Friday, November 20, 2009

चलो मेला देखें




बचपन में मेला देखने गया था। पिताजी की उंगली पकड़र गांव के किनारे पर दशहरा का बड़ा मेला लगा था। उस उम्र में शायद वही मेला बड़ा लगता था। मेला चूंकि दशहरा का था इसलिए रावण का पुतला जलाने की तैयारी थी। मैं डरने लगा लेकिन मेरे पिता को भला ये कैसे मंज़ूर हो कि उनका लाल, उनके घर का चश्मोचिराग डर जाए, और वो भी एक पुतले से। पितजी ने मुझे समझाया कि ये पुतला है इससे डरते नहीं। मेरे मंद बुद्धिपटल पर उन्होने रावण और रामायण से जुड़ा सारा ज्ञान उड़ेल दिया। लेकिन मेरा ध्यान तो आम के पेड़ के नीचे लगी दुकान में छन रहे ताज़ा-ताज़ जलेबियों पर था। मेले में गुब्बारे में भी मुझे रिझा रहे थे। बांसुरी वाला मुझे देखकर और भी तेज सुर छेड़ता जैसे मां सरस्वसी से ज़बरन चिल्लाने को कह रहा हो। मेरे हठ पर पिताजी ने मुझे गरमा-गरम जलेबियां चखाईं। अब हठ से अगर जलेबी मिल सकती है को बांसुरी क्यों नहीं। बस मेरे हठ ने मेरी संगीत पिपासा पूरी कर दी। शाम हुई मेला खत्म हो गया। रात में दादी के पास रजाई में लिपटते ही सवाल उठाया कि अगला मेता कब आएगा। सवाल सुनकर दादी कुछ पल सोचने लगी, जैसे किसी पार्टी के नेता गन्ने की कीमत को लेकर संसद में हो हल्ला कैसे किया जाए इस पर विचार करते हैं। दादी ने कहा कि जल्दी ही आएगा। मेले कई आए लेकिन गांव छोड़ने के बाद मुझे मेले की वो जलेबियां दोबारा नसीब नहीं हुईं। हालांकि शहर में आने के बाद मुझे जलेबिया ज़रूर दिखाई दीं, लकेनि मेरे हठ के बावजूद पिताजी ने मुझे ये कहकर जलेबियां खाने से इनकार कर दिया कि 'इसमें मिलावट है। इसको खाने से बीमार हो जाओगे' क्या गांव की वही मीठी जलेबी शहर में ज़हर हो जाती है। खैर उसके बाद मैने न कभी जलेबी खाने की हठ की और ना ही कभी बांसुरी लाने की। जानता था कि अब मैं उस पार्टी की तरह हो गया हूं चो चुनाव में अपनी ज़मानत तक नहीं बाचा पाया है। हारकर सत्ताधीश पिताजी की शरण में रहने लगा। साल पर साल बीत गए। एक दिन मेरे कानों में फिर वही शब्द सुनाई पड़ा 'मेला'... इस मेले से नई पीढ़ी बखूबी परिचित हैं। अगर आप दिल्ली में रहते हैं तो ज़रूर आपने ये मेला देखा होगा। दिल्ली में लगे अंतरराष्ट्रीय मेले का नाम सुनते ही मैं फिर रोमांचित हो गया। अब मैं अपने पैरों पर खड़ा हो गया हूं। अब पिताजी से सबकुछ पूछने कहने की ज़रूरत नहीं पड़ती। जैसे चुनाव में बहमत मिल गया हो। आखिरकार सालों बाद मन में बचपन के मेले की धुंधली यादें लिए हुए मैं मेले में जा पहुंचा। मेले की विशालता देखकर एक पल तो लगा कि जैसे संगमनगर में लगनेवाले महाकुंभ में आ गए हों। मेरे बचपन के मेले और इस मेले में तुलना की ही नहीं जा सकती, क्योंकि तुलना के लिए शब्द नहीं होंगे। मेला का रूप बदल चुका था। यूं कहें कि मेला 'सोफेस्टिकेटेड' हे गया था। कोट टाई वाले लाट साहब हैंगर में लटके कपड़े की तरह दिखने वाले मेमसाहब की बाहों में बाहें डाले मेले की लुत्फ उठाने आए थे। अब अंदर का हाल सुनिए। अंदर एक अलग ही दुनिया थी। मानो अपनी आकाशगंगा छोड़कर किसी और आकाशगंगा में आ गए हों। लेकिन चारों ओर मुझ जैसे दिखने वाले मानव ही थे इसलिए ये मान लिया कि मैं अपने ही ग्रह पर हूं। दुकान पर सामान लेने गया हूं। महीने की शुरूआत में शॉपिंग मॉल का भी लुत्फ भी उठा लेता हूं। लेकिन यहां तो दुकानों का रंग कुछ और ही था। ज़रूरत की लगभग सारी चीज़ें इस मेले से नदारद थीं। कुछएक दिखीं भी तो वो रोटी, कपड़ा और मकान जैसी बुनियादी चीज़ों की फेहरित्स से कोसों दूर थीं। लेकिन इस मेले हर ग़ैरज़रूरी चीज ज़रूरत का आभास करा रही थी। उस आभास पर मेरी जेब साथ देने के लिए तैयार नहीं थी। ब इन चीज़ों के दाम तो पूछ ही सकता था। दाम पूछा तो उन तमाम खबरिया चैनलों के पत्रकारों को कोसने का मन हुआ जो महंगाई का मुद्दा लेकर सरकार की टांग खींचते हैं। ज़रा इस मेले में आकर तो देखिए, कैसे लाखों रुपए खर्च किए जाते हैं। मैंने कई उन लोगों को भी देखा जो घर से तो आए थे मेला देखने लेकिन हाथ में ले जा रहे थे, गुलदस्ते। कीमत हज़ारों रुपए और दलील ये कि इसे फलां देश की स्टॉल से खरीदा गया था। वहीं ये कहने वालों की भी सुनी कि ये सामान इसी देश की गलियों में मजदूरों का खून चूसकर बनाया जाता है। और दाम आधे से भी कम। अब इस विरोधाभास पर क्यों अपना दिमाग लगाऊं। आखिर मेला खत्म हुआ। और पूरी हो गई मेरी मेला देखने की रही-सही हसरत....

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