
हाल में हमने अपनी आज़ादी की साल गिरह मनाई है। लेकिन जश्न के इस माहौल में कहीं मातम भी है। कर्नाटक के एक कालेज में एक मुस्लिम लड़की के बुर्का पहनने को लेकर बखेड़ा खड़ा हो गया है। कालेज ने लड़की को बुर्का पहन कर कक्षा में आने से मना कर दिया। पाखंड़ियों के ढोंग का शिकार बनी लड़की अब कॉलेज नहीं जा रही है। इस लड़की की मानें तो कॉलेज प्रबंधन के एक अधिकारी ने उससे कहा है अगर वो बुरका पहनकर आएगी तो वो खुद भी भगवा स्कार्फ बांध कर कालेज आने लगेगा। इस लड़की का कॉलेज जाना बंद हो गया। महज इसलिए कि वो बुर्का पहनती है। अपने मजहब का पालन करना देश के संविधान में ग़ैरकानूनी तो नहीं है। फिर किस कानून के तहत उसे कॉलेज जाने से रोका गया ? तालिबान सिर्फ पाकिस्तान और अफगानिस्तान में ही हैं इस बात को अब हम कैसे मानें। क्या इस लड़की के गुनाहगार देश के तालिबानी नहीं हैं। ऐसे फरमानों को तालिबानी ना भी कहें तो कॉलेज प्रशासन के उस अधिकारी की बात पर मुझे आपत्ति है। बुर्का एक लिबास है। और अगर एक लड़की अपना लिबास पहनकर कॉलेज आ रही है तो उस पर रोक क्यों ? उस अधिकारी की बात का क्या जवाब है जिसमें उसने कहा कि अगर तुम बुर्का पहनकर आओगी तो मैं भगवा बांधकर आउंगा। तो क्या अब कपड़ों को लेकर भी धर्मांध लोग आपसी जंग चाहते हैं। भगवा शांति का प्रतीक है। लेकिन यहां उसके बात कहने का तरीका किस ओर इशारा करता है ये आप भी समझ सकते हैं। ये घटना देश के उस भाग में हुई है जहां साक्षरता की दर सबसे ज्यादा है। दक्षिण भारत में हुई ये घटना नई नहीं है। मसलन यूपी के कुछ कॉलेजों में महीनों पहले लड़कियों के जींस और टीशर्ट पहनने पर रोक लगा दी गई थी। स्कूल की महिला शिक्षकों को भी स्लीवलेस पहनने के लिए मना कर दिया गया था। कॉलेज का तर्क था कि इससे छेड़-छाड़ की घटनाओं पर रोक लगाने में मदद मिलेगी। यानि लड़कियां जींस ना पहनें तो उनके साथ बलात्कार जैसी घटनाएं नहीं होंगी। इस तर्क पर कोई गणित सही नहीं बैठता। समाज में महिलाओं की रक्षा की ज़िम्मेदारी उठाने के बजाय उनके कपड़ों पर बैन लगाना कहीं भी जायज नहीं है। देश आज़ाद है और हर शख्स एक सीमित दायरे में अपनी आज़ादी का इस्तेमाल कर सकता है। समाज का पाखंड महिलाओं पर सदियों से भारी रहा है। वक्त हैइन पाखंडियों को सही तर्क से रूबरू कराने का। वक्त है उन्हे ये दिखाने का, कि दुनिया में महिलाओं का बोलबाला है। और हम हैं कि 21वीं सदी में अभी भी उन तर्कों में उलझे हैं जिसकी प्रासंगिकता कभी थी ही नहीं और ना ही कभी होगी।
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