Thursday, August 6, 2009

'हड़ताल है हड़ताल'




चारों ओर हड़ताल हो रही है। कहीं बस ड्राइवर हड़ताल पर हैं। तो कहीं डॉक्टर हड़ताल पर हैं। कहीं टीचर हड़ताल पर हैं तो कहीं बैंक कर्मचारी हड़ताल पर हैं। हर ओर है हड़ताल, हर जगह है हड़ताल। ताजा उदाहरण है हड़ताल पर गए देश भर के बैंकों के 10 लाख कर्मचारी। बैंकों की हड़ताल है। काम-धंधा ठप्प पड़ा है। व्यापारी परेशान हैं तो आम लोग दिक्कतें झेल रही हैं। किसी की सैलरी आनी है तो किसी को इंस्टालमेंट भरनी है। किसी को बेटी के लिए पैसा भेजना है तो किसी को मां की दवाई के लिए पैसा भेजना है। लेकिन है तो हड़ताल। बैंक बंद हैं, काम कैसे होगा ? क्या हड़ताल ही समस्या का समाधान है ? ये सवाल हर वो आम आदमी पूछता है जो हड़ताल का खामियाजा भरता है। बसों की हड़ताल हुई तो सड़कों की रफ्तार रुक जाती है। मंज़िल पर जाने के लिए खड़ा आम आदमी अपना मन मसोस कर रहा जाता है। हड़ताल से हासिल भले ही कुछ ना हो, लेकिन हड़ताल होती ज़रू है। टीचरों को तनख्वाह बढ़वानी है तो हड़ताल होती है। भले ही नुकसान बच्चों के भविष्य का हो। लेकिन हड़ताल तो होनी है। डॉक्टरों को पैसा बढ़वाना है तो हड़ताल होगी। लाखों मरीज अस्पतालों के बाहर इलाज के इंतजार में पड़े रहते हैं। कई मरीज इलाज के बिना दम तोड़ देते हैं। उनकी लाशें सवाल पूछती हैं। आखिर मेरा क्या कसूर था ? डॉक्टरों के पास जवाब है ना! भई हमें भी तो पैसा चाहिए। फिर चाहे आपकी जान ही क्यों ना जाए। भगवान का दर्ज भले ही हमें मिला है तो क्या, पैसे से बड़ा भगवान कोई नहीं है। मरी हुई मां की लाश गांव में इंतज़ार कर रही है। बेटा आएगा तो शरीर को आग मिल पाएगी। गरीब बेटा दूर शहर में आंसू बहा रहा है क्योंकि ट्रेनों की हड़ताल है। मां की लाश तो इंतजार कर सकती है। लेकिन रेलवे कर्मचारियों का भत्ता नहीं बढ़ाया गया तो धरती फट जाएगी। इस हकीकत से हम सब वाकिफ हैं। मैं तारीफ करता हूं सरकार की जिसने कुछ महीनों पहले तेल कंपनियों और पेट्रोल पंप मालिकों की हड़ताल पर सख्त रवैया अपनाते हुए उन्हे कदम पीछे लेने पर मजबूर कर दिया। सरकार ने हड़तालियों को गिरफ्तार करने तक के आदेश दे दिए। मरते क्या ना करते। हड़ताल खत्म हुई और ज़िंदगी पटरी पर लौट गई। ट्रांसपोर्टरों ने हड़ताल की। महंगाई आसमान पर पहुंच गईं। रोजमर्रा की चीजें जेब पर भारी पड़ने लगीं। दिल्ली में सरकार ने कड़ा रुख इख्तियार किया। हड़तालियों पर लगाया एस्मा। ट्रकों का रजिस्ट्रेशन रद्द कर दिया। देखिए ना, हड़ताल तुरंत खत्म हो गई। यानि ये समझ में आ गया कि हड़ताल से लड़ना है तो हड़तालियों की ना सुनी जाए। एक बार सुनी तो अगली हड़ताल के लिए तैयार रहिए। तैयार रहिए तकलीफों का बोझ सहने के लिए। अब वक्त है हड़ताल जैसे देशद्रोह से लड़ने का। देश की अर्थव्यवस्था को खोखला करते हड़तालियों के खिलाफ सख्त कदम ही इसका इलाज है। ये हड़ताल अब ना हो, यही मेरी हसरत है।

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