मांगकर चुनाव लड़ने वाले हमारे नेताजी के पास करोड़ों रुपए आ गए हों। मन को ये समझाया कि चलो नेताजी पर धन कुबेर की कृपा हो गई है। लेकिन एक विरोधाभास ने मेरी सोच पर सवाल खड़ा कर दिया कि देश के सभी राज्यों में कभी किसान, तो कभी मजदूर रहे नेताजी आज सोने की लंका बनाने के लिए तैयार हैं। धनकुबेर ने इनका साथ नहीं दिया। लेकिन इन्होने अपने सियासी चाल से अलादीन का वो चिराग हासिल कर लिया जिसके बलबूते वो सबके सामने हमारी खून-पसीने की गाढ़ी कमाई लूट लेते हैं। लेकिन हम कुछ नहीं कह सकते। फिर चाहे लाख 'कोड़ा' ही क्यों ना मार लो, होगा कुछ नहीं। लेकिन आपके सामने मेरा मुद्दा ये नहीं कि नेताजी चोर हो गए। कहना ये है कि अब चोरी के साथ नेताजी ने गुंडागर्दी शुरू कर दी। आपको की लूटेंगे और अगर आपने आवाज़ उठाई तो आपकी जान के लाले पड़ जाएंगे। अब महाराष्ट्र की सियासत का रुख करते हैं। महाराष्ट्र की क्षेत्रीय पार्टी है 'शिवसेना'। लेकिन अब इस पार्टी से सारा देश परिचित है। इसलिए नहीं कि आजादी से पहले कांग्रेस की तरह इन्होने भी अपने देश या फिर अपने राज्य के लिए कोई बलिदान दिया हो या कोई समाजसेवी काम किया हो। 60 के दशक में शिवसेना अस्तित्व में आई अपने तीखे तेवर के चलते। और आज उसका अस्तित्व है तो सिर्फ इसलिए क्योंकि उनका नया धंधा है लोगों को मारना-पीटना। 80 के दशक में उन्होने महाराष्ट्र में लोगों को एक दूसरे का दुश्मन बना दिया। जिस महाराष्ट्र में पहले एक उत्तर और दूसरा दक्षिण का आया एक साथ क कंपनी में काम करते थे, खाना खाते थे। इस शिवसेना ने उनमें दरार डाल दी। यानि अंग्रेजों की नीति को अपनाकर इन्हे सत्ता मिली। महाराष्ट्र के स्थानीय लोगों के कान में ये भरा गया कि परप्रांतीय उनका हक छीन रहे हैं। उनकी नौकरियां, उनकी रोजी-रोटी पर कब्ज़ा कर रहे हैं। राज्या में शिक्षा का स्तर आज के मुकाबले बेहद कम था। लोग आज के मुकाबले कम जागृक थे। शिवसेना के बहलावे-फुसलावे में आकर उन्होने अपने भाइयों को अपना दुश्मन मान लिया। बाबा साहब अंबेडकर के कानून ने हर शख्स को ये अधिकार दिया है कि वो देश के किसी भी कोने में अपनी जीविका चला सकता है। लेकिन शिवसेना ने इस कानून को दरकिनार कर अपना नया कानून बनाया। इस कानून के मुताबिक सिर्फ मराठियों को मुंबई में रहने का अधिकार था। शिवसेना को सबसे ज्यादा चिढ़ उत्तरभारतीयों से रही। या यूं कहें कि परप्रांतीय शब्द उन्होने केवल उत्तरभारतीयों के लिए ही बनाया था। क्योंकि आज भी महाराष्ट्र में किसी और राज्य के लोगों के खिलाफ शिवसेना ने अपना मोर्चा नहीं खोला है। बरगलाए मराठियों ने उत्तरभारतीयों को मारना-पीटना जो शुरू किया तो आज तक सिलसिला नहीं थमा। कई सरकारें बदल गईं लेकिन सिलसिला चलता रहा। वक्त के साथ लोग नींद से जागे। हक़ीकत को पहचानने लगे। जनता को जगाने का सबसे बड़ा काम किया मीडिया ने। एक के बाद कई नेताओं के कारनामों का पर्दाफाश होने के बाद खादी के अंदर छिपे गीदड़ों को डर लगने लगा। मीडिया ने महाराष्ट्र में मार-पीट के सिलसिले को खत्म करने की ठानी। मराठियों को ये समझाया कि घर बैठे नौकरी नहीं मिलती। अगर उत्तरभारतीय महाराष्ट्र में नौकरी करना छोड़ दें तो क्या उनके अंदर मेहनत कर करियक बनाने की क्षमता रह पाएगी। राज्य में कई असामाजित तत्व भी इन नेताओं की शरण में आए। क्यों क्योंकि खादी की शरण में आकर उनके गुनाह छिप जाते हैं। लोग जब जागे तो सत्ता का लंबे अरसे तक स्वाद भोग चुकी शिवसेना राज्य में हाल ही में हुए चुनाव में बुरी तरह हारी। महाराष्ट्र की जनता ने शिवसेना को ये अहसास करा दिया कि अब वो हिंदू-मुस्लिम के नाम पर लड़ने की बजाय अपने परिवार को अच्छी परवरिश देने की कोशिश करेंगे। वक्त के साथ कदम मिलाकर चलने की राह में नई पीढ़ी भी राजनीति में कूद पड़ी, नतीजा धोती वाले बूढ़े नेताजी को चिंता हो गई कि अब वो अपनी जेब कैसे भरेंगे। बहरहाल इस नए युग को बनाने में सबसे बड़ा हाथ रहा मीडिया का। सियासत को पलट देने वाली ताकत रखने वाली मीडिया से खार खाकर शिवसेना ने अपना अपना गुस्सा मीडिया पर भी उतारना शुरू कर दिया है। दिया भले कितने ही गहन अंधेरे में हो, उसकी लौ उजाला तो करेगी ही। लेकिन शिवसेना से आसामाजिक पार्टिया नहीं चाहतीं कि जनता जागे जिससे उनका सिक्का चलता रहे। लेकिन वक्त बदल चुका है। शिवसेना की ही गोद से निकली एक और पार्टी ने मैं मराठी- मैं मराठी का झंडा लेकर महाराष्ट्र में नया बवाल शुरू कर दिया है। भाषा और राज्य के नाम पर भेदभाव करने और विकृत मानसिकता वाली इस दूसरी असामाजिक पार्टी का नाम है महाराष्ट्र नव निर्माण सेना। राज्य के बेरोजगार युवाओं को करियर बनाने के लिए जमकर मेहनत करने की सलाह देने के बजाय इस सेना पार्टी के मुखिया राज ठाकरे कहते हैं कि उत्तरभारतीयों को भगाओं, तभी तुम्हारा घर चलेगा। शिक्षा से मुंह चुराने वाले, आपराधिक छवि वाले जैसे कुछ युवा राज ठाकरे की इस मुहिम में शामिल हो चुके हैं। लेकिन आज वो ये नहीं जानते कि सियासत में गंदा खेल खेलने वालों को अब ज्यादा दिन आराम नहीं मिलता। इससे पहले वक्त निकल जाए, कुछ ऐसा करें ताकि उनका देश, उनका राज्य उनके साथ विकसित हो। बहरहाल मीडिया पर हल्ला करके शिवसेना ने अपने हार की भड़ास निकाली। शिवसेना के हार के पीछ सबसे अहम किरदार मीडिया ने निभाया। पार्टी अपने अंत पे है और बुझने से पहले फड़फड़ा रही है। लेकिन इस काले धुंए वाले दिए की जगह एक और दिए ने ले ली है।
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