


कोसी...बिहार की जीवनदायिनी नदी। कोसी ने बिहार के पूतों को अपनी गोद में पाला पोसा। कोसी के अमृतमयी जल से बिहार के खेत लहलहाए। सालों बिहार का लालन-पालन करने वाली कोसी अचनाक अपने बच्चों से क्यों नाराज़ हो गई ?
साल 2008 बिहार के लोग कभी भी भूल नहीं सकते। इसी साल कोसी मैया अपने बच्चों से इतनी खफ़ा हुईं कि चारों ओर वो तांचव मचाया, जिसका खौफ बिहार के लोगों के जेहन में आज भी है। कोसी मैया के प्रकोप ने कई लोगों को काल के मुंह में भेज दिया। कोसी के कहर को एक साल हो चुके हैं। उस भयानक तबाही के एक साल बाद भी हादसे के शिकार लोगों की हालत बद से बत्तर है। जब बाढ़ आई तो सरकारी मदद पहुंची। लेकिन मदद सिर्फ कागज़ों में ही दिखी। करोड़ों रुपए लोगों की मदद के लिए खर्च किए गए। ये बातें भी सरकारी फाइलों में लिखी हैं। लेकिन अगर हकीकत देखनी है तो कोसी के आस-पास बसने वाले लोगों से मिलिए। सारे दावों पर पड़ी धूल खुद-बखुद हट जाएगी। मैंने सुना है, उन लोगों की ज़बानी जो बाढ़ पीड़ितों की मदद के लिए गए थे। मैंने सुना कैसे, राहत शिविरों में सवर्णों और दलितों के साथ भेदभाव किया जाता था। मैंने सुना, किस तरह दलितों को खाने में खिचड़ी और चावल का मांड़ दिया जाता था, जबकि ब्राह्मणों को चावल,दाल,रोटी सब्ज़ी दी जाती थी। बाढ़ ने गरीबों को और गरीब बना दिया जबकि जो रसूखदार थे वो आज गरीबों का हक मारकर ऐश कर रहे हैं। एक कमेटी ने सरकार को रिपोर्ट सौंपी जिसमें लिखा था कि सवर्णों ने दलितों और गरीबों की ज़मीन पर अपना कब्ज़ा कर लिया है। तबाही के बाद राहत मिली सिर्फ उन्हे जो छीनना जानते थे। जिन्हे मदद की वास्तव में ज़रूरत थी वो बेचारे आज भी मदद की राह देख रहे हैं। केंद्र सरकार ने बाढ़ पीड़ितों की मदद के लिए राहत फंड भेजा, लेकिन वो लोगों तक पहुंचने के पहले ही कई लोगों की जेबें भरने में खत्म हो गया। कोसी के किनारे रहने वाले आज भी कोसी की धारा को देखकर सहम जाते हैं। ज़रा सी बरसात भी इन लोगों में डर पैदा कर देती है। कोसी की धारा में पले-भड़े कोसी के लाल आज अपनी उस मां को देखकर डर जाते हैं। नेपाल में पैदा हुई कोसी इठला-इठला कर भारत में आती है। बिहार के लोगों को जीवन देती है। लेकिन अब कोसी मैया की गोद में उठी छोटी सी लहर भी डरावनी लगती है। नेपाल में कोसी पर डैम बनाए जाने की योजना है। लगभग 8000 करोड़ रुपए लगाकर कोसी के कहर को रोकने की कोशिश की जानी है। लेकिन ये तमाम योजनाएं अभी कागज़ों में हैं। खद्दवालों को इंतज़ार है पैसों के सरकारी खजाने से निकलने का। वहीं कोसी के लाल इंतज़ार कर रहे हैं तिनके के सहारे का। सहारा अब तक नहीं मिला इसलिए आसमान में आंख उठाए भगवान से प्रार्थना कर रहे हैं कि हे परमेश्वर अब मत बरसना। इंद्र देवता ने कोसी के लालों की फरियाद सुन ली। इस साल पानी नहीं बरसा। कोसी के लाल एक और कहर से तो बच गए लेकिन धरती के कई सपूत सूखे खेतों में बैठे बरसने की गुहर कर रहे हैं। अब भगवान भी कशमकश मे हैं। आखिर करें ते क्या करें...
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