


15वीं लोकसभा बखूबी अपना कम कर रही है। यूपीए ने सांसदों को 100 days का टारगेट दे रखा है। टारगेट पूरा हुआ तो पार्टी में जगह और मजबूत होगी। इसलिए हर कोई अपनी ड्यूटी बजा रहा है। मसला ये नहीं है। मुझे बात करनी है इस 100 दिनों में शामिल सबसे बड़े टारगेट की। और वो है देश का विकास। लोकसभा में आए दिन हंगामा हो रहा है। कभी अनिल अंबानी के दादरी प्रोजेक्ट को लेकर तो कभी सरकार की विदेश नीति को लेकर। विपक्ष में बैठी भारतीय जनता पार्टी ने चुनावों में खूब दावा किया, 'सत्ता में आए तो देश के विकास के लिए ना जाने क्या-क्या करेंगे...आज वो विकास दिख रहा है बुंदेलखंड में। वो विकास दिख रहा है उन गांवों में जहां एक जून की रोटी नसीब नहीं हो रही है। देश की 60 फीसदी आबादी खेती पर निर्भर है। देश की अर्थ व्यवस्था खेती पर चल रही है। लेकिन देश के नेता हैं कि इस ओर देखने से कतरा रहे हैं। माना राज्यों की विधानसभाओं में मुद्दा उठता रहा है। लेकिन क्या लोकसभा के लिए ये मुद्दा अहम नहीं है। नरेगा के लिए केंद्र हजारों करोड़ रुपए दे रहा है। लेकिन वो पैसे कहां जा रहे हैं है कोई इसका जवाब देने वाला ? आज वक्त इतना भी नहीं है कि इन सवालों का जवाब मांगा जाए। हालात इतने बिगड़े हैं लेकिन सुध लेने वाला कोई नहीं है। लोकसभा में मंगलवार को मुद्दा गूंजा वो था हाफिज सईद को लेकर। माना आतंकवाद देश की बड़ी समस्या है। लेकिन हमारे देश की अंदरूनी समस्या से भी ज्यादा। देश की सरकार विदेश नीति पर काम कर रही है। मुलायम सिंह ने केंद्र सरकार को आड़े हाथों लिया। हाफिज सईद पर पाकिस्तान में मुकदमा चल रहा है। दुनिया जानती है कि ये महज़ एक ड्रामा है। पाक ने भारत की अबतक ना सुनी तो अब क्या सुनेगा। पाक ने तो कसम खा रखी है कि अगर भारत ने कुछ कहा तो वो नहीं सुनना है। लेकिन हां अगर अमेरिका का डंडा चला तो बात कुछ बन सकती है। अमेरिकी पैसों से उसने अपनी ताकत खड़ी की है। माना विदेश नीति बनने में सालों लगते हैं। तो क्या सालों तक लोकसभा का कीमती वक्त केवल सरकार को घेरने में लगा दिया जाए। इस सरकार से पूछने के लिए सवाल और भी हैं। मैं तारीफ करता हूं सरकार के उस कदम का जिसमें उन्होने मासूम बच्चों के लिए मुफ्त शिक्षा का विधेयक पास करवाया। देश के विकास के लिए ये एक महत्वपूर्ण प्रयास है। सारा देश महंगाई की मार से घायल है। महंगाई दर के सरकारी और कागजी आंकड़ों पर नज़र डालें तो दिल करता है कि खाने पर बस टूट पड़ों क्योंकि इससे सस्ता कभी नहीं मिलेगा। लेकिन हकीकत में एक जून की थाली की कीमत कमर तोड़ रही है। इस महंगाई के अलावा आज देश सूखे से जूझ रहा है। अनाज की कमी है। दालों की कीमत आसमान पर है। इस सूखे के लिए केंद्र सरकार राहत पैकेज भी दे रही है। लेकिन इस पैकेज से कितनों को राहत मिलेगी क्या है कोई इसका जवाब देने वाला? उत्तरप्रदेश में अनाज का भंडार पैदा होता है। लेकिन इस बार सूखे की चपेट में हैं यूपी के 47 ज़िले। लेकिन ये सिर्फ कागज़ी आंकड़े हैं। हकीकत में ये संख्या कुछ ज़्यादा है। यूपी की मुख्यमत्री ने कहा है कि वो सूखे से निपटेंगी। लेकिन क्या आप विश्वास करते हैं माया की ज़बान पर ? मायावती की जान अटकी है लखनऊ के अंबेडकर पार्क पर। साढ़े चार सौ करोड़ से भी ज्यादा की रकम पानी की तरह इस पार्क में बहाई गई है। वो भी सिर्फ अपनी साख बचाने के लिए। पार्क में मायावती अपनी मूर्तियां लगवाने में व्यस्त हैं। उन्हे कहां सुध है सूखे की मार झेल रहे लोगों की। हां जो थोड़ा वक्त मिला उसमें उन्होने 11 करोड़ का हैलिकॉप्टर खरीदने का मन बनाया। शायद इस हेलिकॉप्टर से माया देख सकें कि सूखे खेतों में कितने लोगों का भविष्य धूल के साथ उड़ रहा है। किसानों पर पहले ही कर्ज का बोझ है। इस बोझ से टूटती कमर पर सूखे का वज़न भी गिरा है। क्या सरकार एक और विदर्भ कांड का इंतज़ार कर रही है। मैं सरकार और सरकारी नीति के खिलाफ नहीं हूं। मैं बस ये कहा रहा हूं कि देश के विकास की जड़ को मजबूत किए बिना कोई भी नीति कारगर नहीं हो सकती। बुंदेलखंड को राहत देने के लिए कांग्रेस के युवराज राहुल गांधी परेशान हैं। लेकिन क्या बुंदेलखंड में 100 लोगों को भी राहत मिला। लोगों की गाढ़ी कमाई केंद्र सरकार ने दे तो दी लेकिन वो पैसा कहां है इसका जवाब भी किसी के पास नहीं है। मैं तो बस उस बेबसी पर रो रहा हूं जब एक मां अपने बच्चे को दो के बाद तीसरी रोटी नहीं देती क्योंकि उसका दूसरा बेटा भूखा रह जाएगा। इस हालात में हम चर्चा कर रहे हैं विदेश नीति की। खेती की ज़मीनों को बड़े औद्योगिक घराने सरकार पर दबाव डालकर एसईज़ेड में तब्दील करवा रहे हैं। और वक्त आने पर उन ज़मीनों पर बड़े-बड़े मॉल नज़र आते हैं। जिनका इस्तेमाल सिर्फ वो कर सकते हैं जिनका पेट और जेब दोनों भरे हैं। उस मॉल के बाहर खड़ा वो किसान मजबूरी में अपनी ज़मीन की औनी-पौनी कीमत लेकर तकदीर को कोसता है। मैंने वो तस्वीरें देखी हैं जिसमें खेतों में पड़ी दरारों पर एक नंगा बच्चा चल रहा है। इन दरारों में वो अपनी किस्मत खोज रहा है। घर में बैठी बूढ़ी मां आसमान में टकटकी लगाए इंद्रदेव से गुहार कर रही है। वो कहती है कि अब ना बरसे तो मेरे बच्चे भूखे मर जाएंगे। तुमने पेट दिया तो अब रोटी भी दो। क्योंकि वो मां भले ही पढ़ी-लिखी नहीं है लेकिन वो जानती है कि उसकी सुध लेने कोई नहीं आएगा। लेकिन भगवान भी उसपर मेहरबान होने से कतरा रहे हैं। भगवान तो इंसानों से पहले ही नाराज़ हैं। अच्छी-भली फसल जहां भी हुई इंद्र देवता वहीं ज़रूररत से ज्यादा मेहरबान हो जाते हैं। शायद इसकी वजह हम इंसान ही हैं। लेकिन मुद्दा ये भी नहीं है। मुद्दा है उन लोगों की मदद करने का जिन्हे मदद की ज्यादा दरकार है। जितने पैसों में मायावती का एक पार्क बना है,उतनी रकम में तो उत्तरप्रदेश की किस्मत ही बदल जाती। सैंकड़ों अस्पताल, स्कूल बनकर तैयार हो जाते। नरेगा का जितना पैसा भ्रष्टाचार रूपी राक्षस के पेट में गया वो पैसा बेरोगारी के हालात बदलने के लिए पर्याप्त था। फिलहाल सवाल और जवाब के लिए वक्त नहीं है। वक्त है जल्दी से जल्दी जागने का और कई ज़िंदगियों को बचाने का। जो इस उम्मीद में हैं कि कभी तो उनकी हसरत पूरी होगी।
thank you mam
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