


क्या आपने कभी किताब लिखी है। अगर नहीं तो ज़रूर लिखिए। किताब का विषय कुछ भी रख लीजिए, वो मायने नहीं रखता। लेकिन हां किताब बिकने के जो सबसे ज्यादा ज़रूरी है उसके बारे में आपको बता देता हूं। किताब को बिक्री बढ़ाने के लिए आपको उसमें किसी बड़ी हस्ती का नाम लेना होगा। उसके साथ जुड़े विवादों को भले ही ना लिखें लेकिन कुछ ना कुछ विवादास्पद ज़रूर लिखें। विवाद बड़ा रहा तो आपका नाम होगा। लेकिन देश की बड़ी पार्टियों के बड़े नेताओं को किस नाम की चाह है। खबरों से ताल्लुक रखने वाले तमाम लोगों को पता है कि बीजेपी के वरिष्ठ नेता जसवंत सिंह ने एक किताब लिखी है। इस किताब में उन्होने मुस्लिम लीग के नेता मुहम्मद अली जिन्ना की जमकर तारीफ की है। पाकिस्तान के साथ भारत के करीबी रिश्ते बीजेपी को कभी रास नहीं आएंगे। लेकिन एक पाकिस्तानी नेता की नेक छवि का गुणगान करके जसवंत सिंह ने एक नए विवाद को जन्म ज़रूर दिया है। जसवंत की किताब 'जिन्ना - इंडिया, पार्टिशन, इंडिपेंडंस' जनता के सामने है। किताब जैसे-जैसे फैलेगी, विवाद भी बढ़ता जाएगा। कांग्रेस को चारा मिलेगा बीजेपी का नंगा करने का। वहीं बीजेपी भी सेक्युलर छवि दिखाने की बात कहकर मामले से पल्ला झाड़ सकती है। लेकिन तबतक मचे हंगामे से मिली प्रसिद्धि जसवंत सिंह की पिपासा ज़रूर शांत कर देगी। जिन्ना का जिन्न पहली बार नहीं निकला है। एनडीए के शासनकाल में उपप्रधानमंत्री लालकृष्ण आडवाणी पाकिस्तान गए थे। आडवाणी ने जिन्ना को एक सेक्युलर नेता बताया था। जबकि सारा हिंदुस्तान जानता है कि देश के दो टुकड़े करने के लिए जिन्ना ने ही सियासत शुरू की थी। आडवाणी के बयान पर देश भर में होहल्ला हुआ। आडवाणी ने सफाई भी दी लेकिन उनकी सफाई किसी काम में नहीं आई। बीजेपी के असंतुष्ट नेता चाहते क्या हैं, ये शायद उन्हे भी नहीं मालूम। हिंदुत्व का नारा लेकर चुनावी मैदान में उतरी बीजेपी को वो झटका लगा जो शायद आनेवाले कई सालों तक पार्टी के लिए नासूर बनकर रह जाएगा। वक्त है जागने का। वक्त है आगे बढ़ने का। वक्त है विकास का। नई पीढ़ी किसी धर्म, किसी मज़हब से बैर नहीं रखती। हर मज़हब के साथ वो कंधे से कंधा मिलाकर आगे बढ़ना चाहते हैं। ऐसे में बीजेपी की संकुचित सोच क्या उन्हे कभी सत्ता में वापस ला पाएगी ? जवाब शायद ना में मिले। जसवंत सिंह ने अपनी बहुचर्चित किताब में लिखा है कि बंटवारे का ज़ख्म देश को जिन्ना ने नहीं, बल्कि नेहरू ने दिया था। जसवंत ने लिखा है कि देश का बंटवारा नेहरू की केंद्रीयकृत राजनीति की वजह से हुआ था। जसवंत ने अपने एक इंटरव्यू में कहा कि जिन्ना एक महान व्यक्ति थे। एक सवाल पर जसवंत सिंह ने कहा,'हां मैं बिल्कुल मानता हूं क्योंकि उन्होंने कुछ ना में से एक चीज बनाई थी और वो खुद को नापसंद करने वाली कांग्रेस पार्टी व अंग्रेजी शासन के खिलाफ अपने दम पर खड़े हुए। गांधी जी ने खुद भी जिन्ना को महान भारतीय कहा था, तो हम उन्हें यह दर्जा क्यों नहीं देते? हम यह क्यों नहीं समझते कि महात्मा गांधी ने ऐसा क्यों कहा था।' पूर्व विदेशमंत्री रह चुके जसवंत सिंह ने पाकिस्तान के खिलाफ अपनी विदेश नीति में कहीं भी कोई कड़ा रुख नहीं इख्तेयार किया। जिन्ना पर जसवंत का लेख पार्टी के लिए खतरनाक हो सकता है। खासकर ऐसे में जब पार्टी पहले ही अंत:कलह से जूझ रही है। बीजेपी के पास शायद सच्चर कमेटी का बहाना है। मुसलमानों को रिजर्वेशन के मामले को लेकर बीजेपी कांग्रेस से लड़ तो सकती है। लेकिन इस किताब का क्या, जिसने इस देश के गुनहगार को देवता है आज़ादी के महानायक को राक्षस बना दिया।
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